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Antibiotics leads heart problems: एंटीबायाेटिक से बीमार हाे सकता है दिल


Antibiotics leads heart problems: किसी बीमारी काे खत्म करने के लिए एंटीबायाेटिक का प्रयाेग आपके दिल की सेहत के लिए खतरनाक हाे सकता है। ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है। शाेध में पाया गया है कि सामान्य ताैर पर दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं दिल का कमजाेर करने का काम करती हैं।

वैंकूवर शोधकर्ताओं इस बात का खुलासा किया है कि फ्लोरोक्विनोलोन (एक प्रकार का एंटीबायोटिक जो बैक्टीरिया, श्वसन और यूरिन ट्रैक्ट इंफेक्शन के संक्रमण जैसी बीमारियों का इलाज करने के लिए उपयोग किया जाता है ) के उपयोगकर्ताआें दिल की बीमारी ( antibiotics causing heart failure ) हाेने का ज्यादा खतरा रहता है।यह जोखिम उन लोगों की तुलना में 2.4 गुना अधिक है, जो एक अन्य प्रकार के एंटीबायोटिक का उपयोग करते हैं।

शाेध के लेखक महियार इत्मिनान का कहना है कि आमतौर पर,डॉक्टर एंटीबायोटिक का चयन करते हैं क्योंकि इसमें जीवाणुरोधी गतिविधि होती है। मौखिक रूप से लेने पर यह अच्छी तरह से अवशोषित हो जाता है, जो इसे इलाज के ताैर पर प्रभावी बनाता है।इसके साथ ही आप राेगी काे एक गाेली देकर घर भेज सकते हैं।

उन्हाेंने बताया की एंटीबायोटिक दवाओं का वर्ग बहुत सुविधाजनक है, लेकिन अधिकांश मामलों में,विशेष ताैर पर कम्युनिटी रिलेटेड इंफेक्शन के लिए वास्तव इनकी जरूरत नहीं हाेती है। लेकिन फिर राेगी काे ये दवाएं दी जाती, जाे आगे चलकर गंभीर हृदय की समस्याओं का कारण बनी सकती है।

शोध के निदेशक डॉ ब्रूस कार्लटन ने कहा कि यह शाेध एंटीबायोटिक दवाओं ( Antibiotic causing heart problems ) की वास्तविक अावश्यकता के संबंध पर प्रकाश डालता हैं। किसी मरीज काे एंटीबायोटिक देने से पहले उसकी जरूरत काे समझना हाेगा क्याेंकि इसके बिना एंटीबायोटिक का प्रयाेग मरीज काे दिल की गंभीर बीमारियां ( antibiotics leads heart problems ) दे सकता है।


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Alzheimer's Drug: अल्जाइमर से बचाएगी बीपीएन 14770


Alzheimer Drug: भूलने की बीमारी अल्जाइमर के इलाज के लिए शोधकर्ताओं ने एक नई दवा की खोज की है। शोधकर्ताओं का दावा कि यह नर्इ दवा याददाश्त जाने, तंत्रिका क्षति और अल्जाइमर रोग ( Alzheimer's disease ) के अन्य लक्षणों जैसे, सामान्य कामकाज करने में कठिनाई, भाषा व बाेलचाल की समस्या, समय और स्थान में असमन्वय, निर्णय लेने में कठिनाई या गलत निर्णय, संक्षिप्त सोच से बचा सकती है।

प्रीक्लिनिकल शोध को जर्नल ऑफ फार्माकोलॉजी एंड एक्सपेरीमेंटल थेरेप्यूटिक्स में प्रकाशित इस शाेध के अनुसार नर्इ दवा ( Alzheimer's drug ) -बीपीएन 14770 - अमलॉइड बीटा ( amyloid beta ) के प्रभावों को रोकती है। अमलॉइड बीटा, अल्जाइमर प्रोटीन का हॉलमार्क है, जो तंत्रिका कोशिकाओं के लिए विषाक्त होता है।

शाेध में दावा किया गया है कि टेट्रा थेरेप्यूटिक्स के विकास के तहत बीपीएन14770 ( BPN14770 ) उन प्रक्रियाओं को सक्रिय करने में मदद कर सकती है जो तंत्रिका के स्वास्थ्य में सहयोग करती हैं और डिमेंशिया ( Dementia ) को रोकती है।

बुफालो यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर शोधकर्ता यिंग जू ने कहा, ''इस तरह के अवलोकन का मतलब है कि अल्जाइमर पैथोलॉजी को कुछ हद तक मस्तिष्क द्वारा कुछ हद तक बर्दाश्त किया जा सकता है, ऐसा प्रतिपूरक प्रक्रिया के कोशिकीय व सिनेप्टिक स्तर पर चलने की वजह से है।''

जू ने कहा, ''हमारे नए शोध के अनुसार, बीपीएन14770 मल्टीपल बॉयोलॉजिकल प्रक्रियाओं को सक्रिय करने में सक्षम हो सकती है, यह प्रक्रियाएं दिमाग को याददाश्त की कमी, तंत्रिका संबंधी क्षति व बॉयोकेमिकल हानि से रोकती हैं।

क्या है अल्जाइमर राेग ( what is Alzheimer's disease )
अल्जाइमर रोग (Alzheimer's Disease) रोग 'भूलने का रोग' है। जाे कि अलोइस अल्जाइमर के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने सबसे पहले इसका विवरण दिया। इस बीमारी के लक्षणों में याददाश्त की कमी होना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना तथा फिर इसकी वजह से सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं की गंभीर स्थिति आदि शामिल हैं। रक्तचाप, मधुमेह, आधुनिक जीवनशैली और सर में कई बार चोट लग जाने से इस बीमारी के होने की आशंका बढ़ जाती है। अमूमन 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है।

अल्जाइमर राेग के लक्षण ( Alzheimer's disease symptoms )

याददाश्त खोना - राेजमर्रा की जरूरी बाताें काे भूलना डीमेंशिया का सबसे सामान्य आरंभिक लक्षण है। व्यक्ति अक्सर भूलने लगता है और बाद में उसे याद नहीं कर पाता।

सामान्य कामकाज करने में कठिनाई - डीमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति राेजमर्रा के काम, जैसे खाना बनाना, फाेन उठाना, कपड़े बदलना, सफार्इ आदि करने में दिक्कत आती है।

भाषा के साथ समस्या - अल्जाइमर बीमारी ( Alzheimer's ) का मरीज साधारण शब्द या असामान्य समानार्थक शब्द भूलने लगता है और उसकी बोली या लिखावट अस्पष्ट होती जाती है। उदाहरण के लिए वह टूथब्रश भूल जाता है और अपने मुँह के लिए वह चीज माँगता है।

समय और स्थान में असमन्वय - अल्जाइमर का मरीज अपने पड़ोस में भी खो जाता है। वह यह भूल जाता है कि वह कहाँ है, वहाँ वह कैसे आया और घर वापस कैसे जाना है।

निर्णय लेने में कठिनाई या गलत निर्णय - अल्जाइमर का मरीज अनाप-शनाप कपड़े पहन सकता है, गरमी में बहुत से कपड़े या ठंड में काफी कम कपड़े। उसके निर्णय लेने की क्षमता कम होती है। वह अंजान लोगों को बहुत सारे पैसे दे सकता है।

संक्षिप्त सोच में समस्या - अल्जाइमर का मरीज ( Alzheimer's ) कठिन मानसिक कार्यों में असामान्य कठिनाई महसूस करने लगता है, जैसे वह यह नहीं समझ पाता कि कोई संख्या क्यों है और उनका उपयोग कैसे किया जाता है।


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High Blood Pressure: बाॅॅॅडी में अचानक हाें ये बदलाव ताे न करें नजरअंदाज


High blood pressure: हार्इ ब्लड प्रेशर मध्यम व बड़ी उम्र के लाेगाें में संज्ञानात्मक गिरावट ( cognitive decline ) ( सुनने, याद रखने, एकग्रता की कमी ) काे बढ़ावा देता हैं। लेकिन सही समय पर इलाज से इस समस्या काे कम किया जा सकता है। यह बात हाल में हुए एक शाेध में सामने आर्इ है।

अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एल एच लुमे ने कहा कि शाेध में मिली जानकारी महत्वपूर्ण है।क्योंकि उच्च रक्तचाप और संज्ञानात्मक गिरावट ( high blood pressure and cognitive decline ) उम्र बढ़ने से जुड़ी दो सबसे आम समस्याएं हैं। आैर पूरी दुनिया में आधे से ज्यादा लाेग इस समस्या ये जूझ रहे हैं।

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के 2017 के उच्च रक्तचाप दिशानिर्देशों ( Hypertension Guidelines ) के अनुसार, उच्च रक्तचाप लगभग 80 मिलियन अमेरिकी वयस्कों और एक अरब लोगों को वैश्विक रूप से प्रभावित करता है। मस्तिष्क के स्वास्थ्य और उच्च रक्तचाप के बीच संबंध पर आधारित इस शोध में शोधकर्ताओं ने इस बात जांच की कि उच्च रक्तचाप मस्तिष्क के रक्त वाहिकाओं को कैसे प्रभावित करता है, जाेकि व्यक्ति की याददाश्त,बाेलचाल आैर साेचने के तरीके काे बदल देते हैं।

शोधकर्ताओं ने 2011-2015 के बीच चीन के स्वास्थ्य और सेवानिवृत्ति अनुदैर्ध्य अध्ययन (CHARLS) से लगभग 11,000 वयस्कों पर एकत्रित आंकड़ों का विश्लेषण किया, ताकि यह आकलन किया जा सके कि उच्च रक्तचाप और इसके उपचार संज्ञानात्मक गिरावट को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।

शाेध में उच्च रक्तचाप को 140 मिलीमीटर पारा (एमएमएचजी) या उच्चतर के सिस्टोलिक रक्तचाप और 90 एमएमएचजी या उच्चतर के डायस्टोलिक रक्तचाप के रूप में परिभाषित किया गया था।

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के दिशानिर्देशों के अनुसार, उच्च रक्तचाप को 130 mmHg या उच्चतर या 80 mmH या उच्चतर डायस्टोलिक रीडिंग के रूप में परिभाषित किया गया है।

चीन में अध्ययन के लिए, शोधकर्ताओं ने अपने उच्च रक्तचाप के उपचार, शिक्षा के स्तर के बारे में घर पर अध्ययन प्रतिभागियों का साक्षात्कार किया और नोट किया कि वे एक ग्रामीण या शहरी वातावरण में रहते थे।उन्हें संज्ञानात्मक परीक्षण करने के लिए भी कहा गया था, जैसे कि मेमोरी क्विज के हिस्से के रूप में तुरंत शब्दों को याद करना।चार साल के अध्ययन में कुल मिलाकर अनुभूति स्कोर में गिरावट आई।

55 वर्ष और उससे अधिक आयु उच्च रक्तचाप से ग्रसित प्रतिभागियों में,सामान्य प्रतिभागियों की तुलना में संज्ञानात्मक गिरावट की दर में तेजी से वृद्धि देखी गई।उच्च रक्तचाप ( high blood pressure ) का उपचार लेने वाले आैर सामान्य रक्तचाप वाले लोगों में संज्ञानात्मक गिरावट ( cognitive decline ) की दर समान थी।हालांकि अध्ययन में ये खुलासा नहीं हाे सका है कि उच्च रक्तचाप काैन सा इलाज संज्ञानात्मक गिरावट को कम करने में महत्वपूर्ण है।

शाेध के लेखक लेखक शूमिन रुई , जीवविज्ञानी कोलंबिया विश्वविद्यालय मेलमैन स्कूल, ने कहा कि हमें लगता है कि उच्च रक्तचाप की जांच का विस्तार करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए, क्याेंकि कर्इ लाेगाें काे इस बात का पता नहीं है कि वे उच्च रक्तचाप से ग्रसित हैं जिसका इलाज किया जाना चाहिए" ।

उन्हाेनें कहा की यह अध्ययन चीन में मध्यम आयु वर्ग और बड़ी आयु के लाेगाें पर केंद्रित है, लेकिन हमारा मानना है कि हमारे परिणाम कहीं और की आबादी पर भी लागू हो सकते हैं।हमें यह समझने की आवश्यकता है कि उच्च रक्तचाप के उपचार द्वारा संज्ञानात्मक गिरावट ( high blood pressure and cognitive decline ) से कैसे बचा जा सकता है।


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कैंसर से बचाएंगी ये आदतें, जानें इनके बारे में


कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसके पूरी तरह ठीक होने की संभावना कम ही होती है। साथ ही एक बार उपचार के बाद भी इसके दोबारा होने का खतरा रहता है। ऐसे में कुछ आदतों को अपनाकर इसके खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है।

त्वचा कैंसर से बचाव -
अत्यधिक सन एक्सपोजर से की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में यूवी किरणों से बचने के लिए ऐसे कपड़े पहनें जिनसे ज्यादा शरीर कवर रहे व सनग्लास का उपयोग करें।

फल-सब्जी खाएं -
इनमें पर्याप्त मात्रा में फाइबर व अन्य पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। फाइबर कैंसर पैदा करने वाली फ्री-रेडिकल्स को गेस्ट्रोइन्टेस्टाइनल ट्रैक तक नहीं पहुंचने देते जिससे इसके होने की आशंका कम हो जाती है। इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में फल-हरी सब्जियां खाने से आहार नली में कैंसर का खतरा घटता है।

कार्बोहाइड्रेट फूड्स कम लें -
का र्बोहाइड्रेट फूड्स जैसे सफेद चावल, पास्ता व शक्कर शरीर में ऊर्जा व ग्लूकोज का स्त्रोत होते हैं, लेकिन इन्हें ज्यादा खाने से बचना चाहिए। ये खाद्य पदार्थ शरीर में ब्लड शुगर का लेवल बढ़ाने के साथ ब्रेस्ट कैंसर का खतरा भी बढ़ाते हैं।

वजन नियंत्रित रखें -
अत्यधिक वजन से पेट, ब्रेस्ट व गर्भाशय कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। दरअसल इन अंगों में फैट बढ़ने से ट्यूमर होता है। साथ ही फैट टिश्यू अत्यधिक मात्रा में एस्ट्रोजन पैदा करते हैं, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ता है। मोटे लोगों का इंसुलिन स्तर बढ़ने से भी ट्यूमर होने का खतरा बढ़ता है।

वैक्सीनेशन-
वैक्सीनेशन से कई रोगों का बचाव संभव है। हेपेटाइटिस-बी का टीका क्रोनिक लिवर रोग व लिवर कैंसर से बचाने में मददगार है। वैसे ही ह्यूमन पैपीलोमा वायरस (एचपीवी) का इन्फेक्शन सर्वाइकल कैंसर का खतरा बढ़ाता है। ऐसे में चिकित्सक के परामर्श से इसका वैक्सीनेशन कराया जा सकता है।


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obsessive compulsive disorder: एक ही काम बार-बार करना यानी ओसीडी


obsessive compulsive disorder: अक्सर छोटी-छोटी बातों को लेकर अधिक सोचना, घर से बाहर निकलने से पहले लाइट, पंखों व गैस को 5-6 बार देखना कि वे बंद है या नहीं, हाथों को बार-बार साबुन से धोना, चीजें सही जगह पर न मिलने पर परेशान या गुस्सा होना, हर काम में दूसरों की राय बार-बार लेना या एक ही काम को बार-बार करने की आदत जैसे लक्षण ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर के हो सकते हैं।

ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर ( obsessive compulsive disorder ) सनक ( obsession ) और विवशता ( compulsion ) से मिलकर बना है।जिसकी वजह से व्यक्ति बार-बार बिना चाहे वह काम करता है जाे वह कर चुका है। जैसी गेट बंद करने के बाद बार-बार यह देखना की गेट बंद है के नहीं, जब कि उसे मालूम हाेता की वह गेट बंद हैं। पर फिर भी वह उसे बार-बार देखता है। इस तरह की स्थिति राेगी काे अंशात बना देती है। समय पर इलाज ना लेने से स्थिति गंभीर हाे जाती है।

इलाज
6 माह या इससे ज्यादा समय से लक्षण हैं तो ओसीडी ( obsessive compulsive disorder ) हो सकता है। रोग की गंभीरता के अनुसार दवाओं व थैरेपी से इलाज करते हैं। ज्यादातर मामलों मेें संज्ञानात्मक व्यवहारजन्य थैरेपी (सीबीटी) की मदद लेते हैं। गंभीर अवस्था में एंटीडिप्रेशन दवाएं भी दी जाती हैं।


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आयरन की पूर्ति करेगा कोकोनट चॉकलेट लड्डू, जानें बनाने का तरीका


घर पर आसानी से तैयार होने के कारण ये लड्डू काफी हैल्दी हैं। इनमें कैल्शियम, विटामिन व आयरन हैं। ये हड्डियों को मजबूती देते हैं।

सामग्री: डेढ़ कप कसा हुआ नारियल, आधा बाउल डार्क चॉकलेट, एक कप कंडेंस्ड मिल्क, सौंफ आदि।

एक माइक्रोवेव में डार्क चॉकलेट 30 मिनट के लिए या फिर आप गैस पर भी चॉकलेट को पिघला सकते हैं। अब कसे हुए नारियल में थोड़ा -थोड़ा कर कंडेंस्ड मिल्क डालकर मिश्रण मिलाएं। यह तब तक मिलाएं जब तक कि मिश्रण लड्डू बनने जैसा न हो जाए। अब मिश्रण को छोटे-छोटे लड्डुओं का रूप दें। एक प्लेट को एल्युमिनियम फॉयल से ढक दें। फिर माइक्रोवेव में रखी चॉकलेट निकालकर थोड़ी देर ठंडी होने के लिए रखें। ध्यान रहे चॉकलेट बिल्कुल ठंडी न करें। अब नारियल के लड्डुओं को चॉकलेट में डिप कर फॉयल लगी प्लेट पर निकालें। आप चाहें तो इन्हें सौंफ आदि से डेकोरेट कर सकते हैं। फिर 5 मिनट के लिए फ्रिज में रखें। निकालकर खाएं चॉकलेटी कोकोनट लड्डू।


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Passive smoking: पैसिव स्मोकिंग से हड्डियां कमजोर


Passive smoking: बचपन में पैसिव स्मोकिंग (धूम्रपान करने वाले के पास रहने वाले) के दायरे में रहने से युवावस्था में रुमेटॉयड आर्थराइटिस का खतरा रहता है। रुमेटोलॉजी की एनुअल यूरोपियन कॉन्फ्रेंस में हुए एक शोध के दौरान यह बात सामने आई। यह जोड़ों से जुड़ी समस्या है। जिसमें हाथ-पैर के जोड़ों प्रभावित होते हैं।

पैसिव स्मोकिंग के खतरे ( passive smoking dangers )

दिल की बीमारियों का रहता है खतरा:
पैसिव स्मोकिंग से कार्डियोवेस्कुलर सिस्टम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसका धुंआ रक्त की धमनियों पर कार्टिसोल जमा कर देता है जिससे रक्त प्रवाह अवरोधित हो जाता है इससे गंभीर बीमारी होने का खतरा पैदा हो जाता है। इससे दिल का दौरा भी पड़ सकता है इसलिए पैसिव स्मोकिंग से दूर रहने का प्रयास करें।

छोटे बच्चों के लिए हानिकारक:
माता-पिता को अपने बच्चों को सिगरेट के हानिकारक धुएं से दूर रखना चाहिए। बच्चों के फेफड़े अधिक संवेदनशील होते हैं इससे उन्हें ब्रोकाइटिस, संक्रमण, खांसी, अस्थमा का अटैक होने से गंभीर बीमारी हो सकती है।

गर्भपात का डर:
पैसिव स्मोकिंग का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव तब होता है जब गर्भवती मां के शरीर में ये धुंआ लगातार पहुंचता है। इससे सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम होने का खतरा रहता है, जिससे गर्भपात होने की आशंका रहती है। इसलिए गर्भवती महिला को इससे दूर रहना चाहिए।


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मेनोपॉज के बाद बढ़ सकता है कैंसर का खतरा


महिलाओं में मेनोपॉज की औसत उम्र 47 वर्ष के लगभग होती है। लेकिन जिन महिलाओं में चालीस की उम्र के बाद भी यदि एक वर्ष तक माहवारी न आए तो यह स्थिति भी रजोनिवृत्ति की है। ऐेसे में यदि इस दौरान भी रक्तस्त्राव हो तो सतर्क होने की जरूरत है। यह सर्विक्स, यूट्रस या ओवरी के कैंसर का लक्षण हो सकता है। मेनोपॉज के बाद रक्तस्त्राव चाहे मामूली ही क्यों न हो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। वर्ना लापरवाही से कैंसर एडवांस स्टेज में पहुंच सकता है।

युवा व किशोरावस्था
युवावस्था में गर्भाशय ग्रीवा या 'सर्विक्स' कैंसर के मामले कम होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह कैंसर एचपीवी वायरस के संक्रमण से होता है जो शारीरिक संबंध के दौरान महिला के शरीर में प्रवेश करता है। कम उम्र में यदि यह संक्रमण होता भी है तो ज्यादातर मामलों में यह स्वत: खत्म हो जाता है। यदि खत्म न हो तो कैंसर का रूप लेने में इसे एक साल या इससे अधिक समय लग सकता है। वहीं यूट्रस की गांठें किशोरावस्था व युवावस्था में भी पाई जाती हैं। इनमें से कुछ कैंसर की भी हो सकती हैं। इलाज जरूरी है।

प्रमुख जांचें
शुरुआती अवस्था में जांचों से इस कैंसर से बच सकते हैं। इस स्टेज पर इलाज संभव है। वर्तमान में सर्विक्स कैंसर से बचाव के लिए एचपीवी (ह्यूमन पैपीलोमा वायरस) वैक्सीन उपलब्ध है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 21 वर्ष से अधिक उम्र की हर महिला को पैप स्मीयर टैस्ट करवाना चाहिए। कोई खराबी न आने पर इसे तीन वर्ष बाद पुन: करवाते हैं। वहीं 30 की उम्र के बाद इस टैस्ट के साथ एचपीवी-डीएनए जांच करवाते हैं। इनके सामान्य पाए जाने पर 5 साल बाद पुन: करवाते हैं। कैंसर की पुष्टि होने पर कॉल्पोस्कोपी व बायोप्सी करते हैं। यदि परिवार में स्तन कैंसर की हिस्ट्री है तो डॉक्टरी सलाह पर साल में एक बार मेमोग्राफी करवानी चाहिए।

अधिक मामले
जननांगों से जुड़े विभिन्न कैंसर में से ओवरी के कैंसर में मृत्यु दर अधिक होती है। शुरुआती अवस्था में इस कैंसर की पहचान करने वाले टैस्ट उपलब्ध न होने से मामले गंभीर स्थिति में सामने आते हैं। अंडाशय में कोई गांठ महसूस हो (विशेषकर किशोरावस्था व मेनोपॉज के बाद) या जी घबराने, पेट में भारीपन, कब्ज आदि को सामान्य मानकर न टालें। एक माह तक यदि ये लक्षण महसूस हों तो सतर्क हो जाना चाहिए। साथ ही घर में पहले से यदि किसी को ओवरी या ब्रेस्ट कैंसर है तो उनमें भी यह हो सकता है।


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सर्दी-जुकाम या गले में परेशानी होने पर भी बहता कान


बिना डॉक्टरी सलाह के कान में कुछ न डालें, इससे संक्रमण की आशंका बढ़ती है। 20% मामलों में सड़क हादसे व तेज आवाज से सुनने की क्षमता पर असर होता है। सीटी स्कैन व एक्सरे से कान की मांसपेशियों की जांच करते हैं। हियरिंग टैस्ट के तहत टिम्पैनोग्राम या ऑडियोमेट्री करते हैं। कान बहने के दौरान सिर्फ रक्त व पस या दोनों का एकसाथ आना, पारदर्शी पदार्थ या तरल निकलने पर तय होता है इलाज।

हमारा कान मुख्य रूप से तीन भागों से मिलकर बना होता है। पहला, बाहरी हिस्सा है जिसमें पिन्ना व कैनाल आते हैं। दूसरे हिस्से में कान के पर्दे के पीछे स्थित तीन सूक्ष्म हड्डियांं होती हैं। इसमें मेलियस, इंकस, स्टेपिस के अलावा यूस्टेशियन ट्यूब होती है। तीसरे (आंतरिक) भाग लेबिरिन्थ में कैनाल व सूक्ष्म संरचना होती है। इस संरचना यानी ट्यूब के बंद होने से कान बहने जैसी समस्या सामने आती है।

प्रमुख कारण - सर्दी, खिचखिच या गले में दिक्कत यदि एक हफ्ते से ज्यादा है तो कान को नुकसान हो सकता है। ऐसा नाक के पिछले व गले के ऊपरी भाग में मौजूद यूस्टेशियन ट्यूब में संक्रमण के कारण आई सूजन के बने रहने से पर्दे में छेद से होता है जिससे कान बहने लगता है। 20 प्रतिशत मामलों में सड़क हादसे या किसी अन्य तरह से कान पर या आसपास चोट लगने व अचानक तेज आवाज से सुनने में मददगार हड्डियों में चोट लग जाती है। जिससे सुनाई देना कम हो जाता है व मवाद आने लगती है।

ध्यान दें -
कई बार कुछ लोगों को कान से सनसनाहट या घंटी बजने की आवाज आने की समस्या होती है। इसे मेडिकल की भाषा में रिंगिग व बजिंग कहते हैं। ऐसा लंबे समय से हो तो कान के पर्दे में छोटा छेद हो सकता है जिसे स्मॉल सेंट्रल परफोरेशन कहते हैं। इन लक्षणों का इलाज जरूरी है। नाक की हड्डी टेढ़ी होने से भी कान संबंधी परेशानी होती है।

लक्षण -
कान बहने के साथ बुखार, चिड़चिड़ाहट और बेचैनी।
गंभीर अवस्था में कान में अचानक दर्द व भारीपन महसूस होना। ऐसे में कान बहना पहले शुरू होता है व दर्द बाद में होता है।
कान लगातार बहता है तो सुनाई कम देता है। यह समस्या कान में अंदर तक होने से बदबू आने के साथ कई बार खून भी आ सकता है।


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chronic myeloid leukemia - तेजी से फैलती हैं ब्लड कैंसर की कोशिकाएं


क्रॉनिक मायलॉइड ल्यूकीमिया ( chronic myeloid leukemia ) ब्लड कैंसर ( Blood Cancer ) का एक प्रकार है जो किसी व्यक्ति के खून में जीन 9 व 22 की अदला-बदली से होता है। इससे बोनमैरो में रक्त कोशिकाएं असंतुलित हो जाती हैं और सफेद रक्त कोशिकाओं (डब्लयूबीसी) की संख्या बढ़ जाती है। चूंकि खून शरीर के सभी हिस्सों में जाता है, ऐसे में इसके साथ बेकाबू रूप से बढ़ी हुई कोशिकाएं स्वस्थ सेल्स को भी प्रभावित करती हैं। यही क्रॉनिक मायलॉइड ल्यूकीमिया है। युवाओं व बुजुर्गों को यह ज्यादा होता है।

इस बीमारी का पता कैसे चलता है?
प्रारंभिक अवस्था में इसके कोई खास लक्षण सामने नहीं आते हैं। सामान्य लक्षणों में थकान रहना, खून की कमी, अचानक वजन घटना, बार-बार बुखार आना, पसीना ज्यादा आना, भूख न लगना या थोड़ा खाने पर ही पेट भर जाना या पेट फुलाव आदि हैं। रोग की पहचान के लिए डॉक्टरी सलाह से ब्लड टैस्ट करवाना चाहिए। साथ ही बोनमैरो की बायोप्सी जांच से भी इसका पता चल जाता है।

इसका असर कब होता है? इसकी स्टेज क्या हैं?
यह रोग धीरे-धीरे असर दिखाता है। अन्य कैंसर की तरह इसकी भी कई स्टेज हैं। पहली स्टेज शुरुआत के ३-४ साल बाद दिखती है। दूसरी में कैंसर तेजी से बढ़ता है और तीसरी में स्थिति बेकाबू हो जाती है। जब रक्त की कोशिकाएं असंतुलित होकर पूरे शरीर में घुमती हैं तो स्थिति गंभीर हो जाती है।

बीमारी के मुख्य कारण क्या हैं?
तिल्ली या लिवर का आकार बढ़ने, रेडिएशन, प्रदूषण, बैक्टीरिया वाले भोजन से जीन खराब और रक्तकोशिकाएं प्रभावित होती हैं।

इससे बचने के उपाय क्या हैं?
शुरुआती स्टेज में जांचों से रोग पर काबू पा सकते हैं। ऐसे में इसे डायबिटीज, बीपी की तरह रोज मात्र एक गोली लेने से ही कंट्रोल कर सकते हैं। कीमोथैरेपी व बोनमैरो ट्रांसप्लांट भी करा सकते हैं।


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Postnatal Depression - शिशु की परवरिश को लेकर बना रहता है डर


प्रसव के बाद 20-25 फीसदी महिलाओं के दिमाग में कई भ्रम पैदा होने लगते हैं जिस कारण वे न तो शिशु की सही देखभाल कर पाती हैं और न ही पालन-पोषण और परिवार की जिम्मेदारी निभाने में तालमेल बैठा पाती हैं। यह स्थिति पोस्टनेटल डिप्रेशन की होती है जो बच्चे से ज्यादा मां को प्रभावित करती है।

ऐसे भ्रम पैदा होते :
बच्चे का पालन-पोषण ठीक से कर पाउंगी या नहीं, प्रसव के बाद फैमिली सपोर्ट मिलेगा या नहीं, शिशु की परवरिश के लिए शारीरिक रूप से सक्षम हूं या नहीं... ये भ्रम प्रसव के बाद महिला के मन में रहते हैं। ऐसा लगभग 6 हफ्तों तक होना सामान्य है लेकिन इससे ज्यादा समय तक ऐसे खयाल गंभीर डिप्रेशन की ओर इशारा करते हैं। कई बार लंबे समय तक इस समस्या से पोस्टपार्टम साइकोसिस हो सकता है जो दुर्लभ बीमारी के रूप में सामने आता है।

ये हैं वजह :
हार्मोन्स में बदलाव होना प्रमुख है। कई बार किसी बीमारी, परेशानी या पोषक तत्त्वों की कमी के चलते गर्भावस्था के दौरान दवाओं का कोर्स पूरा ना लेने या इनके दुष्प्रभाव से भी महिला का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। घर की जिम्मेदारी के साथ यदि व्यवसायिक रूप से व्यस्त हैं तो भी दोनों के बीच तालमेल बनाने का तनाव भी मानसिक और व्यवहारिक रूप से असर करता है।

लक्षण:
इस समस्या के लक्षण अलग-अलग महिला में भिन्न हो सकते हैं। साथ ही दिन-ब-दिन इनकी गंभीरता कम होने लगती है। बिना कारण उदास रहना और रोना, थकान होने के बावजूद नींद न आना या जरूरत से ज्यादा देर तक सोते रहना, बच्चे की परवरिश, परिवार के सहयोग व जिम्मेदारी और समाज के साथ से जुड़े नकारात्मक विचार आना प्रमुख हैं। कई बार मां खुद को नुकसान पहुंचाने जैसा गंभीर कदम तक उठा लेती है।

ऐसे होगा इलाज
मनोरोग फैमिली हिस्ट्री जानकर, बातचीत कर समस्या को समझते हैं। इसके बाद रोग और इसकी गंभीरता को जानने के बाद इलाज तय करते हैं। प्राथमिक उपचार के तौर पर काउंसलिंग की मदद ली जाती है। लेकिन कई बार एंटीडिप्रेसेंट दवाओं से भी लक्षणों को धीरे-धीरे कम किया जाता है। हार्मोन्स का स्तर बेहद कम होने पर कई बार हार्मोनल थैरेपी भी चलाई जाती है। महिला को फैमिली सपोर्ट देने की सलाह देते हैं।


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रेटिना में खराबी से कमजोर हो जाती है आंखों की राेशनी


रेटिना आंखों का पर्दा है जो सबसे पीछे की परत पर होता है। इसमें मौजूद फोटोकेमिकल चैनल्स ऑप्टिक नर्व से दिमाग को सिग्नल्स देते हैं। जिससे आंखों को देखने का इशारा मिलता है। इस प्रक्रिया में एक सेकंड से कई गुना कम समय लगता है। रेटिना नर्वस सिस्टम से जुड़ा है। इसमें कोई तकलीफ होने पर आंखों की रोशनी बरकरार नहीं रहती।

रेटिना संबंधी रोग
रेटिना के साथ आंखों में दो कॉर्निया, लेंस व दो लिक्विड चैंबर्स और बाहरी हिस्से में दस लेयर होती हैं। जिनमें बेहद महीन रक्त नलिकाएं होती हैं। इनमें कोई संक्रमण या किसी रोग के कारण खराबी आ जाती है। मधुमेह रोगियों में ब्लड शुगर लेवल के असंतुलन से रेटिना की रक्तनलिकाओं का आकार बिगड़ने लगता है व धीरे-धीरे वे डैमेज हो जाती हैं। पर्दे पर रक्त के थक्के जमने से पीडि़त को धुंधला दिखाई देने की शिकायत होती है। अधिक उम्र संबंधी आंख की समस्या मैक्युलर डिजनरेशन में भी रेटिना के मध्य भाग की कोशिकाओं में खराबी और कमजोरी आने पर रिसाव होने लगता है।

लक्षण : नजर कमजोर होना, आंखों के किनारे वाले भागों में अंधेरा छाना, पढऩे में दिक्कत होना और गंभीर अवस्था में तेज दर्द होता है।

इलाज
पौष्टिक खानपान (हरी सब्जियां व फल) से आंखों को स्वस्थ रखें। संक्रमण होने पर बिना डॉक्टरी सलाह के आईड्रॉप प्रयोग में न लें। साल में एक बार व जो डायबिटिक हैं उन्हें साल में दो बार आई चैकअप करवाना चाहिए। लेजर तकनीक से सर्जरी करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार गर्म पानी में रुई डुबोकर निचोड़ें। इससे आंखों की सिकाई करें।

ये ध्यान रखें
- आंखों के रेटिना, कॉर्निया और लिक्विड चैंबर्स को सुरक्षित रखने के लिए ड्राइविंग करते समय हेलमेट जरूर पहनें।
- चश्मा इस्तेमाल में लें।
- मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल व हाई बीपी को नियंत्रित रखें।
- धूम्रपान व शराब से दूरी बनाएं।
- दिन में 2-3 बार आंखों पर सामान्य पानी के छींटें दें।
- भ्रामरी प्राणायाम और योग से भी आंखों को लाभ मिलता है।
- त्रिफला चूर्ण और आंवला खाएं।
- बादाम, मुनक्का, सौंफ, गाय का देसी घी खाने में नियमित इस्तेमाल करने से आंखें स्वस्थ रहती हैं।


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लाइपोमा: बिना दर्द की चर्बीवाली गांठें, न करें नजरअंदाज


लाइपोमा एक सामान्य रोग है जिसे चर्बी से बनी गांठ कहते हैं। ये गांठें एक जगह इकट्ठी होकर उभर आती हैं। खास बात है कि इनसे शरीर को कोई नुकसान नहीं होता। सिर्फ एक फीसदी मामले ही इनके कैंसर कोशिकाओं में तब्दील होने के आते हैं। ये 40-50 वर्ष की आयु वालों में अधिक होती हैं। इनका आकार 1-3 सेमी. होता है। ये गांठें त्वचा पर उभरी हुई व कई बार पेट या किसी अन्य अंग के अंदर भी ये बनने लगती हैं। इन्हें छूने पर गुदगुदी का अहसास होता है व दबाने से इनमें जमा फैट इधर-उधर चला जाता है।

गर्दन, कंधे, कमर, पीठ, पेट, बाजुओं और जांघों पर खासकर उभरने वाली गांठें शरीर के किसी भी हिस्से और अंग में हो सकती हैं। यह उभार तीन तरह का होता है- फैटी टिश्यु, ट्यूमर व कोशिकाओं का स्वत: बढ़ना। बच्चों में होने वाला लाइपोमा दुर्लभ होता है जिसके मामले कम ही सामने आते हैं।

कारण
लाइपोमा के स्पष्ट कारणों का पता अभी तक नहीं चला है। लेकिन दो मुख्य कारणों से यह समस्या सामने आती है। पहला लाइपोमेटोसिस, जो आनुवांशिक समस्या है। इसमें त्वचा-मांसपेशियों के बीच के हिस्से में गांठ बनती है। दूसरा मोटापा, जिसमें चर्बी वाली कोशिकाएं शरीर के विभिन्न हिस्सों में किसी एक जगह एकत्र होकर धीरे-धीरे गांठ का रूप लेती हैं। इनके अलावा जो लोग अधिक फास्ट फूड, डीप फ्रिज में रखा भोजन, मिठाई, नमकीन, बटर, घी, चीज और या फिर इनके साथ कोल्डड्रिंक अधिक पीते हैं उनमें इस तरह की गांठें बनने की आशंका अधिक होती है।

इलाज
आयुर्वेद में गुनगुना पानी पीने, सुपाच्य भोजन करने की सलाह देते हैं। पंचकर्म, शोधनवस्ती प्रक्रिया के अलावा उभार कम करने के लिए गांठ पर औषधियों का लेप लगाते हैं। कई बार चीरा लगाकर गांठ में मौजूद गाढ़े तत्त्व को निकालकर शोधन औषधियों का लेप लगाते हैं ताकि समस्या दोबारा न हो। होम्योपैथी में इसे साइकोटिक मियाज्म रोग कहते हैं। लक्षणों के अनुसार कैलकेरिया व लैपीसाइलबाई दवा रोगी को देते हैं।

लापरवाही न बरतें
शरीर के किसी भी अंग में गांठ उभरे तो डॉक्टरी सलाह जरूरी लें। कई बार गांठ के बने रहने से व्यक्ति तनाव में रहने लगता है जिससे स्थिति बिगड़ सकती है।

सिकाई न करें
शरीर पर बनी कोई भी गांठ की सिकाई बिना डॉक्टरी सलाह के न करें। खासकर यदि गांठ लाइपोमा की और उसके अंदर का फैट दबने पर इधर से उधर हो तो। इन गांठों को लेकर लोग सोचते हैं कि सिकाई से ये सिकुड़ कर कम हो जाएंगी। जबकि ऐसा नहीं है। सिकाई करने से भीतर की चर्बी जलती है व अंदर ही अंदर जानलेवा संक्रमण हो सकता है।

नसों पर गांठ होने पर होता दर्द
लाइपोमा यदि नसों पर उभर जाए तो इनमें दर्द होने लगता है। ऐसे में वजह जानने के लिए सीटी स्कैन, एमआरआई, एक्स-रे या अल्ट्रासाउंड जांच कराई जाती है। सर्जरी से दर्द वाली गांठों का इलाज होता है व जल्द से जल्द इन्हें निकलवा देना चाहिए। वहीं शरीर पर कोई गांठ ऐसी बनी हो जो दर्द नहीं कर रही है और ठोस है तो सतर्क होने की जरूरत है। ये गांठ कैंसर की हो सकती है। ऐसे में विशेषज्ञ तुरंत फाइन निडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी (एफएनएसी) जांच कराने की सलाह देते हैं। कुछ मामलों में गांठ की बायोप्सी जांच के तहत इसके अंदर सुई डालकर कुछ हिस्सा बाहर निकाल लेते हैं। इसमें मौजूद लिक्विड व अन्य पदार्थ की जांच कर पता करते हैं कि वे कैंसर है या नहीं।


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नमी के मौसम में फैल सकता है स्किन इंफेक्शन, एेसे करें बचाव


नमी के मौसम में पसीना निकलना आम बात है। लेकिन थोड़ी सी भी लापरवाही से इंफेक्शन गंभीर हो सकता है। यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब किसी माध्यम से दूसरों के संक्रमित पसीने के संपर्क में आते हैं। जिम में, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, खेल का मैदान, झूले या भीड़ भाड़ वाली जगहों से संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है।

त्वचा का संक्रमण
मेथिसिलिन रेजिस्टेंट स्टेफाइलोकोकस ऑरियस स्किन इंफेक्शन की प्रमुख वजह है। यह कई एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी होता है इसलिए इसका इलाज आसान नहीं होता। इसकी वजह से त्वचा पर घाव-फुंसियां होने लगती हैं। संपर्क में आने के बाद यह आसानी से फैलता है।

हेपेेटाइटिस-बी वायरस
आमतौर पर मानते हैं कि एचबीवी खुले घाव या म्यूकस की झिल्ली से फैलता है लेकिन ओलंपिक कुश्तीबाजों पर हुई एक स्टडी के अनुसार 11 फीसदी प्रतिभागियों के पसीने में वायरस पाया गया। यह स्टडी ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोट्र्स में प्रकाशित हो चुकी है।

इंपेटिगो
बच्चों में होने वाला यह त्वचा का संक्रमण है। अधिक पसीना आने वालों में भी इसकी आशंका होती है। त्वचा पर लाल चकत्ते, फुंसियां या फफोले होते हैं।

कोल्ड व फ्लू
वैसे तो इसके वायरस पसीने में नहीं होते लेकिन वायरस को फैलाने में पसीने की अहम भूमिका होती है। छींकने, खांसने या नाक पौंछने से वायरस स्किन पर चिपककर पसीने के जरिए आसानी से दूसरों तक पहुंच जाते हैं।

हर्पीज
कई शोधों में सामने आया कि त्वचा से त्वचा का संपर्क होने पर एसएसवी-1 (हर्पीज सिम्प्लैक्स वायरस) व एचएसवी-2 फैलता है।

ऐसे बचें
भोजन करने या मुंह छूने से पहले हाथ अच्छे से धोएं। दूसरों के कपड़े न पहनें। सार्वजनिक स्थल या परिवहन आदि में कुछ भी छूने के बाद हाथों को सेनिटाइजर से साफ करें या साबुन से धोएं। जिम व स्पोट्र्स उपकरणों से संक्रमण फैलता है। सावधानी बरतें।


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दिमाग की कार्यक्षमता को घटाता है धूम्रपान, एेसे बनाएं दूरी


स्मोकिंग के दौरान निकोटीन बार-बार दिमाग में रिलीज होने वाले डोपामाइन में असंतुलन पैदा करता है। जिससे दिमाग की तंत्रिकाएं धीमा काम करती हैं। इससे अवसाद, व्यवहार में बदलाव व मानसिक विकार के लक्षण दिखते हैं। युवाओं में यह लत तेजी से लगती है।विशेषज्ञाें के अनुसार जितनी जल्दी निकाेटीन की लत काे छाेड़ा जाए उतना अच्छा हाेता है।स्मोकिंग छोड़ने के कुछ समय बाद व्यक्ति को बेचैनी, आलस, भूख न लगना, उल्टी, कमजोरी, गुस्सा, बदनदर्द और चिड़चिड़ापन जैसी समस्या होती है।लेकिन दो हफ्ते में इन लक्षणों में कमी आने लगती है।

निकोटीन छोड़ने के उपाय
मजबूत विलपावर सबसे ज्यादा फायदा करती लेकिन निकोटीन छुड़ाने वाली च्वुइंगम, स्किन पैच, इंहेलर और नेजल स्प्रे भी आजमा सकते।

उपचार
धूम्रपान छोड़ने के बाद व्यक्ति के लक्षणों के आधार पर दवा देते हैं। इन्हें बिना डॉक्टरी सलाह के न लें क्योंकि इस दौरान दवा लेने के बावजूद व्यक्ति को थकान, नींद न आना, कब्ज जैसी दिक्कतें होती हैं जो कुछ दिनों में सामान्य हो जाती हैं।

टबैकम व नक्सवोमिका :
टबैकम तंबाकू से बनी है। सिगरेट छोडऩे के बाद जिन्हें कार व बस में यात्रा के दौरान उल्टी के साथ चक्कर आने, धड़कनों के अचानक बढऩे, अवसाद और दस्त की दिक्कत हो तो यह दवा देते हैं।

इग्नाटिया :
शरीर में ऐठन, बेहोशी, उदासी, गुस्सा करने, जिसने किसी घटना के बाद स्मोकिंग शुरू की हो उसे यह दवा देते हें।

लोंबेलिया :
जो लोग अस्थमा, उल्टी, चक्कर, ठंडा पसीना व अधिक लार आदि की समस्या से पीडि़त हैं उन्हें यह दवा देते हैं।

कैल्डियम सेगुइनम :
जिनमें अधिक बेचैनी के साथ अस्थमा, मिचली, चक्कर आने, सिरदर्द, अवसाद, शोर के प्रति संवेदनशीलता जैसे लक्षण हों उन्हें यह दवा देते हैं।


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बचपन में ही ऑटिज्म की जानकारी देगा टेस्ट


शिशु को ऑटिज्म है या नहीं, इसका पता बचपन में लगाने के लिए अमरीकी वैज्ञानिकों ने फिजियोलॉजिकल टैस्ट विकसित किया है। न्यूयॉर्क के रेनसीलर पॉलीटेक्नीक इंस्टीट्यूट में हुए इस शोध में यह बात सामने आई। रक्त के नमूने से मेटाबोलाइट्स की जांचकर इस रोग का पता लगा सकते हैं।

क्या हाेता है ऑटिज्म
ऑटिज्म एक मानसिक बीमारी है जिसके लक्षण बचपन से ही नजर आने लग जाते हैं। इस रोग से पीड़ित बच्चों का विकास तुलनात्मक रूप से धीरे होता है। ये जन्म से लेकर तीन वर्ष की आयु तक विकसित होने वाला रोग है जो सामान्य रूप से बच्चे के मानसिक विकास को रोक देता है। ऐसे बच्चे समाज में घुलने-मिलने में हिचकते हैं, वे प्रतिक्रिया देने में काफी समय लेते हैं और कुछ में ये बीमारी डर के रूप में दिखाई देती है।

हालांकि ऑटिज्म के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है लेकिन ऐसा माना जाता है कि ऐसा सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचने के कारण होता है। कई बार गर्भावस्था के दौरान खानपान सही न होने की वजह से भी बच्चे को ऑटिज्म का खतरा हो सकता है।

लक्षण:

- सामान्य तौर पर बच्चे मां का या अपने आस-पास मौजूद लोगों का चेहरा देखकर प्रतिक्रिया देते हैं पर ऑटिज्म पीड़ित बच्चे नजरें मिलाने से कतराते हैं।

- ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे आवाज सुनने के बावजूद प्रतिक्रिया नहीं देते हैं।

- ऑटिज्म पीड़ित बच्चों को भाषा संबंधी भी रुकावट का सामना करना पड़ता है।

- इस बीमारी से पीड़ित बच्चे अपने आप में ही गुम रहते हैं वे किसी एक ही चीज को लेकर खोए रहते हैं।

- अगर बच्चा नौ महीने का होने के बावजूद न तो मुस्कुराता है और न ही कोई प्रतिक्रिया देता है तो चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।


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Malaria - दिल के लिए 30 फीसदी अधिक घातक है मलेरिया


एक नए शोध में बताया गया है कि मलेरिया संक्रमण के कारण हृदयघात (हार्ट फेल) होने की 30 फीसदी से अधिक संभावना है।विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के 2018 के आंकड़ों के अनुसार, मच्छरों के कारण होने वाला यह संक्रमण हर साल दुनिया भर में 21.9 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित करता है।

डेनमार्क के हार्लेव जेनटोफ्ट यूनिवर्सिटी अस्पताल के पोस्टडॉक्टरल रिसर्च फेलो फिलिप ब्रेनिन ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा, ''हमने मलेरिया के मामलों में वृद्धि देखी है, जोकि पेंचीदा है। वह इसलिए, क्योंकि इन मामलों में हृदय रोग से संबंधित समस्याओं में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है।"

ब्रेनिन ने कहा, ''हालांकि हमने मलेरिया के मामलों को कम करने के लिए निवारक उपाय किए हैं, लेकिन यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।"

शोधकर्ताओं ने जनवरी 1994 से जनवरी 2017 के बीच मलेरिया संक्रमण वाले रोगियों की पहचान की। इस अध्ययन में रोगियों की औसत आयु 34 थी, जिसमें 58 फीसदी पुरुष शामिल रहे।इस दौरान लगभग चार हजार मलेरिया मामलों की पहचान की गई। इसमें गंभीर मलेरिया के लिए जिम्मेदार 40 फीसदी प्लाजमोडियम फाल्सीपेरम शामिल रहा, जो एक परजीवी मच्छर के काटने से फैलता है।

रोगियों पर 11 साल तक किए गए अध्ययन के बाद हार्ट फेल के 69 मामले सामने आए, जो सामान्य आबादी की तुलना में बहुत अधिक है। इसके अलावा हृदय व रक्तवाहिकाओं संबंधी बीमारियों से कुल 68 मौत के मामले देखने को मिले, जोकि सामान्य सीमा के अंदर ही माना जाता है।

ब्रेनिन ने कहा, ''इन रोगियों में दिल से संबंधित बीमारियों की 30 फीसदी वृद्धि की संभावना पाई गई।" निष्कर्षों को ज्यादा मान्य बनाने के लिए हालांकि और अधिक शोध की आवश्यकता होगी। लेकिन हाल के अध्ययनों में पाया गया है कि मलेरिया मायोकार्डियम (मांसपेशियों का टिश्यू) में जरूरी परिवर्तनों का कारण बन सकता है।

प्रायोगिक अध्ययनों से यह भी पता चला है कि उच्च रक्तचाप के कारण मलेरिया ब्लड प्रेशर की प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, जो हृदयघात का कारण बनता है।इसके अलावा मलेरिया हृदय में सूजन पैदा करने वाली वाहिकाओं (वैसकुलर) को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे फाइब्रोसिस और इसके बाद हृदयघात हो सकता है।

यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी (ईएससी) के अनुसार, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा और कोरोनरी धमनी रोग हृदयघात होने के प्रमुख कारणों में से है।यह निष्कर्ष पेरिस में वल्र्ड कांग्रेस ऑफ कार्डियोलॉजी के साथ ईएससी कांग्रेस-2019 में प्रस्तुत किए गए थे।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के अनुसार, मलेरिया होने की संभावना वाले प्रमुख देशों में शुमार भारत ने इससे निपटने में पर्याप्त सफलता पाई है। परिषद के अनुसार, मलेरिया के मामलों में 80 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। पहले जहां सन 2000 में मलेरिया के 23 लाख मामले सामने आए थे, वहीं 2018 में इनकी संख्या घटकर तीन लाख 90 हजार रह गई है। इसके अलावा मलेरिया से होने वाली मौतों में 90 फीसदी की गिरावट आई है। सन 2000 में जहां मलेरिया के कारण 932 मौत हुई, वहीं 2018 में यह आंकड़ा 85 रहा।


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इन कारणों से हाथ-पैरों में झनझनाहट महसूस होती है


न्यूरोपैथी तंत्रिका से जुड़ा डिसऑर्डर है जिसमेंं मरीज को अक्सर हाथ-पैरों में चीटियों के चलने जैसा महसूस होता है। लोगों में इसके प्रति जागरुकता न होने के कारण इस रोग से पीड़ित मरीजों की संख्या मेंं बढ़ोत्तरी हो रही है। जानते हैं इसके इलाज के बारे में और बचाव का तरीका-

ये हैं लक्षण -
हाथ-पैरों में चीटियां चलने जैसा अहसास। शरीर में कमजोरी व हाथ-पैरों में दर्द होना। सामान्यत: यह दर्द बिजली के करंट जैसा होता है। नसों मे खिंचाव होना और त्वचा का सुन्न पड़ना। इसके अलावा शरीर के संतुलन में कमी होना भी एक लक्षण है।

मुख्य कारण -
डायबिटीज : शरीर में ब्लड शुगर का स्तर बिगड़ने से स्नायुतंत्र कमजोर होने लगता है।
बढ़ती उम्र : इस दौरान दिमाग का कार्य धीमा होने से न्यूरोपैथी होना एक सामान्य समस्या है।
शराब पीना : शराब पीने से दिमाग कमजोर हो जाता है जिससे इस रोग की आशंका रहती है।
संक्रमण : कई तरह का संक्रमण भी तंत्रिका तंतुओं को कमजोर करता है, इसमें एचआईवी मुख्य है।
दुर्घटना : किसी तरह का एक्सीडेंट स्नायुतंत्र को प्रभावित कर न्यूरोपैथी का कारण बनता है।
ऑटोइम्यून डिजीज : जब शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र ही बॉडी के विरुद्ध काम करने लगता है तो न्यूरोपैथी की आशंका रहती है। ऐसे में असमय न्यूरोपैथी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

खानपान पर ध्यान दें -
रोगी को खानपान पर विशेष ध्यान देने की सलाह देते हैं। ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के लिए खानपान में हरी सब्जियां शामिल करें। शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी न हो इसके लिए मौसमी फल खाने के लिए कहते हैं। इसके अलावा नियमित रूप से वॉक करें। साथ ही न्यूरोपैथी से जुड़े लक्षण दिखते ही विशेषज्ञ से संपर्क करें।


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ये लक्षण दिखाई दें तो हो सकती है फैटी लिवर कि समस्या


व्यक्ति जो कुछ भी खाता है उसे पचाने के बाद उसमें से पोषक तत्त्वों को पूरे शरीर में पहुंचाने का काम लिवर करता है। यह अंग शरीर से विषैले तत्त्वों को बाहर निकालता है। साथ ही यहां ऐसे पदार्थ मौजूद हैं जो शरीर में एल्बुमिन, प्रोटीन व खून का थक्का बनाने वाले तत्त्वों के निर्माण में सहायक हैं। लिवर के बिना शरीर में रक्त का संचार संभव नहीं। मेडिकली इसे शरीर का पावर हाउस कहते हैं।

इन्हें रोग का खतरा - शराब पीने और धूम्रपान करने वालों को इस रोग की आशंका अधिक होती है। टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित मरीज, जिनके शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक हो, 50वर्ष से अधिक उम्र के लोग और ज्यादा मात्रा में तलाभुना खाने वालों में इसका खतरा रहता है।

ये हो सकते हैं लक्षण -
लिवर में फैट बढ़ने से अंग का आकार बढ़ जाता है। इस कारण एंजाइम्स की मात्रा बढ़ने से लिवर की क्षमता प्रभावित होती है। आमतौर पर फैटी लिवर के कोई खास लक्षण नहीं। लेकिन जब 30-40 फीसदी फैट लिवर में जमा हो जाए तो भूख न लगना, जी-घबराना, वजन घटना, पेट के ऊपरी भाग में दर्द होता है। गंभीर मामलों में व्यक्ति में पीलिया, लिवर में सिकुड़ने व लिवर सिरोसिस की आशंका बढ़ती है। ज्यादा फैट जमा होने पर पेट में पानी भरने के साथ शरीर में सूजन आती है जिसका असर दिमाग पर होता है। गंभीर स्थिति लिवर फेल्योर की होती है। जिसमें लिवर ट्रांसप्लांट करते हैं।

कारण : जिनका वजन अधिक है उनकी परेशानी बढ़ सकती है। शराब पीने वाले या जिनकी कैंसर की दवा लंबे समय से चल रही है उन्हें मेटाबॉलिक सिंड्रोम की शिकायत हो सकती है। इस कारण शरीर में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है जिससे मधुमेह, हृदय रोग व ब्लड प्रेशर से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं।

इलाज : कारण के आधार पर उपचार तय होता है। संतुलित व पौष्टिक आहार लें। हल्के भोजन के साथ सलाद खाएं। विटामिन- ई व सी युक्त चीजों से लिवर स्वस्थ रहता है। प्रो-बायोटिक्स (हैल्दी बैक्टीरिया) जो दही में मौजूद होते हैं, को दवा के रूप में लें। जन्म के समय से ही बच्चे को हेपेटाइटिस का टीका लगवाएं।

आयुर्वेदिक उपचार -
लिवर को फिट रखने के लिए सुपाच्य भोजन खाएं। तरल पदार्थ जैसे नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी, अनार, सेब समेत अन्य फलों को खाने से पेट ठीक रहता है। चोकर वाली रोटी खाएं। गिलोय, एलोवेरा, कालमेघ, चिरायता, भृंगराज, करेले का जूस, आंवले का पाउडर नियमित लेने से पेट संबंधी कोई समस्या नहीं रहती। गंभीर स्थिति में चूर्ण खिलाकर पेट की सफाई की जाती है।

होम्योपैथी दवा -
रोगी को लक्षणों के अनुसार फॉस्फोरस, कैलकेरिया दवा देते हैं। जिन्हें फैटी लिवर की समस्या अधिक शराब पीने से हुई है उन्हें नक्सवोमिका दवा दी जाती है। वहीं फैटी लिवर के साथ गैस की दिक्कत हो तो लाइकोपोडियम दवा से आराम पहुंचाते हैं। फैटी लिवर के रोगी को खानपान पर विशेष ध्यान देने के साथ नियमित व्यायाम करने की सलाह दी जाती है।


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रीढ़ की हड्डी में लगी चोट से हो सकती है ये समस्याएं


रीढ़ की हड्डी शरीर का सपोर्ट सिस्टम है जिसमें शरीर के हर अंग को चलाने के लिए नसों का गुच्छा होता है। किसी कारण इस हड्डी पर चोट लगने से जब नसों पर दबाव बढ़ता है तो दिक्कतें होती हैं। इस हड्डी में शरीर को चलाने वाले तार होते हैं जिससे दिमाग तक सिग्नल जाता है और हमारा शरीर काम करता है।

इस कारण दिक्कत : तंत्रिका की कोशिकाओं पर चोट लगने से नस पर बन रहे दबाव से परेशानी होती है। ऊंचाई से गिरने पर सीवियर स्पाइन इंजरी होती है। यह स्थिति आंशिक लकवे की होती है जिसमें रोगी को 4-5 माह आराम करना होता है।

लक्षण : गर्दन व कमर में दर्द का समय के साथ बढ़ना, हाथ व पैर में कमजोरी महसूस होना, यूरिन व स्टूल करने पर नियंत्रण खत्म होना, हाथ-पैर में सुन्नपन व झनझनाहट होना, चलने में परेशानी और कंपन होना।

सावधानी बरतें-
यदि बैठकर भारी वजन उठाना है तो संतुलन के साथ उठाएं। कंप्यूटर पर काम करते या ड्राइविंग के समय सीधे बैठें। छोटे बच्चे को गोद में उठाने के लिए बैठ जाएं, फोन का प्रयोग करते समय गर्दन न झुकाएं, कंधे के बजाय पीठ पर बैग टांगें।

सड़क हादसे में खतरा-
सड़क हादसे में रोगी को इंजरी के बाद अस्पताल पहुंचाने में जल्दबाजी करने से उसकी चोट गंभीर हो जाती है। उसे उठाते समय सिर, कमर व पैर के नीचे हाथ लगाकर सीधे उठाएं व क्रैश कार्ट, लकड़ी का पट्टा या हार्ड कार्ड बोर्ड प्रयोग में लेें। रीढ़ की हड्डी सीधी रहेगी व अंदरूनी नसों को नुकसान नहीं होगा।

ऐसे होगा इलाज-
एमआरआई, सीटी स्कैन जांच से रीढ़ की हड्डी में चोट का पता लगाते हैं। चोट के बाद फ्रैक्चर के दौरान हुए टुकड़ों को फिक्स कर जोड़ते हैं। गंभीर स्थिति में सर्जरी करते हैं। इलाज के कुछ दिन बाद से रिकवरी के लिए फिजियोथैरेपी देते हैं। मेडिकल जगत में इलाज के लिए स्टेम सेल थैरेपी भी ले सकते हैं।


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