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देश में पिछले साल मलेरिया के 28 फीसदी मामले घटे, मलेरिया प्रभावित दुनिया के शीर्ष चार देशों में अब भारत नहीं


हेल्थ डेस्क. भारत में 2017 और 2018 में मलेरिया के 28 फीसदी मामलों में कमी आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, 2018 में भारत में मलेरिया के 26 लाख और युगांडा में 15 लाख मामले सामने आए हैं। जो पिछले सालों के मुकाबले कम हैं। इसी के साथ भारत मलेरिया प्रभावित दुनिया के शीर्ष चार देशों की सूची से बाहर हो गया है। लेकिन मलेरिया से सबसे अधिक प्रभावित दुनिया के 11 देशों में भारत एक-मात्र गैर-अफ्रीकी देश के रूप में मौजूद है। डब्ल्यूएचओ ने ये आंकड़े वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट 2019 में जारी किए हैं।



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Last year, 28 percent of malaria cases in the country were down, India no longer among the top four countries in the world affected by malaria

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ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने तैयार किया कृत्रिम न्यूरॉन, हार्ट अटैक और अल्जाइमर्स के इलाज में मदद करेगा


हेल्थ डेस्क. ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने कृत्रिम न्यूरॉन तैयार किया है। उनका दावा है कि सिलिकॉन चिप के रूप में तैयार इस न्यूरॉन से हार्ट अटैक, अल्जाइमर्स(भूलने की बीमारी) का इलाज किया जा सकेगा।इसका इस्तेमाल शरीर में इम्प्लांट की जाने वाली मेडिकल डिवाइस में किया जाएगा।इसे तैयार करने वालेबाथ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि इस बनाने के लिए बेहद ताकतवरमाइक्रो-प्रोसेसर का इस्तेमाल किया जाएगा।इंसान के शरीर में करोड़ों न्यूरॉन पाए जाते हैं, जिनका काम मस्तिष्क से सूचना का आदान-प्रदान और विश्लेषण करना है।

इमरजेंसी में कारगर साबित होगा

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, कृत्रिम न्यूरॉन वास्तव में शरीर में मौजूद न्यूरॉन की तरह नर्वस सिस्टम के इलेक्ट्रिक सिग्नल को जवाब देगा। यह उस समय सबसे कारगर साबित होगा, जब प्राकृतिक न्यूरॉन काम करना बंद कर देंगे। रीढ़ की हड्डी में चोट लगने की स्थिति में भी कृत्रिम न्यूरॉन फायदेमंद साबित होगा।

बायो-सर्किट में आई खराबी को रिपेयर भी करेगा

कृत्रिम न्यूरॉन बायो-सर्किट में आई खराबी को रिपेयर भी कर सकेगा और शरीर में चल रहीं क्रियाओं को सामान्य रखने में मदद करेगा। हार्ट अटैक की स्थिति में दिमाग में मौजूद न्यूरॉन हृदय तक सिग्नल नहीं पहुंचा पाते हैं, इसलिए दिल रक्त पंप नहीं कर पाता। ऐसे मामलों में यह कारगर साबित होगा।

दो तरह के कृत्रिम न्यूरॉन तैयार किए गए

शोधकर्ताओं ने फिलहाल अभी दो तरह के हिप्पोकैम्पल और रेसीपिरेटरीन्यूरॉन तैयार किएहैं। इनमें एक दिमाग के हिप्पोकैम्पस हिस्से में पाया जाता है, जो याददाश्ततेज रखने में अहमभूमिकानिभाता है। रेसीपिरेटरीसांसों को नियंत्रित करने में मदद करता है।

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British scientists designed the artificial neuron, this heart failure and will help in the treatment of Alzheimer's

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सर्दियों में वेजिटेबल ऑयल और नीम की पत्तियों से फटी एड़ियों को बनाएं कोमल


लाइफस्टाइल डेस्क. महिलाएं अक्सर कामकाज में व्यस्त होने के कारण एड़ियों पर ध्यान नहीं दे पातीं, जिस कारण ऐड़ी की त्वचा सख्त हो जाती है और रूखी होकर फटने लगती हैं। परवाह की कमी से एड़ियों में दरारों का बढ़ना, सूजन, दर्द और चलने में परेशानी होती है। इससे बचने के लिए कुछ आसान से घरेलू उपाय आजमा सकती हैं। ब्यूटी एक्सपर्ट प्राची सक्सेना से जानिए रूखी एड़ियों को कोमल बनाने के टिप्स...

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The problem of torn ankles is common in winter,home remedies will help to overcome this problem

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पालतू कुत्तों के साथ बच्चे करते हैं ज्यादा पढ़ाई, सीखने और समझने की बढ़ती है क्षमता


लाइफस्टाइल डेस्क.लाइफस्टाइल डेस्क. ज्यादातर पेरेंट्स पालतू कुत्तों को बच्चों की पढ़ाई के वक्त दूर रखते हैं ताकि बच्चे पढ़ाई छोड़ने उनके साथ खेलने ना लगें। लेकिन हाल ही में कनाडा के यूबीसी ओकानागन स्कूल ऑफ एजुकेशन की रिसर्च में सामने आया है कि जब बच्चों के आस-पास पालतू कुत्ते होते हैं तो उनका मन देर तक पढ़ाई में लगा रहता है और वो जल्दी सीख और याद कर पाते हैं। बच्चे पढ़ाई में ज्यादा इंट्रेस्ट दिखाते हैं।



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Children with pet dogs grow more ability to study, learn and understand

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टीवी और मोबाइल ने बच्चों की शारीरिक गतिविधियां घटाईं, खेल-खेल में बच्चों से करवाएं कसरत


लाइफस्टाइल डेस्क. आज कल बच्चे पढ़ाई के बाद बाकी का समय तकनीक में गुजार देते हैं। इसके कारण उनकी शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं। खेल-कूद या व्यायाम बच्चों के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना बड़ों के लिए। इससे उनका शरीर मजबूत और फुर्तीला बना रहता है। खासतौर से 5 साल से 14 साल के बच्चों के लिए ये जरूरी है। ऐसे में आप बच्चों के साथ खेल-खेल में कुछ मजेदार व्यायाम कर सकते हैं।फिटनेस एक्सपर्ट आरव मिश्रा से जानिए कैसे बच्चों से खेल के दौरानकरवाएं व्यायाम...

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TV and mobile reduce children's physical activity, get children exercised in sports and games

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अदरक, हल्दी और पत्तेदार सब्ज़ियां सर्दियों में बढ़ाती हैं रोगों से लड़ने की क्षमता


लाइफस्टाइल डेस्क. अगर आपको हमेशा गले में खराश, सर्दी-ज़ुकाम,एलर्जी या पल-पल में रोग होते हैं तो आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है। बीमारियों से लड़ने के लिए इसका मजबूत होना जरूरी है, खासतौर पर ठंड में। अपने आहार में कुछ खाद्य पदार्थ शामिल करके स्वस्थ रह सकते हैं। साओल हार्ट सेंटर के निदेशक डॉ. बिमल छाजेड़ बता रहे हैं कि कैसे आप सर्दियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकते हैं।

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Ginger, turmeric and leafy vegetables kept in winter increases immunity

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कॉर्न मसाला, मेथी ढेबरा और ज्वार का उपमा जैसी डिशेज सर्दियों में बढ़ाएंगी जुबां का स्वाद


हेल्थ डेस्क. गर्मा-गरम सब्जी के साथ बाजरे, ज्वार और मक्के के आटे की रोटियां सर्दियों का मजा दोगुना कर देती हैं। ये अनाज स्वादिष्ठ होने के साथ-साथ सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद है। शरीर में गर्माहट बढ़ाते हैं और पाचन क्रिया को भी दुरुस्त रखते हैं। इनकी सिर्फ रोटी ही नहीं बनती बल्कि और भी लजीज व्यंजन बनते हैं। फूड ब्लॉगर आस्था रायजादा चंद रेसिपीज आपको बता रही हैं...


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Dishes like corn masala, fenugreek dhebra and jowar upma will enhance the taste of tongue in winter

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शोधकर्ताओं का दावा- बीपी, ग्लूकोमा की 18 तरह की दवाओं से होगा पथरी का इलाज


मैसाचुसेट्स.अमेरिका स्थित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में शोधकर्ताओं ने हाई ब्लड प्रेशर और ग्लूकोमा बीमारी में इस्तेमाल होने वाली 18 प्रकार की दवाओं के प्रयोग से पथरी का आसान इलाज ढूंढ़ने का दावा किया है। इन दवाओं के अलग-अलग अनुपात में मिश्रण कर ऐसी दवाई तैयार की गई है, जो पथरी का आकार कम कर उसे तेजी से बाहर निकाल सकती है।

इस दवाई को कैथेटर द्वारा सीधे मूत्रवाहिनी में पहुंचाया जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि मूत्रवाहिनी को शिथिल किया तो स्टोन को आसानी से निकाला जा सकता है। एमआईटी को शोध की दुनिया में नंबर वन माना जाता है।

लैब में मापा चिकनी दवाएं कितना आराम देती हैं
रिसर्च टीम में शामिल किडनी स्टोन प्रोग्राम के उप निदेशक माइकल सीमा और ब्रायन ईस्नर का कहना है कि शोधकर्ताओं ने पहली बार उच्च रक्तचाप या ग्लूकोमा जैसी बीमारियों का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली 18 दवाओं का चयन किया। फिर उन्हें प्रयोगशाला में एक डिश में उगाई गई मानव मूत्रवाहिनी कोशिकाओं के साथ संपर्क में लाया गया, जहां वे यह माप सकते थे कि दवाएं चिकनी मांसपेशियों की कोशिकाओं को कितना आराम देती हैं।इसके रिजल्ट बहुत ही अच्छे आए।

टीम ने 1 अरब कोशिकाओं का विश्लेषण किया
रिसर्च टीम ने सोचा कि क्यों न दवाओं को सीधे मूत्रवाहिनी में पहुंचाया जाए? इससे ट्यूब रिलेक्स तो होगी ही, शेष शरीर के संभावित नुकसान को भी कम किया जा सकता है। इसके बाद शोधकर्ताओं ने लगभग 1 अरब कोशिकाओं का विश्लेषण करने के लिए कम्प्यूटेशनल प्रसंस्करण का उपयोग किया। उन्होंने दो दवाओं की पहचान की जो ज्यादा अच्छी तरह काम कर रही थीं। प्रयोग में उन्होंने पाया कि दोनों दवाएं एक साथ दिए जाने पर और भी बेहतर काम करती हैं। इनमें से एक निफ़ेडिपिन है। इस कैल्शियम चैनल ब्लॉकर का उपयोग उच्च रक्तचाप का इलाज करने के लिए किया जाता है और दूसरा एक प्रकार की दवा है जिसे रॉक अवरोधक के रूप में जाना जाता है, जिसका उपयोग ग्लूकोमा के इलाज के लिए किया जाता है।

स्टोन निकालने का समय भी तय हो सकता है
इन प्रयोगों के लिए एक सिस्टोस्कोप का उपयोग करके दवाएं सीधे मूत्रवाहिनी में रिलीज की थीं जो एक कैथेटर के समान है और एक कैमरे से जुड़ सकता है। साथ ही संभावित दुष्प्रभावों का खतरा बिल्कुल नहीं रहता। रिसर्च में आगे यह पता लगाया जा रहा है कि इस दवाई से मांसपेशियों को कितने समय तक रिलेक्स रखा जा सकता है। साथ ही स्टोन को कितने जल्द (मिनट, घंटे या दिन) बाहर निकाला जा सकता है।

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Researchers claim- BP, 18 types of glaucoma drugs will treat stone

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प्रोटीन को भारतीय जरूरी नहीं मानते, 73% लोग इसकी कमी से जूझ रहे; 93% को इसके फायदे तक पता नहीं


हेल्थ डेस्क. आयरन और कैल्शियम की तरह भारतीयों में प्रोटीन की भी कमी है। 73% शहरी आबादी में प्रोटीन का स्तर मानक से काफी कम है। खानपान में इसे क्यों शामिल करना चाहिए, 93%लोगों को यह भी पता नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात है कि भारतीय प्रोटीन को महत्व ही नहीं देते।उनका मानना है कि यह सिर्फ जिम जाने वालोंके लिए जरूरी है। इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो के हालिया सर्वे में यह बात सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 7 शहरों में हुए सर्वे में भारतीयों का मानना है कि डाइट में प्रोटीन का इस्तेमाल वजन घटाने के लिए किया जाता है। 2018 में इनबॉडी-आईपीएसओएस की रिसर्च के मुताबिक, 71% भारतीयों की मांसपेशियां कमजोर हैं। मानक के मुकाबले शरीर में 68% तक प्रोटीन की कमी है। नेशनल सैंपल सर्वे (2011-12) के मुताबिक, ग्रामीण इलाके में 56.5 ग्राम और शहरी इलाके के भारतीय 55.7 ग्राम प्रोटीन लेते हैं।

रोजाना कितना प्रोटीन जरूरी
स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में काम कर रहे डॉ. नंदन जोशी कहते हैं- शारीरिक रूप सेसक्रिय न रहना और मानक से कम प्रोटीन शरीर में पहुंचने से युवाओं की मांसपेशियों को कमजोर हो रही हैं। 30 साल की उम्र में मांसपेशियां क्षतिग्रस्त होना शुरू होती हैं। हर 10 साल में 3-5% तक मांसपेशियां डैमेज होती हैं। रोजाना एक्सरसाइज और प्रोटीन इसे रिपेयर करने का काम करते हैं और एक्टिव रखतेहैं। किसी भी इंसान को अपने वजन के मुताबिक प्रोटीन लेना चाहिए। जैसे आपका वजन 60 किलो है तो रोजाना 60 ग्राम प्रोटीन डाइट में लेना चाहिए।

कमी कैसे पूरी करें
डाइटीशियन और क्लीनिकल न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. नीतिशा शर्मा बताती हैं कि मांसाहारी हैं तो डाइट में मीट, चिकन, अंडे ले सकते हैं। शाकाहारियों के लिए दूध, फलियों की सब्जियां, मूंगफली, नट्स और दालें बेहतर विकल्प हैं। एक ही जगह पर दिनभर का ज्यादातर समय बिताना, शरीर सक्रिय न रखना और प्रोटीन का घटता स्तर मांसपेशियों को कमजोर कर रहा है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, प्रोटीन जीवन के हर पड़ाव के लिए जरूरी है।

सबसे ज्यादा प्रोटीन की कमी लखनऊ वालों में
इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो के एक अन्य सर्वे में देश के प्रमुख शहरों में प्रोटीन का स्तर जांचा गया। सर्वे में पाया गया 90% लखनऊ के लोगों में प्रोटीन की कमी है। दूसरे पायदान पर दो शहर अहमदाबाद और चेन्नई हैं, यहां की 84% आबादी प्रोटीन की कमी से जूझ रही है। तीसरे स्थान पर विजयवाड़ा (72%) और चौथे पर मुंबई (70%) है। वहीं, दिल्ली में यह आंकड़ा 60 फीसदी है। इस सर्वे में 1800 लोग शामिल किए और उनके खानपान का विश्लेषण किया गया।

इंडियन डाइटिक एसोसिएशन के मुताबिक, भारतीयों को खानपान से जरूरत का मात्र 50 फीसदी की प्रोटीन मिल पा रहा है। प्रोटीन बच्चों के विकास के अलावा उनके सोचने-समझने की क्षमता को बेहतर बनाता है। यह मांसपेशियों के लिए जितना जरूरी है, उतना ही शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए भी अहम है। इसके अलावा स्किन और बालों को खूबसूरत और हेल्दी बनाने के लिए शरीर में पर्याप्त प्रोटीन का होना जरूरी है।

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Indians do not consider protein necessary, 73% of people are struggling with its deficiency; 93% do not even know its benefits

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रोटावायरस की नई वैक्सीन की रोटावैक-5डी लॉन्च, इसे 8 डिग्री सेल्सियस तक स्टोर किया जा सकता है


हेल्थ डेस्क. भारत बायोटेक इंटरनेशनल कंपनी ने मंगलवार को रोटावायरस वैक्सीन का नया संस्करण रोटावैक-5डी लॉन्च किया। पुरानी वैक्सीन के मुकाबले में इसमें डोज की मात्रा कम रखी गई है।खासियत है कि इसे अपेक्षाकृत उच्च तापमान पर भीस्टोर किया जा सकेगा।

नई रोटावैक-5डी वैक्सीन की एक खुराक 0.5 मिलीलीटर है। इसे 2-8 डिग्री सेल्सियस पर 24 महीने तक स्टोर किया जा सकेगा। 37 डिग्री सेल्सियस पर रोटावैक-5डी को साथ दिनों तक स्टोर किया जा सकेगा। इसके उलट, पहले वाले संस्करण कीरोटावैक वैक्सीनमें 2.5 मिलीलीटर की एक खुराक होती थीऔर इसे -20 डिग्री सेल्सियस पर ही स्टोर किया जा सकता था।



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Bharat Biotech launches Rotavac 5D, a new version of the rotavirus vaccine

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दुनिया में प्रदूषण से हर साल 70 लाख मौत, इसमें 6 लाख बच्चे भी शामिल, छोटे-छोटे उपायों से घटाएं बढ़ते मौत के आंकड़े


हेल्थ डेस्क. प्रदूषण मौत के आंकड़े बढ़ा रहा है। दुनियाभर में हर साल 70 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण से हो रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है, इन आंकड़ों में 6 लाख बच्चे भी शामिल हैं। हवा, पानी, फल और सब्जियों में जहर घुल रहा है। लेकिन घर में छोटी-छोटी सावधानी बरतकर इसके असर और मौत के आंकड़ों को कम किया जा सकता है। हर साल 2 दिसंबर को नेशनलपॉल्यूशन कंट्रोल डे भोपाल गैस त्रासदी में जान गंवाने वाले लोगों की याद में मनाया जाता है। इस मौके पर जानिए हवा में घुलते जहर के असर को कैसे कम करें...

कैसे इंसानों तक पहुंच रहा 'जहर'
हवा को प्रदूषित करने की बड़ी वजह है फैक्ट्री और कारखानों से निकलने वाला धुआं, एसपीएम यानी सस्पेंडेड पार्टिक्युलेट मैटर, सीसा और नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि। जगह-जगह फेंके और जलाए जा रहे कूड़े से निकल रही गैसें हवा में मिलकर इसे जहरीला बना रही हैं। फैक्ट्रियों और कारखानों से निकला कचरा नदियों में जा रहा है जो डायरिया, टाइफॉयड और हैजा जैसी बीमारियों को फैला रहा है। प्रदूषण की हुए कई शोध बताते हैं यह न सिर्फ जान ले रहा है बल्कि बच्चों के दिमाग पर बुरा असर छोड़ रहा है, गर्भ में पल रहा भ्रूण भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यह मिस्कैरेज का खतरा बढ़ाता है।



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7 million deaths due to pollution in the world every year, including 6 lakh children in it, reduce the death toll by small measures

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गगनयान में जाने वाले अंतरिक्ष यात्री बिना पानी के स्प्रे से नहाएंगे, नासा ने इसरो से तकनीक मांगी


नई दिल्ली (अमित कुमार निरंजन).भारत का स्वदेशी बहुउद्देशीय मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ दिसंबर 2021 में लाॅन्च किया जाएगा। इसमें इसरो और आईआईटी दिल्ली नया प्रयोग करने वाले हैं। इसके तहत अंतरिक्ष यात्री बिना पानी के स्प्रे से नहाएंगे। इसेक्लेन्स्टा इंटरनेशनल कंपनी ने आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर तैयार किया है। अंतरिक्ष में नहाने के लिए इसका इस्तेमाल करने वाला भारत पहला देश होगा। नासा भी इसका इस्तेमाल किए जाने को लेकर इसरो के साथ संपर्क में है।

अंतरिक्ष में यात्रियों को स्पेस शटल में कम से कम सामान ले जाना हाेता है। जहां नहाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं होता है। न नहाने पर शरीर पर कई तरह के कीटाणु पैदा हो जाते हैं। अंतरिक्ष यात्रियों को नहाने के लिए अलग प्रकार से पानी का उपयोग करना पड़ता है। यहां तक कि उन्हें अपने पेशाब को जमा कर विशेष प्रक्रिया के जरिए रिसाइकिल कर इस्तेमाल करना पड़ता है।

स्प्रे कोनेवी, आर्मी कमांडो इस्तेमाल कर चुके हैं

बिना पानी के स्प्रे से नहाने की तकनीक पर आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर काम करने वाले डॉ. पुनीत गुप्ता ने बताया कि उनकी मां को कुछ साल पहले पैर में चोट आ गई थी। घाव में इंफेक्शन न हो, इसलिए डॉक्टर ने चोट को पानी से दूर रखने की हिदायत दी। इस कारण वह कई दिनों तक नहा नहीं पाईं। उन्हें बालों और त्वचा में खुजली होती थी। वहीं से उन्हें वॉटरलेस बॉडी वॉश बनाने का आइडिया आया। 2018 में उन्होंने स्टार्टअप शुरू किया। आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर इसरो के लिए इस प्रोजेक्ट पर काम किया। तब से लेकर अब तक नेवी,आर्मी कमांडो इसका इस्तेमाल पानी की गैरमौजूदगी में कर चुके हैं। अब इस प्रोडक्ट का इस्तेमाल एम्स रायपुर समेत करीब 200 से ज्यादा सरकारी अस्पताल अपने उन मरीजों के लिए कर रहे हैं, जिन्हें किसी न किसी चोट के कारण पानी से दूर रहने के लिए कहा जाता है। इसके इस्तेमाल के बाद शरीर से 100% कीटाणु खत्म हो जाते हैं।

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी सेल बनेगा

आईआईटीदिल्ली और इसरो संयुक्त रूप से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी सेल स्थापित करेंगे। आईआईटी के निदेशक रामगोपाल राव ने शुक्रवार को कहा कि यह सेल हमारी स्पेस टेक्नोलॉजी बाहरी देशों को मुहैया कराने के अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नैनो टेक्नोलॉजी, फंक्शनल टेक्सटाइल और स्मार्ट मैन्यूफैक्चरिंग के लिए रिसर्च का काम करेगा।



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Astronauts going to Gaganyaan will take a shower without water spray

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किचन गार्डनिंग में कच्चे हैं तो आसान चीजों से शुरुआत करें


हेल्थ डेस्क. किचन गार्डनिंग ज्यादातर बड़े घरों में की जाती रही है, जहां घर के पीछे बगीचा होता है, जिसमें आसानी से फल और सब्जियां उगाई जा सकती हैं। लेकिन यह कॉन्सेप्ट आमतौर पर शहरों के छोटे घरों में कारगर साबित नहीं हो पाता। शेफ संजीव कपूर छोटे घरों में किचन गार्डनिंग टिप्स दे रहे हैं। शेफ ने बताया- 'मैंने जब मुंबई में रहना शुरू किया तो खिड़की की चौखट की छोटी क्यारियों में पुदीना (मिंट), लेमनग्रास, जवारे (व्हीट ग्रास) और अजवाइन उगाना शुरू किया। मेरी मां इनका इस्तेमाल कभी चटनी बनाने में, कभी-कभी चाय में और तो कभी अनूठे कुरकुरे पकोड़े बनाने में भी करती थीं। धीरे-धीरे हमने टमाटर, हरी मिर्च, भिंडी वगैरह के बीज बड़े गमलों में बोना शुरू किया। कुछ ही महीनों में काफी मात्रा में सब्जियां ऊगने लगीं, जिससे हमें बहुत खुशी मिली और हम और भी ज्यादा सब्जियां लगाने के लिए प्रोत्साहित हुए। और इस सब्जियों का स्वाद लाजवाब था। ये ज्यादा क्रंची, ज्यादा फ्रेश और बहुत शानदार थीं।'

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If you are raw in kitchen gardening then start with easy things

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सूफी संतों की दरगाह पर थी सामूहिक भोजन की परंपरा, करतारपुर में पहली बार गुरु नानक देव जी ने शुरू किया लंगर


हेल्थ डेस्क. खाने का संबंध स्वाद से है या स्वास्थ्य से?... या फिर दोनों से...? बहरहाल मैं ये सवाल आपके लिए छोड़ता हूं। आज बात ना स्वाद की और ना स्वास्थ्य की, बात करूंगा संस्कृति, परंपरा और एक नेक भावना की जो जुड़ी हुई है अंतत: भोजन से ही। आपमें से अधिकांश लोगों ने गुरुद्वारों पर लंगर में जरूर खाया होगा। गुरुबानी के मीठे बोल और अरदास के पवित्र शब्दों के बीच गुरुद्वारा पहुंचने वाला हरेक व्यक्ति अपनी आत्मा तृप्त करके लंगर से उठता है। लंगर एक ऐसी परंपरा है, जहां ना जात पूछी जाती है और ना धर्म। लंगर में हर भूखे व्यक्ति को बस भोजन दिया जाता है। हाल ही में गुरु नानक देव जी का 550वां प्रकाश पर्व मनाया गया। आइए इसी बहाने लंगर की परंपरा और इसके इतिहास के बारे में बता रहे हैं फूड हिस्टोरियन आशीष चोपड़ा...

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In the twelfth and thirteenth centuries the dargah of Sufi saints was the tradition of mass food, for the first time Guru Nanak Devji started the langar in Kartarpur

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3 साल तक के बच्चों को शक्कर खिलाने से फैटी लिवर का खतरा


हेल्थ डेस्क. बच्चों को तीन साल की उम्र तक जितना संभव हो शक्कर ना खिलाएं। अगर बच्चा ज्यादा शुगर खाता है तो उसे भविष्य में फैटी लिवर की समस्या हो सकती है। यह बात हृदय रोग विशेषज्ञ आईएलबीएस दिल्ली के डायरेक्टर डॉ. एसके सरीन ने कही। वे शनिवार को भोपाल मिंटो हॉल में डायबिटीज और हृदय रोग पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रहे थे। डॉ.एस के सरीन ने कहा कि प्रदेश में शकर, नमक और शराब पर अतिरिक्त टैक्स लगना चाहिए। इन तीनों चीजों के उपयोग से ही व्यक्ति को लिवर संबंधी समस्याएं होती हैं। शक्कर के बजाय सरकार को गुड़ को प्रमोट करना चाहिए, इससे न सिर्फ लोगों को स्वास्थ्य लाभ मिलेगा, बल्कि किसानों की आर्थिक उन्नति भी होगी।

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Feeding sugar to children up to 3 years of risk of fatty liver

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85 फीसदी मरीजों में होते हैं साइलेंट गालस्टोन्स; गैस, पेट फूलना और पेट में लगातार भारीपन महसूस होने पर डॉक्टर से करें संपर्क


हेल्थ डेस्क. पथरी या स्टोन स्वास्थ्य की एक बहुत ही प्रचलित समस्या है, जिससे अमूनन हर दूसरे-तीसरे परिवार में कोई न कोई पीड़ित रहता ही है। लेकिन पथरी-पथरी के बीच में अंतर समझना भी जरूरी है। पथरी दो तरह की होती हैं - किडनी की पथरी और गालब्लैडर (पित्त की थैली या पित्ताशय) की पथरी। इन दोनों का इलाज भी अलग-अलग होता है। किडनी की पथरी का इलाज स्टोन के आकार और उसकी लोकेशन पर निर्भर करता है जिसका सही निर्णय यूरो सर्जन मरीज की जांच और रिपोर्टों के आधार पर करते हैं। वैसे किडनी की छोटी पथरियां ज्यादा मात्रा में पानी पीने से शरीर से निकल जाती हैं। लेकिन गालब्लैडर की पथरी का उपचार ऑपरेशन ही होता है, जिसमें मरीज के गालब्लैडर को स्टोन सहित निकाल दिया जाता है। डॉ. विशाल जैन लेप्रोस्कोपिक सर्जन एवं हर्निया स्पेशलिस्ट से जानिए गालब्लैडर स्टोन के बारे में...

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Gas, flatulence and persistent heaviness in the stomach indicate Gallstones

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46 साल के इंसान के शरीर में मिले 700 से अधिक टेपवर्म, कई बार दौरे पड़ने के बाद पहुंचा था हॉस्पिटल


बीजिंग. चीन के 46 साल वर्षीय झू जॉन्गफा के शरीर में 700 से अधिक परजीवी टेपवर्म पाए गए। ये दिमाग और गुर्दे तक पहुंच चुके थे। पेशे से मजदूर झू को कई बार दिमागी दौरे पड़ने के कारण हॉस्पिटल ले जाया गया। रिपोर्ट में सामने आया कि टेपवर्म के अंडे पेट तक पहुंच चुके हैं और ब्लड के जरिए पूरे शरीर में पहुंच चुके हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, टेपवर्म अधपके सूअर के मांस के जरिए पहुंचा है और अपनी संख्या बढ़ा रहा था।



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More than 700 tapeworms found in the body of a 46-year-old man, had reached the hospital after having multiple seizures

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मेकअप की सही टेक्नीक से छुपाएं चाहरे के दाग-धब्बे और पिंपल्स


हेल्थ डेस्क. पिंपल्स की वजह से अकसर महिलाएं कॉन्फिडेंस की कमी महसूस करती हैं। इस वजह से काफी स्ट्रेस भी हो जाता है। उन्हें हर वक्त यह महसूस होता रहता है कि हर कोई त्वचा को घूर रहा है। किसी स्पेशल डे को यदि आप पिंपल की वजह से खराब होने से बचाना चाहती हैं, तो आज हम आपको बता रहे हैं कि मेकअप से इन्हें कैसे कवर कर सकती हैं। चूंकि पिंपल्स अलग-अलग तरह के होते हैं, मेकअप एक्सपर्ट कायनात हुसैन आपको उन्हीं के हिसाब से मेकअप टिप्स दे रही हैं...

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Hide the pimples with the right makeup technique

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हड्डियां मजबूत करेगा अंजीर और अनिद्रा से राहत देगा कीवी, सर्दियों में जरूरत के मुताबिक चुनें फल


हेल्थ डेस्क. सर्दियों के मौसम में कई तरह केफल बाजार में मिलने लगते हैं। ये रसीले और बेहद स्वादिष्ट होते हैं। इन मौसमी फलों में कई गुण भी छुपे होते हैं जो हमारे शरीर को पोषण देते हैं। सर्दियों में मिलने वाले फल आंखो से लेकर मसल टिशू के लिए फायदेमंद होते हैं। फूड ब्लॉगर मानसी पुजारा से जानिए सर्दियों में मिलने वाले फलों के बारे में...



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choose fruits according to need in winter

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सर्दियों में जोड़ों के दर्द में आराम के लिए गुनगुना पानी पीएं और सुबह की सैर करें


हेल्थ डेस्क. सर्दियों के मौसम में हड्डियों और जोड़ों में दर्द की शिकायत आमतौर पर बढ़ जाती है। खासतौर पर बुजुर्ग इससे अधिक जूझते हैं। इससे निजात पाने के लिए चंद सावधानियां रखनी जरूरी हैं। वरिष्ठ प्रत्यारोपण सर्जन डॉ. अखिलेश यादव बता रहे हैं सर्दियाें मेंजोड़ों को फिट रखने के टिप्स...



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Hot water and morning walk will provide relief in joint pain in winter

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कमजोर पाचन को मजबूत बनाने के लिए करें सुप्तवीरासन,पाशासन और अर्ध-पवनमुक्तासन


हेल्थ डेस्क. कहते हैं पेट सही तो सब सही। पेट सही होने के लिए पाचन क्रिया सही होना जरूरी है। लेकिन अव्यवस्थित जीवनशैली और खान-पान के कारण अधिकतर लोगों का पाचन कमजोर होता है। इसके कारण पेट में दर्द, गैस, पेट फूलना या पेट साफ नहीं होने जैसी समस्याएं होती हैं। ऐसे में योग अपनाकर इसे दुरुस्त कर सकते हैं।

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Suptavirasana, Pāासनiासनāsana and Ardha Pawanmuktasana make weak digestion strong

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फ्यूजन खाने का बढ़ रहा चलन, छत्तीसगढ़ के पारम्परिक व्यंजनों में चखें विदेशी स्वाद


हेल्थ डेस्क. पारम्परिक व्यंजनों में विदेशी स्वाद का तड़का अधिकतर पसंद किया जाता है। इसे फ्यूजन कहा जाता है जो काफी समय से चलन में भी है। कुछ ऐसे ही फ्यूजन छत्तीसगढ़ के पारम्परिक व्यंजनों में लेकर आए है।फूड ब्लॉगर नीलम अग्रवाल बता रही हैं देसी व्यंजन में विदेशी स्वाद के कुछ टिप्स...


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Fusion food trend, taste exotic flavor in traditional cuisine of Chhattisgarh

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गले और नाक से निकाली गईं 2 जोक, 3 सेमी लंबाई की एक वोकल कार्ड में फंसी थी


हेल्थ डेस्क.चीन केफुजिआन प्रांत में लगातार दो महीने तक खांसी झेल रहे व्यक्तिके गले के अंदर सेजोक चिपकी पाई गई। मरीज के मुताबिक, दो महीने से लगातार खांसी आ रही थी, लेकिन जब बलगम में खून आने लगा तो डॉक्टर के पांस पहुंचा।

चीन के वुपिंग अस्पताल में सीटी स्कैन के बाद भी वजह सामने नहीं आई, तो डॉक्टरों ने ब्रॉन्कोस्कोपी की। जोक की पुष्टि होने के बाद माइनर सर्जरी करके इसे निकाला गया।



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The patient was coughing for two months due to a stick in the throat and nose, the doctor said, reached the body with water

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वैज्ञानिकों ने फलों और दूध के बैक्टीरिया से बनाई कम कैलोरी वाली चीनी, दावा; डायबिटीज रोगियों के लिए फायदेमंद


हेल्थ डेस्क. वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया की मदद से फलों और दूध उत्पादों से ऐसी चीनी बनाई है, जिसमें सामान्य चीनी की तुलना में मात्र 38% कैलोरी होती है। इस चीनी को टैगाटोज कहा जाता है। अमेरिका की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि अब तक इस चीनी से किसी तरह का दुष्प्रभाव सामने नहीं आया है। टैगाटोज को अमेरिका के खाद्य नियामक एफडीए से मंजूरी मिल चुकी है।



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Scientists claim low-calorie sugar made from fruit and milk bacteria; Beneficial for diabetes patients

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विदिशा में महिला ने दो सिर, तीन हाथ और चार पंजे वाले बच्चे को दिया जन्म


हेल्थ डेस्क. मध्य प्रदेश के विदिशा की बबीता अहिरवार ने शनिवार को दो सिर, तीन हाथ और चार पंजे वाले बच्चे को जन्म दिया है। महिला की उम्र 23 साल है और डिलिवरी विदिशा जिला अस्पताल में हुई है। जिला अस्पताल के सिविल सर्जन संजय खरे के मुताबिक, बच्चे का वजन 3.3 किलो है। महिला के पति जसवंत अहिरवार का कहना है, जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशु को अस्पताल के आईसीयू में रखा गया था, लेकिन तबियत बिगड़ने पर उसे भोपाल के हमीदिया अस्पताल रेफर किया गया है।



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Woman gives birth to a child with two heads, three hands and four claws in Vidisha

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दुनिया में 80 फीसदी से अधिक टीनएजर्स अनफिट, 146 देशों के 16 लाख स्टूडेंट्स पर WHO ने की रिसर्च


    हेल्थ डेस्क. विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में 80 फीसदी से अधिक टीनएजर्स अनफिट हैं। इनमें 85 फीसदी लड़कियां और 78 फीसदी लड़के शामिल हैं। अनफिट रहने की वजह रेग्युलर एक्सरसाइज न करना और मोबाइल स्क्रीन पर अधिक समय बिताना है। द लेंसेट चाइल्ड एंड एडोलेसेंट हेल्थ जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, रिसर्च में 146 देशों के 16 लाख स्टूडेंट को शामिल किया गया था, जिनकी उम्र 11-17 साल है।



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    More than 80% of teenagers unfit in the world, WHO researches 1.6 million students from 146 countries

    Click here to Read full Details Sources @ https://www.bhaskar.com/health/healthy-life/news/more-than-80-of-teenagers-unfit-in-the-world-says-who-126142726.html

    मरीज के शरीर से 7.4 किलो की किडनी निकाली; भारत में पहली और दुनिया में तीसरी सबसे भारी


      हेल्थ डेस्क. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की टीम ने एक मरीज के शरीर से देश की सबसे भारी किडनी निकाली है। इसका वजन 7.4 किलो और माप 32 गुणा 21.8 सेमी है। यह किडनी दुनिया में तीसरी सबसे भारी किडनी है। दुर्लभ सर्जरी करीब दो घंटे चली। ऑपरेशन करने वाली टीम में डॉ. अजय शर्मा, डॉ. सचिन कथूरिया और डॉ. जुहिल नानावती शामिल रहे।

      जेनेटिक डिसऑर्डर से था पीड़ित
      यूरोलॉजी विभाग के कंसल्टेंट डॉ. सचिन कथूरिया ने बताया कि 56 वर्षीय मरीज दिल्ली का रहने वाला है। वह ऑटोसोमल डोमिनेंट पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज नाम के जेनेटिक डिसऑर्डर से पीड़ित था। पॉलीसिस्टिक किडनी रोग एक आनुवांशिक स्थिति है। इसमें दोनों किडनी में द्रव से भरे सिस्ट विकसित हो जाते हैं, जिससे उनमें सूजन आ जाती है। मरीज का 2006 से हमारे परामर्श में इलाज चल रहा था। लेकिन इसमें शामिल जोखिमों के कारण वह सर्जरी के लिए सहमत नहीं था।

      अमेरिका और नीदरलैंड में हो चुकी ऐसी दुर्लभ सर्जरी
      डॉ. सचिन ने कहा- 'अभी तक दुनिया में इस प्रकार की दो दुर्लभ सर्जरी हुई हैं। पहली अमेरिका में (9 किलो) और दूसरा नीदरलैंड (8.7 किलो) में। अब हम इसे गिनीज वर्ल्ड ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज कराने की तैयारी कर रहे हैं।



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      7.4 kg of kidney removed from the patient's body; First in India and third heaviest in the world

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      चॉकलेट फेस्ट और द ऑनियन मार्केट जैसे फेस्टिवल में चखने को मिलता है अनोखी डिशेज का स्वाद 


      हेल्थ डेस्क. यदि आप दुनियाभर के अलग-अलग हिस्से का जायका पसंद करते हैं, तो जानिए, कुछ खास फूड फेस्टिवल्स के बारे में। इन्हें देखने और अनोखी डिशेस का स्वाद चखने के लिए दुनिया भर से लाखों टूरिस्ट आते हैं।


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      Tasting tastes of unique dishes at festivals like Chocolate Fest and The Onion Market

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      केरल के स्कूली शिक्षक बीनू आयुर्वेद से करते हैं पेड़ों का इलाज, 100 साल से भी पुराने ठूंठ में तब्दील वृक्षों को जिंदा कर दिया


      कोट्‌टायम.पेड़-पौधों से इंसान की बीमारी दूर करने के बारे में आपने सुना होगा, लेकिन केरल के 51 वर्षीय के. बीनू ऐसे शख्स हैं, जो आयुर्वेद के जरिए पेड़-पौधों का इलाज करते हैं। पेशे से स्कूल शिक्षक बीनू ने 100 साल से भी पुराने कई ऐसे पेड़ों को फिर से जिंदा कर दिया, जो ठूंठ हो गए थे। पेड़ों के संरक्षण के लिए वे बीते 10 सालों से जुटे हुए हैं। आसपास ही नहीं, देशभर के लोग अपने पेड़ों की बीमारी के बारे में उन्हें बताते हैं और बीनू उनका इलाज करते हैं- वह भी मुफ्त। उन्होंने वृक्षों को बचाने के लिए वृक्ष आयुर्वेद से संबंधित कई पुस्तकें लिखीं जो अब केरल के स्कूली कोर्स में भी शामिल की जा रही हैं।

      वृक्षों को जीवित इंसान की तरह मानने वाले बीनू अपनी दिनचर्या के मुताबिक सुबह लोगों से उनके वृक्षों की बीमारी सुनते हैं और स्कूल से लौटते समय वृक्षों का इलाज करते हैं। शनिवार-रविवार या फिर छुट्‌टी के दिन वे सुबह से ही वृक्षों के इलाज के लिए मौके पर पहुंच जाते हैं। उन्होंने हाल ही में यूपी के प्रयागराज और कौशांबी में कई एकड़ में अमरूदों के बाग में फैली बीमारी ठीक करने में भी मदद की। बीनू ने 15 साल पहले एक अधजले पेड़ का इलाज कर उसे हराभरा बना दिया तो लाेगाें काे आश्चर्य हुआ। फिर मालायिंचीप्पारा के सेंट जोसेफ स्कूल के कुछ बच्चे उनके पास आए। उनसे कहा कि उनके स्कूल में एक आम का पेड़ है जिसमें कई सालों से आम नहीं फल रहा है। उन्होंने इसका इलाज किया और उसमें आम आने लगे तो बच्चों ने बीनू को ‘पेड़ वाले डॉक्टर’ की ख्याति दिला दी। आसपास के लोग बीनू को पेड़ वाले डॉक्टर के नाम से ही जानते हैं।

      बीनू का कहना है कि उनका ज्यादातर समय दीमक के टीले की मिट्‌टी ढूंढने में निकल जाता है। वे दीमक के टीले की मिट्‌टी से ही बीमार पेड़ों का इलाज करते हैं। 60 साल पहले तक वृक्ष आयुर्वेद काफी प्रचलित था। महर्षि चरक और सुश्रुत ने भी ग्रंथों में पेड़ों की बीमारी का उल्लेख किया है। मैंने अपनी कोशिशों के जरिए सैकड़ों वृक्ष बचाए, यही मेरा उद्देश्य है।

      इलाज में दीमक के टीले की मिट्‌टी, गोबर, दूध और घी का प्रयोग करते हैं

      बीनू का कहना है कि वृक्ष आयुर्वेद में पेड़ों की हर बीमारी का इलाज बताया गया है। इनमें दीमक के टीले की मिट्‌टी, धान के खेतों की मिट्‌टी प्रमुख है। गोबर, दूध, घी और शहद का इस्तेमाल भी किया जाता है। केले के तने का रस और भैंस के दूध का भी इस्तेमाल करते हैं। कई बार तो पेड़ों के घाव में महीनों तक भैंस के दूध की पट्‌टी भी लगानी पड़ती है।



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      Kerala school teacher Beenu treats trees with Ayurveda, makes trees transformed into stub more than 100 years old alive

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      भारत में दवाइयां दुनिया के औसत दाम से 73% सस्ती, ब्रिक्स देशों में सबसे कम; अमेरिका में कीमतें सबसे ज्यादा


      नई दिल्ली.भारत में लोगों को दवाइयों पर दुनिया के औसत से करीब 73% तक कम खर्च करना पड़ता है। एक स्टडी के मुताबिक, भारत सस्ती दवाएं मुहैया कराने के मामले में दुनिया के 5 टॉप देशों में शामिल है। जहां भारत में दुनिया के औसत से 73.82% तक सस्ती दवाएं मिलती हैं, वहीं थाईलैंड में दवाएं वैश्विक औसत से करीब 93.93% सस्ती पड़ती हैं। यह कीमतें दुनिया में सबसे कम हैं। इसके बाद केन्या (93.76%) दूसरे, मलेशिया (90.80%) तीसरे और इंडोनेशिया (90.23%) चौथे नंबर पर है। ब्रिक्स में साथी देशों (ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के मुकाबले भी भारत में दवाएं सबसे सस्ती हैं।

      इंग्लैंड के लंदन और जर्मनी के बर्लिन आधारित हेल्थकेयर कंपनी मेडबेल ने अध्ययन के लिए 50 देशों में सभी अहम दवाइयों के दामों की तुलना की। इनमें हाई-कोलेस्ट्रोल के लिए इस्तेमाल होने वाली लिपिटोर दवा से लेकर बैक्टेरियल इन्फेक्शन में काम आने वाली जिथ्रोमैक्स और एचआईवी-एड्स में दी जाने वाइरीड शामिल हैं। मेडबेल ने तुलना के लिए 13 फार्मास्यूटिकल कंपाउंड्स की कीमतों का विश्लेषण किया।

      सरकारी हेल्थकेयर की तरफ से मुहैया दवाएं भी सर्वे में शामिल

      जिन दवाओं की तुलना की गई है, उनमें ज्यादातर आम लोगों के इस्तेमाल में आने वाली हैं। दिल की परेशानी और अस्थमा के अलावा ब्लड प्रेशर जैसी आम जरूरतों वाली दवाओं को तुलना में रखा गया है। इसमें सरकारी हेल्थकेयर सिस्टम में शामिल दवाओं के साथ उन दवाओं को भी रखा गया, जिनके लिए लोगों को अपनी जेब से रकम खर्च करनी पड़ती है। सर्वे में अलग-अलग देशों में ब्रांड कंपाउंड और उसके जेनेरिक वर्जन दवा को सामान्य डोज के हिसाब से कुल औसत में बदला गया, ताकि उनकी क्वालिटी में फर्क न आए।

      भारत में कौन सी दवा कितनी सस्ती
      भारत में दिल और हाई कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी दवाइयां वैश्विक औसत से करीब 84.82% सस्ती हैं, जबकि अमेरिका में यह दवाएं 2175% तक महंगी हैं। एंग्जाइटी डिसऑर्डर की दवाएं भारत में 91.13% तक कम दाम में उपलब्ध हैं। अमेरिका में इनकी कीमत 1071% ज्यादा है। भारत में कुछ दवाओं के दाम वैश्विक औसत से ज्यादा भी हैं। बैक्टेरियल इन्फेक्शन की दवाएं भारत में सबसे सस्ती हैं (औसत से 88.46% कम)। वहीं अमेरिका में इनकी कीमत 1755% ज्यादा है।

      हालांकि, भारत में एचआईवी-एड्स (162.87%), डायबिटीज (6.62%) और ब्लड प्रेशर (31.37%) जैसी दवाओं के दाम वैश्विक औसत से काफी ऊपर हैं। इन दवाइयों के दाम भी अमेरिका में सबसे ज्यादा हैं।

      दवा फार्मास्यूटिकल कंपाउंड किस समस्या के लिए औसत दाम में फर्क
      भारत अमेरिका
      लिरिका प्रेगाबेलिन एपिलेप्सी - 91.13 1071.17
      लिपिटोर एटोरवास्टेटिन हाई कोलेस्ट्रॉल - 84.82 2175.83
      वेंटोलिन सालब्यूटामोल अस्थमा - 64.76 1191.01
      जिथ्रोमैक्स अजिथ्रोमाइसिन बैक्टेरियल इन्फेक्शन - 88.46 1755.25
      लांटस इंसुलिन ग्लार्गाइन डायबिटीज टाइप 1 और 2 6.62 557.86
      प्रोग्रैफ टैक्रोलिमस प्रतिरक्षा रोधी - 87.46 86.45
      यास्मिन ड्रोसपिरेनोन फीमेल कॉन्ट्रासेप्शन - 54.94 785.99
      प्रोजैक फ्लोक्जेटाइन डिप्रेशन/ओसीडी - 84.43 2124.89
      जैनेक्स अल्प्राजोलम पैनिक डिसऑर्डर - 73.21 2568.75
      जेस्ट्रिल लिसिनोप्रिल हाई ब्लड प्रेशर 31.37 2682.56
      टेनोवोफिर वाइरीड हैपटाइटस बी/ एचआईवी-एड्स 162.87 217.02
      हुमिरा अदालिमुमाब त्वचा की बीमारी - 74.20 482.91
      ब्रांडेड ड्रग्स -- -- - 87.41 421.74
      जेनेरिक ड्रग्स -- -- - 91.45 97.41


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      Medicines in India are 73% cheaper than the average worldwide price, the lowest among BRICS countries; Highest price in america

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      भारतीय खाने से बनाए मेक्सिकन डिश साल्सा और बाउल ऑफ हैप्पीनेस


      हेल्थ डेस्क. एक छोटा सा ट्विस्ट किसी भी डिश या खाने को नया स्वाद, नया रूप दे सकता है। शेफ संजीव कपूरदाल और सब्जी के ट्विस्ट के बारे में बता चुका हैं। इस बार वे देसी खाने को मेक्सिकन मेकओवर देने का आसान तरीका बता रहे हैं। इसके अलावा एक खुशियों भरे कटोरे की रेसिपी भी बता रहे हैं, जो रोज के खाने से ही तैयार किया जा सकता है। जानिए सिंपल रोटी से मेक्सिकन फूड बनाने के कुछ टिप्स...


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      Make Desi Mexican Food with Bread

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      बेटियों के पिता लंबी उम्र जीते हैं, हर बेटी के पैदा होने पर 74 हफ्ते उम्र बढ़ जाती है


      वारसा. माता-पिता की जिंदगी खुशियों से भर देने के साथ बेटियां पिता की जिंदगी के कुछ और साल भी बढ़ा देती हैं। पोलैंड की जेगीलोनियन यूनिवर्सिटी के अध्ययन में दावा किया है कि बेटियों के पिताउन लोगों के मुकाबले लंबी उम्र जीते हैं, जिनके यहां बेटियां नहीं होती। अध्ययन में पता चला कि बेटा होने का तो पुरुष की सेहत या उम्र पर कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन बेटी होने परपिता की उम्र 74 हफ्ते बढ़ जाती है। पिता के यहां जितनी ज्यादा लड़कियां होती हैं, वे उतनी लंबी उम्र जीते हैं।

      यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने बच्चों का पिता की सेहत और उम्र पर असर जानने के लिए 4310 लोंगों का डेटा लिया। इसमें 2147 माताएं और 2163 पिता थे। शोधकर्ताओं का दावा है, यह अपनी तरह का पहला ऐसा शोध हैं। इससे पहले बच्चों के पैदा होने पर मां की सेहत और उम्र को लेकर अध्ययन हुए हैं।

      बेटा-बेटी का मां की सेहत पर नकारात्मक असर
      यूनिवर्सिटी के एक शोधकर्ता के मुताबिक, बेटियों की बजाय बेटों को प्राथमिकता देने वाले पिता अपनी जिंदगी के कुछ साल खुद ही कम कर लेते हैं। बेटी का पैदा होना पिता के लिए तो अच्छी खबर है, लेकिन मां के लिए नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे पहले हुए अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन बायोलॉजी के एक अध्ययन में कहा गया था कि बेटे और बेटी दोनों का मां की सेहत पर नकारात्मक असर पड़ता है जिससे उनकी उम्र कम होती है।

      पहले हुए शोध में ऐसे भी दावे
      इससे पहले हुए एक अन्य अध्ययन में अविवाहित महिलाओं के शादीशुदा के मुकाबले ज्यादा खुश रहने की बात सामने आई थी। हालांकि एक और शोध में यह बात भी सामने आई थी कि बच्चे होने के बाद मां और बाप दोनों की उम्र बढ़ जाती है। इस अध्ययन में 14 साल तक का डेटा लिया गया था और पता चला था कि बच्चों के साथ रहने वाले कपल्स बिना बच्चों वाले कपल्स के मुकाबले ज्यादा खुश और लंबी उम्र जीते हैं।

      DBApp



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      Fathers of daughters live longer, 74 years of age increases after every daughter is born

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      बच्चे की छोटी-मोटी हरकतों से समझें उनके मौन इशारे


      हेल्थ डेस्क. एकल परिवारों और खासकर उन परिवारों में जहां माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, वहां बच्चों की परवरिश करना माता-पिता के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता। ऐसे में बच्चों के जरा से रोने पर भी माता-पिता परेशान हो उठते हैं और सीधे डॉक्टर के पास भागते हैं। बच्चों की परवरिश में एक हिस्सा उनकी भावभंगिमा पढ़ना और उनकी जरूरतों को समझना भी है। शिशु रोग विशेषज्ञ होने के नाते मैं आपको बता रहा हूं कि नवजात बच्चे (अधिकतम एक साल तक) कब और क्यों रोते हैं और उनके रोने पर क्या करना चाहि, बता रहे हैंशिशु रोग विशेषज्ञ और लेखक डॉ. अव्यक्त अग्रवाल...

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      Understand the silent gestures of the child with small movements

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      वायु प्रदूषण से बढ़ती है श्वसन और फेफड़े संबंधी बीमारियां, तुलसी, गुड़ और त्रिफला के गुण रखेंगे फिट


      हेल्थ डेस्क. वायु प्रदूषण से अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) की गंभीर समस्या हो सकती है। वायु प्रदूषण जनित दूसरे रोगों में हृदय रोग, स्ट्रोक, आंखों में जलन, एलर्जी, खांसी, नजर कमजोर होना और जहरीले कण शरीर में ज्यादा जाने पर उल्टी, दस्त व बुखार भी हो सकता है।प्रदूषण की समस्या अब केवल सर्दी के मौसम और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक ही सीमित नहीं रही है। यह कम या ज्यादा मात्रा में सभी शहरों व कस्बों की एक आम समस्या बन चुकी है और प्राय: हर मौसम में इसका असर देखने को मिल जाता है। जब भी प्रदूषित परिवेश से हमारे शरीर में जहरीले तत्व प्रवेश करते हैं, वे फ्री रेडिकल्स उत्पन्न करते हैं। फ्री रेडिकल्स तनाव और अन्य कई तरह की बीमारियों की वजह बनते हैं। ऐसे में एंटी ऑक्सीडेंट्स की भूमिका काफी बढ़ जाती है, जो इन फ्री रेडिकल्स को शरीर से बाहर कर हमारी कोशिकाओं को नुकसान से बचाते हैं। तो अगर प्रदूषण से लड़ना है तो हमें अपने भोजन में उन चीजों को शामिल करना होगा या उनकी मात्रा बढ़ानी होगी जो एंटी ऑक्सीडेंट्स से भरपूर हों। यहां वेलनेस एक्सपर्ट डॉ. शिखा शर्मा वायु प्रदूषण निपटने के लिए सही डाइट की सलाह साझा कर रही हैं...


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      Respiratory and lung diseases increase due to air pollution, properties of Tulsi, Jaggery and Triphala will keep fit

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      खाने की कोई भी चीज बेकार नहीं जाने देते असम के लोग


      लाइफस्टाइल डेस्क. असम प्रकृति की गोद में बसा हुआ छोटा-सा प्रदेश है। यहां के लोग प्रकृति से जितना लेते हैं, उतना ही लौटा भी देते हैं। खाने में विविधता है, अपनापन है, तो स्थानीयता का ज़बरदस्त स्वाद भी है। यहां खाने की हरेक चीज का पूरा इस्तेमाल होता है और कोई भी चीज़ फेंकी नहीं जाती। जैसे केले के पेड़ और केले को ले लीजिए। केला, उसका फूल और तना तो सीधे खाने के काम आता है। वहीं पेड़ के पत्ते, जिसे स्थानीय भाषा में कोलपोतुवा कहते हैं, का इस्तेमाल नाश्ता आदि परोसने के लिए किया जाता है। केलों के छिलकों को सुखाकर उनको जलाया जाता है और फिर इसकी राख को पानी में डाला जाता है। फिर इस पानी को छानते हैं। छना हुआ यह काला पानी खार कहलाता है। कुछ लोग सीधे ही चावल या किसी भी अन्य असमी डिश में यह खार डालकर खाते हैं, तो कुछ साथ में थोड़ा सा खाने का तेल भी मिलाते हैं। यह खार असमी अस्मिता से इस कदर जुड़ा है कि कई बार असमी लोगों को ‘खार-खौआ’ भी कहा जाता है, हां यह असमी लोगों का बड़प्पन ही है कि वे इसका बुरा नहीं मानते। यहां फूड हिस्टोरियन और लेखक आशीष चोपड़ा से जानिए आसम खाने के बार में कुछ खास...

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      People of Assam do not let anything of food go waste

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      31 उंगलियाें वाली 63 वर्षीय महिला की कहानी; पड़ोसी डायन समझते हैं, तानों के कारण घर छोड़ा


      लाइफस्टाइल डेस्क. एक जन्मजात बीमारी ने मुझे जीवनभर के लिए लोगों से अलग कर दिया। लोगों के तानों ने घर छोड़ने पर मजबूर किया। वह मुझे अपने जैसा नहीं समझते।यह कहना हैपैरों में 19 और हाथों में 12 उंगलियाेंके साथ जन्मी महिलाकुमार नायक का। वहकहती हैं कि पड़ोसी मुझे आम इंसान नहीं, डायन समझते हैं।बात करना तो दूर, वे मेरे पास तक नहीं आते।

      कुमार नायक की उम्र 63 साल है। उनका जन्म ओडिशाके गंजाम जिले में हुआ। वह जन्म से पॉलीडैक्टली नाम की बीमारी से ग्रस्त हैं। नतीजा, हाथ और पैर में उंगलियाेंकी संख्या आम इंसान से ज्यादा है। इसे लोग अशुभ मानते थे। उनके तानों ने कुमार को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

      नायक कहती हैं कि गरीब परिवार में जन्म लेने के कारण इलाज नहीं हो पाया। आज 63 साल बाद भी लोगों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया। उनके और मेरे बीच की दूरी बरकरार है। एक समय के बाद मैं उनकी आलोचनाओं की आदी हो गई और घर से बाहर न निकलने का फैसला लिया। कुछ लोग पास आते भी हैं तो सिर्फ ये देखने के लिए कि कितनी अंगुलियां हैं।

      क्या है पॉलीडैक्टली
      हाथों और पैरों में सामान्य से ज्यादा उंगलियोंका कारण पॉलीडैक्टलीबीमारी है। ऐसी स्थिति तब बनती है, जब गर्भ में 7वें या 8वें हफ्ते में भ्रूण में ज्यादा अंगुलियां विकसित हो जाती हैं। आंकड़ों के मुताबिक, दुनियाभर में 700-1000 में से एक ऐसा मामलाहोता है। हालांकि प्रेग्नेंसी के दौरान अल्ट्रासाउंड से इसका पता लगाया जा सकता है। बॉस्टन चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के मुताबिक, विकसित देशों में ऐसा मामला सामने आने दो वर्ष की उम्र मेंउंगलियों को सर्जरी की मदद से हटा दिया जाता है।

      भारत में ऐसे कई हैं मामले
      गुजरात के देवेंद्र सूथर भी इससे जूझ रहे हैं। उनके हाथ और पैरों में 7-7 उंगलियां हैं। इसके लिए इनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है। देवेंद्र पेशे से कारपेंटर है और दुनिया में एकमात्र इंसान हैं इन्हें मैक्सिमम फिंगर्स मैन भी कहा जाता है। देवेंद्र के परिवार में दूसरे सदस्यों के साथ ऐसा नहीं है। गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड से देवेंद्र ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धी पाई, लेकिन आर्थिक तौर पर कोई मदद नहीं मिली।

      गुजरात के देवेंद्र सूथर

      ऐसा ही एक और मामला भारत के ही अक्षत में देखा गया था। जिनके हाथों और पैरों में 7-7 उंगलियांं थी और 2010 में गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम भी दर्ज हुआ था। लेकिन बाद में सर्जरी की मदद से इनकी संख्या सामान्य कराई थी। इसलिए वर्तमान में यह रिकॉर्ड देवेंद्र के नाम है।

      पिछले महीने चीन में जन्मजात दाहिने पैर में 9 उंगलियाोंके साथ पैदा हुए 21 वर्षीय अजुन की सर्जरी की गई। 4 अतिरिक्त उंगलियोंको हटाया गया। अजु़न लोगों से दूर रहते थे क्योंकि वे उन्हें सामान्य नहीं मानते थे। पेरेंट्स उनकी अतिरिक्त उंगलियोंको शुभ मानते थे, लेकिन अजुन के दबाव बनाने पर सर्जरी की गई।

      DBApp



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      The story of 63-year-old Kumar, born with 31 fingers, spoke; Neighbors consider me a witch, because of their taunts, I had to leave the house

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      पूरे गुजरात में फरसाण का मिलेगा अलग-अलग स्वाद, लहसुन, लाल मिर्च और नमक का तड़का बनाता है  इसे खास 


      लाइफस्टाइल डेस्क. फूड हिस्टोरियन होने के नाते मैं खाने की खोज में भारत और दुनिया के कई कोनों की यात्रा करता हूं। ठीक उसी तरह गुजराती लोग अपने व्यापार के लिए पूरी दुनिया में जाते हैं। अफ्रीका से लेकर अमेरिका तक हर जगह आपको गुजराती मिल जाएंगे। अब जहां-जहां गुजराती जाएंगे, वहां उनके स्नैक्स साथ जाते ही हैं। गुजरातियों की ही तरह उनके स्नैक्स भी ट्रेवल फ्रेंडली होते हैं, मतलब आप इन्हें कई दिनों तक खा सकते हैं। यहां फूड हिस्टोरियन आशीष चोपड़ा बता रहे हैं इस खास स्नैक्स फरसाण के बारे में कुछ खास...



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      Farsan will get different taste, garlic, red chilli and salt tempering throughout Gujarat.

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      मसालों की खुशबू से महकता अधिक कैलोरी वाला उज्बेकिस्तानी फूड हर पांच में एक मौत की वजह


      लाइफस्टाइल डेस्क. मसालों की तेज खुशबू से महकती उज्बेकिस्तान की सिल्क रोड पर पहुंचते हैं तो खूबसूरत मोजेक इमारतें और आर्टवर्क के बेहतरीन नमूने देखने को मिलते हैं। लेकिन चर्चा खाने से शुरू होती है और खत्म भी इसी पर होती है। हर डिश इतनी लाजवाब है कि मुंह में पानी आ जाए। लेकिन रिसर्च के नतीजे थोड़ा चौकाने वाले हैं। दावा है कि उज्बेकिस्तान में हर पांच में एक मौत की वजह यहां का खाना है। खाने में आखिर ऐसा क्या है जो मौत की वजह बन रही है, पढ़िए रिसर्च रिपोर्ट -


      क्या खाते हैं यहां के लोग
      उज्बेक कुजीन की गिनती लजीज व्यंजनों में की जाती है। ज्यादातर फूड ऐसे हैं जिनमें कैलोरी का लेवल काफी अधिक है। कभी इसे एगरेरियन सोसायटी के लिए तैयार किया गया था। काफी मेहनती होने के कारण इस समुदाय के लोगों को अधिक कैलोरी वाले फूड की जरूरत होती थी।
      खाने की लगभग हर वैरायटी में मीट किसी न किसी रूप में शामिल है जिसे अधिक चर्बी वाली भेड़ से निकाला जाता है। खाने में मैदा, चावल, सब्जियां और तेल के साथ सौंफ, काली मिर्च, धनिया और तेजपत्ता जैसे मसालों का प्रयोग अधिक होता है।

      सोम्सा

      उज्बेकिस्तान की कई नेशनल डिशेज हैं जो जगह के मुताबिक बदलती जाती हैं लेकिन पूरे मुल्क में फेमस हैं। कबाब, नूडल, सूप के अलावा अधिकतर डिशेज ऐसी हैं जो भट्टियों में बेकिंग प्रकि्रया से तैयार की जाती हैं। इसमें सोम्सा, नारयन, स्रुपा, शाश्लिक, मंती, नान, प्लॉव शामिल है।

      • प्लॉव : यह एक तरह का पुलाव है, जिसमें चावल, गाजर और मीट का अधिक इस्तेमाल किया जाता है।
      • सोम्सा : यह पेस्ट्री की तरह दिखती है जिसमें मीट और प्याज भरा होता है, इसे भट्टी में बेक किया जाता है।
      • लैगमेन : यह सूप की कैटेगरी है, जिसमें मीट और नूडल सूप सर्व किया जाता है।
      • नारयन : नूडल सूप और मीट इसका खास हिस्सा है।
      • स्रुपा : यहां का सबसे पॉप्युलर सूप है जिसे मीट और सब्जियों से मिलाकर तैयार किया जाता है।
      • शाश्लिक : एक तरह का कबाब है जिसे ग्रिल्ड मीट और मसालों से तैयार किया जाता है।
      • मंती : मीट और प्याज को मैदे की फिलिंग में इस्तेमाल करते हैं जो मोमोज की तरह दिखती है।
      • नान : एक तरह की ब्रेड है।
      शाश्लिक

      सबसे पसंदीदा डिश उज्बेकिस्तानी पुलाव
      यहां की सबसे ज्यादा खाई जाने वाली डिश है उज्बेकिस्तानी पुलाव यानी प्लॉव। इसकी शुरुवात 1300 में अमीर तैमूर के शासनकाल में हुई है। दुश्मनों को हराने के लिए तैमूर ने सैनिकों के लिए इसे बनावाया था। यह लंबे समय तक उन्हें ऊर्जा देने का काम करता था और इसे पहुंचाना आसान था। उज्बेकिस्तान में हर विशेष आयोजन में इसे तैयार किया जाता है और हफ्ते में एक बार यहां के लोग इसे जरूर खाते हैं।

      प्लॉव : यह एक तरह का पुलाव है, जिसमें चावल, गाजर और मीट का अधिक इस्तेमाल किया जाता है।

      मौत की असल वजह है क्या
      2019 में जारी लेंसेट जर्नल में प्रकाशित रिसर्च कहती है 2017 में यहां1.1 करोड़ मौते हुईं।हर पांच में से एक मौत की वजह खानपान में पोषक तत्वों का कम और अधिक नमक का इस्तेमाल होना है। लेकिन उज्बेकिस्तान की गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट लोलो एब्दुराखिमोवा इसे पूरी तरह से सच नहीं मानतीं। वह कहती हैं कि ऐसे मामलों की मुख्य वजह बिगड़ी लाइफस्टाइल है। उज्बेक कुजीन एगरेरियन सोसायटी के लिए तैयार किया गया था जो दिनभर काफी मेहनत करते थे। अगर खाना सीमित मात्रा में लिया जाए तो खतरा न के बराबर है।

      लोलो के मुताबिक, मौतें बढ़ने की तीन मुख्य वजह हैं - भूख से अधिक खाना, एक ही जगह पर दिनभर बैठकर समय बिताना और एक ही जैसा खाना लंबे समय तक खाना। यहां के लोग शारीरिक तौर पर कम सक्रिय हैं, इसलिए वजन आसानी से बढ़ता है।
      लोलो कहती हैं, आज उज्बेकिस्तानी लोगों की डाइट में फल और सब्जियां कम शामिल हैं जबकि पुराने समय में यह खानपान का अहम हिस्सा हुआ करता था। इसकी जगह पर सिर्फ अधिक कैलोरी वाले फूड लिए जा रहे हैं।

      फूड और पर्यटन बढ़ाने की कोशिश
      फूड व्लॉगर रावशन खोदिजेव कहते हैं कि मैं पिछले तीन साल से अपने यूट्यूब चैनल पर उज्बेक खानपान की जानकारी दे रहा हूं। करीब 10 हजार सब्सक्राइबर में से 60 फीसदी उज्बेकिस्तानी हैं। अन्य 40 फीसदी ऐसे हैं जो यहां के खानपान से प्रभावित हैं उसे बनाना सीखना चाहते हैं।

      पिछले कुछ समय से उज्बेकिस्तान अपने पर्यटन और खानपान की खूबियों को दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश में लगा है। वीजा की फीस घटाई गई है, टूरिज्म वर्कर को ट्रेनिंग दी जा रही है और इंटरनेशनल विमानों की दूरी का दायरा बढ़ाया गया है।
      नतीजा यह है कि दुनियाभर के देशों से व्लॉगर यहां पहुंच रहे हैं जो उज्बेकिस्तान की खूबसूरती और खानपान को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बयां कर रहे हैं। पिछले साल थाईलैंड के फूड व्लॉगर मार्क वियंस को यहां आने का निमंत्रण भेजा गया था। इससे जुड़े एक वीडियो 1 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा था। 2014 के मुकाबले 2018 में पर्यटकों की संख्या यहां तीन गुनी हुई है।



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      Uzbekistan food with high calorie due to aroma of spices causes one death in every five

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      रोज की बोरिंग सब्जी और दाल में अचार और मेवे से नया ट्विस्ट


      लाइफस्टाइल डेस्क. दाल और सब्जी के बिना हमारा रोज का खाना अधूरा है। ये दोनों ही चीजें हमें कितनी भी पसंद क्यों न हों, कभी-कभी यह बोरिंग लगने लगती हैं। तब हम स्वाद बदलने के लिए विकल्प तलाशने लगते हैं या इस एकरसता को खत्म करने के लिए बाहर खाने चले जाते हैं। हालांकि कुछ समय बाहर खाने के बाद हमें घर लौटना ही होता है, वही होममेड खाने के लिए। और ऐसा क्यों न हो? भले ही दाल-सब्जी में एकरसता हो लेकिन ये हमें दिनभर के लिए रोजाना ऊर्जा प्रदान करते हैं। यहां मशहूर शेफ संजीव कपूर कुछ अलग तरह के फूड एक्सपेरिमेंट्स के बारे में बता रहे हैं...

      कई लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या दाल और सब्जी जैसे सादे खाने को भी थोड़ा इंटरेस्टिंग बनाया जा सकता है। आज मैं दाल और सब्जी को ट्विस्ट देने के कुछ ऐसे ही तरीके बता रहा हूं, जिन्हें आप आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। क्योंकि कभी-कभी फूड में थोड़ा सा भी बदलाव उसके स्वाद में बड़ा अंतर ला सकता है।



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      New twist with pickles and nuts in daily boring vegetables and lentils

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      टाइट जींस पहन लॉन्ग ड्राइव पर गए युवक को कार्डियक अरेस्ट, डॉक्टरों ने 45 मिनट सीपीआर देकर जान बचाई


      नई दिल्ली. टाइट जींस पहनकर लॉन्ग ड्राइव पर गए दिल्ली के एक युवक को कार्डियक अरेस्ट के बाद अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। हार्ट बीट और पल्स रुकने के साथ ही शरीर के अंग नीले पड़ गए। डॉक्टरों ने 45 मिनट तक लगातार सीपीआर दिया, जिसके बाद हार्ट बीट और पल्स वापस आई। डॉक्टरों के अनुसार, टाइट जींस में लगातार आठ घंटे तक ऑटोमैटिक कार चलाने के दौरान पैरों में खून का थक्का जम गया, जो टूटकर फेफड़ों तक पहुंच गया। इसी वजह से उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया।

      पीतमपुरा निवासी सौरभ शर्मा 10 अक्टूबर को कार से ऋषिकेश गए थे। वहां पहुंचने पर उन्हें तकलीफ हुई तो किसी और की मदद से 12 अक्टूबर को दिल्ली लौट आए। घर पर बेहोश होने के बाद परिजन उन्हें मैक्स अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच में पता चला कि पल्मोनरी इम्बोलिज्म की वजह से कार्डियक अरेस्ट आया है।फेफड़ों की धमनियों में रक्त की आपूर्ति बाधित होने को पल्मोनरी इम्बोलिज्म कहते हैं।

      पल्मोनरी इम्बोलिज्म की वजह टाइट कपड़े

      हृदय रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. नवीन भामरी ने बताया कि सौरभ की सांसें थम गई थीं। बीपी या पल्स भी रिकॉर्डनहीं हो रहा था। उन्हें पेशाब भी नहीं हो रही थी। सीपीआर से धड़कन शुरू हुई और वह होश में आए। 24 घंटे में उनका बीपी स्थिर हुआ।डॉ. भामरी ने बताया कि पूरी जांच के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पल्मोनरी इम्बोलिज्म की वजह टाइट कपड़े पहनकर लॉन्ग ड्राइव करना है।

      टाइट कपड़े पहनकर लंबी यात्रा भी घातक
      सौरभ का इलाज करने वाले डॉक्टर योगेश कुमार छाबड़ा ने कहा कि टाइट कपड़े पहनकर लॉन्ग ड्राइव करना खतरनाक हो सकता है। फ्लाइट में टाइट कपड़े पहनकर लंबी यात्रा भी घातक हो सकती है। ऐसे में टाइट कपड़ों से बचना चाहिए या फिर हर घंटे ब्रेक लेना चाहिए।

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      Cardiac arrest to young man wearing long jeans on long drive, doctors saved his life by giving 45 minutes CPR

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      पहली बार कैंसर के मरीजों के लिए जियो टैगिंग हो रही; महाराष्ट्र, उत्तर-पूर्वी राज्यों में सबसे ज्यादा केस


      नई दिल्ली (मुकेश काैशिक).कैंसर के कहां कितने मरीज हैं, इसका पता लगाने के लिए देश में पहली बार मरीजों की जियो टैगिंग की जा रही है। इस आधार पर एक नक्शा तैयार किया जा रहा है ताकि समय रहते इस बात का पता चल जाए कि कैंसर के ज्यादातर मरीज देश के किन इलाकों में हैं औरइलाज करवाने के लिए किनसेंटरों तक पहुंच रहे हैं। जहांमरीज ज्यादा होंगे, वहां लाल कलर का बिंदु नक्शे में आकार ले लेगा।

      जियाे टैग में मरीज औरउसकी बीमारी की पूरी जानकारी संग्रहित रहेगी। शुरुआती टैगिंग से पता चला है कि महाराष्ट्र के अलावा कैंसर के ज्यादातर मरीज देश के पूर्वोत्तर में हैं। यहां संख्या लगातार बढ़ रही है। मरीजों की जियाे टैगिंग का काम टाटा मेमोरियल सेंटर कर रहा है, जो परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत काम करता है।

      कैंसर के हर साल 16 लाख मामले
      स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर के हर साल 16 लाख मामले सामने आ रहे हैं। इनमें सबसे अधिक दो लाख आंतों के कैंसर के हैं, जबकि ब्रेस्ट कैंसर के मामले एक लाख 40 हजार हैं। एक लाख मामले ओरल कैंसर, 45 हजार पुरुषों के ओरल कैविटी के कैंसर और 90 हजार मामले गले के कैंसर के हैं।

      बीमारी से लड़ने का सरकारी ढांचा नाकाफी

      टाटा मेमोरियल सेंटर के मुताबिक कैंसर के दो तिहाई मरीजों का इलाज प्राइवेट अस्पतालों में हो रहा है, क्योंकि इस बीमारी से लड़ने का सरकारी ढांचा नाकाफी है। जियो टैगिंग से पता चला है कि पिछले 6 महीने में 75 हजार मरीज टाटा मेमोरियल सेंटर पहुंचे। यह संख्या अगले साल 80 हजार तक पहुंच जाएगी।कैंसर पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ग्लोबोकैन के अनुसार, भारत में कैंसर रोगी लगातार बढ़ रहे हैं। अगले 15 साल में यह संख्या 13 लाख सालाना से बढ़कर 2035 में 17 लाख सालाना तक पहुंच जाएगी। कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। 2018 में 8 लाख मौतें हुईं, जो 2035 में 13 लाख हो जाएगी।

      इलाज के लिए ‘स्पाेक एंड हब’ माॅडल पर विचार हो रहा

      कैंसर से लड़ने के लिए गठित संसदीय समिति ‘स्पाेक एंड हब’ माॅडल पर विचार कर रही है। इसके तहत राज्य स्तर पर मामूली कैंसर से लड़ने के लिए ‘स्पोक’ की तरह स्थानीय अस्पताल बनाए जाएं और कैंसर से लड़ने के लिए इन अस्पतालों का हब अलग से हो। समिति काे 130 स्पोक, 30 हब बनाने की सिफारिश मिली है।



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      टाटा मेमोरियल सेंटर।

      Click here to Read full Details Sources @ https://www.bhaskar.com/national/news/geo-tagging-to-detect-cancer-patients-01691681.html

      व्यक्ति ने 30 साल रोजाना सिगरेट पी, दोनों फेफड़े काले पड़े; ट्रांसप्लांट नहीं हो सके


      बीजिंग. चीन के जिआंगसु के वूशी पीपुल्स अस्पताल के डॉक्टरों ने एक मृत व्यक्ति के फेफड़े ट्रांसप्लांट करने से मना कर दिया। दरअसल, व्यक्ति 30 साल तक रोजाना एक डिब्बी सिगरेट पीता रहा। इस कारण उसके फेफड़े काले पड़ गए थे।

      डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया। कैप्शन में लिखा- क्या आप में अब भी धूम्रपान करने की हिम्मत है? यदि आप बहुत ज्यादा सिगरेट पीते हैं तो ट्रांसप्लांट के लिए आपके फेफड़े कभी भी स्वीकार नहीं किए जाएंगे।'

      सबसे अच्छा धूम्रपान विरोधी विज्ञापन
      डॉक्टरों द्वारा अपलोड किए गए वीडियो को 2.5 करोड़ लोगों ने देखा और अब तक का सबसे अच्छा धूम्रपान विरोधी विज्ञापन माना।

      मरीज को सांस लेने में तकलीफ थी
      नेशनल हार्ट एंड लंग इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर पीटर ओपेंशॉ ने कहा, ‘मरीज के फेफड़े में सूजन थी। उसे सांस लेने में तकलीफ होती थी। ट्रांसप्लांट होने पर यह दूसरे मरीज को सांस लेने में परेशानी पैदा करता।’

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      China, person smoked cigarettes daily for 30 years, both lungs blackened; Wuxi People's Hospital in Jiangsu Could not tr

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      ससुराल में मीठा बनाएं तो जरूर आजमाएं मेंगो कोकोनट बर्फी, रोज कोकोनट लड्डू और पनीर पेठा मिठाई


      हेल्थ डेस्क. विवाह के बाद ससुराल में चूल्हा छुलाई या बहू भोज की रस्म होती है। ये दुल्हन की पहली रसोई होती है जिसमें वह परिवार के लिए कुछ मीठा बनाती है। आमतौर पर हलवा, खीर या रबड़ी बनाई जाती है लेकिन इन्हें बनाने में समय भी काफी लगता है। ऐसे में मीठे में कुछ झटपट बनाकर परिवार को खुश कर सकती हैं। तुलसी व्यास से जानिए इन रेसिपीज के बारे में...

      1. बर्फी

        क्या चाहिए: नारियल- डेढ़ कप कद्दूकस किया हुआ, दूध- आधा कप, आम पापड़ी- 1/3 कप, इलायची पाउडर- एक चुटकी।

        ऐसे बनाएं:चौकोर गहरे बर्तन पर घी लगाकर एक तरफ रखें। अब पैन में नारियल डालकर भूनें। मध्यम आंच पर इसे हल्का गुलाबी होने तक भूनें। फिर दूध, शक्कर और नारियल का रस या गूदा डालकर मध्यम आंच पर मिलाते हुए पकाएं। इसे गाढ़ा होने तक पकाएं। ठंडा करके इलायची पाउडर मिलाएं। घी लगे बर्तन में मिश्रण डालें। ऊपर से सूखे मेवे डालकर सेट होने के लिए रखें।

      2. लड्डू

        क्या चाहिए:नारियल बूरा- डेढ़ कटोरी, कंडेंस्ड मिल्क- 1 कटोरी, इलायची पाउडर- 1 छोटा चम्मच, गुलाब सिरप- 2 बड़े चम्मच।

        ऐसे बनाएं:बड़े बोल में एक कटोरी नारियल बूरा, कंडेंस्ड मिल्क और गुलाब सिरप डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। नारियल में थोड़ा-थोड़ा कंडेंस्ड मिल्क डालते हुए मिलाएं। इलायची पाउडर डालकर मिलाएं। हथेलियों पर थोड़ा-सा घी लगाकर मिश्रण के लड्डू बना लें। एक थाली में नारियल बूरा डालकर इसमें लड्डू लपेटें।

      3. पेठा

        क्या चाहिए: पेठा - 1 बड़ी कटोरी, पनीर - 1 बड़ी कटोरी, इलायची- 4 से 5, पिस्ते- 10 से 12, काजू - 10 से 12, नारियल बूरा- ⅓1 छोटी कटोरी।

        ऐसे बनाएं:एक बड़े बोल में पेठे और पनीर को कद्दूकस करें। इसे अच्छी तरह से मसलते हुए मिलाएं। इसमें इलायची दाने, पिस्ते और काजू के टुकड़े डालकर मिलाएं। थोड़ा-थोड़ा मिश्रण लेकर लड्डू बनाएं या मनचाहा आकार दें। एक थाली में नारियल बूरा डालें। इसमें एक-एक करके लड्डू डालकर नारियल बूरा लपेटें। स्वादिष्ठ पनीर पेठा मिठाई तैयार है।



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          make healthy desert for your in-laws

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      शादी के डिनर मेन्यू को नया और यादगार बनाएं, मेहमानों को चखाएं साग और फायर पान स्वाद


      हेल्थ डेस्क. मौसम के साथ-साथ शादी की तैयारियां भी बदलती रहती हैं। जो नहीं बदलता वो है खाने का मेन्यू। लिहाजा इस बार मेन्यू में कुछ बदलाव कर सकते हैं। पूरी, सब्जी, गुलाबजामुन के साथ-साथ सर्दी के व्यंजन मेन्यू में शामिल कर सकते हैं। कुछ नए व्यंजनों की सूची हम सुझा रहे हैं। इससे भोजन में न सिर्फबदलाव आएगा बल्कि मेहमान भी इसे जीवनभर याद रखेंगे। अंजना मिश्रा से जानिए शादी में डिनर मेन्यू में आप क्या नया परोस सकते हैं...

      1. रोटी

        मैदे की बनी नान, रुमाली, तंदूरी आदि रोटियां रखने के बजाय देसी अनाज की रोटियां रखें। गेहूं की रोटी के साथ-साथ बाजरा, मक्का, ज्वार आदि की रोटियां रखें। ये मौसमी होने के साथ-साथ सेहत के लिहाज से भी अच्छी हैं।

      2. चटनी और पकौड़ी

        गर्मागर्म चाय के साथ पकोड़ियां मिल जाएं तो क्या कहने। कुरकुरी पकौड़ियां मेन्यू में शामिल कर सकते हैं। इसके साथ लाल और हरी चटनी भी परोस सकते हैं। सर्द मौसम में लोगों को चाय और चटनी के साथ-साथ पकौड़ियां खाने में मजा आएगा। अलग-अलग तरह की पकौड़ियां मेन्यू में रख सकते हैं।

      3. पान

        माउथ फ्रेशनर के रूप में पान और रंगीन सौंफ अधिकतर शादियों में मिल ही जाती है। सादे पान के साथसाथ फायर पान रख सकते हैं। सर्दी के मौसम में गर्मागर्म पान मेहमानों को यकीनन भा जाएगा।

      4. साग

        जिनको अधिक तला या मसालेदार भोजन नहीं पसंद है उनके लिए साग का कॉर्नर बनाएं। इसमें सभी मौसमी साग जैसे पालक, मैथी, बथुआ या सरसों का साग रख सकते हैं।

      5. कॉर्न

        शादी में भुट्टे देसी अंदाज़ में भूनकर मेहमानों को परोस सकते हैं। इसे दो तरीकों से पेश किया जा सकता है। एक जैसा आमतौर पर लोग कोयले में भूनकर और ऊपर से नींबू-नमक लगाकर खाना पसंद करते हैं। इसके अलावा छोटे टुकड़ों में भी परोस सकते हैं या फिर उबालकर भी दे सकते हैं।

      6. ड्रिंक

        सर्दी में चाय के अलावा गर्म ड्रिंक में फ्रूट पंच भी परोस सकते हैं। इसमें फलों के रस के साथ-साथ दालचीनी, जायफल, अदरक और गुड़ होता है। ये स्वादिष्ठ होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी अच्छा होता है। इसे छोटे-छोटे गिलासों में ही परोसवाएं ताकि बर्बाद न हो।

      7. चॉकलेट

        नए और अनोखे खाने की तरफ लोग ज्यादा आकर्षित होते हैं। ऐसे में मीठे में ट्विस्ट लाने के लिए आइसक्रीम के विविध रूप रखे जा सकते हैं, जैसे वॉलनट फज पर वनीला आइसक्रीम स्कूप और हॉट चॉकलेट। डोनट्स भी रखे जा सकते हैं।



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          Make your dinner menu new and memorable at the wedding

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      बच्चों को खसरे का टीका लगाया जाना अनिवार्य, ऐसा न करने पर 2 लाख रु. जुर्माना; संसद में कानून पेश


      बर्लिन.जर्मनी की सरकार ने नए कानून में बच्चों को मिजल्स (खसरे) का टीका लगवानाअनिवार्य कर दिया है। जो माता-पिता ऐसा नहीं करेंगे, उनसे 2750 डॉलर (करीब 2 लाख रु.) जुर्माना वसूला जाएगा।मिजल्स प्रोटेक्शन एक्ट के तहत अभिभावकोंको इसके सबूत देने होंगे कि उनके बच्चे को स्कूल या किंडरगार्टन में एडमिशन से पहलेखसरे का टीका लगाया जा चुका है। इससे बचाव के लिए वैक्सीन की दो खुराक की जरूरत होती है।

      खसराएक संक्रामक बीमारी है, जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से हवा के जरिए फैलती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने सीएनएन को बताया कि कम्युनिटी फैसिलिटी के मेडिकल स्टाफ, डेकेयर वर्कर्स, शिक्षकों और श्रमिकों को भी इस अधिनियम के तहत टीका लगाया जाना है। यह मार्च 2020 में लागू होने वाला है।

      खसरा दूषित सतह को छूने से भी फैलताहै। इसमें बुखार, खांसी, नाक बहना, आंखों में पानी आना और शरीर पर लाल निशान बनने लगतेहैं।स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, जर्मनी में जनवरी से अक्टूबर के बीच खसरे के 501 मामले सामने आए। नए कानून के अनुसार माता-पिता को टीकाकरण का सर्टिफिकेट देना होगा।

      95% आबादी को खसरेका टीका लगाने की जरूरत

      मंत्रालय के अनुसार, बिना टीकाकरण वाले बच्चों पर शुल्क लगाया जाएगा। साथ ही उन्हें स्कूल से निकाल दिया जाएगा।यूनिसेफ के अनुसार, 2018 में दुनियाभर में लगभग 3,50,000 खसरे के मामलेदर्ज किए गए। यह आंकड़ा 2017 से दोगुना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 95% आबादी को खसरेका टीका लगाया जाना चाहिए।

      इटली में भी टीकाकरण अनिवार्य

      मार्च में इटली में भी टीकाकरण को अनिवार्य कर दिया गया। प्रशासन ने माता-पिता को चेतावनी दी थी कि अगर बच्चों का टीकाकरण नहीं हुआ है तो उन्हें स्कूल न भेजा जाए। अगर बिना टीकाकरण वाले बच्चे स्कूल में मिले तो उनके माता-पिता को 500 यूरो (करीब 40 हजार रुपए) जुर्माना भरना पड़ेगा।

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      प्रतीकात्मक फोटो।

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      फ्रेंच फ्राइज के साथ नटेला और दूध में तीखा चीटोस के ट्विस्ट के साथ ट्राई करें नया स्वाद


      हेल्थ डेस्क. खाने-पीने की चीजों के साथ हमेशा से ही एक्सपेरीमेंट होते आए हैं। इन्हीं एक्सपेरीमेंट्स की वजह से कई स्वादिष्ट डिशिज इजात की गईं। अब ऐसे ही प्रयोग इंडियन और कॉन्टीनेंटल डीशिज में हो रहे हैं। जैसे फ्रेंच फ्राइज पर क्रीमी-चॉकलेटी नटेला या दूध में तीखा-चटपटा चीटोस मिक्स कर नए ट्विस्ट के साथ खाया जा रहा है। फूड ब्लॉगर अमी कैप्रिहन बता रही हैं ऐसे कुछ नए फूड कॉम्बोज और ट्विस्ट के बारे में...

      1. फ्रूट्स

        लैटिन फूड में फलों पर लालमिर्च पाउडर भुरक कर खाया जाता है, जो उनका खास मील होता है। फल ऊर्जा देते हैं और मिर्च फलों का स्वाद बढ़ा देती हैं।

      2. फूड

        नटेला का स्वाद बिल्कुल चॉकलेट सॉस जैसा ही होता है, जबकि ये हेजलनट से बनती है। इसे फ्रेंच फ्राइज के साथ खाने पर दोनों ही चीजों का जायका बढ़ जाता है। फ्राइज़ के साथ नटेला डिप रखें।

      3. चीटोज

        जब तीखा या चटपटा खाना हो तो दूध के साथ खाना चाहिए कि इससे मिर्च कम लगती है। तीखे और चटपटे चीटोस को दूध में डालकर खाया जा सकता है। स्वाद बेहद अलग और मजेदार हो जाता है।

      4. पिज्जा

        ताजा केला काटकर पिज्जा पर टॉपिंग की तरह रख सकते हैं। ट्विस्ट ये है कि केला आखिर में रखें। ओवन के अंदर चीज़ के साथ रख दिया तो स्वाद पसंद ना आने पर निकालना मुश्किल हो सकता है।

      5. स्ट्रोबेरी

        खुशबूदार स्ट्रॉबेरी का मौसम आ गया है। ऐसे में यदि इसके स्वाद का मज़ा अलग अंदाज में लेना चाहते हैं तो क्रीम और ब्राउन शुगर में डिप करके खाया जा सकता है।

      6. सैंडविच

        अक्सर ग्रिल्ड चीज सैंडविच सूप के साथ लेते हैं लेकिन कभी एपल सॉस के साथ ट्राय कीजिए। चीज और एपल कॉम्बो पसंद किया जाता है, बच्चों को भी खूब पसंद आएगा।

      7. शहद

        एवोकेडो को "हिप्सटर्स फ्रूट' कहा जाता है। एवोकेडो टोस्ट के बाद एवोकेडो आइसक्रीम का इंतजार है, जो कभी भी आ सकती है। लेकिन तब तक इसे शहद के साथ खाकर देखिए। बेहद स्वादिष्ट लगेगा।

      8. बनाना

        ब्रेड में चीज लगाकर तो सभी खाते हैं, कभी ब्रेड को चीज और केला लगाकर टोस्ट कीजिए तो स्वाद तो बढ़ेगा ही सेहत भी बढ़ेगी। चीज के साथ टोस्ट होने पर केला भी उसके साथ पिघल जाता है।



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          new food combo will give new taste to foodies

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      पाकिस्तान टायफाइड का नया टीका विकसित करने वाला पहला देश बना, डब्ल्यूएचओ ने 2018 में इसे मान्यता दी थी


      इस्लामाबाद. पाकिस्तान के नाम शुक्रवार को चिकित्सा जगत में एक उपलब्धि दर्ज हो गई। वह टायफाइड का नया टीका विकसित करनेवाला दुनिया का पहला देश बन गया। इसे टायफाइड कॉन्जूगेट वैक्सीन (टीसीवी) नाम दिया गया है। यह टायफाइड के एक प्रकार- एक्सट्रीमली ड्रग रेजिस्टेंस ड्रग (एक्सडीआर) में प्रभावी है। स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, सिंध प्रांत में यह बीमारी जानलेवा बनी हुई है। वहां यह टीका काफी मददगार होगा।

      अधिकारियों ने बताया कि नवंबर 2016 में देश में दवा प्रतिरोधी टायफाइड बुखार ने 11 हजार लोगों को अपनी चपेट में लिया था। इसका सबसे ज्यादा प्रकोप सिंध प्रांत में था। यह सल्मोनेला टायफी बैक्टीरिया की वजह से होता है। विशेषज्ञों ने इसे ‘सुपरबग’ नाम दिया। इससे पीड़ित 100 में से औसतन 20 मरीजों की मौत हो रही थी। यही कारण था कि सरकार ने इसका समाधान खोजने के प्रयास शुरू किए।

      भारत में भी बन चुका टायफाइड का टीका
      भारत में भी टसापबार टीसीवी नाम से टायफाइड का टीका बनाया जा चुका है। पिछले साल ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे मान्यता दी थी। इसे भारत बायाटेक कंपनी ने विकसित किया है। टीसीवी की प्रतिरोधक क्षमता अन्य टीकों से अधिक है और इसमें कम डोज देने पड़ते हैं।

      टायफाइड से मरने वालों में 70% की उम्र 15 साल से कम

      2017 में टायफाइड के 63% केस और इससे हुईं 70% मौतों के मामले में 15 साल से कम उम्र के बच्चे थे। इस टीके को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2018 में मान्यता दी थी। फिलहाल सिंध के शहरी क्षेत्रों में प्रतिरक्षण कैंपेन के तहत इस टीके का उपयोग किया जाएगा। इससे पहले कराची में हुए कार्यक्रम में इस टीके को प्रदर्शित किया गया।

      क्यों और कहां फैलती है टाइफाइड बीमारी?

      टायफाइड बीमारी गंदे पानी, बिना धुली सब्जियों के इस्तेमाल और साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखने की वजह से फैलती है। यह भीड़भाड़ वाले इलाकों में रहने वालों के बीच जल्दी फैलती है। सिंध प्रांत में फैलने वाले टायफाइड में कोई दवा असर नहीं करती थी। इसलिए खोजकर्ताओं ने इस टायफाइड को एक्सटेंसिव करार दिया। फिर इसके इलाज के लिए टीका खोजा गया।

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      Pakistan news updates: first country to introduce new vaccine to combat typhoid

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      रेजिस्टेंस बैंड से घर पर ही दे सकते हैं बॉडी को सही शेप, चुनें अपना वर्कआउट


      लाइफस्टाइल डेस्क. कभी व्यायाम के लिए स्थान की कमी होने से यह महत्वपूर्ण गतिविधि कर पाना सम्भव नहीं होता। ऐसे में रेजिस्टेंस बैंड के साथ सोफ़े पर बैठकर या बिस्तर पर लेटकर भी व्यायाम कर सकते हैं। बैठकर बाहों और पैरों को सुडौल आकार दे सकते हैं। रेज़िस्टेंस बैंड एक तरह का इलास्टिक बैंड होता है, जिससे व्यायाम करना काफी असरदार होने के साथ-साथ दिलचस्प भी होता है।देखिए किस तरह व्यायाम करना है, बता रही हैं फिटनेस एक्सपर्ट कविता कुमार...

      1. आर्म

        सोफे या काउच पर बैठकर इसे कर सकते हैं। पैरों को ज़मीन पर रखते हुए सीधे बैठ जाएं। पैरों को थोड़ा-सा फैलाएं। अब बाएं पैर की एड़ी के नीचे रेज़िस्टेंस बैंड फंसाएं। दाएं हाथ से बैंड का दूसरा हिस्सा पकड़ें। दाएं हाथ की कोहनी दाएं पैर के घुटने पर टिकाएं। तस्वीर अनुसार बाएं हाथ की कोहनी बाएं पैर के घुटने पर टिकाएं। अब दाएं हाथ से बैंड को अपनी ओर खींचें और फिर ढीला छोड़ें। इसे कई बार करें। यही प्रक्रिया बाएं हाथ से भी दोहराएं।

      2. शोल्डर

        सोफे पर सीधे बैठ जाएं। पैरों को ज़मीन पर रखते हुए थोड़ा-सा फैलाएं। तस्वीर अनुसार हाथों को सीने के सामने रखें और दोनों हथेलियों के पिछले हिस्से में रेज़िस्टेंस बैंड फंसाएं। हथेलियों को विपरीत दिशा में खींचें। हाथों को इसी अवस्था में सिर के ऊपर सीधा ले जाएं। हाथों को इसी तरह वापस नीचे सीने के सामने ले आएं। इसे कई बार दोहराएं।

      3. वाइपर

        ये व्यायाम बिस्तर पर कर सकते हैं। दोनों पैरों को जोड़ें और टखने पर रेज़िस्टेंस बैंड को चढ़ाएं। सीधा लेट जाएं और बांहें खोलकर कंधे की सीध में फैलाते हुए बिस्तर पर रखें। तस्वीर अनुसार दोनों पैरों को बिस्तर से ऊपर उठाते हुए कमर और पैरों के बीच समकोण बनाएं। पैरों को जोड़कर रखें। अब पैरों को फैलाने का प्रयास करें। फिर सामान्य अवस्था में ले आएं। फिर पैरों को खोलते हुए बिना शरीर के ऊपरी हिस्से को उठाए, दाईं ओर और फिर बाईं ओर ले जाएं। फिर सामान्य अवस्था में पैरों को लाएं। इस प्रक्रिया को यथासम्भव बार दोहराएं।

      4. सीटेड

        पीठ सीधी रखते हुए बैठ जाएं और पैरों को सामने की ओर सीधा फैलाते हुए जोड़कर रखें। बैंड को तस्वीर अनुसार तलवों के नीचे फंसाएं। बैंड का दूसरा हिस्सा दोनों हाथों से पकड़ें। अब हाथों से बैंड को अपनी ओर खींचें और फिर ढीला छोड़ दें। इसे करते वक़्त पैर और कमर बिल्कुल सीधी रखनी है। ये व्यायाम बिस्तर या किसी समतल सतह पर बैठकर ही किया जाना चाहिए।



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          If there is no place to exercise at home, then exercise on the couch or bed

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      निऑन और ग्लिटरी आईलाइनर से नए अंदाज में बढ़ाएं आंखों की खूबसूरती


      लाइफस्टाइल डेस्क. खूबसूरत आंखों के लिए यूं तो कई तरह के उत्पादों का इस्तेमाल किया जाता है पर आईलाइनर इनमें सबसे अधिक प्रचलित और पसंदीदा है। लाइनर का इस्तेमाल आंखों को ख़ूबसूरत और आकार में बड़ा दिखाने के लिए करते हैं पर अब इन्हें अलग अंदाज में लगाना ट्रेंड बन गया है, तो आइए आप भी एक नजर डाल लीजिए।

      1. इस तरह का लाइनर इन दिनों काफ़ी पसंद किया जा रहा है। इसमें आख़िरी छोर पर बो बनाया जाता है, जो दिखने में सोबर और स्टाइलिश लगता है। अपनी पसंदीदा आकृति भी बना सकती हैं।

      2. ये आईलाइनर्स काफ़ी आकर्षक लगते हैं। इन्हें ख़ासतौर पर निऑन कलर्स में पसंद किया जाता है। ड्रेस से मैच करता या कॉन्ट्रास्ट लाइनर लगा सकती हैं।

      3. इस तरह का आईलाइनर ख़ासतौर पर पार्टी या फंक्शन में लगाया जाता है। इन्हें अलग-अलग रंगों में लगाया जाता है। इनमें गहरे शेड अधिक पसंद किए जाते हैं।

      4. ये काफी स्टाइलिश लगते हैं। पहले काले रंग के लाइनर को लगाकर उसके ऊपर अन्य रंग के लाइनर को लगाया जाता है। इनमें हरा, नीला और कत्थई रंग के शेड चलन में रहते हैं।

      5. ये दिखने में काफ़ी अलग होते हैं। ऊपर काले रंग का लाइनर लगाकर नीचे काजल की जगह ग्लिटरी लाइनर लगाया जाता है। ऊपर भौंह के नीचे अलग रंग का लाइनर लगाया जाता है।



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          Enhance the beauty of eyes in a new style with neon and glitter eyeliner

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      व्यक्ति की बंद नाक में 20 साल से बढ़ रहा था दांत, 30 मिनट की सर्जरी कर निकाला


      हारबिन. चीन में 30 साल के झांग बिन्सेंग नाक बंद होने की शिकायत के बाद अस्पताल पहुंचे। एक्सरे रिपोर्ट के बाद डॉक्टरों ने बताया कि उसके नथूने में एक सेंटीमीटर का दांत विकसित हो गया है। यह 20 साल से नथूने में है। व्यक्ति को बीते 3 महीनों से रात में सांस लेने की ज्यादा दिक्कत थी। उसकी सूंघने की क्षमता भी कम हो रही थी।

      दरअसल, 10 साल की उम्र में गिरने से झांग का दांत टूटकर नथूने में चला गया था। वहीं, उसने अपनी जड़ें विकसित कर ली थी। लंबे अंतराल से बढ़ रहा दांत कैविटी का कारण बन गया। डॉक्टर ने दांत को 30 मिनट में सर्जरी कर निकाल दिया गया।डॉक्टर गुओ लॉन्मेई ने बताया, "जब नाक में दांत गया,तब नाकउसे निकाल नहीं सकी। जैसा वह अंदर आई किसी चीजनिकाल देती है।"

      MRI

      दिमाग में मिला था 12 सेंमी लंबा कृमि
      दक्षिण-पूर्वी शहर गुआंगझाऊ में भी इसी तरह का एक मामला सामने आया था, जब 12 सेंटीमीटर का कृमि (टेपवर्म) 36 साल के व्यक्ति के दिमाग में पाया गया था। कृमि उसके दिमाग के हिस्से को 15 साल से नुकसान पहुंचा रहा था। व्यक्ति को घोंघे खाने की लत की वजह से कृमि का इंफेक्शन हुआ था।

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      झांग बिन्सेंग की नाक से निकाला गया दांत।

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