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Asthma: अस्थमा में राहत के लिए कारगर है ये थैरपी, जानें इसके बारे में


asthma : बच्चों व बड़ों के अस्थमा में फर्क होता है ?

बच्चों व वयस्कों में अस्थमा एक जैसा ही होता है। दोनों में एलर्जंस (एलर्जी के कारक) के कारण सांस की नली सिकुड़ जाती है और सूजन आ जाती है। ऐसे में बलगम बनने और सांस लेने में दिक्कत होती है।

अस्थमा से जुड़ी गलतफहमी क्या हैं ?
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि बच्चे के बड़े होने पर यह समस्या खत्म हो जाएगी। कुछ को लगता है कि एलर्जंस से दूर रहकर इससे बचा जा सकता है। साथ ही इंहेलर को आखिरी इलाज के तौर पर भी देखते हैं।

स्टेरॉयड को लेकर लोगों में क्या भ्रम है ?
लोगों को लगता है कि इंहेलर में पाए जाने वाले स्टेरॉयड से बच्चे का विकास रुक जाएगा जबकि ये सिर्फ भ्रम है। कॉर्टिकोस्टेरॉयड का बच्चे के विकास से कोई संबंध नहीं है। इंहेलर में मौजूद कॉर्टिकोस्टेरॉयड शरीर में प्राकृतिक रूप से भी बनता है जो सूजन को कम करता है। अस्थमा का समय रहते इलाज न हो तो बच्चे का विकासजरूर प्रभावित हो सकता है।

आईसीएस थैरेपी कैसे कारगर है ?
आईसीएस (इंहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉयड) थैरेपी से काफी कम मात्रा में कॉर्टिकोस्टेरॉयड की डोज सीधे सूजी हुई नलियों में जाती है जिससे राहत मिलती है। ओरल मेडिसिन के मुकाबले इसके परिणाम बेहतर होते हैं साथ ही इससे साइड इफैक्ट्स का खतरा भी काफी कम हो जाता है।

क्या लक्षण न दिखने पर दवा बंद कर दें ?
अक्सर लोग अस्थमा के लक्षण नजर न आने पर दवाइयां लेना छोड़ देते हैं। परिणाम स्वरूप यह बीमारी दोगुने प्रभाव के साथ उभरकर सामने आती है। इसलिए दवा छोड़ने से पहले डॉक्टरी सलाह जरूर लें। बच्चों में यह रोग होने पर अभिभावक इसे नजरअंदाज न करें, एक्सपर्ट से मिलें व कारणों और इलाज की जानकारी लें।


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Nail Chewing Habit: नाखून चबाने की आदत को एेसे छुड़ाएं


nail chewing Habit: Biting Nails: बच्चों में नाखून चबाने की आदत को माता-पिता यह सोचकर नजरअंदाज कर देते हैं कि एक उम्र बाद वह इस आदत को छोड़ देगा। लेकिन ऐसा नहीं है नाखून चबाने के दौरान उसके शरीर में नाखून के जरिए कीटाणु पहुंचते रहते हैं जो संक्रमण, दांतों के घिसने व आगे-पीछे होने का कारण बनते हैं। मेडिकली यह हैबिट डिस्ऑर्डर है। जिसमें आदत के लंबे समय तक बने रहने से छुड़ाना मुश्किल होता है। कारण: इसकी कोई निश्चित वजह नहीं है। कुछेक मामलों में तनाव के कारण भी बच्चा नाखून चबाता है।

ऐसे छुड़ाएं आदत -
यदि बच्चे में यह आदत लंबे समय तक बनी रहे तो तो धीरे-धीरे इस आदत को छुड़वाएं। सबसे पहले माता-पिता जानने की कोशिश करें कि बच्चा किन स्थितियों में नाखून चबाता है जैसे टीवी देखने या खाली बैठने के दौरान। साथ ही उससे बात कर तनाव के कारण को जानें। बार-बार टोकने के बजाय बच्चे को किसी खेल या काम में व्यस्त रखें।


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Heart Problems: इन कारणों से होती है हार्ट की समस्याएं


Heart Problems: bad lifestyle: पचास की उम्र के बाद शरीर का ढलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है। ऐसे में रोग प्रतिरोधक क्षमता तो कमजोर होती ही है साथ ही कई बार खराब जीवनशैली व खानपान परेशानियों को बढ़ाने का काम करता है। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद शरीर में कैल्शियम की कमी बहुत तेजी से होने लगती है जिसके कारण जल्दी हड्डी टूटने की दिक्कत होने की आशंका बढ़ जाती है। जानें इस उम्र में कैसे ध्यान रखें-

रक्त नलिकाएं संकरी : रक्तनलिकाएं संकरी होने के कारण शरीर व ब्रेन में खून का संचार बाधित होता है। इससे हार्ट अटैक व पैरालिसिस का खतरा बढ़ता है। कई बार शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने से सांस संबंधी परेशानी भी हो सकती है। इसके अलावा बीपी, डायबिटीज, मोतियाबिंद, ऑस्टियोपोरोसिस व पुरुषों में प्रोस्टेट के बढऩे की दिक्कत भी आमतौर पर इस उम्र में अधिक होती है।

जीवनशैली बदलें : इन रोगों से बचने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी हैं। इसके लिए रोजाना योग व व्यायाम करें। तनाव कम करने के लिए कोई न कोई मानसिक गतिविधि करें। स्मोकिंग से परहेज करें। बगैर मलाई का 500 एमएल दूध रोजाना पिएं। अधिक तले-भुने व वसायुक्तखाने से परहेज करें। हरी सब्जियां, मौसमी फल व सलाद अधिक से अधिक खाएं। रात के खाने के बाद टहलें।

जांचें जरूरी : एहतियात के तौर पर स्वस्थ व्यक्तिको भी पांच वर्षों के अंतराल पर शुगर, लिपिड प्रोफाइल (कोलेस्ट्रॉल के साथ), ईसीजी, बोन डेंसिटी टैस्ट, महिलाओं को ब्रेस्ट व यूट्रस संबंधी व पुरुषों को प्रोस्टेट से जुड़ी जांचें करानी चाहिए।


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हाई बीपी बढ़ाता ब्रेन स्ट्रोक व किडनी फेल होने का खतरा


समस्या की एक वजह तला-भुना खाना भी
बढ़ता वजन, व्यायाम से दूरी, धूम्रपान और अधिक तला-भुना खाना हाई ब्लड प्रेशर के मुख्य कारण हैं। इसके अलावा पेरेंट्स या परिवार में बीपी के मरीज होने पर फैमिली के सदस्यों में हाई ब्लड प्रेशर होने की 20-25 प्रतिशत आशंका रहती है।
इमरजेंसी यानी सांस फूलना व सीने में दर्द
तेज सिरदर्द, घबराहट महसूस होना, सांस फूलना, चक्कर आना, सीने में दर्द महसूस होना जैसे लक्षण
दिखें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
हाई बीपी आंखों व किडनी को भी करता प्रभावित
बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर कई तरह से शरीर के अंगों पर असर करता है।
हार्ट अटैक : हाई बीपी के कारण लगातार धमनियों के क्षतिग्रस्त होने से हृदय को रक्त पंप करने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। दबाव अधिक होने पर ऐसी स्थिति बनती है।
रोशनी घटना : उच्च रक्तका दबाव रेटिना से जुड़ी धमनियों को क्षतिग्रस्त करता है। इनमें रक्तसंचार बाधित होने के कारण आंखों की रोशनी घटने लगती है। इसे हायपरटेंसिव रेटिनोपैथी कहते हैं।
ब्रेन स्ट्रोक : यह रक्तनलिकाओं को कमजोर करता है। जिससे ये धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। या इनमें किसी तरह का ब्लॉकेज होने पर बे्रन स्ट्रोक की स्थिति बनती है। कई बार ऐसी स्थिति के लंबे समय तक बने रहने और दबाव बढऩे से ये नसें फट जाती हैं जिसे ब्रेन हैमरेज कहते हैं।
किडनी फेल होना : ब्लड वेसल्स के क्षतिग्रस्त होने से किडनी का फिल्टर (ग्लोमेरुलस) कमजोर होने के कारण रक्त साफ नहीं हो पाता। इस कारण शरीर से विषैले तत्त्व बाहर नहीं निकल पाते। ऐसे में किडनी फेल्योर की स्थिति बनती है।
कितना हो ब्लड प्रेशर
सामान्य ब्लड प्रेशर का स्तर 120/80 एमएमएचजी होना चाहिए। 140/90 या इससे अधिक ब्लड प्रेशर को हाई की श्रेणी में रखा जाता है।
कब कराएं टैस्ट
सामान्य लोगों को 30-32 साल की उम्र से बीपी चेक कराना चाहिए। फैमिली हिस्ट्री के साथ में शराब पीने व धूम्रपान की आदत है तो 25 साल की उम्र से जांच जरूर कराएं। कुछ मामलों में बच्चों में बीपी की समस्या हो सकती है। घर में इसे जांचने के लिए डिजिटल बीपी मशीन का प्रयोग कर सकते हैं। मशीन डॉक्टर को जरूर दिखाएं ताकि इसमें जरूरी सेटिंग की जा सके।
सावधानी : दिल खुश तो सब खुश
एक्सरसाइज : रोजाना कम से कम 30 मिनट की कार्डियो एक्सरसाइज करें जैसे ब्रिस्क वॉक, जॉङ्क्षगग, साइक्लिंग, स्वीमिंग व डांस। वॉक में 1 मिनट में 45-50 कदम, ब्रिस्क वॉक में 75-80 कदम, और जॉगिंग में 150-160 कदम चलते हैं। घुटने में दर्द के मरीज कम से कम 1-2 किलोमीटर जरूर पैदल चलें।
ये ध्यान रखें : इस दौरान यदि सांस फूले तो तुरंत रुकें और आराम करें। साथ ही डॉक्टर से सलाह लें।
खुश रहें खुश रहने से दिल के रोगों का खतरा कम होता है। इसलिए तनाव कम करने के लिए पेंटिंग, फोटोग्राफी, गाना सुनना, किताब पढऩा, बच्चों संग खेलना, घूमने जाने जैसी गतिविधियां कर सकते हैं।
खानपान : फाइबर युक्त चीजें (गेहूं, दलिया, ओट्स, ब्राउन राइस, स्प्राउट्स, ज्वार, बाजरा), आयरन (हरी सब्जियां, बींस, ओट्स, अलसी के बीज, शलजम) व ओमेगा-३ (सरसों तेल, बादाम, अखरोट, अलसी के बीज) से भरपूर आहार लें। दिनभर में 10 से 12 गिलास पानी जरूर पिएंं।
इनसे करें परहेज : फास्ट फूड, तली-भुनी चीजें, कोल्ड ड्रिंक्स, मीठी चीजें, सैचुरेटेड फैट (देसी घी, वनस्पति, मक्खन आदि), पैक्ड फूड (अचार, चिप्स आदि), रेड मीट, नमक आदि।
डॉ. सुबु्रतो मंडल, हृदय रोग विशेषज्ञ


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B Alert - सांस फूलने के साथ बलगम आए ताे ना करें लापरवाही


अगर आपको लंबे समय से सांस फूलने के साथ बलगम आने की समस्या है तो लापरवाही न करें। यह फेफड़ों के सिकुड़ने की बीमारी आईएलडी ( इंटरस्टीशियल लंग डिजीज ) हो सकती है। इसमें फेफड़े धीरे-धीरे सिकुड़ने के बाद खोखले हो जाते हैं। यह बीमारी इसलिए गंभीर मानी जाती है क्योंकि अभी तक न तो इसके कारणों का पता चला है और न ही इलाज के लिए कारगर दवा बनी है। शुरुआती चरण में इसके लक्षणों के आधार पर इलाज करके मरीज को राहत देने की कोशिश की जाती है।

जरूरी जांचें एक्स-रे
सबसे पहले डॉक्टर मरीज का एक्स-रे करवाकर स्थिति का पता लगाते हैं। अगर डॉक्टर को लगता है कि फेफड़े में आईएलडी के लक्षण है तो वे आगे की जांच करवाते हैं।

सीटी स्कैन
आईएलडी की पहचान के लिए सीटी स्कैन सबसे उपयोगी जांच है। इसमें फेफड़ों के लगभग सभी हिस्सों की स्पष्ट इमेज आ जाती है, लेकिन कई बार जरूरत पडऩे पर विशेषज्ञ फेफड़ों की बॉयोप्सी भी कराते हैं।

बायोप्सी
इसमें चिकित्सक मरीज के प्रभावित फेफड़े से ऊत्तक निकालकर माइक्रोस्कोप के जरिए रोग का पता लगाते हैं। इससे रोग की वास्तविक स्थिति (स्टेज) का पता चलता है।

ये हैं लक्षण
- सूखी खांसी और बलगम आना।
- शरीर का वजन कम होना।
- चलने पर सांस फूलना।
- सीने में दर्द।
- बीमारी बढ़ने पर बैठने पर भी सांस फूलने की समस्या हो सकती है।

संभावित कारण व इलाज
फेफड़े की बीमारी मुख्य रूप से बैक्टीरिया, वायरस और फंगस से होती है। लेकिन आईएलडी के सही कारणों का अभी तक स्पष्ट पता नहीं चला है। ऐसे कई संभावित कारण हैं जिनके आधार पर इसका अनुमान लगाया जा सकता है जैसे -
- एस्बेस्टस (अभ्रक वाली चीजें) बालू के कण।
- टेलकम पाउडर कोयला और धातुओं के कण।
- अनाज की कटाई-छंटाई से निकलने वाली धूल।

इलाज :
इडियोपैथिक (जिसके कारणों का पता न हो) बीमारी होने के कारण विशेषज्ञ इसका इलाज लक्षणों के आधार पर करते हैं। अमरीका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्टे्रशन की ओर से इस रोग में 'परफैनीडॉन' नामक दवा लेने की सलाह दी जाती है। लेकिन यह दवा भी पूरी तरह से कारगार नहीं मानी जा रही है।

40 पार के लोगों को खतरा
आईएलडी फेफ ड़े से जुड़ी लगभग दो सौ बीमारियों का एक समूह है। ज्यादातर मामलों में यह बीमारी 40 साल से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती है। बीमारी के शुरुआत में सांस फूलने और बलगम आने जैसी समस्याएं सामने आती हैं, लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है सांस फूलने की समस्या भी बढ़ती जाती है। इस बीमारी में फेफड़े सिकुड़कर मधुमक्खी के छत्ते के आकार का हो जाता है। इसका एकमात्र विकल्प फेफड़ों का प्रत्यारोपण है।

बहुत खर्चीला है फेफड़ों का ट्रांसप्लांट
फेफड़ों के प्रत्यारोपण का काम देश में शुरू हो गया है लेकिन यह बहुत महंगा है। साथ ही फेफड़ों के दानदाता आसानी से न मिलना भी एक बड़ी समस्या है। इसके कारण प्रत्यारोपण में काफी मुश्किलें सामने आती हैं।शुरुआत में सांस फूलने और बलगम आने जैसी समस्याएं सामने आती हैं, बीमारी बढ़ने के साथ परेशानी अधिक बढ़ जाती है।

क्या करें
- धूम्रपान न करें।
- अधिक से अधिक पानी पिएं।
- ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें।
- सर्दी में ठंडी चीजों से बचें।
- दूषित वायु से खुद को बचाएंं।
- घर की साफ-सफाई का खयाल रखें।
- एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर पैष्टिक भोजन लें।
- फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले कामों में सावधानी बरतें ।

विशेषज्ञ की सलाह
आईएलडी के सही कारणों का पता न होने से बचाव के बारे में ठोस जानकारी नहीं है। फिर भी मरीज को उन सभी संभावित चीजों से दूर रहना चाहिए जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। जांचों से मरीज में आईएलडी की पुष्टि हो चुकी है तो उसे डॉक्टरी सलाह पर पर काम करना चाहिए। इसके अलावा विशेषज्ञ की सलाह से निकोकोकल व इनफ्लूएंजा वैक्सीन का टीकाकरण भी कराया जा सकता है जिससे इम्युनिटी बढ़ती है।


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डायबिटीज रहेगी दूर करें ये घरेलू उपाय


करें ये उपाय
अन्न का पांच भाग, काले चने दो भाग और गेहूं एक भाग लेकर पीसकर उसका आटा प्रमेही का सेवन करना चाहिए।
नया अन्न, अधिक खाना, अधिक सोना, दही का अधिक सेवन इस रोग की उत्पत्ति में कारण हैं। इसलिए इनसे बचना चाहिए। भोजन के बाद जल नहीं पीना चाहिए। जल और सत्तू का प्रयोग इस रोग में हितकर है। लाजा प्रमेह को नष्ट करता है। हल्दी और यव इस रोग में विशेष रूप से हितकारी है।
हरीतकी प्रमेह का नाश करती है। शिलाजीत का सेवन करने से व्यक्ति प्रमेह के उपद्रवों से शीघ्र ग्रसित नहीं होता। आंवला और हल्दी चूर्ण का नित्य प्रयोग इस रोग में विशेष लाभकारी है।
प्रमेह का रोगी अगर स्थूल है, तो संशोधन यानी वमन विरेचन के प्रयोग से और अगर उस का रोगी कृश है, तो उसके शरीर में वृद्धि करने वाले द्रव्यों के प्रयोग से उसकी चिकित्सा करनी चाहिए।
जब शरीर में मल संचित होते रहते हैं, वे उपेक्षित होकर चिरकाल तक शरीर में पड़े रहते हैं, तो विभिन्न रोगों के साथ-साथ प्रमेह रोग की उत्पत्ति होती है। इसलिए शरीर का शोधन करने से इससे बचा जा सकता है।
इनके साथ फल और सब्जियों का भी भरपूर सेवन करना चाहिए। ध्यान रहे कि उन फलों का सवेन कदापि न करें, जिनमें शर्करा की मात्रा अधिक होती है।
विजयसार की लकड़ी का चूर्ण 200 ग्राम की मात्रा में लेकर एक घड़े में पानी में भिगो दें। अगले दिन पीने के लिए उस पानी का प्रयोग करें। यह पानी और लकड़ी रोजाना बदलनी चाहिए। तभी अच्छे लाभ मिलते हैं।


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स्तन कैंसर से बढ़ जाता है हृदय रोग का खतरा


जिन महिलाओं की रजोनिवृत्त हो चुकी होती है और उन्हें स्तन कैंसर हो जाता है तो उन महिलाओं में हृदय रोग का अधिक खतरा होता है। एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस बात का पता लगाया है।

वर्जीनिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर जोआन पिंकर्टन ने कहा कि ‘कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी और एरोमाटेज इनहिबिटर्स के उपयोग (जो एस्ट्रोजन को कम करते हैं) की वजह से स्तन कैंसर के लिए उपचारित महिलाओं में दिल की बीमारी अधिक देखी जाती है।

हृदय जोखिम विकिरण के संपर्क में आने के पांच साल बाद यह रोग हो सकता है और इसका जोखिम 30 साल तक बना रहता है।

पिंकर्टन ने कहा कि हृदय-स्वस्थ जीवन शैली में संशोधन से आवर्ती स्तन कैंसर और हृदय रोग के विकास के जोखिम दोनों में कमी आएगी। स्तन कैंसर से बची हुई महिलाओं और जिन महिलाओं को स्तन कैंसर है, उन रजोनिवृत्ति महिलाओं में हृदय रोग के लिए जोखिम कारकों की तुलना और मूल्यांकन करना अध्ययन का लक्ष्य था।


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लक्षणों की सही समय पर पहचान कर न बनने दें अस्थमा रोग को गंभीर


यह है समस्या
अस्थमा एक तरह से एलर्जी का ही एक प्रकार है। इसमें कुछ कारणों से बार-बार सांस लेने में तकलीफ और खांसी की समस्या होती है। हालांकि हर उम्र और प्रकृति के व्यक्ति और समस्या की गंभीरता के अनुसार दौरे की प्रवृत्ति अलग-अलग हो सकती है। इससे मरीज दिन में एक दो बार या कई बार या हफ्ते में कुछ बार परेशान होता है। कुछ इतने परेशान हो जाते हैं कि दैनिक कार्य ही नहीं कर पाते।
अस्थमा अटैक
शुद्ध हवा को मुंह और नाक के जरिए फेफड़ों तक पहुंचाने वाली ब्रॉन्कियल ट्यूब में सूजन आने से सांस लेने में काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। अस्थमा अटैक के दौरान इन ट्यूब की लाइनिंग में सूजन बरकरार रहने से नलियां सिकुड़ जाती हैं और व्यक्ति को सांस लेने में बाधा आती है। लक्षणों का बार-बार सामना करने से मरीज को नींद न आने, दिनभर थकान और मन न लगने की शिकायत रहती है।

कारण
अस्थमा एक तरह से एलर्जी का ही रूप है। इसमें एलर्जी के कारणों के संपर्क में आने से अस्थमा अटैक आता है। इसके कई कारण हैं- इंडोर एलर्जन्स (घर में मौजूद धूल-मिट्टी के बारीक कण, पालतू के बाल, किटाणू) के अलावा घर के बाहर पोलन्स, हवा में मौजूद सूक्ष्म कण, धूम्रपान, तंबाकू चबाना, कैमिकल के संपर्क में आना शामिल हैं।
करें विशेषज्ञ से संपर्क
वैसे तो नियमित रूप से दवाएं लेने और सावधानियों को बरतकर इस बीमारी को कंट्रोल किया जा सकता है। लेकिन कई बार अचानक ही मरीज को अस्थमा अटैक आ सकता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टरी सलाह लेना जरूरी होता है।
प्रमुख जांचें हैं जरूरी
अस्थमा के लक्षणों और मरीज की हालत देखकर रोग की पुष्टि करने के लिए विशेषज्ञ कई तरह की जांचें प्रमुख रूप से करते हैं। जानते हैं इनके बारे में-
स्पाइरोमेट्री : यह एक सामान्य टैस्ट है, जिससे सांस लेने की गति की पहचान की जाती है।
चेस्ट एक्सरे : संक्रमित फेफड़ों की स्थिति का पता लगाने के लिए चेस्ट एक्सरे करना जरूरी होता है। इसमें फेफड़ों में अस्थमा ही नहीं बल्कि अन्य समस्याओं का भी पता करते हैं।
पीक फ्लो : यह विशेष प्रकार का टैस्ट होता है। इसमें यह पता लगाते हैं कि मरीज अपने फेफड़ों से सांस को सामान्य तरीके से ले पा रहा है और छोड़ पा रहा है या नहीं। इस परीक्षण के दौरान मरीज को तेजी से सांस लेने की सलाह देते हैं।
शारीरिक परीक्षण : मरीज के स्वास्थ को गंभीरता से देखते हैं। खासतौर पर मरीज के सीने पर घरघराहट की आवाज को महसूस करते हैं। अस्थमा की गंभीरता का पता चलता है।
एलर्जी टैस्ट : अस्थमा के मरीजों में सबसे पहले एलर्जी टैस्ट किया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के एलर्जन्स के सहारे मरीज में अस्थमा के कारक यानी एलर्जन की पहचान की जाती है।


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स्ट्रेस ज्यादा होने से महिलाओं को हो सकती है ये बीमारी


लक्षण भी स्पष्ट नहीं दिखाई देते
दिल की बीमारी को पुरुषों से जोड़कर देखा जाता है, पर हालिया सर्वे बताते हैं कि हृदय रोगों से हर साल पुरुषों की तुलना में महिलाओं की मौत के मामले बढ़े हैं। कुछ मामलों में महिलाओं में इसके लक्षण पुरुषों से अलग होते हैं। भारत के पंजीयक महानिदेशक व इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के संयुक्त शोध के मुताबिक 5.8 फीसदी भारतीय महिलाओं में धमनियों से संबंधित हृदय की बीमारी होती है। लगभग दो तिहाई (64 फीसदी) औरतों की अचानक मृत्यु धमनियों की बीमारी से होती है। ऐसे में उनमें लक्षण भी स्पष्ट नहीं दिखाई देते।
कारण: घर-ऑफिस दोनों जगह के काम में तालमेल बैठाने से शहरी महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले दोगुना तनाव है। यह हृदय रोगों के खतरे को दोगुना करता है। मोटापा, व्यायाम से दूरी, फैमिली हिस्ट्री, धूम्रपान और अधिक शुगर के स्तर को नजरअंदाज करना अन्य कारण हैं। ऐसी महिलाएं जिनमें मेनोपॉज समय से पहले (50 साल) आता है, या कोई सर्जरी के दौर से गुजरी हों, उनमें हृदय संबंधी रोगों का खतरा ज्यादा रहता है। खानपान, व्यायाम व लाइफस्टाइल में बदलाव कर परेशानी को रोका जा सकता है।
लक्षण: महिलाओं में हृदय रोग के लक्षण पुरुषों से भिन्न दिखाई पड़ते हैं। कुछ लक्षणों की बात करें तो गर्दन, जबड़े, कंधे, कमर का ऊपरी हिस्सा या उदर के आसपास बेचैनी, सांसों का छोटा होना, दाहिने हाथ में दर्द, उल्टी महसूस होना, सिर हल्का लगना, बेहोशी छाना या थकावट जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

डॉ रमाकांत पांडा, कार्डियक सर्जन


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Throat Infection : गले में सूजन से होती हैं ये समस्याएं, जानें इनके बारे में


throat infection : swelling in throat : हमारे गले में आगे की तरफ सांस नली व पीछे भोजन नली शुरू होती है। निगलते समय भोजन सांस नली में न जाए इसके लिए कई चीजें हमारे गले में होती है। इन्हीं में एक संरचना है एपीग्लोटिस। यह छोटी पत्ती के आकार का नरम हड्डी से बना उभार होता है जो जीभ के बिल्कुल पीछे के भाग पर स्थित होता है, यह कुछ निगलते समय सांस नली को ढक लेता है। इस भाग में कई बार संक्रमण व सूजन आने से स्थिति बढ़ जाती है। मेडिकली इसे एपिग्लोटाइटिस कहते हैं। इसे गले में होने वाले संक्रमण का एक रूप भी कह सकते हैं। दिक्कत होने पर तुरंत इसका इलाज जरूरी है क्योंकि जिस तरह यह सांस नली के पास होता है उससे सांस लेने में तकलीफ बढ़ने का खतरा रहता है।

कारण : यह जीवाणु से होने वाला संक्रमण है। ये किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। इस जीवाणु से बचने के लिए लगने वाले टीके के कारण बच्चों में इसके मामले घटे हैं। गले में सूजन व अन्य कारणों में अधिक गर्म और पतली चीजें निगलना या फिर गले में चोट लगना भी वजह हो सकता है।

लक्षण : गले में तेज दर्द, बुखार, खानपान की चीजें निगलने में दिक्कत, लार टपकना व आवाज में बदलाव। सांस में तकलीफ हो सकती है। ये लक्षण तेजी से कुछ ही दिनों में पनपते हैं। थकान व घबराहट हो सकती है। सांस लेने में परेशानी बढ़ने पर तुरंत इलाज की जरूरत पड़ती है।

उपचार : एक्स-रे में यह भाग अंगूठे के आकार का दिखाई देता है। एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक व सूजन कम करने वाली दवाएं दी जाती हैं। बैक्टीरिया से बचने के लिए बच्चों में डेढ, ढाई, साढ़े तीन व 18वें माह में हिब वैक्सीन लगाई जाती है।


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नवजात को हृदय रोग की समस्या है तो घबराएं नहीं, 95 प्रतिशत नवजातों में दिल का इलाज संभव


बच्चों में हृदय की कौनसी बीमारियां ज्यादा होती हैं?
बच्चों में ज्यादातर दिल में सुराग होना, धमनियों का गलत जुड़ाव व रक्त नलियों में रुकावट के मामले सामने आते हैं। मां-बाप को बीमारी के शुरुआती संकेतों पर ध्यान रखना चाहिए जैसे बार-बार खांसी-जुकाम या निमोनिया, रक्त में ऑक्सीजन की कमी से शरीर का नीला पडऩा, बेवजह संास फूलना, वजन ना बढऩा या ग्रोथ रुक जाना।
क्या सर्जरी के बाद बच्चा आम बच्चों की तरह जीवन जी सकता है ?
करीब 90 प्रतिशत से अधिक बच्चों के हृदय रोगों का इलाज 95 प्रतिशत सफलता से किया जा सकता है। ऐसे लगभग सभी बच्चे सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं। स्थिति के अनुसार चिकित्सक कुछ सावधानी बरतने की सलाह अभिभावकों को देते हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी है।
हृदय रोग कम करने के लिए क्या करना चाहिए?
दूरदराज के डॉक्टरों और समाज में इन बीमारियों के प्रति जागरुकता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि इन बच्चों को स्पेशलाइज्ड पीडियाट्रिक कार्डियक हॉस्पिटल में वक्त रहते सही इलाज दिया जा सके। ऐसे हालात में समय का काफी महत्व है।
डॉ. सुनील कौशल, पीडियाट्रिक कार्डियक सर्जन


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गुमसुम और अकेले रहना भी हैं इस बीमारी के लक्षण


अक्सर गुमसुम रहना, दूसरे लोगों से घुलने-मिलने से बचना, अपने मन की बात दूसरों को आसानी से न समझा पाना जैसे लक्षण तीन साल की उम्र से लेकर जीवनभर दिख सकते हैं। ये लक्षण एस्पर्जर सिंड्रोम के हो सकते हैं। जो ऑटिज्म स्पैक्ट्रम डिस्ऑर्डर का एक प्रकार है।

लक्षण - इनके मरीज किसी भी कार्य को करने का अपना तरीका बनाते हैं, इसमें कोई बदलाव इन्हें पसंद नहीं आता।
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अलग व अकेला रहना पसंद करते हैं। इससे ग्रसित बच्चों की सीखने की क्षमता धीमी होती है। ये बोलने और नई भाषा सीखने में देरी करते हैं।
इससे पीड़ित कई मरीज बहुत प्रतिभावान भी होते हैं, वे किसी एक फील्ड जैसे म्यूजिक, एक्टिंग जैसा कोई एक काम बहुत अच्छी तरह से कर दिखाते हैं। ये बहुत कम चीजों को एंजॉय करते है जैसे उन्हें डांस करना पसंद है तो जरूरी नहीं कि म्यूजिक भी उन्हें अच्छा लगे। ये दूसरों की आंखों में देखकर बात करने से कतराते हैं।

कारण : रोग की मुख्य वजह फिलहाल अज्ञात है। एक्सपट्र्स का मानना है कि ये एक जेनेटिक बीमारी है। यानी परिवार में किसी को यह समस्या होगी तो उसके आगे की पीढ़ी में भी ये हो सकती है।

उपचार - इस बीमारी का पूरी तरह से निदान संभव नहीं है लेकिन कुछ थैरेपी और काउंसलिंग से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। जैसे स्पेशल एजुकेशन, स्पीच थैरेपी, अभिभावकों की काउंसलिंग, सामाजिक मेल-मिलाप व व्यवहार में बदलाव और दवाएं। साइकोलॉजिस्ट, स्पीच थैरेपिस्ट और चिकित्सक एक टीम वर्क के रूप में इसका इलाज करते हैं। उपचार से बच्चे सामाजिक व्यवहार व संवाद में आने वाली समस्याओं को नियंत्रित करना सीखते हैं।


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बड़ी आंत में सूजन, छाले और खूनी दस्त इस बीमारी के है लक्षण


अल्सरेटिव कोलाइटिस बड़ी आंत से जुड़ी बीमारी है
अल्सरेटिव कोलाइटिस बड़ी आंत से जुड़ी बीमारी है। आमतौर पर पेटदर्द के साथ खूनी दस्त इसके शुरुआती लक्षण होते हैं। कई बार लोग इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं जो आगे चलकर गंभीर रूप ले सकते हैं। इसमें बड़ी आंत की आंतरिक सतह में सूजन आ जाती है और उसमें छाले या घाव (अल्सर) होने लगते हैं। इस बीमारी की शुरुआत बड़ी आंत के अंतिम हिस्से यानी मलद्वार से होती है और धीरे-धीरे पूरी आंत प्रभावित होने लगती है। अल्सरेटिव कोलाइटिस आमतौर पर छोटी आंत में नहीं होती है लेकिन गंभीर स्थिति में जब बीमारी पूरी बड़ी आंत तक फैल जाती है तब छोटी आंत का अंतिम भाग भी प्रभावित हो सकता है। यह समस्या किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। लेकिन इसके ज्यादातर मामले 15-30 वर्ष की उम्र में देखे गए हैं। जानते हैं बीमारी से जुड़े तथ्यों के बारे में।

लक्षण
स्टूल के साथ खून आना (खूनी दस्त), पेटदर्द, एनीमिया, थकान, सांस फूलना, बुखार, भूख न लगना, वजन घटना और इन वजहों से शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी होने से कमजोरी आने जैसे लक्षण सामने आते हैं। कुछ मरीजों को जोड़दर्द, आंख में सूजन, त्वचा पर घाव, पीलिया होना, उल्टी और बेचैनी की शिकायत हो सकती है।
कारण
आनुवांशिकता के अलावा संक्रमण, तनाव, दवाओं का अधिक प्रयोग और संक्रमित भोजन से रोग प्रतिरोधक तंत्र में परिवर्तन होने लगता है। इन वजहों से बीमारी जन्म ले लेती है।
गंभीरता : नियमित कराएं जांच
अल्सरेटिव कोलाइटिस के इलाज को टालते रहना मरीज में कोलोन कैंसर की आशंका को बढ़ा देता है। कोलोन कैंसर की जल्दी पहचान व इलाज के लिए बीमारी के 10 वर्ष बाद नियमित तौर पर गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट से कोलोनोस्कोपी टैस्ट और बायोप्सी कराएं। इसके अलावा बीमारी की गंभीर अवस्था में आंतों से खून बहने से रक्त की कमी होना, आंतों का अत्यधिक फूलना, आंतों का फटना, रक्त से जुड़ा संक्रमण, आंत के कमजोर होने से इसमें छेद आदि का खतरा भी हो सकता है।

इलाज
टैस्ट : रोग का पता लगाने के लिए ब्लड टैस्ट, कोलोनोस्कोपी व बायोप्सी करते हैं। जरूरत के अनुसार स्टूल टैस्ट, पेट का एक्स-रे भी करते हैं।
दवाएं : रिपोर्ट के आधार पर सूजन कम करने व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बरकरार रखने के लिए कई दवाइयां दी जाती हैं। इनमें एंटीबायोटिक्स, प्रो-बायोटिक्स, इम्यूनोसप्रेसेंट्स, आयरन व मल्टीविटामिन शामिल हैं।
सर्जरी : गंभीर स्थिति और दवाओं से फायदा न होने पर सर्जरी ही विकल्प है। सर्जरी के दौरान बड़ी आंत को निकाल दिया जाता है। इस बीमारी से पीडि़त अधिकांश मरीज कई बार अमीबायसिस या आंतों के संक्रमण से बचने की दवाएं मनमर्जी से ले लेते हैं जो दिक्कत बढ़ा सकती है। ऐसे में गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट से ही इलाज कराएं और डॉक्टरी सलाह के अनुसार दवाएं लें।
खानपान : मरीज को संतुलित आहार दें। डाइट में सीमित मात्रा में ही कार्बोहाइडे्रट जैसे चावल, बे्रड, आलू आदि दें। खानपान में प्रोटीनयुक्तचीजें जैसे दूध, मछली, अंडे, सब्जियां व फल बढ़ाएं। दूध व दूध से बनीं चीजें प्रोटीन व कैल्शियम का अच्छा स्त्रोत हैं इन्हें जरूर दें। यदि इन्हें खाने से दस्त अधिक हों तो इनकी जगह दही, लस्सी व छाछ दे सकते हैं। खाना बनाते व खाते समय सफाई का ध्यान रखें। बाहर के बजाय घर का बना भोजन ही खाएं।


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लार की जांच कर करेंगे दमा की पुष्टि


क्या है दमा
सामान्य शब्दों में दमे से आशय सांस लेने की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होना है। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें श्वास नलिकाएं इनफ्लेम्ड (एलर्जी के कारण आने वाली लाली व सूजन) हो जाती हैं, जिससे श्वास नली तंग हो जाती है और सांस लेने में परेशानी होती है।

दमे के लक्षण
सुबह और रात के समय खासतौर पर जुकाम व खांसी की समस्या देखने को मिलती है। लगातार बलगम-खांसी रहना, जोर-जोर से सांस लेना, सांस लेने में आवाज आना, पैदल चलने या काम करते समय सांस फूलना व छाती में जकड़न जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। ऑक्सीजन स्तर कम होने या बाहरी एलर्जिक तत्वों के संपर्क में आने से यह समस्या बढ़ जाती है, जिसे अस्थमा अटैक कहा जाता है। आमतौर पर मौसम बदलने, अत्याधिक ठंड, गर्मी व बरसात के समय में यह अधिक होता है। अपर्याप्त नींद, आंखों से पानी बहना, छाती में जकड़न, नाक बहना आदि लक्षण होते हैं।

नए शोध हो रहे हैं
मरीजों में अस्थमा की पुष्टि मात्र उनके लार की जांच (सलाइवा टैस्ट) से हो सकेगी। लंदन की लॉफबोरफ यूनिवर्सिटी के प्रो. कोलीन सीजर के मुताबिक, दमा पर हुए एक शोध में स्वस्थ व अस्थमा से पीड़ि़त लोगों की लार का सैंपल लिया गया। इसका लिक्विड क्रोमेटोग्राफी मास स्पेक्ट्रोमेट्री एनालिसिस किया जिसमें मेटाबॉलिक बायोमार्कर्स की उपस्थिति को जांचा गया। इनकी उपस्थिति से इस रोग की पुष्टि की जाती है। अभी दमा का पता लगाने के लिए पल्मोनरी फंक्शन टैस्ट, ब्लड-यूरिन टैस्ट कराना पड़ता है। इससे मरीजों को दर्द और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह शोध अभी जारी है।


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फैमिली हिस्ट्री है तो रहें अलर्ट


कोरोनरी आर्टरी डिजीज
बुरा कोलेस्ट्रॉल बढऩे से होने वाली यह बीमारी जेनेटिक भी हो सकती है। वल्र्ड हार्ट फेडरेशन के मुताबिक अगर पिता या भाई में से किसी को 55 की उम्र से पहले अथवा मां या बहन में से किसी को 65 साल की उम्र से पहले हार्ट अटैक हुआ हो, तो परिजनों को हार्ट डिजीज की आशंका अधिक होगी। इसके अलावा कार्डियोमायोपैथी (हृदय की संरचना में बदलाव व ब्लड पंप करने की क्षमता घटना), हार्ट रिद्म प्रॉब्लम (अरिद्मिया), एऑर्टा से जुड़ी बीमारी के इलाज में लेटलतीफी हार्ट के लिए दिक्कत पैदा कर सकती है।
जानें फैमिली हिस्ट्री होने पर क्या रखें ध्यान-
ऐसे कम होगा जोखिम
कोरोनरी आर्टरी डिजीज का शुरुआती चरण में पता नहीं चलता। इसलिए परिवार में किसी को हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या रही हो तो अलर्ट हो जाएं। जर्नल ऑफ दी अमरीकन मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक भाई या बहन को हार्ट डिजीज होने पर कार्डियोवैस्कुलर डिजीज होने का जोखिम 100 फीसदी बढ़ जाता है। इसकी वजह भाई-बहनों में समान जींस के अलावा एक जैसी खानपान की आदतों का होना है। ऐसे में बीपी चेक करें, लिपिड प्रोफाइल टैस्ट और ब्लड शुगर की नियमित जांच कराएं। साथ ही बच्चों के कोलेस्ट्रॉल लेवल की जांच दो वर्ष की आयु से ही शुरू कर देनी चाहिए। हैल्दी डाइट लें व व्यायाम जरूर करें।
डॉ. दीपक माहेश्वरी, हृदय रोग विशेषज्ञ


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आंख में संक्रमण के कारण पुतलियों पर पड़ता है ये असर


लक्षण : बैक्टीरियल इंफेक्शन में आंखों में लालिमा, दर्द व गंभीर अवस्था में सूजन आ जाती है। वायरल व फंगल के लक्षण भी समान हैं फर्क सिर्फ इतना है कि इनमें लक्षणों की पहचान शुरुआत में न होकर स्थिति गंभीर होने पर होती है।
किन्हें ज्यादा खतरा
जो धूल-मिट्टी के संपर्क में अधिक रहते हैं। डायबिटीज व क्रॉनिक रोगों के मरीज या एंटी कैंसरस ड्रग का प्रयोग करने वालों में इसकी आशंका अधिक रहती है। कमजोर इम्युनिटी वाले या नमी वाली जगह पर रहने वालों में यह रोग हो सकता है।
गंभीर अवस्था
इसमें कॉर्नियल अल्सर बनता है जिसमें कॉर्निया में पस भर जाता है, इसे हाइपोपियोन कहते हैं। कॉर्निया में सूजन रहने के साथ नजर कमजोर होने लगती है इससे चीजें धुंधली दिखती हैं।
इलाज : आंसू का नमूना लेकर कल्चर टैस्ट करते हैं। इसमें बैक्टीरिया, वायरस या फंगस की सूक्ष्म स्तर पर जांच होती है जिससे कौनसे जीव से रोग पनपा, का पता चलता है। ड्रॉप्स व एंटीबायोटिक दवा देते हैं। बैक्टीरियल का एंटीबैक्टीरियल दवा या फॉर्टिफाइड एंटीबायोटिक ड्रॉप्स से इलाज करते हैं।
डॉ. अजय कपूर, नेत्र रोग विशेषज्ञ, जयपुर


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जोड़ बदलवातेे समय डिजाइन देखकर न हों भ्रमित


फायदों को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं
आमतौर पर जब लोग जोड़ प्रत्यारोपण कराने जाते हैं तो उन्हें अस्पतालों में मोटे-पतले, भारी हल्के जोड़ों के कई डिजाइन दिखाए जाते हैं व फायदों को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। इसके चलते लोग भ्रमित हो जाते हैं। वे सर्जरी के बेहतर परिणामों के लिए मोटी रकम खर्च करते हैं फिर भी संतोषजनक परिणाम नहीं मिलते। सफलता विशेषज्ञ की कुशलता पर निर्भर करती है जोड़ के डिजाइन पर नहीं। इसलिए इन बातों में न आएं। जोड़ चाहे किसी भी डिजाइन या धातु का बना हो, सफल प्रत्यारोपण के बाद 20 से 30 वर्षों तक बेहतर काम कर सकता है।
किन-किन जोड़ों का प्रत्यारोपण हो सकता है?
जोड़ प्रत्यारोपण सिर्फ घुटने व कूल्हों का ही होता है क्योंकि अब तक इनके परिणाम ही बेहतर पाए गए हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा मामले घुटनों के आते हैं।
इसकी नौबत क्यों और कब आती है?
प्रमुख वजह शारीरिक गतिविधियों का अभाव व खराब जीवनशैली है। शारीरिक सक्रियता की कमी के चलते यह समस्या ज्यादातर गृहिणियों को होती है। ऐसे में वजन बढऩा, घुटनों में दर्द, सूजन,जैसे लक्षण सामने आते हैं। कई बार ऑस्टियोपोरोसिस के मरीजों को भी तकलीफ बढऩे पर घुटनों के प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। लंबे समय तक समस्या टालने या सही इलाज न मिलने पर धीरे-धीरे जोड़ों के मूवमेंट में मददगार चिकना पदार्थ खत्म हो जाता है व हड्डियां टकराने लगती हैं। तब रिप्लेसमेंट की जरूरत पड़ती है।
कैसे समझेंं, कब है जरूरत?
सामान्य कामकाज के लिए चलने-फिरने, उकड़ू व आलती-पालती मारकर बैठने आदि कामों में जोड़ों में असहनीय दर्द हो तो जोड़ों का एक्स-रे कराएं व विशेषज्ञ से संपर्क करके स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। ध्यान रहे विशेषज्ञ से रिप्लेसमेंट की सलाह मिलने के बाद भी एक बार अन्य सर्जन से सेकंड ओपिनियन जरूर लें क्योंकि कई बार तकलीफ के बावजूद दवाओं व व्यायाम से रिकवरी की गुंजाइश होती है।
नौबत आने पर किन बातों का खयाल रखना चाहिए?
सर्जन के पिछले रिकॉर्ड के बारे में अच्छे से जानकारी जुटाएं क्योंकि केस बिगडऩे से मरीज की स्थिति गंभीर हो सकती है और फिर से प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ सकती है। दोबारा रिप्लेसमेंट में जटिलताएं और खतरा पहले की तुलना में काफी हद तक बढ़ जाते हैं। इसके अलावा जिस अस्पताल में भी सर्जरी कराएं वहां आईसीयू सपोर्ट व बेहतर फिजिशियन होने जरूरी हैं ताकि संक्रमण आदि की स्थिति से निपटा जा सके।

सर्जरी के बाद फिट होने में कितना समय लगता है?
6-7 दिनों में मरीज का घुटना 90 डिग्री पर घूमने लगता है तब उसे अस्पताल से छ़ट्टी दे दी जाती है। 21 दिनों तक वॉकर से चलने की सलाह देते हैं। तीन माह बाद वह फिट हो जाता है।
सर्जरी के बाद किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उकड़ू, आलती-पालती व जमीन पर बैठने से परहेज करना चाहिए। किसी तरह की परेशानी होने पर चिकित्सक को फौरन दिखाना चाहिए।

डॉ सी. एस. यादव, नी एंड हिप जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन


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जानेंं, समझें और जांचें दिल की हर हरकत


हृदय की प्रमुख बीमारियां
कोरोनरी हार्ट डिजीज : धमनियों में ब्लॉकेज के कारण रक्तसंचार बाधित होना।
लक्षण : सीने में दर्द होना प्रमुख है। इसके अलावा सीने में जलन, ऐंठन, धड़कनों का तेज होना, सांस असामान्य होना, पसीना आना व उल्टी आने का अहसास होना।
अरिद्मिया : धड़कनों का असामान्य होना।
लक्षण: सीने पर तेज प्रहार होने जैसा महसूस होना, बेहोशी छाना, छोटी-छोटी सांस आना, कमजोरी लगना।
हार्ट अटैक : धमनियों में ब्लॉकेज होने से हृदय में खून की सप्लाई बंद होना। ऑक्सीजन की कमी।
लक्षण: छाती में बाईं ओर तेज दर्द, पसीना आना, सांस लेने में तकलीफ व चक्कर आना।
हार्ट इंसफिशिएंसी : इसका मतलब हार्ट का काम बंद कर देना नहीं बल्कि शरीर की जरूरत के अनुसार हृदय का पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप न कर पाना।
लक्षण: छाती में दर्द के मुकाबले सांस अधिक फूलती है। इसके अलावा हाथ, पैर और पेट में सूजन होना।
हार्ट वॉल्व डिजीज : रक्तसंचार को नियंत्रित करने वाले वॉल्व का काम न करना।
लक्षण : सांस का असामान्य होना खासकर जब आप लेटे हों या ठंडी हवा के संपर्क में आने पर सीने पर दबाव या भारीपन महसूस होना, बेहोशी व कमजोरी।
ये जांचें हैं जरूरी
कोलेस्ट्रॉल : हृदय रोग का बड़ा कारण है शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढऩा। ब्लड सैंपल लेकर इसकी जांच करते हैं। शरीर मेंं ट्राइग्लिसराइड, एलडीएल व एचडीएल का कुल स्तर 200 एमजी/डीएल से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
ईसीजी: यह दर्दरहित टैस्ट है। हृदय रोग की आशंका होने पर मरीज की छाती, भुजाओं और पैरों की त्वचा पर छोटे इलेक्ट्रोड पैच लगाकर दिल की इलेक्ट्रिक एक्टिविटी को रिकॉर्ड करते हैं।
ईकोकार्डियोग्राम : हार्ट की मांसपेशियों, वॉल्व की स्थिति और हृदय रोगों के खतरे के आकलन के लिए अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल किया जाता है।
स्ट्रेस टैस्ट : मरीज के शरीर पर इलेक्ट्रोड लगातार ट्रेडमिल या साइक्लिंग वर्कआउट कराते हैं। इस दौरान हार्ट रेट व बीपी पर नजर रखी जाती है।
एंजियोग्राफी : एक पतली कैथेटर को मरीज के हाथ या पैर की रक्त नलिका में डालकर एक्सरे मशीन से हार्ट की कार्यक्षमता का पता लगाते हैं।
परेशानी का सबब ये आदतें
अनिद्रा : कम से कम 7 घंटे सोने से हृदय की धमनियों की कार्यक्षमता बढ़ती है।
बीपी : उच्च रक्तचाप धमनियों को ब्लॉक करता है। जिससे कई बीमारियों का खतरा बढ़ता है।
डायबिटीज : यह दिल को कमजोर करती है। पीडि़त शुगर लेवल नियंत्रित करें व सामान्य लोग सावधानी बरतें।
बढ़ता वजन : फैट से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है जो हार्ट अटैक का कारण बनता है। ट्रांस फैट सर्वाधिक नुकसान पहुंचाता है। पांच साल में एक बार कोलेस्ट्रॉल की जांच जरूर कराएं।
तनाव व बुरी आदतें: तनाव का सीधा रिश्ता दिल की सेहत से है। इससे जितना हो सके दूर रहें।
स्मोकिंग : इससे धमनियां सिकुड़ती हैं जिससे रक्तसंचार बाधित होता है और हृदय रोगों का खतरा बढ़ता है।
शराब : यह हृदय की मांसपेशियों को कमजोर करती है जिससे हृदय रक्त पंप नहीं कर पाता।


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इस कारण से होती है गले में दर्द की समस्या


अक्सर 5-15 साल के बच्चों को गले में बैक्टीरियल इंफेक्शन की दिक्कत होती है। फेफड़े, लिवर व हृदय की क्रॉनिक बीमारी से पीड़ित बच्चों को भी यह ज्यादा प्रभावित करता है। इसे सोर थ्रॉट या स्ट्रेप थ्रॉट कहते हैं।

लक्षण : बुखार, गले में दर्द व सूजन प्रमुख हैं। इसके अलावा मरीज को भूख कम लगने, कुछ भी खाने की चीज को निगलने में परेशानी होने के साथ दिक्कतें बढ़ने पर सांस लेने में भी तकलीफ होने लगती है। कई बार इस बैक्टीरिया के विरुद्ध काम करने वाले शरीर के एंडीबॉडीज स्वस्थ कोशिकाओं को भी नष्ट करने लगते हैं हृदय के कार्य पर भी असर होता है। इस अवस्था को एक्यूट रुमेटिक फीवर कहते हैं।

कारण : साफ-सफाई के अभाव के अलावा बैक्टीरिया की वजह से यह होता है। खांसने या छींकने के जरिए यह फैलता है।
जांच : ब्लड जांच में यदि डब्ल्यूबीसी की संख्या ज्यादा पाई जाए जिसमें भी विशेषकर न्यूरोफिल्स सेल्स ज्यादा हो जाएं तो बैक्टीरियल इंफेक्शन की पुष्टि कर रोग की पहचान की जाती है।
इलाज : एंटीबायोटिक दवा देते हैं। मरीज को लिक्विड डाइट जैसे जूस, नारियल पानी पीते रहने की सलाह देते हैं।


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गुमसुम रहना, भोजन में अरुचि, काम में निराशा है तो जानें ये बातें


गुमसुम रहना, खाने-पीने में रुचि न दिखाना, किसी से मिलने में कतराना, काम को उत्साह से न करना आदि मनोरोग के लक्षण हैं। दिमाग में रसायनों का असंतुलन इनका कारण है। इन मनोरोगों का डीबीएस (डीप ब्रेन स्टीमुलेशन) सर्जरी से इलाज संभव है।

क्यों होता है डिप्रेशन या दिमाग से जुड़ा डिस्ऑर्डर -
मस्तिष्क में मौजूद लिंबिक सर्किट गंभीर और उत्तेजित करने वाले भावों को नियंत्रित करता है। इसके निर्जीव या कमजोर होने पर रसायन असंतुलित हो जाते हैं। इस कारण डिप्रेशन या मस्तिष्क से जुड़े डिस्ऑर्डर की समस्या पैदा होती है।

क्या है डीबीएस सर्जरी-

डीप ब्रेन स्टीमुलेशन (डीबीएस) सर्जरी तब करते हैं जब दवाएं असर नहीं करतीं। सर्जरी से पहले ईईजी व एमआरआई जैसी जांचें कराकर कारण व स्थिति स्पष्ट की जाती है। सर्जरी के तहत प्रभावित हिस्से पर बारीक चीरा लगाकर इंसुलेटेड तार को इम्लांट करते हैं। इसके बाद तार के सिरे को सिर, गर्दन और कंधे की त्वचा के अंदर से लाते हुए कॉलरबोन (गर्दन), सीने या पेट के पास इंप्लांट किए गए न्यूरोस्टीमुलेटर से जोड़ते हैं।

न्यूरोस्टीमुलेटर की मदद से प्रभावित हिस्से में हर दो घंटे में 2 वोल्ट का करंट दिया जाता है। जो सर्किट को सक्रिय करता है। न्यूरोस्टीमुलेटर आजीवन लगा रहता है। सर्जरी के बाद 2-3 दिन में मरीज स्वस्थ हो जाता है। ऐसे में डॉक्टर कुछ सावधानी जैसे जिस जगह पर न्यूरोस्टीमुलेटर लगा है वहां किसी तरह का दबाव न पड़े, की सलाह देते हैं।

सर्जरी के बाद इंफेक्शन या ब्लीडिंग न हो इसलिए विशेषज्ञ समय-समय पर चेकअप करवाने की सलाह देते हैं। पार्किंसन डिजीज, डिस्टोनिया, क्रॉनिक पेन व ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिस्ऑर्डर (मन में अजब-गजब विचार आना व उसे करने की जिद करना) जैसे मनोरोगों का इलाज किया जाता है।


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