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कान्हा के जन्मोत्सव पर लगाएं गोपालकाला और फलाहारी गुलाब जामुन का भोग


लाइफस्टाइल डेस्क. जन्माष्टमी पर कन्हैया के मन को भाने वाले माखन मिश्री का प्रसाद बनाया जाता है। धनिया पंजीरी, मखाना पाग, सिंघाड़े की पूरी भी बनाते हैं। लेकिन इस बार कान्हा के जन्मोत्सव पर भोग को बदलाव कर सकते हैं। उन्हें गोपालकाला और फलाहारी गुलाब जामुन का भोग लगा सकते हैं। अंजु पांडे बता रही हैं इन्हें कैसे बनाएं...

  1. श्श्


    क्या चाहिए :पोहा- 1 कप, मुरमुरे (लाई) - कप, जीरा- चम्मच, नमक- स्वादानुसार, शक्कर - 1 बड़ा चम्मच, देसी घी- 2 बड़े चम्मच, हरी मिर्च- 2 या 3, अदरक- इंच टुकड़ा, हरा धनिया- 2 बड़े चम्मच बारीक कटा हुआ, दही- 2 कप, ककड़ी- 1 बारीक कटी हुई, ताज़ा नारियल- 4 बड़े चम्मच कद्दूकस किया हुआ, अनारदाना- कप, आम का अचार छोटा चम्मच, नींबू का अचार- छोटा चम्मच।

    ऐसे बनाएं :पोहा भिगोकर 15 मिनट के लिए रखें। पोहे का पानी अच्छी तरह से निथार लें। बड़े बर्तन में भीगा हुआ पोहा, मुरमुरे, ककड़ी, दही, अनारदाना, हरा धनिया, आम व नींबू का अचार, नमक, शक्कर और नारियल का बूरा डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। इसे एक तरफ़ रख दें। अब कड़ाही में घी गर्म करें। इसमें जीरा डालकर तड़काएं। कद्दूकस किया हुआ अदरक और बारीक कटी हुई हरी मिर्च डालकर भूनें। यह तड़का तैयार पोहे के मिश्रण में मिलाएं। गोपालकाला प्रसाद तैयार है।

  2. श्श्


    क्या चाहिए : पनीर- कप कद्दूकस किया हुआ, सिंघाड़े का आटा- 1 कप, उबला और मसला हुआ आलू- 1 कप, अदरक का पेस्ट- 1 छोटा चम्मच, हरी मिर्च 5 बारीक कटी हुई, दही- 2 कप, नमक स्वादानुसार, देसी घी या तेल- तलने के लिए, शक्कर- 1 छोटा चम्मच, भुना हुआ जीरा पाउडर- छोटा चम्मच, हरा धनिया- थोड़ा-सा, इमली की चटनी और हरी चटनी।

    ऐसे बनाएं: कद्दूकस पनीर, मसला हुआ आलू, कटी हरी मिर्च, अदरक का पेस्ट और सेंधा नमक अच्छी तरह से मिलाएं। मिश्रण के छोटे-छोटे गोले बना लें। बड़े बोल में सिंघाड़े का आटा और पानी का गाढ़ा घोल बनाएं। घोल इतना गाढ़ा रखें कि दही बड़े पर आसानी से लिपट जाए। कड़ाही में घी या तेल गर्म करें। तैयार दही बड़ों को सिंघाड़ा आटा के घोल में डुबोएं। फिर मध्यम आंच पर सुनहरा होने तक तलें। अलग बर्तन में दही, नमक और शक्कर मिलाकर अच्छी तरह से फेंटें। तैयार दही बड़े एक प्लेट में रखें। ऊपर से दही, भुना हुआ जीरा पाउडर, चटनी और कटा हुआ हरा धनिया से सजाकर परोसें।

  3. श्श्


    क्या चाहिए: मावा- 250 ग्राम, सिंघाड़े का आटा- 4 बड़े चम्मच, काजू- 5, पिस्ता- 5, छोटी इलायची का पाउडरछोटा चम्मच, देसी घी- 4 बड़े चम्मच, शक्कर- 500 ग्राम, बेकिंग पाउडर- छोटा चम्मच, पानी- आवश्यकतानुसार।

    ऐसे बनाएं:चाशनी तैयार करने के लिए बर्तन में शक्कर और पानी उबालें। चाशनी के लिए शक्कर का एक चौथाई हिस्सा पानी होना चाहिए। शहद जैसी गाढ़ी होने तक चाशनी को पकाएं। फिर छोटी इलायची का पाउडर डालकर मिलाएं। आंच बंद करके एक तरफ़ रख दें। अब मावा को मसलकर अच्छी तरह नरम कर लें। सिंघाड़े का आटा और बेकिंग पाउडर छानकर मिला लें। इसे मावे में डालें और अच्छी तरह से मसलकर एकसार कर लें। भरावन के लिए तैयार मावे के मिश्रण से एक छोटा हिस्सा अलग कर लें। इसमें बारीक कटे हुए काजू, पिस्ता और एक बड़ा चम्मच पिसी हुई शक्कर डालकर मिलाएं। गुलाब जामुन बनाने के लिए बचे हुए मावा मिश्रण की नींबू के आकार की लोई बना लें। इसे गोल करके हथेली से दबाएं। तैयार भरावन का छोटा-सा टुकड़ा लोई पर रखें और चारों तरफ से बंद करें। अच्छी तरह से चिकना होने तक गोल करें। इसी तरह सभी गुलाब जामुन तैयार करें। धीमी आंच पर घी में सुनहरा होने तक शैलो फ्राय करें। हल्की गर्म चाशनी में इन्हें डाल दें।



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      Janmashtami 2019 Bhog Prasad Recipes: Janmashtami Sri Krishna Favourite Food Special Prasad Bhog, Gopalakala Prasad

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मूड डिसऑर्डर और डिप्रेशन का एक कारण नकारात्मक सोच भी, सकारात्मक विचार रखते हैं सेहतमंद


हेल्थ डेस्क. सकारात्मक सोच एक बेहद शक्तिशाली जरिया है कामयाबी पाने का और स्वस्थ रहने का। और सबसे लोकप्रिय होने का भी। सकारात्मक या नकारात्मक सोच का सीधा सम्बंध दिमाग से है। हमारा दिमाग नकारात्मक सोच और विचारों के लिए तेजी से प्रतिक्रिया करता है। अच्छी खबर के बजाए बुरी खबर का हम पर ज्यादा असर पड़ता है।

जब भी सकारात्मक रूप से सोचते हैं, तो हमारा दिमाग यह मान लेता है कि सब कुछ नियंत्रण में है और इसके लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं। लेकिन नकारात्मक सोच के कारण पैदा होने वाला तनाव, दिमाग में इस तरह के बदलाव लाता है कि मानसिक विकारों जैसे अवसाद, मनोविदलता (सीजोफ्रेनिया) और मूड डिसऑर्डर जैसी परेशानियां शरीर में जन्म लेने लगती हैं। पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों के दिमाग में असामान्यताएं देखी जा सकती हैं। इससे तनाव हाॅर्मोन कॉर्टिसोल की मात्रा शरीर में बढ़ जाती है, जो हाॅर्मोन्स के सामान्य कार्यों में बाधा पैदा करता है। डाॅ. अमूल्य सेठ, कोलम्बिया एशिया अस्पताल, गाजियाबाद से जानिए सोच बदलने पर कितना कुछ बदल जाता है

  1. जब आप व्यक्ति या परिस्थितियों में अच्छाई या सीख देखने की कोशिश करते हैं, तो आप अपनी क्षमताओं को भी सकारात्मक नजरिए से देखते हैं। ऐसी सोच रखने वाले लोग ज्यादा सक्रिय होते हैं। समाज के प्रति बेहतर दृष्टिकोण रखते हैं। हर कार्य खुशी से करते हैं इसलिए सफल भी होते हैं। यह साबित हो चुका है कि अगर आप अपने काम से खुश होते हैं तो आप अधिक सफल होते हैं।

    • असफलता के अवसरों में से सीख ढूंढें :आपका कोई प्रोजेक्ट नकार दिया गया है या असफल हुआ है, तो निराश होने या दूसरे से तुलना करके उदास होने की जगह उन दो-तीन बातों का नोट बनाएं, जो असफलता के लिए ज़िम्मेदार रहीं। अगले प्रोजेक्ट में इनका ध्यान रखें।
    • वर्तमान पर फोकस करें :इस दिन, पहर या घंटे पर नहीं, इस लम्हे पर ध्यान दें। हो सकता है, दो मिनट पहले आपको किसी से डांट पड़ी हो, तो ध्यान दें कि वह लम्हा तो बीत चुका। अभी इसी समय, इसी क्षण पर बीती बात का साया क्यों पड़ने दें। जो याद रखना है, उसे याद में डालें और सम्भलकर आगे बढ़ें।
    • सकारात्मक लोगों के साथ रहें :सुनिश्चित करें कि आपके आसपास के लोगों की सोच भी सकारात्मक हो। खुद अपने दोस्त बनिए। अपनी आलोचना करने या दूसरों से अपनी तुलना करने के बजाय खुद को दूसरों से बेहतर मानें।


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      positive thinking stays away from mood disorder and depression says expert

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मक्खन के 4 नए स्वाद बदल देंगे आपके खाने का जायका, घर पर आसानी से बनाएं


फूड डेस्क. खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए मक्खन का प्रयोग करती हैं तो इस बार इसे नए तरह से बनाएं। मक्खन के अलग-अलग स्वाद आपको नए जायके से रूबरू कराते हैं। जानिए मक्खन को नया स्वाद देने के लिए 4 तरह से कैसे तैयार करें….

  1. 1 कप नमकीन मक्खन (कमरे के तापमान पर) में 3 बड़े चम्मच ताज़ा व कटा हुआ हरा धनिया, कुटी हुई 1 लहसुन की कली, आधे नींबू का रस, थोड़ा नींबू ज़ेस्ट और 1 चुटकी कुटी हुई लाल मिर्च को हल्के हाथ मिलाएं। इसे सलाद, नूडल्स, पास्ता या ब्रेड पर लगा सकते हैं।

  2. 1 कप सादे मक्खन (कमरे के तापमान पर) में 3 बारीक कुटी हुई लहसुन की कली, 1 नींबू का रस व ज़ेस्ट, 3-3 बड़े चम्मच बारीक कटी हुई तुलसी, पुदीना व हरा धनिया, स्वादानुसार नमक और काली मिर्च डालकर मिलाएं। इस मक्खन को उबली या रोस्टेड सब्ज़ियों में उपयोग कर सकते हैं।

  3. 1 कप सादे मक्खन (कमरे के तापमान पर) में 1 नींबू का रस व ज़ेस्ट, 2 बड़े चम्मच बारीक कटा हुआ हरा धनिया, आधा छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर और आधा छोटा चम्मच नमक डालकर मिलाएं। इसे चीले, ब्रेड, पॉपकॉर्न, चावल या मक्के के दाने के साथ उपयोग कर सकते हैं।

  4. 3/ 4 कप मक्खन में 1 नींबू का रस, 2 बारीक कटा हुआ प्याज/हरा प्याज, 1-2 छोटा चम्मच कद्दूकस की हुई अदरक, 2 बारीक कटी हुई लहसुन की कली, 2 बारीक कटी हरी मिर्च और स्वादानुसार नमक डालकर मिलाएं। इस चटपटे मक्खन को पराठे, रोटी या सब्जीकिसी में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।



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      butter recipe how to make chille thai butter cow boy butter

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नासिक के सिविल हॉस्पिटल में रोज नए रंग की चादर इस्तेमाल होने से घटी नवजातों की मौतें


हेल्थ डेस्क.शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए महाराष्ट्र के नासिक में सिविल हॉस्पिटल ने नया प्रयोग किया है। यहां स्पेशल केयर यूनिट में बिस्तर पर हर दिन अलग-अलग रंग की चादरों का इस्तेमालकिया जा रहा है। जैसे सोमवार के लिए हरा और मंगलवार को नीला। अस्पताल प्रशासन का दावा है कि इस पहल से नवजातों कोरोजानासाफ और संक्रमण मुक्त चादरें मिलती हैं। इसके अलावा हर क्युबिकल में मॉप्स और बकेट लगाए गए। इन कोशिशों से शिशु मृत्युदर में 8% की कमी आई है।

  1. स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट के प्रभारी पंकज गाजरे के मुताबिक, सोमवार को हरी, मंगलवार को नीली, बुधवार को गुलाबी रंग की बेडशीट का इस्तेमाल करते हैं। वहीं, गुरुवार को महरून, शुक्रवार को केसरिया, शनिवार को हल्की हरी और रविवार को हल्की नीली चादरें बिछाई जाती हैं। एक बेडशीट का इस्तेमालएक ही दिन होता है।

  2. इस केयर यूनिट में पहले प्रति माह औसतन 346 में से 55 बच्चों की मौत हो जाती थी। अब यहां हर माह करीब 250 से 300 नवजात भर्तीकिए जाते हैं। शिशु मृत्यु दर 8 प्रतिशत तक घट गई है। नवजातों की बेहतर देखभाल के लिए केयर यूनिट में 16 बेड, तीन मेडिकल ऑफिसर, 8 नर्स और 4 लोगों का सहयोगीस्टाफ है।

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  3. सेंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे 2017 के मुताबिक, महाराष्ट्र में शिशु मृत्यु दर पिछले दस सालों में घटी है। 2008 में मृत्यु दर प्रति 1 हजार बच्चे में से 24 थी, जो 2017 में 13 पर आ गई। यानी हर एक हजारमें अब 13 बच्चों की मौत हो रही है। यह आंकड़ा केरल और तमिलनाडु के करीब पहुंच गया है।

  4. महाराष्ट्र में मृत्यु दर कम होने की एक वजह खास एक्शन प्लान भी है।शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए 2014 में डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ ने मिलकर एवरी न्यूबॉर्न एक्शन प्लान शुरू किया था, जिसका महाराष्ट्र में सकारात्मक असर देखने को मिला।

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      to decrease Nashik civil hospital used colour coded bedsheets to protect newborns from infection

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वॉर्म-अप एक्सरसाइज से मसल्स को करें एक्टिव, घटेगा इंजरी और हार्टटैक का खतरा


हेल्थ डेस्क. वार्म-अप एक्सरसाइज हर व्यायाम का जरूरी हिस्सा है। यह शरीर को व्यायाम (कार्डियोवैस्कुलर और मस्कुलोस्केलेटल) के लिए सक्रिय करता है। हालांकि अक्सर लोग वार्म-अप को महत्व नहीं देते। वार्म-अप मसल्स बनाने या कैलोरीज बर्न करने में अधिक मददगार न हो, लेकिन यह किसी भी वर्कआउट को सफल बनाने के लिए बहुत जरूरी है। डॉ. सीमा ग्रोवर, चीफ फिजियोथेरेपिस्ट, इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल से जानिए क्यों जरूरी है वार्म-अप एक्सरसाइज...

  1. वार्म-अप करने से शरीर का तापमान बढ़ता है। यह खासतौर पर मांसपेशियों के लिए काफी फायदेमंद है। शरीर का तापमान बढ़ने से मांसपेशियों तक ऑक्सीजन का प्रवाह भी बढ़ जाता है, जिससे उनके तनने और रिलैक्स होने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। इससे मुश्किल व्यायाम भी कहीं आसान हो जाते हैं।

  2. वार्म-अप से दिल को भी वर्कआउट के लिए तैयार होने का मौका मिलता है। इससे दिल पर अनावश्यक ज्यादा दबाव नहीं पड़ता। वर्कआउट करने के दौरान या एक्सरसाइज करने के तत्काल बाद हार्ट अटैक के कई केसेस अक्सर देखने या सुनने को मिलते हैं। ऐसा प्रॉपर वार्म-अप नहीं करने की वजह से होता है। अगर वार्म-अप करेंगे तो वर्कआउट के दौरान या तत्काल बाद हार्ट अटैक की आशंका कम हो जाएगी।

  3. वार्म-अप मसल्स का लचीलापन बढ़ता है, जिससे व्यायाम के दौरान मसल्स में इंजरी की आशंका कम हो जाती है। इसी तरह वर्कआउट के बाद कूल डाउन करने से भी मसल्स रिलेक्स हो जाती हैं और उनमें दर्द या सूजन की संभावना नहीं रहती।

  4. वर्कआउट के लिए मेंटली तैयार होना भी बहुत जरूरी है। अगर आप मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं तो उससे कोई भी व्यायाम बहुत मुश्किल लगने लगता है और इसके बीच में ही छोड़े जाने की आशंका बढ़ जाती है। प्रॉपर वार्म-अप करने से आपका शरीर और दिमाग दोनों व्यायाम के लिए तैयार हो जाएंगे और कठिन एक्सरसाइज भी आसान लगेगी।

  5. वार्म-अप करने से व्यायाम के दौरान बेहतर परफॉर्मेन्स में मदद मिलती है। इसका फायदा यह होता है कि एक्सरसाइज के दौरान मशीनों का इस्तेमाल करने में आसानी हो जाती है। वार्म-अप करने से पहले मसल्स बनाने वाली मशीनों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

  6. यह तो स्पष्ट हो गया है कि वार्म-अप हर उम्र के व्यक्ति और हर प्रकार के शरीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपको जिम में अपने लक्ष्य हासिल करने में मदद करता है। वार्म-अप एक्सरसाइज 5 से 10 मिनट तक की जा सकती है। लेकिन सवाल यह है कि वार्म-अप में हम क्या करें? वार्म-अप के लिए कुछ हल्की एक्सरसाइज़ की जा सकती हैं। या जॉगिंग, साइकिलिंग आदि भी कर सकते हैं। इसमें स्ट्रैचिंग भी कर सकते हैं।



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      warm up exercise decrease chances of injury and heart attack

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घर में मौजूद धूल भी अस्थमा अटैक का कारण, सफाई रखें और खिड़कियों पर पर्दे जरूर लगवाएं


हेल्थ डेस्क.एलोपैथी डॉक्टर और लेखक डॉ. अव्यक्त अग्रवाल के मुताबिक, बच्चों के अस्थमा के मामले को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसा करना क्यों जरूरी है, इसे उन्होंने एक मरीज की कहानी बताकर समझाया।

मेरे पास इलाज के लिए आए 6 साल के बच्चे जसवंत की दिन भर से सांसें बहुत तेज थीं। माता- पिता के अनुसार उसे बार-बार सर्दी हो रही थी। सीने से आवाज आ रही थी। वह निमोनिया के कारण दो बार एडमिट भी हो चुका था। क्लीनिकली चैक करने पर मैंने पाया कि उसे अस्थमा था। सर्दी और तेज़ सांसों के चलते वह जब पिछली बार एडमिट हुआ था, तब भी कारण निमोनिया नहीं बल्कि अस्थमा के एपिसोड या छोटे अटैक्स थे। बच्चे का अस्थमा सुनकर स्वाभाविक तौर पर उसके पैरेंट्स चिंतित हुए। उन्हें यकीन करना मुश्किल था कि इस उम्र में भी अस्थमा हो सकता है। अस्थमा को लोग वयस्कों में या उम्र बढ़ने के साथ होने वाला रोग समझते हैं, लेकिन प्रदूषण, खानपान और लाइफस्टाइल में बदलाव के कारण इन दिनों लगभग 10 फीसदी बच्चों को अस्थमा हो रहा है। बच्चों में अस्थमा की ठीक समय पर पहचान और इलाज ना हो तो समय के साथ यह गंभीर होता जाता है।

  1. अस्थमा सांस की नलिकाओं में एलर्जी से उत्पन्न क्रोनिक इंफ्लैमेशन (गंभीर सूजन) की वजह से होता है। श्वास नली में बाहरी एलर्जी के प्रति किसी भी बेहद संवेदनशील तत्व के जाते ही श्वास नलिका के रास्तेसिकुड़ जाते हैं। छुई-मुई के पौधे को छूने पर जैसे पत्तियां बंद होती हैं, कुछ वैसी ही है यह प्रक्रिया। श्वास की नली के संकरी होने से सांस लेने में परेशानी होने लगती है, खांसी आनी शुरू हो जाती है या फिर सांस लेने पर सीटी जैसी अथवा घर्र-घर्र आवाज़ होने लगती है। अस्थमा में सांस लेने में दिक्कत या खांसी की समस्या कुछ दिन के लिए होती है, लेकिन कई मामलों में कुछ हफ्ते बल्कि महीनों तक बिना लक्षणों के भी रह सकती है। किसी खास मौसम जैसे बारिश या ठंड में भी इसके एपिसोड होते हैं। किंतु सही इलाज से बार-बार होने वाले इन एपिसोड से पूर्णतः निजात संभव है। साथ ही बार-बार बीमार होने से होने वाले शारीरिक, मानसिक विकास में अवरोध से भी बचा जा सकता है। कभी-कभार इलाज न लेने पर अस्थमा का एपिसोड जानलेवा भी हो सकता है।

  2. कुछ बच्चों में अस्थमा जैसे लक्षण मात्र दौड़ने या शारीरिक व्यायाम के बाद भी नजर आने लगते हैं। आमतौर पर ऐसे बच्चों को लंबे समय के इलाज की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन अगर सांस फूलने जैसी शिकायत बार-बार हो रही है, तो फिर डॉक्टर से कंसल्ट करने की जरूरत है। अस्थमा के टेस्ट के लिए भी एक्सरे या किसी ब्लड टेस्ट की जरूरत नहीं होती, सिर्फ क्लीनिकल परीक्षण से ही डॉक्टर इसका पता लगा सकते हैं। कुछ बच्चों में नाक की एलर्जी या एलर्जिक रायनाइटिस की समस्या होती है। बचपन में ही इसका समुचित इलाज करने पर आगे चलकर अस्थमा या साइनोसाइटिस की प्रॉब्लम होने से बचा जा सकता है।

  3. अस्थमा का इलाज दो चरणों में किया जाता है। पहला अस्थमा के एपिसोड को खत्म करने के लिए नेबुलाइजेशन और स्टेरॉयड दवाओं की जरूरत होती है। बच्चों को अस्थमा के बार-बार एपिसोड न हों, इसके लिए इन्हेलर दिए जाते हैं। इन्हेलर भी जरूरत के हिसाब से कुछ महीने, साल या सर्दी-बारिश जैसे विशेष मौसम में ही डॉक्टर्स लेने के लिए कहते हैं। अस्थमा में अलग-अलग गंभीरता के बच्चे होते हैं और इलाज उसी के अनुरूप दिया जाता है। बढ़ती उम्र के साथ काफी बच्चे ठीक भी हो जाते हैं। हालांकि कुछ बच्चों को आजीवन इलाज की आवश्यकता हो सकती है। नियमित व्यायाम, प्राणायाम और योग इसका बहुत अच्छा इलाज है। यहां तक कि स्वीमिंग भी फायदेमंद है, बशर्ते आप डॉक्टर द्वारा बताया इलाज भी समुचित ले रहे हों।

  4. बच्चों को अस्थमा ना हो, इसके लिए जरूरी है कि अपने घर में धूल बिल्कुल ना रहने दें। यही अस्थमा के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है। मुमकिन हो तो कालीन (गलीचे) का इस्तेमाल न करें, खिड़की-दरवाज़ों पर पतले पर्दे लगाएंं, वैक्यूम क्लीनर से धूल साफ करते रहें। गाजर घास आदि को भी बच्चों से दूर रखें। अगर किसी को अस्थमा है भी तो फूल-पत्तियों या पेट्स से एलर्जी का इससे कोई संबंध नहीं है। हां, इससे एलर्जी हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं है कि वह अस्थमा ही हो। बहुत बार अस्थमा से पीड़ित बच्चों की माताएं बच्चों को फल इत्यादि देना बंद करवा देती हैं। धूल के डर से बाहर खेलना भी बंद करवा देती हैं, जो कि ग़लत है। इससे बच्चे के शारीरिक विकास पर बुरा असर होता है।

  5. अस्थमा के इलाज में इन्हेलर के माध्यम से दी जाने वाली दवा सबसे सुरक्षित और हानिरहित होती है। इन्हेलर दवा को देने की एक विधि मात्र है जबकि इन्हेलर में मौजूद दवा अलग-अलग तरह और प्रभावों की होती हैं। इन्हेलर से दवा सांस की नली के उन हिस्सों मात्र में पहुंचती है, जहां समस्या है। चूंकि यह रक्त में नहीं जाती, इसलिए यह दवा सर्वाधिक सुरक्षित और साइड इफेक्ट से रहित होती है। यह भ्रांति भी अवैज्ञानिक है कि इन्हेलर के आदी हो जाते हैं।



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      asthma in children all you need to know how to prevent asthma in children

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कश्मीर घाटी की गुलाबी और नमकीन चाय, फूलों को उबालकर और नमक मिलाकर इसे करते हैं तैयार


फूड डेस्क. चाय भारत ही नहीं, दुनियाभर में सबसे ज्यादा पिया जाने वाला पेय पदार्थ है। किसी को एकदम कड़क चाय पसंद होती है तो किसी को कम उबली हुई दूधवाली चाय। किसी को ग्रीन टी पसंद है तो किसी को ब्लैक टी। कोई ब्लैक टी में नींबू डालकर ऑरेंज कलर की चाय पीना पसंद करता है। यानी चाय की प्रकृति के अनुसार इसका रंग भी अलग-अलग होता है। लेकिन आज शेफ और फूड प्रजेंटेटर हरपाल सिंह सोखी से जानिए कश्मीर की अनूठी पिंक टी यानी गुलाबी चाय के बारे में...।

  1. पिंक टी को को 'शीर चाय' कहते हैं। स्थानीय बोली में इसे नून चाय भी कहा जाता है। कश्मीर में नून का मतलब है नमक। यानी यह चाय नमकीन होती है। नमकीन होने के अलावा इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका गुलाबी रंग। साथ ही इसका क्रीमी टेक्सचर भी इसे खास बनाता है। यह कश्मीर के एक और प्रसिद्ध पेय पदार्थ 'कश्मीरी कहवा' से स्वाद और बनाने के तरीके दोनों मायने में काफी अलग होती है।

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    नून या गुलाबी चाय कश्मीर घाटी में पैदा होने वाली विशेष पत्तियों 'फूल' से बनाई जाती है। नून चाय बनाने के लिए चाय की इन 'फूल' पत्तियों को अच्छे से उबाला जाता है। जब चाय उबल जाती है तो उसमें सोडा-बाईकार्बोनेट मिला दिया जाता है। इसी वजह से इसका स्वाद नमकीन होता है। कुछ लोग सोडा-बाईकार्बोनेट के स्थान पर नमक का भी यूज करते हैं। उबलने पर चाय का पानी डार्क लाल रंग में बदल जाता है। अब इसमें दूध मिलाया जाता है जो इसका रंग बदलकर गुलाबी कर देता है। इस चाय को बनाते समय इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि 'फूल' नामक पत्तियां निर्धारित मात्रा से ज्यादा न हो जाएं। अन्यथा इसका स्वाद तो तीखा होगा ही, रंग भी गुलाबी नहीं आएगा।

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    नून चाय में पारंपरिक तौर पर शक्कर नहीं मिलाई जाती है, लेकिन अब युवा पीढ़ी इसमें शक्कर मिलाकर भी पीने लगी हैं। कुछ लोग इसमें "चक्र फूल' जैसे गरम मसाले भी मिलाने लगे हैं। आम कश्मीरी इसी सादी गुलाबी चाय को पीते हैं। लेकिन सम्पन्न कश्मीरी इसमें कुछ सजावट और करते हैं। वे इस गुलाबी चाय में घर में बना क्रीम डालते हैं और उस पर पिश्ते और बादाम के टुकड़ों से गार्निशिंग करते हैं। घर में आए मेहमान की हैसियत के अनुसार ही चाय में डलने वाले क्रीम की मात्रा तय होती है। अगर मेहमान महत्वपूर्ण है तो क्रीम ज्यादा डलता है और कम महत्वपूर्ण है तो कम।

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    कश्मीर में नून चाय या पिंक टी कैसे अस्तित्व में आई, इसका कोई ज्ञात इतिहास तो नहीं है। लेकिन माना जाता है कि यह तुर्किस्तान के यरकंद क्षेत्र से कश्मीर में आई। कश्मीर के पहले मुस्लिम शासक सद्दरुद्दीन शाह को तुर्किस्तान के बुलबुल शाह ने ही इस्लाम में शामिल करवाया था। तुर्किस्तान के यरकंद क्षेत्र में 'एक्टान' नामक चाय बनाई जाती थी जिसमें नमक, दूध और क्रीम का इस्तेमाल किया जाता था। इसलिए माना जाता है कि नमकीन और क्रीम चाय बनाने की यह विधि तुर्किस्तान से ही कश्मीर आई होगी।



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      Kashmiri pink tea noon chai recipe know how to make kashimri pink tea saying chef harpal singh sokhi

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पूरी नींद लेने के मामले में भारतीय अव्वल, चीन और सउदी अरब को पीछे छोड़ा


हेल्थ डेस्क. पूरी नींद लेने के मामले में भारतीय अव्वल हैं। भारतीयों ने चीन, सउदी अरब के लोगों को भी पीछे छोड़ दिया है। मार्केट रिसर्च फर्म केजेटी और फिलिप्स के हालिया सर्वे में यह बात सामने आई है। सर्वे 12 देशों के 18 और इससे अधिक उम्र के 11006 लोगों पर किया गया है। सर्वे में सामने आया कि दुनियाभर के 62 फीसदी लोगों को रात में नींद नहीं आती।

  1. सर्वे के मुताबिक, पूरी नींद लेने के मामले में साउथ कोरिया और जापान के लोगों की स्थिति बुरी है। दुनियाभर में लोग औसतन 6.8 घंटे ही नींद ले पाते हैं। वहीं, वीकेंड की रात में ये आंकड़ा बढ़कर 7.8 घंटे हो जाता है। आमतौर पर विशेषज्ञ आठ घंटे नींद लेने की सलाह देते हैं लेकिन हर 10 में से 6 लोग ही वीकेंड पर देर तक सो पाते हैं।

  2. सर्वे के अनुसार, पिछले 5 सालों में हर 10 में से 4 लोगों की नींद पर बुरा असर पड़ा है। वहीं, 26 फीसदी लोगों का कहना है कि नींद पहले से बेहतर हुई है। सर्वे मेंं शामिल 31 फीसदी लोग ऐसे भी हैं जिनका कहना है कि नींद की वजह से कुछ भी नहीं बदला है।

  3. फिलिप्स ग्लोबल स्लीप सर्वे 2019 के मुताबिक, कनाडा और सिंगापुर ऐसे देश हैं जहां नींद न आने का सबसे बड़ा कारण तनाव है। अनिद्रा की वजह लाइफस्टाइल का व्यवस्थित न होना है। सर्वे में नींद न आने के पांच कारण गिनाए गए हैं। इनमें तनाव (54 %), सोने की जगह (40 %), काम और स्कूल का शेड्यूल (37 %), एंटरटेनमेंट (36 %) और स्वास्थ्य की स्थिति (32 %) शामिल है।

  4. 35 फीसदी शादीशुदा महिलाएं ऐसी हैं जिनकीनींद पूरी नहीं कर पातीं क्योंकि साथ में सो रहे पुरुष खर्राटे लेते हैं। हर 10 में से 6 युवा को हफ्ते में दो बार दिन में नींद आती है। 67 फीसदी का कहना है कि रात में एक बार नींद जरूर खुलती है। भारत में 36 फीसदी और अमेरिका में 30 फीसदी लोग ऐसे हैं जो बिस्तर पर पालतू जानवर के साथ सोना पसंद करते हैं।

  5. शोध में कहा गया है कि अलग-अलग देशों में सोने का तरीका, समय अलग-अलग हो सकता है लेकिन लोग पर्याप्त नींद ले पा रहे हैं या नहीं, यह सर्वे में स्पष्ट तौर पर कहा गया है। सर्वे के मुताबिक, नींद इंसान को सेहतमंद रखने में अहम रोल अदा करती है। अधूरी नींद का सीधा असर दिमाग और उसकी क्षमता पर पड़ता है।



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      indians get best good nights sleep in the world says survey by KJT Group and philips
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इस राखी भाई को खिलाएं वॉलनट बर्फी और पनीर कबाब


लाइफस्टाइल डेस्क. रक्षाबंधन का त्‍योहार भाई-बहन के प्‍यार और दुलार का प्रतीक है। यह त्योहार बिना मिठाई अधूरा है। अखरोट से तैयार की जाने वाली कई डिश ऐसी हैं जिनका स्वाद आप कभी नहीं भूल सकते। ‘होमकुकिंग’ से हेमासरी सुब्रम्‍यणयम और शेफ सब्‍यसाची गोरई बता रहे हैं ऐसी ही डिशेज के बारे में...

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    सामग्री :1 कप वॉलनट्स, एक चौथाई कप दूध, 250 ग्राम खोया या मावा, एक चौथाई कप शक्‍कर, 1 टेबलस्‍पून देसी घी+थोड़ा घी चिकनाई के लिए, आधा टीस्‍पून इलायची पावडर

    बनाने की विधि

    • एक बाउल में आधाकप वॉलनट्स लें।
    • इसे एक चौथाई कप दूध में 1 घंटे के लिये भिगोकर रख दें। इसके बाद इसका एक मोटा पेस्‍ट तैयार कर लें।
    • एक पैन में एक चम्‍मच घी को गर्म करें और उसमें बाकी बचे वॉलनट्स मिला दें। सुनहरा होने तक भूनें, घी को सोखकर लें और एक किनारे रख दें।
    • अब उसी घी में, खोया और शक्‍कर डालकर अच्‍छी तरह मिलायें। इसमें वॉलनट पेस्‍ट डालें और अच्‍छी तरह मिलायें।
    • गाढ़ा होने तक इसे पकायें और फिर एक किनारे रख दें।
    • इसके बाद इलायची पाउडर और भुने हुए वॉलनट्स डालकर अच्‍छी तरह मिलायें।
    • इसे चिकनाई लगी प्‍लेट पर फैलायें और कुछ घंटों के लिये सेट होने के लिये रख दें।
    • इसे टुकड़ों में काटें और वॉलनट्स के साथ सजायें।
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    सामग्री :1 कप टोस्‍ट किया हुआ वॉलनट्स, 200 ग्राम पनीर, लहसुन की 3 कलियां, 15 ग्राम अदरक, 2 हरी मिर्च, आधाटीस्‍पून मिर्च पाउडर, आधा टीस्‍पून नमक, 1 टीस्‍पून साबुत जीरा, 1 टीस्‍पून धनिया पाउडर, 1 टीस्‍पून चाट मसाला, आधा टीस्‍पून आमचूर पाउडर, आधा टीस्‍पून गरम मसाला पावडर, एक मुट्ठी हरी धनिया और पुदीने की पत्तियां, 1 टेबलस्‍पून ऑयल।

    बनाने की विधि

    • फूड प्रोसेसर में वॉलनट्स को महीन पीस लें।
    • अब इसमें पनीर, लहसुन, अदरक, हरी मिर्च, हरी धनिया, पुदीने की पत्तियां, नमक तथा सारे मसाले डालकर मोटा पीस लें।
    • इस मिश्रण को एक बाउल में निकाल लें और छोटे-छोटे हिस्‍सों से कबाब बनायें।
    • एक पैन में ऑयल डालें और कबाब को दोनों तरफ से तब तक शैलो फ्राय करें जब तक कि यह गोल्‍डन ब्राउन ना हो जायें।
    • कटे हुएवॉलनट्स के साथ गरमागरम परोसें।


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      rakshabandhan recipe walnut paneer kebab and walnut barfi

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डेंगू के इलाज़ में फायदेमंद होता है बकरी का दूध


हेल्दी लाइफस्टाइल में दूध एक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। क्योंकि दूध कैल्शियम, प्रोटीन, पोटैशियम और विटामिन डी का एक प्रमुख स्रोत होता है। ज्यादातर भारतीय लोग, गाय या भैंस के दूध को पसंद करते हैं और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इसी का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन शायद ही ये सबको मालूम हो कि बकरी का दूध भी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। यह न केवल इम्यून सिस्टम व मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने का काम करता है बल्कि डेंगू में भी यह काफी प्रभावी है। आइए जानते हैं बकरी के दूध के फायदों के बारे में-

डेंगू में असरदार होता है बकरी का दूध

मानसून में डेंगू एक महामारी की तरह फैल जाता है। वैसे डेंगू से बचने के लिए हर किसी को सतर्कता बरतनी चाहिए, लेकिन फिर भी किसी को डेंगू हो जाए, तो बकरी का दूध उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है । दरअसल डेंगू बुखार में ब्लड प्लेटलेट की कमी हो जाती है, ऐसे में बकरी का दूध एक आसान और प्रभावी उपाय माना जाता है। क्योंकि बकरी के दूध में सेलेनियम होता है जो शरीर में ब्लड प्लेटलेट काउंट को बढ़ाने के लिए जाना जाता है।

इम्यून सिस्टम को बढ़ता है बकरी का दूध

शरीर का इम्यून सिस्टम ठीक होने से बीमारियां आपसे कोसों दूर रहती हैं। ऐसे में आपको उन आहारों का सेवन करना चाहिए, जो आपकी इम्युनिटी को बढ़ाने में आपकी सहायता करे। बकरी का दूध उन्हीं में से एक है जिसमें सेलेनियम नाम का एक समृद्ध स्रोत मौजूद होता है, जो इम्यून सिस्टम या रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायता करता है।

मेटाबॉलिज्म को बढ़ाए

अगर आपके शरीर का मेटाबॉलिज्म सही है तो आप ज्यादा से ज्यादा और सक्रिय रूप से काम करने में सक्षम हो पते हैं । बकरी का दूध कई तरह के पोषक तत्वों से भरपूर होता है, इसमें कैल्शियम, विटामिन बी, फास्फोरस और पोटैशियम पाया जाता है। साथ ही, इसका दूध आयरन और कॉपर से भी समृद्ध है, जो आपके मेटाबॉलिज्म रेट को बेहतर करने में मदद करता है।

हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है

हड्डी का कमजोर होना आजकल एक बड़ी समस्या है जो बुढ़ापे तक बहुत भयंकर हो जाती है। इसलिए हड्डियों को मजबूत रखना बहुत जरूरी है, अगर आप भी अपनी हड्डियों को मजबूत रखना चाहते हैं तो बकरी का दूध इसमें आपकी मदद कर सकता है।कैल्शियम से भरपूर होने कि वजह से इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं है। कैल्शियम के साथ-साथ बकरी का दूध एमिनो एसिड ट्रिप्टोफेन से भी समृद्ध है, जो हमारी हड्डियों और दांतों को मजबूत रखता है।

दिल के लिए है फायदेमंद

खराब जीवनशैली के चलते दिल के मरीजों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इसलिए खान पान का सही होना बहुत जरूरी हो जाता है तो अगर आप अपनी जीवनशैली में बकरी के दूध का सेवन करेंगे तो दिल की बीमारियों से बचे रहेंगे। क्यूंकी इसमें अच्छे फैटी एसिड पाए जाते हैं, जो कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखते हैं। साथ ही पोटैशियम के स्तर की प्रचुरता रक्तचाप को कम करने में मदद करती है क्योंकि यह एक वासोडिलेटर है, जो रक्त वाहिकाओं को आराम देता है।

एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है बकरी का दूध

बकरी का दूध एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है जिससे सूजन को कम करने में मदद मिलती है। अगर आप बकरी का दूध पीते हैं तो पेट में सूजन की शिकायत दूर करने में मदद मिलेगी।



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Goat milk is beneficial in the treatment of dengue

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इस रक्षाबंधन स्वीट डिसेस में ट्राय करें आटे की गुणभरी, डबल चॉकलेट संदेश, बादाम रॉको स्वीट और पनीर बर्फी


लाइफ स्टाइल डेस्क. इस रक्षाबंधन इगर आप परंपरागत मिठाईयों की जगह कुछ नया ट्राय करना चाहतीहैं तो हम आपके लिए कुछ खास स्वीट डिसेस की रेसिपी लेकर आए हैं। इस रक्षाबंधन आपआटे की गुणभरी, डबल चॉकलेट संदेश, बादाम रॉको स्वीट और पनीर बर्फी ट्राय कर सकती हैं। ये स्वादिष्ट होनें के साथ आपके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी रहेंगी।

  1. क्या चाहिए
    घी- 1 कटोरी, गुड़3/4 कटोरी कद्दूकस किया हुआ, सोंठ- 1/2 छोटा चम्मच, जायफल पाउडर- 1 चुटकी, कटे मेवे- 3 बड़े चम्मच।


    ऐसे बनाएं
    पैन में देसी घी गर्म करें। इसमें आटा डालकर बहुत धीमी आंच पर भूनें। आटा गुलाबी हो जाए और ख़ुशबू आने लगे, तो गुड़ डालकर चलाते हुए पकाएं। गुड़ घुल जाने पर आंच से उतार लें। इसमें सोंठ व
    जायफल पाउडर और कटे मेवे डालकर मिलाएं। तुरंत घी लगी हुई थाली में पलट दें। ऊपर से एकसार करके तुरंत ही मनपसंद आकार में काट लें।

  2. क्या चाहिए
    ताज़ा पनीर- 250 ग्राम घर का बना हुआ, कैस्टर शुगर- 80 ग्राम, कोको पाउडर- डेढ़ बड़े चम्मच, आइसिंग शुगर- 1 छोटा चम्मच, चॉकलेट वर्मीसिली- 1 बड़ा चम्मच।


    ऐसे बनाएं
    पनीर, कैस्टर शुगर और कोको पाउडर को मिक्सी में हल्का-सा पीस लें ताकि मिश्रण एकसार हो जाए। पैन में इसे मध्यम आंच पर चलाते हुए पकाएं। जब मिश्रण गाढ़ा होकर इकट्ठा होने लगे तो आंच बंद
    करके इसे ठंडा कर लें। मिश्रण को बराबर भागों में बांट लें और मनपसंद आकार दें। ऊपर से आइसिंग शुगर बुरकें। चॉकलेट वर्मीसिली से सजाकर परोसें।

  3. क्या चाहिए
    बादाम पाउडर- 100 ग्राम, सफ़ेद चॉकलेट चिप्स- 100 ग्राम, कंडेंस्ड मिल्क- 2 बड़े चम्मच। सजाने केलिए कोई भी मेवा व मिनी चॉकलेट चिप्स।


    ऐसे बनाएं
    चॉकलेट चिप्स और कंडेंस्ड मिल्क माइक्रोवेव में एक मिनट रखें। फिर बादाम पाउडर डालकर 30 सेकंड रखें और निकालकर अच्छी तरह मिलाएं। मिश्रण थोड़ा ठंडा करें और मन पसंद आकार दें। मेवा व चॉकलेट चिप्स से सजाएं।

  4. क्या चाहिए
    ताज़ा पनीर- 250 ग्राम, दूध पाउडर- 50 ग्राम, शक्कर- 80 ग्राम, वनीला एसेंस- 1/8 छोटा चम्मच, बादाम व पिस्ता कतरन- 2 बड़े चम्मच।


    ऐसे बनाएं
    शक्कर में तीन चम्मच पानी मिलाकर मध्यम आंच पर पकाएं। शक्कर घुल जाने पर मसला हुआ पनीर डालकर दो मिनट तक चलाते हुए पकाएं। इस बीच दूध पाउडर डाल दें। जब मिश्रण इकटठा होने लगे तो आंच बंद कर दें और ठंडा होने दें। वनीला एसेंस डालकर घी लगी हुई प्लेट में जमने के लिए रखें। ऊपर से बादाम-पिस्ता कतरन से सजाएं।



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      recipe of sweet dishes for rakshabandhan

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खास डिसेस से भईया को दें स्वाद की सौगात


लाइफ स्टाइल डेस्क. स्वादिष्ठ व्यंजनों के दिनवा रक्वाियंधन कवा पर्व अधूरवा है। इस प्वार भरे पर्व के मौके पर भवाई के लिए स्वादिष्ठ व्यंजन बनाइए। हम कु छ व्यंजन लेकर आए हैं जिन्हें मुख्य भोजन और वन-बाइट रेसिपी के तौर पर परोस सकते हैं।

  1. क्या चाहिए
    मक्का दाना- 2 कटोरी, दूध- 2 कटोरी, ताज़ा दही- 1 कटोरी, तेल- 4 बड़े चम्मच, जीरा- 1 छोटा चम्मच, तेजपत्ता-1, हींग- 1/8 छोटा चम्मच, लाल मिर्च पाउडर- 1 छोटा चम्मच, धनिया पाउडर- 2 बड़े चम्मच, हल्दी पाउडर1/4 छोटा चम्मच, नमक- स्वादानुसार, गरम मसाला- 1/4 छोटा चम्मच, प्याज़- 2 लंबे कटे हुए, हरा धनिया- बारीक कटा हुआ।


    ऐसे बनाएं
    मक्के के दाने और दूध मध्यम आंच पर उबालें। दूध सूखने तक पकाएं। दो बड़े चम्मच गर्म तेल में कटा हुआ प्याज़ सुनहरा होने तक भूनें और निकाल लें। एक अलग बोल में दही, नमक और सभी मसाले डालकर मिश्रण तैयार करें। शेष तेल गर्म करके जीरा, हींग और तेजपत्ता डालकर चटकाएं। दही के मिश्रण को तेल में डालकर भूनें। मध्यम आंच पर तेल छोड़ने तक भूनें। इसमें एक कटोरी पानी और नमक डालकर मिलाएं। भूने हुए मक्का दाने मिलाएं और ढंककर पांच मिनट तक पकाएं। ऊपर से तले प्याज़ डालकर निकाल लें। पूड़ी या पराठे के साथ परोसें।

    ...

  2. क्या चाहिए
    मध्यम आकार के टिंडे- 8 से 10, पनीर75 ग्राम (1/3 कटोरी), खोया- 75 ग्राम (1/3 कटोरी), काजू के छोटे टुकड़े- डेढ़ बड़े चम्मच, किशमिश- डेढ़ बड़े चम्मच दो भागो में कटे हुए, हरी मिर्च- डेढ़ बड़े चम्मच, नमक- 1/4 छोटा चम्मच, हरा धनिया- 2 बड़े चम्मच कटा हुआ।


    ग्रेवी के लिए

    खोया व पनीर- 30-30 ग्राम, तेल- 5 बड़े चम्मच, टमाटर प्यूरी- 4 टमाटर की, अदरक-हरी मिर्च का पेस्ट- 2 बड़े चम्मच, जीरा पाउडर- 1 छोटा चम्मच, लाल मिर्च पाउडर- 1 छोटा चम्मच, धनिया पाउडर- 2 बड़े चम्मच, हल्दी- 1/2 छोटा चम्मच, गरम मसाला- 1/2 छोटा चम्मच, नमक- स्वादानुसार, हींग- 2 चुटकी।


    ऐसे बनाएं
    टिंडों को छीलकर अंदर का गूदा हटाकर खोखला कर लें। गूदे को अच्छी तरह से बारीक करें। एक चम्मच तेल में थोड़ा नमक मिलाकर टिंडों के अंदर-बाहर लगाएं। गर्म पैन में इन्हें 5 मिनट तक हल्का-सा पका लें। इसे ठंडा होने के लिए रख दें। एक बोल में पनीर, खोया, काजू, किशमिश, हरी मिर्च, नमक और हरा धनिया मिलाकर भरावन तैयार करें और टिंडों में भर लें। ग्रेवी के लिए पैन में तेल गर्म करके हींग और जीरा पाउडर डालें। तुरंत अदरक, हरी मिर्च का पेस्ट डालकर भूनें। टिंडों का गूदा इसमें डालकर पांच मिनट तक भूनें। टमाटर प्यूरी और मसाले डालकर भूनें। तेल छोड़ने तक मसाला भूनना है। अलग से खोया और पनीर आधा कटोरी पानी के साथ पीस लें और इसे ग्रेवी में मिलाकर कुछ देर भूनें। जब ये तेल छोड़ दे तो आधा कटोरी पानी, गरम मसाला और आधा धनिया डालें। इसमें टिंडे डालकर ग्रेवी में लपेटें। ढंककर मध्यम आंच पर 7-8 मिनट पकाएं। तैयार टिंडों को हरा धनिया और अदरक के लच्छों से सजाकर परोसें।

    ....

  3. क्या चाहिए
    कच्चा नारियल- 200 ग्राम कद्दूकस किया हुआ, सूजी- 2 बड़े चम्मच, गुड़150 ग्राम, काजू व बादाम- 2-2 बड़े चम्मच कटे हुए, किशमिश- 1 बड़ा चम्मच, इलायची पाउडर- 1/4 छोटा चम्मच, ताज़े गुलाब की पंखुड़ियां- 3 बड़े चम्मच, देसी घी- 1 बड़ा चम्मच, चिरौंजी के दाने- थोड़े-से।


    ऐसे बनाएं
    गर्म देसी घी में सूखे मेवे भूनकर निकाल लें। बचे हुए घी में सूजी डालकर मध्यम आंच पर गुलाबी होने तक भूनें। इसमें कद्दूकस नारियल डालकर 7-8 मिनट भूनें। नारियल का पानी सूख जाने पर गुड़ डालकर 5 मिनट तक चलाएं। मेवे भी मिला दें। जब मिश्रण इकट्ठा होने लगे तो इसे आंच पर से उतार लें। इसमें गुलाब की पंखुड़ियां और इलायची डालकर मिलाएं। थोड़ा ठंडा होने पर इसके लड्डू बना लें। चिरौंजी और गुलाब की पंखुड़ियां ऊपर से चिपकाकर परोसें।

    ...

  4. क्या चाहिए
    गेहूं का आटा- 2 कटोरी, नमक- 3/4 छोटा चम्मच, अजवायनआधा छोटा चम्मच, हल्दी- 1/4 छोटा चम्मच, पनीर- 150 ग्राम मसला हुआ, तैयार आम का अचार मसाला- 2 बड़े चम्मच, आम के अचार के टुकड़े- 4-5, नमक-1/4 छोटा चम्मच, हरी मिर्च- 1 बड़ा चम्मच बारीक कटी हुई, हरा धनिया- 2 बड़े चम्मच बारीक कटा हुआ, देसी घी- 1/2 कटोरी, शाही जीरा- 1 छोटा चम्मच।


    ऐसे बनाएं
    अचार का मसाला और टुकड़ों से तेल निकाल दें। आटे में नमक, हल्दी अजवायन और दो बड़े चम्मच घी डालकर मसलें। पानी से हल्का कड़क गूंध लें और कुछ देर ढंककर रखें। दोबारा मलकर नींबू आकार की गोलियां बना लें। बोल में मसला हुआ पनीर, नमक, हरी मिर्च, हरा धनिया और अचार का मसाला मिलाएं। अचार के आम के टुकड़ों को बारीक काटकर इसमें मिला लें। इसकी छोटी-छोटी गोलियां बना लें। आटे की गोलियों में पनीर की गोली भरकर बाटी बनाएं। अवन में इन्हें चारों तरफ़ से भूरा होने तक सेकें। घी और शाही जीरा डालकर परोसें।

    .......



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      special recipe for rakshabandhan festival

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ये पौधे दिलाएँगे मच्छरों से छुटकारा


बरसात के मौसम में हर जगह पानी भरना लाज़मी है ऐसे में मच्छरों की तादात भी तेज़ी से बढ़ने लगती है। इनके काटने से मलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, चिकनगुनिया जैसी जानलेवा बीमारियां फैलती हैं। इन बीमारों से बचाव के लिए लोग क्रीम्स, स्प्रे, मैट जैसे कई तरह के उपाय आज़माए भी जाते हैं। लेकिन आज हम कुछ ऐसे घरेलू उपाय बताएँगे जिनकी मदद से मच्छरों से छुटकारा पाना और आसान हो जाएगा।

बरसात के मौसम में हर जगह पानी भरना लाजमी है ऐसे में मच्छरों की तादात भी तेज़ी से बढ़ने लगती है। इनके काटने से मलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, चिकनगुनिया जैसी जानलेवा बीमारियां फैलती हैं। इन बीमारों से बचाव के लिए लोग क्रीम्स, स्प्रे, मैट जैसे कई तरह के उपाय आजमाएं भी जाते हैं। लेकिन आज हम कुछ ऐसे घरेलू उपाय बताएंगे जिनकी मदद से मच्छरों से छुटकारा पाना और आसान हो जाएगा।

कम खर्च में ऐसे बच्चे मच्छरों से -
घरों में पौधे न केवल सुंदरता को बढ़ाते हैं बल्कि ये सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद होते हैं। ऐसे में कई पौधे ऐसे भी होते हैं जो मच्छरों को दूर भी भागते हैं जिसे आप घर के बाहर गार्डन में, आंगन या फिर बालकनी में लगा सकते हैं। जानते हैं उन पौधों के बारें में -

1. तुलसी- तुलसी का पौधा तो अधिकतर हर किसी के घर में मिल जाता है। इस पौधे की कई लोग पूजा भी करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं ये पौधे की एक खास बात ये भी है कि इस पौधे कि सुगंध से मच्छर भी दूर भागते हैं। इस पौधे को आप घर के बाहर, दरवाजे के पास या खिड़की पर लगा सकते हैं। मच्छर काटने के बाद भी तुलसी काफी फायदेमंद है।

2. नीम का पेड़- अगर आपके घर के आसपास या गार्डन में नीम का पेड़ नहीं है तो जल्द ही आप वहाँ नीम का पौधा लगा सकते हैं। नीम के पौधे से आपको मच्छर ज्यादा परेशान नहीं करेंगें और साथ ही मक्खी और दूसरी तरह के कीड़ों को दूर करने के लिए नीम का पौधा लगाना काफी लाभदायक होता है।

3. गेंदे के फूल कि खुशबू किसको नहीं पसंद? घर की सजावट से लेकर पूजा के लिए इन फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन मच्छरों को गेंदे की महक पसंद नहीं आती। फूलों की तेज़ महक से मच्छर दूर भागते हैं। ऐसे में इनसे छुटकारा पाने के घर के बगीचे या फिर घर के बाहर गमलों में गेंदें का पौधा लगा सकते हैं।



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These plants will get rid of mosquitoes

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गंदे पानी का ‘कोएक्सिअल मच्छर’ फैला सकता है ‘जीका वारयस’


अब तक डॉक्टर्स समझ रहे थे कि खतरनाक जीका वायरस केवल एक विशेष प्रकार के मच्छरों में ही पाया जाता है लेकिन हाल ही में हुई एक विशेष जांच के बाद वैज्ञानिकों ने इस और फिर से नए शोध करना शुरू कर दिए हैं। इस जांच के अनुसार, ब्राजील के वैज्ञानिकों ने आम मच्छर कोएक्सिअल में भी जीका वायरस का पता लगाया है. इसका मतलब कि आम मच्छर भी इस वायरस से जुड़ी बीमारी को फैला सकता है। यह जांच 200 से ज़्यादा कोएक्सिअल मच्छरों पर की गई। इसके परिणामों का अभी परीक्षण किया जा रहा है और अभी तक ऐसी कोई पुष्टि नहीं की गई है, जिससे पता चल सके कि कोएक्सिअल मच्छर मानव शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है।

एडीज मच्छर से डेंगू और चिकनगुनिया भी फैलता है
इस बात को मान कर वैज्ञानिक, जीका वायरस की दवा खोज रहे थे कि जीका वायरस मच्छरों से ही फैलता है। एडीज मच्छर से डेंगू और चिकनगुनिया भी फैलता है। यह खोज रियो-डि-जनेरियो स्थित ओस्वाल्डो क्रूज फाउंडेशन (फियोक्रूज) ने की है. इसके चलते उन्होंने जीका वायरस पर आयोजित एक सेमिनार में इसकी घोषणा की है।

फियोक्रूज के शोधकर्ता अब जीका वायरस वाले प्रभावित इलाकों में कोएक्सिअल मच्छर के नमूनों की खोज कर रहे हैं ताकि सुनिश्चित हो सके कि कोएक्सिअल मच्छर इस वायरस को किस हद तक फैलाते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ब्राजील के शहरों में एडीज मच्छरों की तुलना में कोएक्सिअल मच्छर 20 गुना ज़्यादा हैं।

इस तरह के मच्छर दुनियाभर में पाए जाते हैं और वे गंदे पानी में ही पैदा होते हैं। वहीं, जीका वायरस फैलाने वाला एडीज मच्छर साफ पानी में पैदा होते हैं। कोएक्सिअल का शहरी क्षेत्रों में फैलाव सफाई नहीं रहने की वजह से होता है। यह देश के गरीब इलाकों के लिए एक गंभीर मुद्दा है।



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'Coaxial mosquito' of dirty water can spread 'Zika Varayas'

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डेंगू होने पर बुखार भी हो ये जरूरी नहीं


बारिश का मौसम शुरू होने के साथ ही डेंगू होने का खतरा भी बढ़ जाता है। अक्सर माना जाता है कि बुखार होने के बाद ही डेंगू होता है और बुखार ना होने पर लोग डेंगू के बारे में सोचते नहीं है। हालांकि, ऐसा करना गलत है क्योंकि बिना बुखार हुए भी डेंगू भी हो सकता है। जानते हैं बिना बुखार हुए कौन सा डेंगू होता है और इसका पता कैसे लगाया जा सकता है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, जरनल ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया में प्रकाशित 'ए क्यूरियस केस ऑफ एफेब्रिल डेंगू' नाम के शोध पत्र में बताया गया है कि इस तरह के डेंगू को 'एफेब्रिल डेंगू' कहते हैं। 'एफेब्रिल डेंगू' के लक्षण सामान्य डेंगू से अलग होते हैं। दरअसल सामान्य डेंगू में मरीज को तेज बुखार, और भयानक दर्द की शिकायत होती है। हालांकि, डायबिटीज, बूढ़े लोग और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों में बुखार के बिना भी डेंगू हो सकता है।

ये होते हैं लक्षण-

बता दें कि ऐसे मरीजों को बुखार तो नहीं होता, लेकिन डेंगू के दूसरे लक्षण जरूर होते हैं। ये लक्षण भी काफी हल्के होते है। इस तरह के डेंगू में बहुत हल्का इंफेक्शन होता है। मरीज को बुखार, शरीर दर्द, चमड़ी पर ज्यादा चकत्ते होने की शिकायत नहीं होती है। लेकिन टेस्ट कराने पर उनके शरीर में प्लेटलेट्स की कमी, व्हाइट और रेड ब्लड सेल्स की कमी होती है।

डॉक्टरों के मुताबिक इस सीजन में यानी अगस्त-सितंबर-अक्टूबर में अगर किसी को शरीर में दर्द, थकान, भूख ना लगना, हल्का-सा रैश, लो ब्लड प्रेशर जैसी समस्या हो, लेकिन बुखार की हिस्ट्री ना हो, तो वो डेंगू हो सकता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।



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It is not necessary to have fever if you have dengue

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सेल्फी वीडियो बताएगा ब्लड प्रेशर, शोधकर्ताओं का दावा- 96% तक सटीक जानकारी मिलेगी


हेल्थ डेस्क. ब्लड प्रेशर कितना है, यह जानने के लिए आपको डॉक्टर के चक्कर नहीं लगाने होंगे। टोरंटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मोबाइल फोन के कैमरे से बीपी जानने का नया तरीका विकसित किया है। इसके तहत सेल्फी वीडियो की मदद से ब्लड प्रेशर जाना गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, चीन और कनाडा के 1328 लोगों पर परीक्षण के दौरान 95-96% सटीक जानकारी के साथ तीन तरह के ब्लड प्रेशर मापने में सफलता मिली।

  1. टोरंटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता पॉल झेंग ने ट्रांसडर्मल ऑप्टिकल इमेजिंग तकनीक विकसित की है। इस तकनीक की मदद के चेहरे की स्किन से ब्लड प्रेशर का पता लगाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने इसे समझने के लिए दो मिनट के सेल्फी वीडियो का इस्तेमाल किया।

  2. वीडियो बनाने के दौरान, मोबाइल कैमरे में लगे ऑप्टिकल सेंसर चेहरे पर पड़ने वाली लाल किरण को कैप्चर करते हैं जो स्किन के नीचे हीमोग्लोबिन के कारण रिफ्लेक्ट होती है। ट्रांसडर्मल ऑप्टिकल इमेजिंग तकनीक इन्हीं परावर्तित किरणों की मदद से शरीर में रक्त के दबाव की जानकारी देती है। शोधकर्ताओं का दावा है कियह तकनीक 96फीसदी सटीक परिणाम देती है।

  3. शोधकर्ताओं के मुताबिक, ट्रांसडर्मल ऑप्टिकल इमेजिंग दुनिया में बढ़ते हाइपरटेंशन (हाई बीपी) के मामलों को कम करने में मदद करेगी। खासकर ऐसी जगहों पर जहां स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से उपलबध नहीं हैं। अगर आपको पास फोन या कम्प्यूटर है तो जानकारी सामने आने के बाद आप डॉक्टर से सीधे बात करते सकते हैं। इस तरह लोगों में जागरुकता बढ़ाई जा सकती है।

  4. टेक कंपनी न्यूरालॉजिक्स ने एनुरा नाम की ऐप रिलीज की है जो 30 मिनट के सेल्फी वीडियो से धड़कन और तनाव के स्तर की जानकारी देती है। कंपनी जल्द ही इस ऐप में ब्लड प्रेशर पता लगाने का फीचर शामिल करेगी जो पहले चीन के लिए रिलीज किया जाएगा। कंपनी के फाउंडर ली का कहना है यूजर की सेहत के आंकड़े ऐप क्लाउड पर अपलोड किए जाएंगे। जल्द ही इसकी मदद से कॉलेस्ट्रॉल, हीमोग्लोबिन और ब्लड ग्लूकोज लेवल की जानकारी मिल सकेगी।



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      Toronto university Researchers find way to measure blood pressure with a selfie video 96 percent accurate

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खुश्बूदार तेलों से इलाज, सिरदर्द-अनिद्रा के लैवेंडर ऑइल और जोड़ों में दर्द के लिए लौंग का तेल लगाएं


लाइफस्टाइल डेस्क. एसेंशियल ऑइल का इस्तेमाल सिर्फ खूश्बू के लिए नहीं तनाव, सिरदर्द और अनिद्रा दूर करने के लिए भी किया जाता है। अलग-अलग एसेंशियल ऑइल का इस्तेमाल कई तरह के रोगों में किया जाता है। यह फायदा पहुंचाए इसके लिए इस्तेमाल करने का तरीका भी जानना जरूरी है। वीएलसीसी के लाइफस्टाइल एक्सपर्ट विशाल मुद्गिल बता रहे हैं इनका कब और कैसे इस्तेमाल करें....

    • फुट सोल, नेक टेंपल, चेस्ट एरिया और पल्स पॉइंट्स पर एसेंशियल ऑइल लगाते हैं। एक या दो बूंद ही काफी होती है। ऑलिव ऑइल, ग्रेप सीड ऑइल और होहोबा ऑइल के साथ मिलाकर लगाया जाता है। हर एसेंशियल ऑइल को सीधे स्किन पर लगाना सुरक्षित नहीं होता।
    • लैवेंडर, पिपरमिंट और बेसिल जैसे तेल सिरदर्द, मोशन सिकनेस, नॉशिया, स्ट्रेस और अनिद्रा कम करते हैं। ज्यादा असर के लिए ऑइल को गले के पीछे लगाते हैं।
    • हाई ब्लडप्रेशर, डिप्रेशन के लिए बरगेमॉट ऑइल है। ज्यादा असर के लिए इसे चेस्ट एरिया पर लगाते हैं।
    • लेमन ऑइल, यूकेलिप्टस और पिपरमेंट ऑइल को हेडेक्स, डिज़ीनेस, एंग्जाइटी और थकान के दौरान इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादा असर के लिए इसे कान के पीछे लगाते हैं।
    • क्लोव ऑइल शोल्डर और जॉइंट पेन के लिए असरदार है। जहां दर्द हो सीधे वहीं लगाते हैं।
    • लेमन, बेसिल और लैवेंडर ऑइल कान का दर्द और चक्कर आने के लिए असरदार हैं।
    • नहाते वक्त एसेंशियल ऑइल का इस्तेमाल करने से शरीर और दिमाग दोनों रिलेक्स हो जाते हैं। एक रुमाल पर एसेंशियल ऑइल की पांच-दस बूंदे डालें और नहाने के लिए साथ लेकर जाएं। रुमाल को शावर फ्लोर के कोने में रख दें। शावर से तेज गर्म पानी निकलने दें जिससे स्टीम बनेगी। अब पानी का तापमान सामान्य कर लें।
    • स्प्रे बॉटल के जरिए शावर एरिया को खुश्बूदार बना सकते हैं, इसमें दीवारें और शावर कर्टेन भी शामिल हैं। स्प्रे करने से पहले स्टीम बनाने के लिए शावर को तेज गर्म तापमान पर चालू करें।
    • शावर के बाद एसेंशियल ऑइल को शरीर पर मसाज कर सकते हैं। दोनों घुटनों के पीछे एक-एक बूंद डालें। गले, अंडरआर्म्स और पैरों पर भी डालें। शावर बंद करने से पहले डीप ब्रीदिंग करें।
    • एसेंशियल ऑइल को मसाज के जरिए भी लगाया जाता है। तनाव दूर करने के लिए और ब्लड सर्कुलेशन में सुधार लाने के लिए इसे शरीर पर मसाज किया जाता है। मसाज ऑइल बनाने के लिए आधा कप कैरियर ऑइल के अंदर 15-20 बूंद एसेंशियल ऑइल डाल सकते हैं। इसे पैरों पर मसाज करके बहुत आराम मिलता है।
  1. एसेंशिल ऑइल्स की खुश्बू को बोतल से सीधे भी लिया जा सकता है या हथेली के बीच दो बूंद लेकर खुश्बू ली जा सकती है। रुमाल में भी दो-तीन बूंद ऑइल लेकर सूंघा जा सकता है।

  2. घर पर एसेंशियल ऑइल्स को बहुत आसानी से डिफ्यूज किया जा सकता है। ज्यादातर ऑइल इन्हेल और डिफ्यूज़ करने के लिए सुरक्षित होते हैं। अपना डिफ्यूज़र बनाने के लिए एसेंशियल ऑइल की पांच बूंद एक ऑइल बर्नर में डाल सकते हैं।



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      oil therapy know how to use essential oil to curb health problem

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ये 4 पैरासाइट्स की वजह से मलेरिया बेहद खतरनाक व जानलेवा हो जाता है 


मच्छरों से काटने पर मलेरिया जैसे घातक बीमार हो जाती है जिसका कारण एक संक्रमित एनोफिलीज मच्छर है। अधिकांश तौर पर इन संक्रमित मच्छरों में प्लास्मोडियम पैरासाइट होता है, जो काटने के बाद शरीर पर ही नहीं बल्कि खून में भी पहुँच जाता है। ये संक्रमण कुछ दिनों बाद ही लाल रक्त कोशिकाओं पर बुरा प्रभाव डालने लगता है। 2-3दिन के अंदर ही ये लाल रक्त कोशिकाओं के अंदर के परजीवी कई गुना बढ़ जाते हैं, जिससे संक्रमित कोशिकाएं फट जाती हैं।

आइए जानें मलेरिया किन चार तरह के पैरासाइट से फैलता है -

प्लासमोडियम फेल्किपेरम - अगर मलेरिया के सबसे खतरनाक और जानलेवा पैरासाइट की बात की जाए तो प्लासमोडियम फेल्किपेरम उनमें से एक है। इस पैरासाइट के संक्रामण से होने मलेरिया में उल्टी, बुखार, पीठ दर्द, कमर दर्द, सिर दर्द, चक्कर, बॉडी पेन, थकान लगना और पेट दर्द जैसे लक्षण पाए जाते हैं।

प्लासमोडियम ओवाले - यह पैरासाइट ज्यादातर पश्चिमी अफ्रीका में पाया जाता है और यह इंसान को काटने के बाद काफी लंबे समय तक उसके शरीर में ज़िंदा बना रहता है। इसी कारण से इसका खतरा लंबे समय तक रहता है।

प्लासमोडियम - इस पैरासाइट के संक्रमण से पीड़ित मरीज में ठिठुरन के साथ तेज बुखार के लक्षण दिखाई देते हैं। हालांकि यह जानलेवा नहीं होता लेकिन फिर भी इससे बचाव जरूरी है।

प्लासमोडियम वाइवेक्स – इसपैरासाइट के कारण शरीर में बुखार, जुकाम, थकान और डायरिया जैसी मुश्किलें सामने आती हैं। 60 प्रतिशत मलेरिया के भारतीय मामले प्लासमोडियम वाइवेक्स की वजह से ही सामने आते हैं।



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Because of these 4 parasites, malaria is extremely dangerous and deadly.

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जानें बरसात में होने वाली 5 बीमारियों के बारे में, बचने के ये हैं उपाय


बरसात का मौसम बीमारियों को आमंत्रित करने का मौसम होता है, क्योंकि इस मौसम में बारिश से कई स्थानों पर जलजमाव, कीचड़ व गंदगी से पैदा होने मच्छर व बैक्टीरिया बीमारियां फैलाते हैं। इसके अलावा मौसम में नमी के कारण बैक्टीरिया अधिक पनपते हैं जो पानी और खाद्य पदार्थों को दूषित कर, शरीर की बीमारियों का कारण बनते हैं।

जानिए बरसात की 5 बीमारियां :
1. मलेरिया - मलेरिया बरसात में होने वाली आम लेकिन गंभीर संक्रामक बीमारी है, जो जलजमाव से पैदा होने वाले मच्छरों के काटने से होती है। यह रोग मादा ऐनाफिलिज मच्छर के काटने से फैलता है। इससे बचने के लिए अपने आसपास पानी का जमाव न होने दें।

2. डेंगू - डेंगू बुखार भी मच्छरों के काटने से ही फैलता है, लेकिन डेंगू फैलाने वाले मच्छर साफ पानी में पनपते हैं, इस बात का विशेष ध्यान रखें। एडिज मच्छर के काटने से फैलने वाले इस रोग का प्रभाव मरीज के पूरे शरीर और जोड़ों में तेज दर्द के रूप में होता है। इससे बचने के लिए मच्छरों से बचें और घर से निकलने से पहले शरीर को पूरी तरह ढंककर रखें।

3. डायरिया - बरसात के मौसम में डायरिया सबसे आम समस्या है, जो जीवाणुओं के संक्रमण के कारण होता है। इसमें पेट में मरोड़ होने के साथ ही दस्त लगना प्रमुख हैं। यह खास तौर से बरसात में प्रदूषित पानी और खाद्य पदार्थों के सेवन के कारण होता है, अत: खाद्य पदार्थों को ढंक कर रखें, पानी उबालकर व छानकर पिएं और हाथ धोने के बाद ही कुछ ग्रहण करें।

4. हैजा - विब्रियो कोलेरा नामक जीवाणु के कारण फैलने वाला यह रोग दूषित भोज्य व पेय पदार्थों के कारण होता है। पेट में ऐंठन के साथ लगातार होने वाले उल्टी-दस्त इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं जिसके कारण शरीर में पानी की कमी होना और मिनरल्स की कमी हो जाती है और मरीज बेहद कमजोर हो जाता है। इससे बचने के लिए खाने-पीन संबंधी साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।

5.चिकनगुनिया - चिकनगुनिया भी मच्छरों से फैलने वाला बुखार है, जिसका संक्रमण मरीज के शरीर के जोड़ों पर भी होता है और जोड़ों में तेज दर्द होता है। इससे बचने के लिए जलजमाव से बचें, ताकि उसमें पनपने वाले मच्छर बीमारी न फैलाएं।



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Learn about the 5 diseases that occur in the rain, these are the measures to avoid

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संक्रमित मच्छर के काटने से होता है येलो फीवर, ऐसे बचें


येलो फीवर यानि पित्त ज्वर मच्छर की एक खास प्रजाति से फैलता है। खासकर दुनिया के कुछ देशों में ये इंफेक्शन बुरी तरह से फैला हुआ है। अगर आप भारत से विदेश जा रहे हैं तो अफ्रीका और साउथ अमेरिका जैसे कुछ ऐसे देश हैं, जहां जाने से पहले आपको इसका वैक्सीनेशन ज़रूर लगवाना चाहिए। यह इसलिए जरुरी है क्योंकि ऐसे देशों में येलो फीवर का काफी प्रकोप है। इन देशों की यात्रा करते वक्त आपको इंफेक्शन लग सकता है।

क्‍या है येलो फीवर
येलो फीवर वायरस द्वारा उत्पन्न होने वाला एक तीव्र हैमरैजिक रोग है, जो मनुष्यों में संक्रमित मच्छर के काटने से होता है। रोग के नाम में येलो शब्द पीलिया की ओर संकेत करता है जो कुछ रोगियों को प्रभावित करता है। यह ऐसा रोग है जो पूरे शरीर को प्रभावित करता है।

येलो फीवर के लक्षण
- बुखार - सर दर्द - मुंह, नाक, कान, और पेट में रक्त स्राव (खून का बहना) - उलटी, मितली, जी मिचलाना - लीवर और किडनी से संबंधित कार्य प्रणाली का ठप पड़ना - पेट में दर्द - पीलिया (jaundice)

येलो फीवर का इलाज
येलो फीवर से करीब 50 प्रतिशत लोग इसके संक्रमण से मर जाते हैं। लेकिन इसके वेक्सीनेशन की मदद से पूरी तरह बचा जा सकता है। येलो फीवर के संक्रमण से बुखार, सर दर्द और उलटी (मितली) जैसे लक्षण पैदा होते हैं। गंभीर स्थितियों में यह ह्रदय, लीवर और किडनी से संबंधित जानलेवा लक्षण पैदा कर सकते हैं।



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Yellow fever is caused by infected mosquito bite

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जानिए जापानी बुखार के बारे में, यह बिमारी 1 से 14 साल की उम्र के बच्चों को अपनी चपेट में लेता है


जापानी बुखार यानि इन्सेफलाइटिस का प्रकोप देश में करीब 20 राज्यों में हर साल फैलता है। खासकर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में साल 2017 में जापानी बुखार के कारण एक दिन में 30 बच्चों की मौत हो गई थी। इस साल भी बिहार में इस बीमारी की चपेट में 150 से अधिक बच्चों की जान चली गई। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, इस बीमारी का पहला मामला साल 1871 में सामने आया था। मच्छरों से फैलने वाला ये वायरस डेंगू, पीला बुखार, और पश्चिमी नील वायरस की प्रजाति का ही है।

क्या है इन्सेफलाइटिस यानि जापानी बुखार
इन्सेफ्लाइटिस एक जानलेवा बीमारी है। यह एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसमें आपके दिमाग में सूजन आने लगती है। इसके लिए आपातकालीन इलाज की जरूरत होती है। इस बीमारी का शिकार कोई भी हो सकता है लेकिन सबसे ज्यादा ख़तरा बच्चों और बूढ़ों को होता है।

जापानी इन्सेफ्लाइटिस के लक्षण
जापानी इन्सेफ्लाइटिस में बुखार होने पर बच्चे की सोचने, समझने, और सुनने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। तेज बुखार के साथ बार- बार उल्टी होती है। यह बिमारी अगस्त , सितंबर और अक्टूबर माह में ज्यादा फैलता है और 1 से 14 साल की उम्र के बच्चों को अपनी चपेट में लेता है।

जापानी इन्सेफ्लाइटिस से बचाव के उपाय -

  • नवजात बच्चे का समय से टीकाकरण कराएं
  • साफ सफाई का ख़ास ख्याल रखे
  • गंदे पानी को जमा ना होने दे साथ ही साफ और उबाल कर पानी पियें
  • बारिश के मौसम में बच्चों को बेहतर खाना दें
  • हल्का बुखार होने पर डॉक्टर को दिखाए।


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Know about Japanese fever, this disease affects children between the age of 1 to 14 years

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फल और सब्जियां डलिया या फ्रिज में एक साथ न रखें, खराब होने से बचाने के लिए समझें रखने का तरीका


फूड डेस्क. बाजार से फल और सब्जियां लाकर एक-साथ डलिया या फ्रिज में रख देते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि कुछ फल और सब्जियां एक साथ रखने से खराब हो जाती हैं। इन्हें रखना का तरीका भी अलग होता है, जानिए इनके बारे में….

  1. इसे किसी फल या सब्जी के साथ न रखते हुए अलग रखें। खासतौर पर तरबूज, केला या टमाटर के साथ नहीं रखें तो बेहतर है। फल एथिलीन गैस छोड़ते हैं जिससे खीरा जल्दी खराब हो जाता है। अगर फ्रिज में भी रख रहे हैं तो खीरा इनसे अलग रखें।

  2. इन्हें एक-साथ रखने के बजाय सेब को फ्रिज में रखें। वहीं संतरे को खुले में रखें। संतरा मैश बैग में रखें ताकि इससे हवा आर-पार होती रहे। मैश बैग कपड़े की जाली से बना हुआ होता है।

  3. अमूमन घरों में आलू और प्याज़ एक ही डलिया में रख देते हैं। प्याज आलू को जल्दी खराब कर देता है। ऐसे में इन्हें खुला तो रखें पर अलग-अलग रखें। आलू कागज के बैग में रख सकते हैं इससे ये लंबे समय तक सुरक्षित रहेंगे। प्याज के साथ लहसुन रख सकते हैं।

  4. फ्रिज में टमाटर बेस्वाद हो जाते हैं। इन्हें डलिया में रखकर खुला रखें। उपयोग किया हुआ आधा टमाटर भी फ्रिज में नहीं रखें। कोई भी फल या सब्जी फ्रिज में खुली रखने पर इनमें बैक्टीरिया पनप जाते हैं, जो सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

  5. अगर सेब और कद्दू एक साथ रखते हैं तो इन्हें अलग-अलग रखें। सेब से कद्दू जल्दी ख़राब हो जाता है। कद्दू को हमेशा कमरे के सामान्य तापमान से ठंडे स्थान पर रखें पर फ्रिज जितना ठंडा भी नहीं। हालांकि कद्दू हमेशा कम मात्रा में ही ख़रीदना चाहिए।



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      how to store vegetable and fruit at home

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खाने का स्वाद दोगुना कर देगी टमाटर-प्याज और मिर्च-इमली की चटनी


फूड डेस्क. यूं तो चटनी एक तरह से साइड डिश है पर हर तरह के खाने का स्वाद यह बढ़ाती है। आमतौर पर हरी चटनी बनाई जाती है या इमली की चटनी। पर इसके अलावा भी कई तरह की चटनियां हैं जिन्हें झटपट बना सकते हैं। इन्हें इडली, डोसा, उत्तपम आदि के साथ परोस सकते हैं। इसके अलावा चीला, पराठा, मोमो, सैंडविच, फरे, कचौड़ी आदि के साथ भी परोसा जा सकता है।

  1. ''

    • क्या चाहिए : टमाटर- 2 कटे हुए, प्याज़- 2 कटे हुए, उड़द दाल- 1 बड़ा चम्मच, सूखी खड़ी लाल मिर्च- 2 या 3, इमली- एक छोटा टुकड़ा, राई- छोटा चम्मच, मीठी नीम- 4-5 पत्तियां, तेल- 1 बड़ा चम्मच, नमक- स्वादानुसार।
    • ऐसे बनाएं :कड़ाही में तेल गर्म करें। इसमें सूखी लाल मिर्च और उड़द दाल डालकर सुनहरा होने तक भूनें। इसमें प्याज़ और नमक डालकर 2-3 मिनट तक भूनें। फिर इमली और टमाटर डालकर मुलायम होने तक भूनें। प्याज और टमाटर थोड़े मुलायम हो जाएं तो इन्हें निकालकर ठंडा करें। फिर मिक्सर जार में बारीक पीसकर पेस्ट बना लें। इसमें पानी मिलाने की जरूरत नहीं होगी। कड़ाही में एक छोटा चम्मच तेल गर्म करके राई और मीठी नीम की पत्तियां तड़काएं। इसे चटनी के ऊपर डालकर परोसें।
  2. श्श्

    • क्या चाहिए :प्याज- 1, लहसुन - 2 या 3 कली, कश्मीरी सूखी खड़ी लाल मिर्च- 3 या 4, इमली- 1-2 छोटे टुकड़े, चना दाल- 1 बड़ा चम्मच भुनी हुई, तेल- 1 बड़ा चम्मच, नमक- स्वादानुसार।
    • ऐसे बनाएं: सूखी खड़ी लाल मिर्च और इमली को पानी में भिगोकर रख दें। कड़ाही में तेल गर्म करें। इसमें प्याज़ और लहसुन डालकर 15 मिनट तक भूनें। जब ये मुलायम हो जाए तो इन्हें निकालकर ठंडा कर लें। अब मिक्सर जार में भुने हुए प्याज़-लहसुन, भुनी हुई चना दाल, नमक, भीगी हुई लाल मिर्च और इमली को पानी सहित डालकर बारीक पीस लें।
  3. श्श्

    • क्या चाहिए : नारियल- आधा कटा हुआ, चना दाल- 1 बड़ा चम्मच भुनी हुई, हरा धनिया- 100 ग्राम, हरी मिर्च- 2, नींबू का रस- 1 छोटा चम्मच, तेल- 1 छोटा चम्मच, राई- छोटा चम्मच, सूखी खड़ी लाल मिर्च- 1, नमक- स्वादानुसार। मीठी नीम5 या 6 पत्तियां।
    • ऐसे बनाएं:मिक्सर जार में कटा हुआ नारियल, चने की दाल, हरा धनिया, हरी मिर्च, नींबू का रस और नमक बारीक पीसकर पेस्ट बना लें। चटनी को बोल में निकाल लें। तड़के के लिए कड़ाही में तेल गर्म करें। इसमें राई और सूखी खड़ी लाल मिर्च तड़काएं। मिर्च को दो टुकड़े करके डालें। चटनी के ऊपर तड़का डालकर परोसें।

    रेसिपी सौजन्य : गीता



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      how to make tomato onion and chilly imli chutney

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खाने का स्वाद दोगुना कर देगी टमाटर-प्याज और मिर्च-इमली की चटनी


फूड डेस्क. यूं तो चटनी एक तरह से साइड डिश है पर हर तरह के खाने का स्वाद यह बढ़ाती है। आमतौर पर हरी चटनी बनाई जाती है या इमली की चटनी। पर इसके अलावा भी कई तरह की चटनियां हैं जिन्हें झटपट बना सकते हैं। इन्हें इडली, डोसा, उत्तपम आदि के साथ परोस सकते हैं। इसके अलावा चीला, पराठा, मोमो, सैंडविच, फरे, कचौड़ी आदि के साथ भी परोसा जा सकता है।

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    • क्या चाहिए : टमाटर- 2 कटे हुए, प्याज़- 2 कटे हुए, उड़द दाल- 1 बड़ा चम्मच, सूखी खड़ी लाल मिर्च- 2 या 3, इमली- एक छोटा टुकड़ा, राई- छोटा चम्मच, मीठी नीम- 4-5 पत्तियां, तेल- 1 बड़ा चम्मच, नमक- स्वादानुसार।
    • ऐसे बनाएं :कड़ाही में तेल गर्म करें। इसमें सूखी लाल मिर्च और उड़द दाल डालकर सुनहरा होने तक भूनें। इसमें प्याज़ और नमक डालकर 2-3 मिनट तक भूनें। फिर इमली और टमाटर डालकर मुलायम होने तक भूनें। प्याज और टमाटर थोड़े मुलायम हो जाएं तो इन्हें निकालकर ठंडा करें। फिर मिक्सर जार में बारीक पीसकर पेस्ट बना लें। इसमें पानी मिलाने की जरूरत नहीं होगी। कड़ाही में एक छोटा चम्मच तेल गर्म करके राई और मीठी नीम की पत्तियां तड़काएं। इसे चटनी के ऊपर डालकर परोसें।


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      how to make tomato onion and chilly imli chutney

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मच्छर ही नहीं मॉनसून में इन जीवों से भी रहें सावधान



बारिश के मौसम में केवल जानलेवा मच्छर ही खतरा नहीं है बल्कि मच्छरों के अलावा भी कई ऐसे जीव हैं जो खतरनाक हो सकते हैं। बारिश के वक्त ज्यादा नमी के कारण ज़मीन पर रेंगने वाले कई जीव अपने बिलों से निकाल कर बाहर आ जाते हैं। ऐसे में इस मौसम से मच्छरों के साथ इन जीवों से भी बच के रहना चाहिए ताकि डेंगू, मलेरिया व चिकनगुनिया आदि बीमारी के साथ ही आप अन्य परेशानियों से बच सकें। आइए जानते हैं कि वो कौन-कौन से जीव हैं, जिनका बारिश के वक्त आने की खतरा काफी बढ़ जाता है-
लाल चीटीं- बारिश में घरों से अंदर लाल चीटियों का दिखना सामान्य है। लेकिन आकार में चोटी दिखने वाली ये चीटियाँ जब काट लेती हैं तो त्वचा में जलन, सूजन और अन्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इस मौसम में इनकी एक बड़ी संख्या में देखने को मिल जाती हैं जिससे छुटकारा जल्दी पाना कई बार मुश्किल हो जाता है ।

सांप- बारिश के मौसम अधिकतर साफ सांप बिल से बाहर आ जाते हैं इसके साथ ही जहां हल्की घास या हरियाली होती है, वहां सांप आ जाते हैं। ऐसे में बारिश के समय हरियाली वाली जगहों में बचकर रहनाचाहिए। सांप काटने की स्थिति में बिना घबराए डॉक्टर के पास जाना चाहिए और जहां सांप ने काटा है उसके दोनों तरफ कसकर पट्टी बांध देनी चाहिए।

बिच्छू- बिच्छू ऐसा जीव है जो देखने में भी बहुत खतरनाक होता है और काटने पर जानलेवा भी साबित हो जाता है। सही समय पर इलाज ना होने पर इंसान की मौत भी हो जाती है।

मक्खी- बारिश की समय सबसे ज्यादा मक्खियां ही परेशान करती हैं जो सीधा तो नुकसान नहीं पहुंचाती है, लेकिन उन पर कई कीटाणु मौजूद होते हैं। इस मौसम में खाने की चीजों पर खास ध्यान देना जरूरी है क्योंकि इनके द्वारा कई कीटाणु फैलने का खतरा बढ़ जाता है।



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Beware of not only mosquitoes but also these animals in monsoon

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गर्भवती महिलाओं को ज्यादा परेशान करते हैं मच्छर


बारिश आते ही मौसम तो सुहाना हो ही जाता है लेकिन इसके साथ बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इस सुहाने मौसम के मज़े में खलल की वजह मच्छर होते है जो इस मौसम में बीमारियों की मुख्य वजह बनते हैं। इसलिए ऐसे मौसम में इससे बचना बहुत जरूरी है। मच्छरों से बचने के लोगों घरेलू उपचार से ले कर कई नई- नई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं । लेकिन क्या आप लोग जानते हैं कि कई ऐसे कारण भी होते है, जिसकी वजह मच्छर कुछ लोगों को ज्यादा काटते हैं।

आखिर किन लोगों को ज्यादा मच्छर काटते हैं-

- कई रिपोर्ट्सके अनुसार मच्छर एक खास ब्लड ग्रुप वाले व्यक्तियों को ज्यादा काटते हैं और रिसर्च में सामने आया है कि मच्छर 'ओ ब्लड ग्रुप; की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं।

- कई लोगों और रिसर्च के अनुसार ये माना जाता है की जब लोग ज्यादा बीयर पी लेते हैं तब भी उन्हें ज्यादा मच्छर काटते हैं। हालांकि इस मामले में पूरी तरह से किसी भी रिसर्च में पुष्टि नहीं हुई है।

- जिन लोगों को ज्यादा पसीना आता है उन्हें मच्छर अधिक काटते हैं, क्योंकि पसीने में लैक्टिक एसिड, यूरिक एसिड, अमोनिया आदि होते हैं, जिससे मच्छर ज्यादा आकर्षित होते हैं।

- गर्भवती महिलाएं अन्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा गहरी सांसें लेती हैं और इस दौरान उनके शरीर का तापमान भी अधिक होता है। इन सब कारणों से गर्भवती महिलाओं को मच्छर अधिक काटते हैं।

- फीमेल यानी मादा मच्छर को जिन्दा रहने के लिए आइसोल्युसिन की जरूरत होती है। इस वजह से जिन लोगों के शरीर में आइसोल्युसिन ज्यादा होता है, उन्हें मच्छर ज्यादा परेशान करते हैं।



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Pregnant women more nervous mosquito

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लंबे समय तक जवां दिखने के लिए स्किन के मुताबिक चुनें ऑयल्स, एक्सपर्ट से जानिए इनकी खूबियां


लाइफस्टाइल डेस्क. एसेंशियल ऑयल्स त्वचा की देखभाल में मददगार होते हैं। इनका उपयोग क्रीम, सीरम आदि में किया जाता है। रोज़ाना इन्हें सही तरीक़े से इस्तेमाल करके त्वचा को ख़ूबसूरत और जवां बनाए रखा जा सकता है। यूं तो एसेंशियल ऑयल कई प्रकार के होते हैं पर कुछ ऐसे हैं जिनका इस्तेमाल आमतौर पर होता है। आइए सौंदर्य विशेषज्ञ पल्लवी सिन्हा से जानते हैं कौन-सा ऑयल किन ख़ूबियों से भरा है और उसे इस्तेमाल करने का बेहतर तरीक़ा क्या है।

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    यह ऑयल तैलीय त्वचा वालों के लिए बेहद फ़ायदेमंद है। इस तरह की त्वचा वालों को आमतौर पर मुंहासों की शिक़ायत रहती है। यह तेल कील-मुंहासों के लिए ज़िम्मेदार

    बैक्टीरिया को नियंत्रित करता है और दाग़-धब्बे दूर करने में भी मददगार होता है। नियमित तौर पर इस्तेमाल करने से त्वचा संबधी समस्याएं दूर होती हैं।


    ऐसे करें इस्तेमाल- चेहरे को अच्छी तरह से साफ़ कर लें। अब 5-6 बूंद टी ट्री ऑयल और 4-5 बूंद शहद की मिलाकर लगाएं। 15-20 मिनट बाद चेहरे को धो लें। रोज़ाना इस्तेमाल कर सकते हैं। सोने से पहले एसेंशियल ऑयल्स का इस्तेमाल करना अधिक फ़ायदेमंद होता है।

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    यह सूरज की तीव्र किरणों से त्वचा की रक्षा करता है। जो लोग धूप में ज़्यादा रहते हैं या जिन्हें जल्दी टैनिंग हो जाती है, उनके लिए यह बड़े काम का है।


    ऐसे करें इस्तेमाल - 1 बड़ा चम्मच शिया बटर, 2 बूंद कैरट सीड ऑयल, 2 बूंद लेमन ऑयल, 2 बूंद फ्रैंकिन्सेंस (लोबान) ऑयल को अच्छी तरह से मिला लें। चेहरे और गर्दन पर मसाज करके रातभर के लिए छोड़ दें। इसे रोज़ इस्तेमाल कर सकते हैं। मिश्रण को बनाकर एक हफ़्ते तक उपयोग में लिया जा सकता है।

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    यह विटामिन-सी से भरपूर होता है। इसका इस्तेमाल अक्सर घरेलू नुस्ख़ों में होता है। यह समय से पहले नज़र आने वाली झुर्रियों, झांइयों को दूर करने में सहायक है। साथ ही तनाव भी भगाता है। इसे सभी तरह की त्वचा वाले लगा सकते हैं।


    ऐसे करें इस्तेमाल- चेहरा साफ़ करके 20 बूंद लेमन ऑयल और 200 मिलीग्राम सैफ फ्लावर ऑयल को अच्छी तरह से मिलाकर बोतल में रख लें। रोज़ सोने से पहले इसे चेहरे, गर्दन और चाहें तो पूरे शरीर पर भी लगा सकते हैं। अगले दिन नहाते वक़्त साफ़ कर लें।

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    यह ऑयल त्वचा को निखारने का कार्य करता है। साथ ही त्वचा की रंगत एक समान भी बनाता है। जिनकी त्वचा लाल रहती है या जलन आदि होती है वे भी इस ऑयल का प्रयोग कर सकते हैं।


    ऐसे करें इस्तेमाल- 2-3 बूंद लैवेंडर ऑयल और 5 बड़े चम्मच एलोवेरा जैल को मिला लें। चेहरा साफ़ करके रोज़ इस मिश्रण को लगाएं। 20 मिनट बाद धो लें। रातभर लगाकर भी रख सकते हैं।

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    यह त्वचा को गहराई से साफ़ करता है। उसे जवां बनाए रखने के साथ ही चेहरे का रक्त संचार भी ठीक रखता है।


    ऐसे करें इस्तेमाल- बोल में 6 बूंद रोज़मेरी ऑयल और एक चम्मच एलोवेरा जैल को मिलाएं। इससे चेहरे और गर्दन की मसाज करें। 15-20 बाद धो लें। रातभर लगाकर भी रख सकते हैं। रोज़ाना इस्तेमाल में लाया जा सकता है। हर तरह की त्वचा वाले लगा सकते हैं।



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      essential oils for skin
      essential oils for skin

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मिस्टर परफेक्ट बनने और बढ़ती उम्र का असर कम करने के लिए बदलें कॉस्मेटिक प्रोडक्ट


हेल्थ डेस्क. झुर्रियां, रेजर बर्न और दाग-धब्बे पुरुषों के लिए आम समस्या है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, उसका सीधा असर त्वचा पर दिखना शुरू हो जाता है। इसलिए आपको अपनी त्वचा पर रोज ध्यान देने की जरूरत है। आम ब्यूटी प्रोडक्ट की जगह ऐसे उत्पादों को शामिल करें जो बढ़ती उम्र का असर कम करें और आपको मिस्टर परफेक्ट बनाएं।

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    क्रीम पुरुषों के लिए भी जरूरी है। ये न सिर्फ चेहरे के दाग-धब्बे छुपाती है बल्कि टोंड त्वचा पाने में भी मदद करती है। इस क्रीम के साथ आपको कुछ और इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके इस्तेमाल से आपके चेहरे के दागधब्बे धीरे-धीरे कम हो जाते हैं और आपको मिलती है बेदाग त्वचा। ये कॉम्प्लेक्शन को निखारती है और चेहरे के ऑयल प्रोडक्शन को कंट्रोल करने में मदद करती है। इसके लिए हमेशा मिनरल बेस्ड बीबी क्रीम चुनें। वैसे भी फाउंडेशन के मुकाबले बीबी क्रीम काफी लाइट होती है। इसके इस्तेमाल से स्किन पोर्स बंद नहीं होते हैं और पिंपल्स जैसी त्वचा की समस्या दूर होती है।

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    आंखों के नीचे के एरिया से बढ़ती उम्र और तनाव का पता चलता है। इसे ठीक करने के लिए सबसे पहले अच्छी नींद और खानपान जरूरी है। साथ ही अंडर आई क्रीम का इस्तेमाल आपको फ्रेश और यंग लुक देगा। आंखों के नीचे काले घेरे को कम करने के लिए यह उपयोगी क्रीम मानी गई है इसका उपयोग सुबह किया जाता है। जो दिन भर शरीर की गंदगी को निकालकर चेहरे व आंखों के नीचे के काले घेरों को दूर करने में मदद करती है। यह ड्राय स्किन में नमी प्रदान कर निखार लाने का काम भी करती है।

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    पतले बाल आपको उम्र से पहले ही बूढ़ा बना देते हैं, इस समस्या के समाधान के लिए आपको एक अच्छे हेयर वॉल्यूम स्प्रे की जरूरत है। ये बालों को बाउंस और वॉल्यूम देते हैं। इसे इस्तेमाल करने के बाद पानी और बारिश से बचें। बालों में जल्दी वॉल्यूम पाने के लिए रूट लिफ्टिंग स्प्रे निकालें और इस्तेमाल करें। बालों की जड़ों और क्राउन पर स्प्रे करने के लिए कोई भी बढ़िया स्प्रे आजमाएं। स्प्रे करने के बाद एक्स्ट्रा परफेक्शन के लिए बालों को अंगुलियों से ब्रश करें।

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    आपके चेहरे पर ताजगी बनी रहे इसके लिए ‘फेस मिस्ट’ परफेक्ट कॉस्मेटिक उत्पाद है। ये ‘सीलिंग एजेंट’ की तरह काम करते हैं। चेहरे पर इस्तेमाल किए गए उत्पाद के बाद फेस मिस्ट लगाने से त्वचा पर ऑइल नजर नहीं आता है। इस तरह कम से कम आठ घंटे आप फ्रेश दिख सकते हैं। ये हर्ब्स और अलग-अलग नैचुरल चीजों से बने होते हैं। अगर आप इसे आम स्प्रे समझने की गलती कर रहे हैं, तो अपनी सोच बदलें। इसे आप घर में भी ग्रीन टी या एलोवेरा जैसी नैचुरल चीजों से बना सकते हैं।

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    एंटी ऐजिंग क्रीम, फेसवॉश और माॅइश्चराइजर बढ़ती उम्र वाले पुरुषों के लिए आइडियल उत्पाद हैं। ये आपकी त्वचा को टाइट करते हैं जिससे चेहरे पर निखार आता है। ये स्किन में नजर आने वाले डार्क स्पॉट्स को कम करते हैं। इसके साथ ही चेहरे पर दिखने वाली लाइन्स और रिंकल्स को हटाने में भी यह इफेक्टिव है। इसके अलावा ये स्किन पोर्स के साइज को कम करते हैं और त्वचा को सॉफ्ट बनाने में भी मददगार है। इनका असर कुछ ही दिनों में दिखाई देने लगता है।



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      how to look young and reduce ageing beauty tips for men

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नूडल्स पास्ता का भारतीय रूप है इडियप्पम, चावल के आटे घर पर कर सकते है तैयार


लाइफस्टाइल डेस्क. पास्ता कहां से आया, इसका कोई एक इतिहास नहीं है। दरअसल, आज हम जो पास्ता खाते हैं, मूलत: पास्ता वैसा नहीं था। शुरुआत में 'पास्ता' शब्द इटली के पारंपरिक नूडल्स के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा। नूडल्स पास्ता के भारतीय संस्करण कहलाने वाले इडियप्पम की शुरुआत कैसे हुई, बता रहे हैं मशहूर शेफ और प्रेजेंटेटर हरपाल सिंह सोखी...

  1. माना जाता है कि नूडल्स पास्ता चाइनीज डिश है जो 1271 में प्रसिद्ध यात्री मार्को पालो की इटली यात्रा के दौरान चीन से इटली पहुंची थी। 13वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इटली में नूडल्स पास्ता को लोकप्रियता मिलनी शुरू हुई। धीरे-धीरे यह इटली की ही डिश मानी जाने लगी। नूडल्स पास्ता का भारतीय संस्करण है इडियप्पम। या यह भी कह सकते हैं कि इडियप्पम से ही संभवत: नूडल्स पास्ता की खोज हुई होगी क्योंकि इडियप्पम, नूडल्स पास्ता से भी काफी पहले से अस्तित्व में रहा है।

  2. इडियप्पम मुख्यत: तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के दक्षिणी भाग में प्रमुखता से खाया जाता है। यह श्रीलंका में भी इतना ही लोकप्रिय है। 'इडियप्पम' का नाम तमिल शब्द 'इडि' से लिया गया है जिसका अर्थ है 'टूटा हुआ' और अप्पम का मतलब है 'पैनकेक'। तमिलनाडु के केरल से सटे इलाकों और केरल में इसे 'नूलप्पम' या 'नूलपट्टू' भी कहा जाता है। नूल का मतलब होता है धागा।

  3. कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों जैसे मंगलौर और उडुपी में इसे सेमिगे के नाम से जाना जाता है। इसे वहां चिकन जिसे 'तुलूवा चिकन' कहते है या फिश करी जिसे गस्सी कहते हैं, के साथ खाया जाता है। इसे नारियल दूध से बनी डिश 'रासायना' के साथ भी खाया जाता है। जाने-माने फूड हिस्टोरियन के.टी. अचाया ने लिखा है कि इडियप्पम और अप्पम जैसी डिशेज समुद्री तटों पर काजियार और कुवियार (फूड वेंडर्स) द्वारा बेची जाती थीं। इसका उल्लेख ईसा से 300 साल पूर्व से लेकर ईस्वीं 300 तक के दौरान रची गईं तमिल संगम काव्य रचनाओं जैसे पेरुम्पानुरु, कांची और सिलप्पाथिकरम में किया गया है। इसका मतलब है कि दक्षिण में ये डिशेज दो हजार साल से भी अधिक समय से चली आ रही हैं और इनकी रेसिपी इतने सालों के बाद भी वैसी ही बनी हुई हैं।

    • अब थोड़ी बात इसकी रेसिपी की भी। इसे पारंपरिक रूप से बनाने में थैर्य रखने की जरूरत होगी। सबसे पहले चावल को पानी में अच्छे से भिगो लिया जाता है। कुछ देर के बाद इस चावल को बारीक पीसकर पेस्ट (बेटर) बना लिया जाता है।
    • इस बेटर में थोड़ा-सा नमक और एक-दो चम्मच तेल मिलाकर उसे तब तक गैस स्टोव पर रख दिया जाता है, जब तक कि उसमें मौजूद पूरा पानी उड़ न जाए। बीच-बीच में इस बेटर को कलछी से हिलाना-डुलाना भी जरूरी है ताकि उसमें गुठलियां न पड़ने पाए।
    • कुछ समय के बाद जब चावल का ये पेस्ट रोटी के आटे की तरह हो जाता है तो गैस बंद कर उसे थोड़ा ठंडा होने दिया जाता है। इसे फिर पीतल या लकड़ी के सांचे (आमतौर पर जिससे घरों में सेंव बनाई जाती है) में डालकर उनके नूडल्स बना लिए जाते हैं।
    • इन नूडल्स को इडली बनाने वाले या अप्पम बनाने के सांचे में डालकर करीब पांच से छह मिनट तक पका लिया जाता है। बस तैयार है इडियप्पम।
    • नूडल्स के लिए आटा बनाने का आसान तरीका यह भी है कि सीधे चावल के आटे को ही पैन में पानी गरम कर उसमें तब तक भून लिया जाता है, जब कि पूरा पानी उड़ न जाए। इडियप्पम को काजू, नारियल दूध और टमाटर की एक खास चटनी के साथ परोसा जाता है।


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      history of noodle pasta known in india Idiyappam and how to make Idiyappam

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जानवरों की लिए भी हैं मच्छर खतरनाक, दूध उत्पादन होता है प्रभावित



मच्छरों का दुष्प्रभाव न केवल इंसानों पर पड़ता है बल्कि जानवरों पर भी पड़ता है। और इसका जानवरों पर इसका सीधा असर देखा जा सकता है। मच्छरों के काटने से जानवर तनाव में आ जाते हैं और उनके दूध उत्पादन की क्षमता पर भी लगभग 10 से 15 प्रतिशत तक का प्रभाव पड़ता है। इसलिए ये जरूरी है कि बारिश के समय खुद के साथ जानवरों को भी ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है।

मच्छर के बार-बार काटने से जानवर परेशान हो जाते हैं और ठीक से चारा भी नहीं खा पाते है। बारिश के मौसम में गंदगी की वजह से मच्छर ज्यादा हो जाते हैं और मच्छर जानवरों के पांव पर ज्यादातर काटते हैं। इसलिए जानवरों को बांधने कि जगह पर साफ सफाई रखनी चाहिए। क्योंकि कई बार ज्यादा मच्छर के काटने से पैरों से खून तक आने लगता है जिसका सीधा-सीधा असर उसके दुग्ध उत्पादन पर भी पड़ता है।

कैसे रखें जानवरों का ख्याल -

  • आप मच्छरदानी और धुआं आदि की मदद से मच्छरों को दूर भगा सकते हैं।
  • हल्के नीम के तेल की मालिश पशु के शरीर पर करें ।
  • नीम और तुलसी के पत्तों को जला कर एक कोने में रख दें और थोड़ी देर बाद में ही बुझा दें ।


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Mosquitoes are dangerous for animals, milk production is affected

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मलेरिया से रहेंगे दूर अगर ये आपको होगा पता



पूरी दुनिया में लाखों लोग मलेरिया के वजह से अपनी जान गंवा देते हैं। ये एक ऐसी प्रचलित बीमारी है जिसकी वजह मच्छर बनते हैं। लेकिन अगर आप समय रहते आप सावधान रहें तो ये आपके आसपास भी नहीं फटकेगी। इस आलेख में आपको बता रहे हैं, मलेरिया के बारे में। जानें सबकुछ, कहां से?कैसे और क्यूं होती है बीमारी। सावधानी ही सबसे बड़ा इलाज है तो आइए आपको आगे बताते हैं कि आप कैसे इससे खुद का कर सकते हैं बचाव।

मलेरिया के बारे में

मलेरिया शब्द का उद्भव इटालियन शब्द "माला एरिया" से बना है जिसका मतलब होता है 'खराब हवा'। ये ऐसी बीमारी है जो परजीवी प्लास्मोडियम के कारण होता है। इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें तो पता चलता है कि मलेरिया का सबसे पुराना वर्णन चीन (2700 ईसा पूर्व) के अतीत से मिलता है। दुनिया में कई जगह मलेरिया को दलदली बुखार अंग्रेजी में बोलें तो Marsh Fever कहा जाता है। मलेरिया को लेकर सबसे पहली स्टडी चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरिन वैज्ञानिक द्वारा की गई थी।


कैसे फैलता है मलेरिया
ये बुखार मादा मच्छर एनोफेलीज़ के काटने के कारण होता है। इस मच्छर में प्लास्मोडियम नाम का परजीवी पाया जाता है जिसके कारण ये रक्त में तेजी के साथ फैल जाता है। उष्णकटिबंधीय एवं शीतोष्ण क्षेत्रों में मलेरिया काफी गंभीर रोग के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। इसके लक्षण की बात करें तो इसमें बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, सिरदर्द, शरीर में दर्द, जी मचलना और उल्टी जैसी चीजें दिखाई देती हैं। कई बार बुखार पसीना आने से उतर जाता है परन्तु कुछ घंटों बाद फिर हो सकता है लेकिन ये सब निर्भर करता है कि किस परजीवी के कारण मलेरिया आपको हुआ है।

लक्षण
- कंपकंपी और ठंड के साथ तेज बुखार चढ़ना
- 104-105 डिग्री तक तेज बुखार (आमतौर पर एक दिन छोड़कर आता है)
- उलटी, कमजोरी, चक्कर आना और जी मिचलाना
- जोड़ों में दर्द नहीं, लेकिन सिर दर्द और शरीर दर्द
- खांसी, गला खराब और नाक बहना
- सिरदर्द और मांसपेशियों में दर्द

बचाव
अगर आप खुद को व अपने परिवार को इस गंभीर बीमारी से दूर रखना चाहते हैं तो मच्छरों को पैदा होने से रोकना पड़ेगा। न रहेंगे मच्छर न फैलेगा मलेरिया। मलेरिया का गंदे पानी में पैदा होता है और इसकी सबसे ज्यादा संभावना इस मौसम में होती है। घर के आसपास जहां भी पानी जमा देखें वहां मिट्टी का तेल छिड़क दें। इस मौसम में कूलर के इस्तेमाल से भी बचना चाहिए।



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Malaria Will Stay Away From It If You Know

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इंसान और बंदर के जेनेटिक मटेरियल से तैयार किया गया दुनिया का पहला डिजाइनर भ्रूण


हेल्थ डेस्क. स्पेन के वैज्ञानिक ने चीन की लैब में पहली बार ऐसा डिजाइनर भ्रूण तैयार किया गया है, जो इंसान और बंदर से मिलाकर तैयार किया गया है। इस हाइब्रिड भ्रूण से तैयार होने वाले बच्चे में दोनों की खूबियां होंगी। कानूनी कार्यवाही से बचने के लिए यह प्रयोग चीन में किया गया। भ्रूण को 14 दिन का विकसित करने के बाद इस पर रोक लगा दी गई। यह कदम इंसानों में जानवर के अंगों को ट्रांसप्लांट करने के लिए अहम माना जा रहा है।

  1. स्पेनिश शोधकर्ता जुआन कार्लोस ने जेनेटिकली मोडिफाइड बंदर केभ्रूण से वेजीन डिएक्टिवेट किए, जो अंगों कोविकसित करने का कम करते हैं। इसके बाद भ्रूण में इंसान की स्टेम कोशिकाओं को डाला किया गया। नतीजा यह रहा है कि भ्रूण किसी भी तरह के ऊतक के निर्माण के लिए सक्षम बन गया।

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    जुआन कार्लोस

  2. शोधकर्ताओं की टीम ने हालांकि किसी भी पत्रिका में रिसर्च के परिणाम नहीं प्रकाशित कराए हैं। वेबसाइट एल-पेस के मुताबिक, हाइब्रिड भ्रूण तैयार किया गया लेकिन विकसित होने के 14 दिन बाद ही उसे खत्म कर दिया गया। भ्रूण में लाल लाइनें देखी गई थीं, जो बताती है इसमें भविष्य में इसमें सेंट्रल नर्वस सिस्टम विकसित नहीं हो सकता। हालांकि भ्रूण तैयार करने का प्रयोग सफल रहा।

  3. शोधकर्ता जुआन कार्लोस 2017 में भी पहली बार इंसान और सुअर के जेनेटिक मैटेरियल को मिलाकर एक भ्रूण तैयार किया था। हालांकि यह प्रयोग बहुत सफल नहीं हो पाया था। रिसर्च के प्रोजेक्ट कॉलाब्रेटर और अमेरिकी मर्सिया कैथेलिक यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर एस्ट्रेला न्यूनेल के मुताबिक, टीम इस अध्ययन को जर्नल में प्रकाशित कराने की तैयारी कर रही है।



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      प्रतीकात्मक फोटो।

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दूर या पास की चीजें देखने के लिए बस पलक झपकानी होगी, शोधकर्ताओं ने बायोमीट्रिक लेंस बनाए


लाइफस्टाइल डेस्क.कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने खास किस्म के लेंस तैयार किए हैं जिसकी मदद से पलक झपकते ही दूर या पास की चीजों को स्पष्ट देखा जा सकेगा। शोधकर्ताओं ने इसे बायोमीट्रिक लेंस का नाम दिया है। दावा है कि ये लेंस खासतौर पर उनके लिए बेहतर साबित होंगे, जिनकी दृष्टि बेहद कमजोर है और चश्मा पहनना मजबूरी है। फिलहाल इस लेंस का प्रोटोटाइप तैयार किया गया है।

  1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, दूर या पास की चीजें देखने के लिए बस आंखों का मूवमेंट बदलना होगा। यह देखने में सामान्य लेंस जैसा ही है। इसमें आर्गनिक टिश्यू की जगह इलेक्ट्रो-एक्टिव पॉलिमर फिल्म का प्रयोग किया गया है। इसमें खास किस्म में तार का इस्तेमाल किया गया है जो करंट पैदा करते हैं। इससेलेंस को फैलने और सिकुड़ने में मदद करती है।

  2. दो बार आंखों को झपकाने परदूर और ऐसा दोबारा करने पर पास की चीजों को स्पष्ट देखा जा सकेगा। इंसान और जानवर जिस तरह पास और दूर की चीजें देखते है, बायोमीट्रिक लेंस को उसी तर्ज पर तैयार किया गया है। इस लेंस का इस्तेमाल भविष्य में आंखों में अपने आप जगह बनाने और रोबोटिक आई के तौर पर भी किया जा सकेगा।

  3. शोधकर्ताओं का कहना है, लेंस को इंसान तक पहुंचने से पहले कई और प्रयोगों से गुजरना होगा। हमारी रिसर्च जारी है। 2014 में सर्च इंजन गूगल ने भी स्मार्ट कॉन्टेक्ट लेंस पर काम करना शुरू किया था। यह लेंस लगाने वालेमधुमेह रोगियों के आंसू से ही ग्लूकोज का स्तर जांच लेता था। हालांकि 2018 में इस प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी गई थी।

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  4. शोधकर्ता शेंगकियांग काई का कहना है कि आंखों के मूवमेंट (पलकें झपकाना) में सिग्नल देने की ताकत होती है। जब आप नींद में होते है तब भी आपकी आंखों में इलेक्ट्रोऑक्यूलोग्राफिक क्षमता होती है। जब आप कुछ भी नहीं देख रहे होते हैं तब भी कुछ लोग अपने आंखों की पुतलियों का मूवमेंट कर इलेक्ट्रोऑक्यूलोग्राफिक सिग्नल जनरेट कर रहे होते हैं।



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      प्रतीकात्मक फोटो।

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अनार का छिलका पेट दर्द-बवासीर और लौकी की छीलन दस्त में राहत देती है


हेल्थ डेस्क. अक्सर फूलों और सब्जी के छिल्कों को बेकार समझकर फेंक दिया जाता है जबकि इनमें औषधीय तत्व होते हैंं। ये कई रोगों सें बचाते हैं। तरबूज, संतरा, अनार, तोरई और लौकी जैसे कई फल और सब्जियां हैं जिनके छिलकों को सुखाकर कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है।

  1. तरबूजके छिलके उपयोगी होते हैं। यदि कब्ज की शिकायत रहती है तो तरबूज को छिलके समेत खाएं। छिलका मुलायम होना चाहिए। इससे कब्ज़ में राहत मिलती है। इसके साथ ही दाद, एक्जिमा आदि की समस्या होने पर तरबूजज के छिलकों को सुखाकर जला लें। राख बन जाने पर सरसों के तेल में मिलाकर प्रभावित जगह पर लगाएं, आराम मिलेगा।

  2. जिनकी त्वचा हमेशा खुश्क होती है उनके लिए ये फायदेमंद हैं। पपीते के छिलके त्वचा पर लगाने से उसकी खुश्की दूर होती है। फटी एड़ियों पर लगाने से वे मुलायम बनी रहती हैं। पपीते के छिलकों को धूप में सुखाकर बारीक पीस लें। इस पाउडर को ग्लिसरीन के साथ मिलाकर लेप बनाएं और चेहरे पर लगाएं। त्वचा चमकदार हो जाएगी।

  3. संतरों के साथ ही इनका छिलका भी बेहद फायदेमंद होता है। यह हडि्डयों को मजबूती देने के साथ ही कब्ज में भी राहत देते हैं। छिलकों के सुखाकर पाउडर बना लें। इसकी चाय बनाकर पिएं। इसका लेप तैयार कर चेहरे पर लगा सकते हैं, यह स्किन को चमकदार बनाता है। संतरे के छिलको को धूप में सुखाकर पीस लें। इस पाउडर को कच्चे दूध व हल्दी में मिलाकर चेहरे पर लगाएं। इससे न केवल मुंहासों का ख़ात्मा होता है बल्कि त्वचा भी चमक उठती है। नींबू का छिलका दांत पर मलने से मसूडे मजबूत बनते हैं। नींबू व संतरे के छिलके सुखाकर महीन पीसकर चूर्ण बना लें। इन्हें दांतों पर घिसने से दांत चमकदार बनते हैं।

  4. जिन महिलाओं को अधिक मासिक स्राव होता है वे अनार के सूखे छिलकों को पीसकर एक चम्मच पानी के साथ लें। इससे रक्तस्राव कम होगा और पेट दर्द में राहत भी मिलेगी। जिन्हें बवासीर की शिक़ायत है वे 4 भाग अनार के छिलके और 8 भाग गुड़ को कूटकर छान लें और बारीक-बारीक गोलियां बनाकर कुछ दिन तक सेवन करें। अनार के छिलकों को मुंह में रखकर चूसने से ख़ासी शांत होती है। अनार के छिलकों को बारीक पीसकर और उसमें दही मिलाकर सिर पर मलने से बाल मुलायम होते हैं।

  5. तोरई की सब्जी खाना तो आम है पर इसके छिलके से बनी सब्जी पेट के विकारों को दूर करती हैं। तोरई का ताज़ा छिलका त्वचा पर रगड़ने से त्वचा भी साफ होती है।

  6. इलायची के छिलकों को चाय के साथ उबालकर पीने से सर्दी- जुकाम में आराम मिलता है। साथ ही इन छिलकों को चाय पत्ती के डिब्बे में डालकर भी रख सकते हैं। इससे चाय का स्वाद बढ़ेगा।

  7. लौकी और उसके छिलकों की सब्जी कई लोगों को पसंद होती है। पर इसके छिलकों को पकाने के बजाय बारीक पीसकर पानी के साथ पिएं। दस्त की समस्या में लाभ मिलता है।

    • नारियल की जटाओं को जलाकर उसे महीन पीस लें, इसमें थोड़ा नमक मिलाकर मंजन करें।
    • टमाटर और चुकंदर के छिलको चेहरे पर लगाने से चेहरे में चमक आती है और होंठों की लालिमा बढ़ती है।


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      health benefits for fruit and vegetable scap
      health benefits for fruit and vegetable scap

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चेन्नई में 7 साल के बच्चे के मुंह से 526 दांत निकाले गए, 5 घंटे चला ऑपरेशन


चेन्नई. डॉक्टरों ने 7 साल के बच्चे के निचले जबड़े का ऑपरेशन कर 526 दांत निकाले। बच्चे का दायां गाल सूजा हुआ था और जब जांच की गई तो बच्चे की इस अस्वाभाविक मेडिकल कंडीशन का पता चला। डॉक्टरों ने कहा कि दांतों के इस अस्वाभाविक विकास की वजह मोबाइल टावर से होने वाला रेडिएशन भी हो सकता है। डॉक्टरों का दावा है कि यह दुनियाभर में अपनी तरह का पहला मामला है। उन्होंने इस स्थिति को कंपाउंड कम्पोजिट ऑन्डोटोम का नाम दिया।

  1. रिपोर्ट्स के मुताबिक, सविता डेंटल कॉलेज केओरल सर्जन डॉ. पी सेंथिलनाथन ने बताया किलड़के को काफी समय से निचले दाएं जबड़े में सूजन की शिकायत थी। सूजन अधिक होनेपर पैरेंट्स उसे लेकर हॉस्पिटल आए। एक्स-रे और सीटी-स्कैन से पता चला कि जबड़े में कई दांत ऐसे हैं जो अधूरे विकसित हैं। ऐसे में सर्जरी का फैसला लिया गया।

  2. सेंथिलनाथन के मुताबिक, दांत जबड़े के अंदरूनी हिस्से में थे, जिसे बाहर से देखना मुश्किल था। मरीज को एनेस्थीसिया देने के बाद उसके जबड़े का एक हिस्सा निकाला गया जिसका वजन 200 ग्राम था, जांच के दौरान इसमें 526 छोटे, मध्य और बड़े आकार के दांत मिले।

  3. इसमें कुछ दांत बेहद छोटे हैं। जबड़े से सभी अतिरिक्त दांतों को निकालने में पांच घंटे लगे। सर्जरी के तीन दिन बाद बच्चे की स्थिति सामान्य हो गई थी। ऑपरेशन के बाद बच्चे ने कहा कि अब उसे कोई दर्द नहीं है।

  4. डॉक्टरों को इस तरह के अस्वाभाविक विकास की वजह नहीं पता चल पाई है। कुछ का मानना है कि यह मोबाइल टॉवर से होने वाले रेडिएशन या फिर किसी जेनेटिक डिसऑर्डर की वजह से हो सकता है।

  5. डॉक्टरों ने कहा कि ऑपरेशन के दौरान हमने उसके स्वस्थ दांतों को रहने दिया। अस्वाभाविक तौर पर आए दांतों को बड़ी ही सावधानी से निकाला गया। इससे पहले किसी के इतने ज्यादा दांत नहीं पाए गए थे। इससे पहले 2014 में एक लड़के के मुंह से 232 दांत निकाले गए थे।

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      chennai doctors extract 526 teeth from 7 year old boys mouth in a world first
      chennai doctors extract 526 teeth from 7 year old boys mouth in a world first

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वयस्कों से ज्यादा किशोरों में तनाव और सिरदर्द, इसे आर्ट थैरेपी से दूर किया जा सकता है


वॉशिंगटन. शोधकर्ताओं ने विद्यार्थियों को तनाव से मुक्ति दिलाने और इससे हाेने वाले सिरदर्द को दूर करने के लिए एक रोचक तरीका ढूंढ निकाला है। हाल ही में हुए शोध में पता चला है कि वयस्कों की तुलना में किशोर इस समस्या से ज्यादा जूझ रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह स्कूल की दिनचर्या है। इसे देखते हुए कई स्कूलों ने तनाव दूर करने के लिए कुछ उपाय भी किए हैं।

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के अध्ययन में पता चला है कि कला आधारित गतिविधियां बच्चों को तनाव से दूर करने में मदद कर सकती हैं, विशेषकर छोटी लड़कियों को होने वाले सिरदर्द को दूर करने में यह काफी प्रभावी है। तीन हफ्ते तक की गई सचेतन आर्ट थैरेपी में सामने आया है कि इससे छात्राओं को होने वाले सिरदर्द की संख्या में काफी कमी आई है। जब यह थैरेपी शुरू की गई थी तो इसमें भाग लेने वाली लड़कियों को होने वाले सिरदर्द की औसत संख्या 7.38 थी, लेकिन थैरेपी के बाद यह संख्या 40 फीसदी घटकर 4.63 रह गई।

  1. इस शाेध के लेखक औरविश्वविद्यालय के मानव केंद्रित डिजायन और इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक एलिन ब्जोरलिंग कहते हैं,"इस शोध से एक बात साफ हो गई है कि अगर हम अपनी रणनीतियों को सफल बनाना चाहते हैं तो हमें किशोरों पर ध्यान देना पड़ेगा।"

  2. उन्होंने बताया,"हमें उन्हें यह बताना होगा कि हम किस तरह उनके लिए बेहतर कर सकते हैं। यही वजह है कि हमारी इस छोटी स्टडी के परिणाम काफी अच्छे रहे। इस टीम ने सीएटल के एक हाईस्कूल की 14 से 17 साल की लड़कियों के साथ यह शोध किया था। इनको हफ्ते में दो दिन 50-50 मिनट के लिए आर्ट थैरेपी दी गई।"

  3. आर्ट थैरेपी जर्नल में इस बारे में प्रकाशित शाेध में बताया गया, इस अध्ययन के खत्म होने के सात हफ्ते बाद भी इन छात्राओं को होने वाले सिरदर्द की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई।

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      The claim made in the research done by the University of Washington With the help of Art Therapy

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अमेरिकी शोधकर्ताओं का दावा, विटामिन-ए स्किन कैंसर का खतरा 17 फीसदी तक घटाता है


हेल्थ डेस्क. स्किन कैंसर से बचाव करना है तो डाइट में विटामिन-ए युक्त चीजों को शामिल करें। अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी में हुई हालिया रिसर्च के मुताबिक, विटामिन-ए 17 फीसदी तक स्किन कैंसर का खतरा घटाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, विटामिन-ए न स्किन और शरीर के विकास में अहम भूमिका निभाता है।

  1. ब्राउन यूनिवर्सिटीके असोसिएट प्रोफेसर यूनयांग चो के मुताबिक, स्किन कैंसर में स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा भी शामिल है जिसे रोकना बेहद मुश्किल है। लेकिन हालिया शोध में सामने आया है कि डाइट में विटामिन-ए शामिल किया जाए तो इसका खतरा कम किया जा सकता है। विटामिन-ए लेने पर सूरज की किरणों का शरीर पर होने वाला नकारात्मक असर कम हो जाता है।

  2. अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन डर्मेटोलॉजी के मुताबिक, यह रिसर्च काफी लंबे समय तक चली है। 1984 से 2012 के बीच यह शोध 1,21,700 महिलाओं पर किया गया है। इसके अलावा 1986 से 2012 के बीच 51,529 अमेरिकी पुरुषों को भी रिसर्च में शामिल किया गया। इनकी डाइट में विटामिन-ए युक्त फल और सब्जियों को शामिल किया गया था। रिसर्च में शामिल महिला और पुरुषों की डाइट और स्किन कैंसर के बीच सम्बंध को समझा गया।

  3. शोध में 1,23,000 गोरे लोगों को शामिल किया गया था जिनकी पिछली पीढ़ी में कैंसर की कोई हिस्ट्री नहीं थी। ऐसे गोरे लोगों में स्किन कैंसर का खतरा दूसरों के मुकाबले ज्यादा रहता है। शोध में शामिल 1,978 लोगों में स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा के मामले सामने आए। यह स्किन कैंसर का एक प्रकार है जिसमें कैंसर कोशिकाएं इतनी तेजी से बढ़ती हैं कि नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है। शरीर में विटामिन-ए की पूर्ति के लिए डाइट में गाजर, मूंगफली, बादाम, ब्रोकली और चने शामिल करें।



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      High Vitamin A intake can lower skin cancer risk says brown university researcher

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मच्छर के काटने पर होने वाली जलन से मिलेगा छुटकारा



दिन हो या रात मच्छर के डंक से शांति भंग हो जाती है और अगर नींद में मच्छर काट ले तो नींद भी खराब हो जाती है। नींद खराब और परेशान होने के पीछे का कारण मच्छर के काटने के बाद स्किन पर होने वाली तेज जलन और खुजली है। कई बार तो जलन और खुजली के कारण स्किन पर लाल निशान भी हो जाते है और कभी- कभी इन्फेक्शन भी होने का खतरा बढ़ जाता है। आइए जानते हैं मच्छर के काटने के बाद होने वाली खुजली और जलन की समस्या से निजात पाने के कुछ घरेलू उपाय -

एलोवेरा

एलोवेरा स्किन के लिए एक अच्छा प्लांट माना जाता है। इसकी पत्तियों में पाया जाने वाला जेल स्किन से कई रोगों को दूर करता है। एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर एलोवेरा न सिर्फ मच्छर के काटने से तुरंत राहत देता है, बल्कि स्किन की जलन को कम भी करता है।
शहद

अपने एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों की वजह से शहद मच्छर के काटने से होने वाले जलन को दूर करने में मदद कर सकता है। शहद अपने रोगाणुरोधी गुण के लिए जाना जाता है साथ ही इसके अंदर संक्रमण को रोकने की क्षमता है। इसके लिए उंगलियों पर थोड़ा शहद लें और इसे जलन वाली जगह पर लगाएं।

एप्ल साइडर वेनेगर

सेब के सिरका यानि एप्ल साइडर वेनेगर एंटी-इंफ्लेमेटरी और कूलिंग नेचर के लिए जाना जाता है। इसके साथ ही इसमें वजन कम करने से लेकर कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने और ब्लड शुगर के स्तर को कम करने जैसे कई गुणकारी तत्व होते हैं। ऐसे में अगर मच्छर आपको काट ले तो आप एक चम्मच सेब का सिरका और एक चम्मच ठंडा पानी मिला कर उस सॉल्यूशन को कपड़े की सहायता से स्किन पर लगाए। ऐसा करने से खुजली और जलन से राहत मिलती है।



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Get rid of the irritation caused by mosquito bites

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होठों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए पहले लिक्विड लिपस्टिक को लगाने का तरीका समझें


लाइफस्टाइल डेस्क. लिक्विड लिपस्टिक पारम्परिक लिपस्टिक की तरह नहीं होती। इन्हें लगाने के खास सलीके हैं, जो इनकी खूबसूरती को अधिक बढ़ाते हैं। महिलाएं लिक्विड लिपस्टिक तो ख़रीदती हैं पर उन्हें लगाने के बारे में जांच-परख कम ही करती हैं। कुछ तो सामान्य लिपस्टिक की तरह ही इस्तेमाल करती हैं। लिपस्टिक को लगाने का सही तरीका क्या है, बता रही हैं पूर्वी विश्वकर्मा...

थोड़ा समय दें
सामान्य लिपस्टिक की तरह लिक्विड लिपस्टिक को नहीं लगाया जाता। इन्हें लगाने के लिए थोड़े समय की आवश्यकता होती है। यानी कि इत्मीनान के साथ लगाया जाता है। जल्दबाजी में लगाने पर ये या तो ठीक तरह से होंठों पर फैलेगी नहीं या हो सकता है होंठ के आसपास लग जाए।

चेकअप भी जरूरी है
अमूमन महिलाएं सिर्फ लिपस्टिक लगाना पसंद करती हैं। ऐसा सामान्य लिपस्टिक के साथ तो चल जाता है पर लिक्विड लिपस्टिक के साथ हल्के मेकअप की ज़रूरत होती है, क्योंकि सिर्फ़ लिक्विड लिपस्टिक लगाना आपके लुक को खराब कर सकता है। डार्क लिक्विड लिपस्टिक लगा रही हैं तो हल्का-फुल्का मेकअप जरूर करें। इससे चेहरा एक-सा लगेगा।

अधिक परत न लगाएं
लिक्विड लिपस्टिक की सिर्फ एक परत ही काफ़ी होती है। इसे लगाने के बाद अतिरिक्त लिपस्टिक को हटा लें। इससे एक अच्छा टेक्स्चर मिलेगा। सामान्य लिपस्टिक की तरह अधिक कोट लगाने से इसकी खूबसूरती फीकी-सी लगेगी।

फटे होंठों से बचें
किसी भी लिपस्टिक को लगाने से पहले ख्याल रखें कि होंठ फटे न हों। यदि होठों पर मृत त्वचा जमीं हो तो उसे हटा लें। इससे होंठ मुलायम हो जाएंगे। इसके बाद ही लिक्विड लिपस्टिक लगाएं। इससे होंठ सुंदर और चेहरा आकर्षक लगेगा।

शेप देना न भूलें
कई लोगों के होंठों का आकार पतला होता है। ऐसे में लिपस्टिक लगाने पर फैल भी जाती है। यदि होंठों को सही आकार देना चाहती हैं, तो पहले लिप लाइनर से आउट लाइन बना लें। उसके बाद ही लिपस्टिक लगाएं। इससे लिपस्टिक ठीक तरह से लगेगी और शेप भी सही आएगा।



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how to use liquid lipstick to make lips look good

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परदेस की मिठास अनूठी है, मेहमानों को चखाएं विदेशी पकवान लोकमा और चुरोस का स्वाद


हेल्थ डेस्क. भारतीय डिजर्ट और दूसरे देशों के डिजर्ट काफी अलग होते हैं। हम इन्हें घी या तेल में बनाते हैं, तो वहीं अन्य देशों में ये ज्यादातर बेक्ड होते हैं। पर इनमें कुछ मीठे व्यंजन ऐसे भी हैं जिन्हें घर पर आसानी से बनाया जा सकता है। ऐसी ही अलग-अलग देशों की स्वीट डिश लेकर आए हैं जिन्हें बेक नहीं बल्कि तल कर बना सकते हैं। पलक रायजादा से जानिए इसे घर पर कैसे तैयार किया जाए…

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    • क्या चाहिए - मैदा- 2 कप, नमक- 1 छोटा चम्मच, यीस्ट- 1 छोटा चम्मच, शक्कर- 3 छोटा चम्मच, गर्म पानी- 1 1/4 कप, नींबू रस- 2 बड़े चम्मच।
    • ऐसे बनाएं- एक बोल में गर्म पानी, एक छोटा चम्मच शक्कर और यीस्ट डालकर मिलाएं। 10-15 मिनट के लिए रख दें। अलग बोल में मैदा और नमक डालें और यीस्ट का पानी डालते हुए मिलाएं। इसे गाढ़ा ही रखें। क़रीब डेढ़ घंटे के लिए ढककर रख दें। इस बीच एक भगोने में 1 1/3 कप पानी, नींबू रस और बची हुई शक्कर डालकर मध्यम आंच पर 10-15 मिनट तक उबालें। इसे हल्का चलाते हुए चाशनी बना लें। कड़ाही में घी गर्म करें। आटे के मिश्रण को लोई का आकार देते हुए घी में सुनहरा होने तक तलें। तैयार बॉल्स पर ऊपर से चाशनी डालकर तुरंत परोसें।
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    • क्या चाहिए- मैदा- डेढ़ कप, बेकिंग पाउडर- 1 छोटा चम्मच, शक्कर- डेढ़ बड़े चम्मच पिसी हुई, जैतून का तेल या सफेद मक्खन 1 छोटा चम्मच, नमक- आधा छोटा चम्मच, घी- तलने के लिए, क्रीम- आधा कप, डार्क चॉकलेट- 4 चॉकलेट बारीक कटी हुई।
    • ऐसे बनाएं- एक बोल में मैदा या बेकिंग पाउडर मिलाएं। नॉनस्टिक पैन में तेल या सफेद मक्खन, नमक, शक्कर और पानी मिलाकर उबालें। इसे मैदे के बोल में धीरे-धीरे डालते हुए मिलाएं। इतना पानी डालें कि ये गूंध जाए। कुछ देर ढककर रख दें। कड़ाही में घी गर्म करें। मैदे के मिश्रण को पाइपिन बैग में भरें और गर्म घी में 5-6 इंच की लंबाई में डालते हुए सुनहरा होने तक तलें। प्लेट में निकाल लें और ऊपर से पिसी शक्कर बुरक दें। डिप बनाने के लिए बोल में क्रीम और चॉकलेट डालकर एक मिनट के लिए रखें और फिर मिलाएं। चॉकलेट के साथ चुरोस सर्व करें।
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    • क्या चाहिए- मैदा- 2 कप, शक्कर- 1 बड़ा चम्मच, कोको पाउडर- 1 बड़ा चम्मच, नमकआधा छोटा चम्मच, घी- 3 बड़े चम्मच, विनेगर- 1 छोटा चम्मच, क्रीम- 2 कप, पिसी शक्कर- 2/3 कप, नींबू का जेस्ट- 1 बड़ा चम्मच, चॉकलेट चिप्स या नट्स।
    • ऐसे बनाएं- एक बोल में शक्कर, नमक, दालचीनी पाउडर, कोको पाउडर डालकर मिलाएं। इसमें घी, मक्खन और विनेगर डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। फिर आधा कप पानी डालकर कड़क गूंध लें। इसे 5-10 मिनट के लिए कपड़े से ढंककर रख दें। बड़ी रोटी के आकार में पतला बेलें और फिर पूड़ी आकार के ढक्कन से इसे काट लें। अब पाइप आकार के मोल्ड पर इन्हें लपेट लें और जोड़ को पानी से चिपका दें। अगर मोल्ड नहीं है तो एल्युमिनियम फॉइल से मोल्ड बना सकते हैं। कड़ाही में घी गर्म करके इनको मोल्ड सहित सुनहरा होने तक तलें। इन तले हुए खोल को निकाल कर ट्रे पर रखें। अलग बोल में पिसी शक्कर, गाढ़ी क्रीम और नींबू जेस्ट डालकर गाढ़ा होने तक फेटें। इसे पाइपिन बैग में भरकर खोल में भर लें। ऊपर से चॉकलेट चिप्स डालकर परोसें। इसी तरह चॉकलेट और क्रीम भी मिलाकर भर सकते हैं।


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      try international desert at home know how to make rannoli churos and lokma

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देश में 40 फीसदी नवजातों को जन्म के पहले घंटे के अंदर नहीं मिल रहा मां का दूध


हेल्थ डेस्क. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर पांच में से तीन नवजातों को जन्म के पहले घंटे में मां का पहला पीला दूध नहीं मिल पा रहा है। भारत में यह आंकड़ा 40 फीसदी है। दुनिया में हर साल 8 लाख मौतें सिर्फ ब्रेस्टफीडिंग न होने के कारण हो रही हैं। इनमें सबसे ज्यादा 6 महीने से कम के बच्चे शामिल हैं। ऐसे मामलों में कमी लाने के लिए डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ हर साल 120 देशों के साथ 1-7 अगस्त तक स्तनपान सप्ताह मनाता है। स्तनपान में लापरवाही और अधूरी जानकारी मां और बच्चे की जान जोखिम में डालने वाली हैं, पढ़िए रिपोर्ट-

  1. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नवजात और मां के दूध के बीच बढ़ती दूरी के कई कारण गिनाए हैं। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर मामले निचले और मध्यम आमदनी वाले देशों में सामने आ रहे हैं। दूसरी सबसे बड़ी वजह भारत समेत कई देशों में फार्मा कंपनियों का ब्रेस्टमिल्क सब्सटीट्यूट का आक्रामक प्रचार करना भी है।

    • स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ मीता चतुर्वेदी के मुताबिक, नवजात के जन्म के तुरंत बाद निकलने वाला मां का पहला पीता दूध कोलोस्ट्रम कहलाता है। इसमें प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट और कैल्शियम अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह नवजात की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर संक्रमण से बचाता है।
    • स्तनपान मां में ब्रेस्ट-ओवेरियन कैंसर, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोगों का खतरा घटाता है। ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली 20 हजारे मौंतें सिर्फ बच्चे को स्तनपान कराकर ही रोकी जा सकती हैं।
    • ज्यादा ब्रेस्ट फीडिंग कराने से मां की कैलोरी अधिक बर्न होती है, जो डिलीवरी के बाद बढ़ा हुआ वजन कम करने में मदद करता है। इस दौरान मांओं के शरीर से ऑक्सीटोसिननिकलता है, जिससे उनका तनाव भी कम होता है।
    • डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, बच्चे जन्म के पहले घंटे से लेकर 6 माह की उम्र तक स्तनपान कराना चाहिए। 6 महीने के बाद बच्चे के खानपान में दाल का पानी और केला जैसी चीजें शामिल करनी चाहिए। उसे दो साल तक दूध पिलाया जा सकता है।
    • स्त्री रोग विशेषज्ञ के मुताबिक, मां को एक स्तन से 10-15 मिनट तक दूध पिलाना चाहिए। शुरुआत के तीन-चार दिन तक बच्चे को कई बार स्तनपान कराना चाहिए क्योंकि इस दौरान दूध अधिक बनता है और यह उसके लिए बेहद जरूरी है।
    • ब्रेस्टफीडिंग के दौरान साफ-सफाई का अधिक ध्यान रखें। शांत और आराम की अवस्था में भी बच्चे को बेस्टफीडिंग कराना बेहतर माना जाता है।
    • बच्चा जब तक दूध पीता है, मां को खानपान में कई बदलाव करना चाहिए। डाइट में जूस, दूध, लस्सी, नारियल पानी, दाल, फलियां, सूखे मेवे, हरी पत्तेदार सब्जियां, दही, पनीर और टमाटर शामिल करना चाहिए।
  2. अगर मां एचआईवी पॉजिटिव, टीबी की मरीज या कैंसर के इलाज में कीमोथैरेपी ले रही है तो ब्रेस्टफीडिंग नहीं करानी चाहिए। अगर नवजात में गैलेक्टोसीमिया नाम की बीमारी पाई गई है तो मां को दूध नहीं पिलाना चाहिए। यह एक दुर्लभ बीमारी है जिसमें बच्चा दूध में मौजूद शुगर को पचा नहीं पाता। इसके अलावा अगर माइग्रेन, पार्किंसन या आर्थराइटिस जैसे रोगों की दवा पहले से ले रही हैं तो डॉक्टर को जरूर बताएं।

  3. भ्रम: स्तन का आकार छोटा होने पर पर्याप्त दूध नहीं बनता है।
    सच:
    ब्रेस्टफीडिंग में इसका आकार मायने नहीं रखता, अगर मां स्वस्थ है तो बच्चों को पिलाने के लिए पर्याप्त दूध बनता है।


    भ्रम: ब्रेस्ट फीडिंग सिर्फ बच्चे के लिए फायदेमंद है मां के लिए नहीं।
    सच:
    ऐसा नहीं है। अगर महिला शिशु को रेग्युलर ब्रेस्टफीड कराती है तो उसमें ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर का खतरा कम हो जाता है। साथ ही ऑस्टियोपोरोसिस की आशंका भी कम होती है।


    भ्रम: रेग्युलर ब्रेस्टफीडिंग कराने से इसका साइज बिगड़ जाता है।
    सच:
    ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। ब्रेस्टफीडिंग के दौरान मां में प्रोलैक्टिन हार्मोन रिलीज होता है जो मां को रिलैक्स और एकाग्र करने में मदद करता है। कई स्टडीज में पाया गया है कि स्तनपान से मां को टाइप-2 डायबिटीज, रुमेटाइड आर्थराइटिस और हृदय रोगों से बचाव होता है।


    भ्रम: मां की तबियत खराब होने पर बच्चे को ब्रेस्टफीड नहीं कराना चाहिए।
    सच:
    मां की तबियत खराब होने पर भी बच्चे की ब्रेस्टफीडिंग बंद नहीं करनी चाहिए। इससे बच्चे की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अगर पहले से कोई दवा ले रही हैं तो डॉक्टर को जरूर जानकारी दें।


    भ्रम: पाउडर वाला मिल्क ब्रेस्ट मिल्क से बेहतर होता है।
    सच:
    ये बिल्कुल गलत है। मां का दूध शिशु के लिए कंप्लीट फूड होता है। यह विटामिंस, प्रोटीन और फैट का सही मिश्रण होता है और बच्चे में आसानी से पच भी जाता है।



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      world breastfeeding week 2019 myths and benefits and why newborn babies dying rate is increasing

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मलेरिया में क्या खाएं और क्या नहीं


मलेरिया बीमारी से कोई भी व्यक्ति ग्रसित नहीं होना चाहता लेकिन मच्छरों के आतंक से बचना भी बहुत मुश्किल काम है। ऐसे में अगर किसी को मलेरिया हो जाता है तो डॉक्टर की सलाह से इलाज़ करवाना चाहिए। ज्यादा गंभीर होने पर कई मलेरिया के मामलों में व्यक्ति की जान भी चली जाती है। ऐसे में अगर आप या आपकी फॅमिली में कोई इस बीमारी से ग्रसित है तो खान पान का ध्यान रखना बहुत जरूरी हो जाता है। सही खान-पान हर बीमारी से रिकवर होनें में मदद करता है। तो आइये जानें की मलेरिया में किन चीजों का सेवन करना चाहिए और किन खाद्य प्रदार्थों से बचना चाहिए।

मलेरिया में क्या खांए-

- चाय, कॉफी व दूध लें, दूध में तूलसी के पत्तें, काली मिर्च, दालचीनी या अदरक डाल कर पियें।

- मलेरिया के रोगी को सेब खिलाएं।

- पीपल का चूर्ण बनाकर शहद मिलाकर खाएं इससे बुखार में लाभ होता है।

- दाल-चावल की खिचड़ी, दलिया, साबूदाना खाएं। ये पचने में आसान होते हैं।

- नीबू को काटकर उस पर काली मिर्च व सेंधा नमक डालकर चूसें इससे फायदा पहुंचेगा।

- इस में अमरूद खाने से रोगी को लाभ होता है।

- तुलसी के पत्ते व काली मिर्च को पानी में उबालकर पिएं।

मलेरिया में क्या न खांए-

- ठंडा पानी न पियें और ना ही ठंडे पानी से नहाएं।

- आम, अनार, लीची, अनन्नास, संतरा आदि नहीं खाएं।

- ठंडी पदार्थ न खाएं।

- एसी में ज्यादा न रहें और न सोएं।

- ठंडी चीज़े जैसे दही, शिकंजी, गाजर, मूली आदि न खाएं।

- मिर्च-मसाले वाले खाद्य पदार्थों न खाएं।



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What to eat and what not to eat in malaria

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जानिए मच्छर के काटने से क्यों होती है खुजली


इस मौसम में मच्छरों के काटने से बीमारियां फैलने का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। मच्छर न लेवल शरीर से खून चूसते हैं बल्कि उनके काटने से अहसहनीय खुजली भी होने लगती है। लेकिन कई लोग ये नहीं जानते कि शरीर की जिस जगह पर मच्छर काटते हैं वहाँ खुजली क्यों होने लगती है? आइए जानते हैं इसके पीछे का कारण।

मादा मच्छर शरीर से खून चूसने के लिए अपना बारीक डंक शरीर में चुभोती हैं। मनुष्य के शरीर में खून का थक्का बहुत जल्दी बनने की वजह से खून चूसते समय शरीर में एक विशेष तरह का जहरीला रसायन मिला देती है। इस वजह से मच्छर को खून चूसने में परेशानी नहीं होती। जहरीला रसायन जब शरीर में पहुंचता है उसी वजह से व्यक्ति को खुजली होने लगती है।

मच्छर अपने डंक की मदद से जिस प्रोटीन को शरीर में प्रवेश करवाते हैं उसके साइडइफेक्ट से बचने में रोग प्रतिरोधक क्षमता व्यक्ति की मदद करती है। इस रोग प्रतिरोधक क्षमता को हिस्टामिन के नाम से जाना जाता है जो एक कंपाउंड रिलीज करती है। यह कंपाउंड शरीर के अंदर मौजूद व्हाइट ब्लड सेल्स को प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचाकर उस प्रोटीन से लड़ने में मदद करता है। हिस्टामिन नाम के इस कंपाउंड की वजह से भी व्यक्ति को खुजली और सूजन महसूस होती है।



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Know why itching is done by mosquito bites

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डेंगू - मलेरिया से बचाव के टिप्स


यूं तो डेंगू-मलेरिया किसी को भी हो सकता है लेकिन प्रेग्नेंट महिलाओं में संक्रमण का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे समय में गर्भवती महिला को और भी सतर्क रहना चाहिए।

गर्भवती महिलाएं ऐसे रखें अपना ख्याल :
- इस बात का पूरी तरह ख्याल रखें कि ऐसी जगह पर बिल्कुल ना जाएं जहां इन बीमारियों का प्रकोप तेज हो।
- अपने आसपास मच्छर ना पनपने दें और घर को साफ-सुथरा रखें। इसके अलावा शाम होते ही घर की खिड़कियां बंद रखें ताकि बाहर से मच्छर अंदर ना आ सकें।
- हमेशा पूरे कपड़े पहनें जिससे कि आपका शरीर पूरी तरह ढ़का रहे। मच्छरदानी का इस्तेमाल जरूर करें।
- अपने शरीर में पानी की कमी ना होने दें। ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थ का सेवन करें। जूस और नारियल पानी को अपनी दिनचर्या में जरूर शामिल करें।
- अगर आपको लगे कि मलेरिया व डेंगू जैसी बीमारियों के लक्षण हैं तो अपने डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें।
- गर्भवती महिलाएं डॉक्टर की सलाह लिए बिना कोई भी दवाई ना खाएं।



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Dengue in pregnancy - prevent this from malaria like this

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डेंगू के लक्षण, सावधानी और उपाय


डेंगू के प्रति जागरूक होना बहुत जरूरी है। क्योंकि लोगों को परेशान करने वाले इस रोग में जानकारी ही बचाव है। इसके लिए आपको बस थोड़ा सतर्क रहना जरूरी है। जानिएं इस बीमारी से जुड़ी कुछ अहम बातें।

ये हैं लक्षण :

- डेंगू एडीज मच्छरों के काटने से होता है। इस रोग में तेज बुखार के साथ शरीर पर लाल-लाल चकत्ते दिखायी देते है।

- इसमें 104 डिग्री तेज बुखार आता है और सिर में तेज दर्द होता है।

- शरीर के साथ जोड़ों में भी दर्द होता है। खाना पचाने में दिक्कत होती है।

- उल्टी होना, भूख कम लगना व ब्लड प्रेशर कम हो जाना इसके कुछ अन्य लक्षण हैं।

- इसके अलावा चक्कर आना, कमजोरी महसूस होना और बॉडी में प्लेटलेट्स की कमी हो जाना खास लक्षण हैं।

- लीवर और सीने में फ्लूइड जमा हो जाता है।

कैसे पता करे की डेंगू हुआ है या नहीं

अगर ऊपर दिए गए लक्षणों में से कोई लक्षण दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर क पास जायें। डेंगू (dengue) की जाचं के लिए एनएस 1 टेस्ट किया जाता है जिसके आधार पर डॉक्टर तय करते हैं कि मरीज़ को डेंगू है या नहीं।

डेंगू से जुड़ी जरूरी जानकारी :

- डेंगू का मच्छर आम तौर पर दिन में काटता है।
- गर्मी और बारिश के मौसम में यह बीमारी तेजी से पनपती है। डेंगू के मच्छर हमेशा साफ़ पानी में पनपते हैं जैसे छत पर लगी पानी की टंकी, घड़ों और बाल्टियों में जमा पीने का पानी, कूलर का पानी, गमलों में भरा पानी।

डेंगू से बचने के आसान उपाय :

वैसे तो डेंगू (dengue) का इलाज चिकित्सकीय प्रक्रिया से डॉक्टरों के द्वारा किया जाता है लेकिन सावधानी के तौर पर आप भी कुछ तरीके अपना सकते हैं।
- रोगी को ज्यादा से ज्यादा तरल चीजें दीजिए ताकि उसके शरीर में पानी की कमी न हो। डेंगू में गिलोई के पत्ते काफी उपयोगी होते हैं।

- मरीज को पपीते के पत्ते पानी में पीस कर दिए जा सकते हैं। यह शरीर में प्लेटलेट्स (platelets) बढाने का काम करते हैं लेकिन देने से पहले एक बार डॉक्टर की सलाह जरुर लें।

- मरीज को डिस्प्रिन और एस्प्रिन की गोली कभी ना दें।

- बुखार कम करने के लिए पेरासिटामॉल की गोली दी जा सकती है।

- जितना हो सके नारियल पानी और जूस पिलायें।



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To avoid dengue, do it

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जानिए मच्छरों के काटने से इन बीमारों का भी होता है खतरा


मच्छरों के डंक और उनसे फैलने वाली बीमारियों से बचना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन सा हो गाया है। खासकर बारिश का मौसम आते ही मच्छरों से होने वाली बीमारियां महामारी का रूप ले लेती हैं। ज़्यादातर मच्छरों से होने वाली अधिकतर बीमारियों दिन में मच्छरों के काटने से होती हैं।


आजतक ज्यादातर लोगों नें केवल डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया व जिका वायरस जैसी बीमारियों के बारे में ही सुना है लेकिन इसके अलावा भी कुछ बीमारियाँ ऐसी हैं जो मच्छरों के काटने से होती हैं। आइए जानते हैं उनके बारे में-

ला क्रोसे इंसेफेलाइटिस

पहली बार इस बीमारी का पता 1963 में चला था ये बीमारी मच्छर से पैदा होने वाले वायरस का नाम अमरीका के विस्कॉन्सिन राज्य के ला क्रोसे शहर के नाम पर पड़ा। इसके ज्यादातर शिकार बच्चे होते हैं। इस बीमारी में रोगी को बुख़ार, सिरदर्द, मितली, उल्टी, थकान और सुस्ती होने लगती है। इसलिए इसका शुरुआती स्तर पर इलाज करवाना लाभदायक होता है। लेकिन अगर इसका इलाज़ समय पर न किया जाए तो फिर दवाओं का प्रभाव भी खत्म हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप कब्ज़, बेहोशी या कोमा और लकवे की शिकायत हो सकती है।

येलो फ़ीवर या पीत ज्वर

पीत ज्वरएक वायरस से फैलता है, इससे सबसे ज्यादा अफ़्रीका के लोग प्रभावित होते हैं। हर साल करीब दो लाख लोगों इस बीमारी से प्रभावित होते हैं, इस वायरस का संक्रमण हो जाने के कुछ दिन बाद ही पता चलता है। इलाज़ होने के बाद भी इसके करीब 15 फ़ीसदी पीड़ित दूसरे और ख़तरनाक चरण में पहुंच जाते हैं, जिसमें रोगियों की मृत्युदर 50 फ़ीसदी तक पहुँच जाती है। इसके बाद पीड़ित व्यक्ति में पीलिया के लक्षण दिखाई देते हैं और लीवर में खराबी आने के वजह से उसकी त्वचा और आंखों का सफ़ेद हिस्सा पीला पड़ जाता है।


इसलिए मच्छरों से हमेशा सावधान रहीं और कोई भी शंका होने पर तुरंत इलाज़ करवाएँ। इसके साथ मच्छरों से बचने के लिए मॉस्किटो रेपेलेंट क्रीम और लिक्विड का इस्तेमाल करना चाहिए।



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Know the mosquito bites, these diseases also cause danger

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जानिए जानलेवा मलेरिया का इतिहास और उसके लक्षण


दुनिया भर में कई देश मच्छरों से होने वाली बीमारी मलेरिया के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। हर साल इस बीमारी से मरने वालों की संख्या लाखों तक पहुँच जाती है। आइए जानें इस जानलेवा बीमारी का इतिहास और साथ ही इस बीमारी के कारण भी।

मलेरिया का इतिहास
मलेरिया इटालियन भाषा के शब्द माला एरिया से निकला है, इसका हिंदी भावार्थ बुरी हवा है। इस बीमारी का सबसे पुराना वर्णन चीन से मिलता है जहां इसे दलदली बुखार (Marsh Fever) भी कहा जाता था। फिर साल 1880 में मलेरिया का सबसे पहला अध्ययन चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरिन वैज्ञानिक ने किया।

कारण-
मलेरिया मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से होता है। इसलिए मच्छरों से हमेशा बच के रहना चाहिए, खासकर बारिश के मौसम में मच्छरों के काटने से जानलेवा बीमारियाँ हो जाती है। आइए जानते हैं इस बीमारी के दौरान दिखाई देने वाले लक्षण-
- तेज ठंड लगकर बुखार आना
- बुखार उतरने पर पसीने का आना
- लो ब्लड शुगर
- थकान, सरदर्द, मसल्स पेन
- पेट की दिक्कत और उल्ट‍ियां
- बेहोशी का होना, खून की कमी, एनीमिया

अगर आपको भी इनमें से कोई भी लक्षण नज़र आयें तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेकर खून की जांच करवानी चाहिए।



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Know the history of malaria and its symptoms

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टीबी जैसी संक्रामक बीमारी होने से पहले जानकारी देगा एल्गोरिदम सिस्टम, इजराइली वैज्ञानिकों का दावा


हेल्थ डेस्क. इजरायली वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम विकसित किया है जो टीबी या दूसरी संक्रामक बीमारी होने से पहले ही अलर्ट कर देगा। ऐसी बीमारियों के होने का खतरा कितना है, यह भी बताया जा सकेगा। नेचर कम्युनिकेशन पत्रिका में प्रकाशित शोध के मुताबिक, रिसर्च शरीर में मौजूद रोगों से लड़ने वाला इम्यून सिस्टम और बैक्टीरिया पर की गई है। विकसित किए नए सिस्टम में एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया गया है जो रक्त की जांच करबताता है संक्रामक बीमारी का खतरा कितना है।

  1. यह रिसर्च विजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के शोधकर्ताओं ने की है। उनके मुताबिक सबसे पहले इम्यून कोशिकाओं और बैक्टीरिया के मिलने पर क्या होता है, इसकी जांच की गई। ऐसे ब्लड का सेंपल लिया गया है जिसमें इम्यून सेल्स और साल्मोनेला बैक्टीरिया थीं।

  2. शोध के अगले चरण में वैज्ञानिकों ने एक एल्गोरिदम तैयार किया जो इन दोनों के मिलने और बैक्टीरिया की संख्या बढ़ने पर क्या शरीर में क्या बदलाव होते हैं, इसकी जानकारी देता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह एल्गोरिदम ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) होने की शुरुआती अवस्था में इससे निपटने में मदद करता है।

  3. शोधकर्ताओं के मुताबिक, एल्गोरिदम का पहला प्रयोग नीदरलैंड के एक स्वस्थ व्यक्तियों के ब्लड सेंपल पर किया गया था। इनमें से कुछ लोग साल्मोनेला बैक्टीरिया से संक्रमित थे और उनके इम्यून सिस्टम में हुए बदलाव को रिकॉर्ड किया गया। शोधकर्ता हेव-अवीवी का कहना है एल्गोरिदम पहले इम्यून सेल्स और साल्मोनेला की जांच करता है क्योंकि सबसे ज्यादा बीमारी का कारण यह बैक्टीरिया है। इसके बाद टीबी की मुख्य वजह मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस की जांच करता है।

  4. शरीर में टीबी के वैक्टीरिया का समय से पता चलना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह बॉडी में लंबे समय तक रहती है और असर काफी समय बाद दिखता है। नए सिस्टम की मदद से मोनोसाइट्स इम्यून सेल्स की गतिविधि का स्तर भविष्य में बीमारी का खतरा बताने में मदद करेगा।



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      Israeli researchers develop algorithm to predict infectious diseases in future

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रीढ़ की हड्डी और गर्दन के दर्द से बचने के लिए बदलें कुर्सी पर बैठने का तरीका, अपनाएं 20-20 का नियम


हेल्थ डेस्क. रोजाना ऑफिस में 6 से 8 घंटे तक कुर्सी पर बैठकर काम करना रीढ़ की हड्डी, पीठ और गर्दन के लिए कई समस्याएं पैदा करती है। इससे बचने के लिए जरूरी है आपके बैठने का तरीका यानी पॉश्चर को सुधारें। इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स की चीफ फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. सीमा ग्रोवर बता रही हैं, कुर्सी पर बैठने के दौरान किन 5 बातों का ध्यान रखना चाहिए....

    • लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहने से आंखों पर तनाव बढ़ता है, सिरदर्द और गर्दन की मसल्स में भी दर्द हो सकता है। इसलिए 20-20 का नियम अपनाएं। इस नियम के अनुसार हर 20 मिनट के बाद 20 सेकण्ड के लिए स्क्रीन से दूर होकर अपनी आंखें बंद कर लीजिए। आंखों को 20 बार झपकाएं। ऐसा करते समय अपनी गर्दन सीधी रखें। वैसे यह जरूरी नहीं है कि आप इस नियम का 100 फीसदी पालन करें। इस नियम के पीछे मंशा केवल इतनी है कि आप लगातार एक ही पोजिशन में न रहें। उसे बदलते रहें और इसमें यह नियम मदद कर सकता है। आप 20 की जगह 25 या 30 का आंकड़ा भी रख सकते हैं।
    • हर घंटे कुर्सी से दो बार उठने की आदत डालिए। दो-चार मिनट कहीं टहलकर आ जाइए। इसके अलावा जब भी फोन आए तो उठकर या टहलकर बात करने की आदत भी डाल लीजिए।
    • अगर आपका ऑफिस पहले, दूसरे या तीसरे फ्लोर पर है तो यह आपके लिए अच्छा ही है। एक-दो बार सीढ़ियों का इस्तेमाल कर नीचे-ऊपर टहल लीजिए। टहलते समय हल्की स्ट्रेचिंग भी करते रहेंगे तो और भी बेहतर रहेगा।
    • काम के बीच-बीच में कुर्सी पर बैठे-बैठे भी स्ट्रैचिंग करते रहेंगे तो अच्छा रहेगा। खासकर पैरों, बाजुओं और कंधों की हल्की स्ट्रैचिंग लगातार करते रहना चाहिए।
    • बीच-बीच में नियम से पानी पीना भी बहुत जरूरी है। यह आपको हाइड्रेट रखने में तो मदद करेगा ही, फि रखने में भी मदद करेगा। इस दौरानस्क्रीन या फाइलों पर से कुछ समय के लिए नजरें हटेंगी। गर्दन में मूवमेंट होता रहेगा।


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      sitting on a chair for a long period cause backache and neck pain you need to change body posture

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मच्छर के काटने से आता है तीन तरह का बुखार


डेंगू के ज्यादातर मामलों में मच्छर के काटने से हल्का बुखार होता है लेकिन डेंगू बुखार (dengue fiver) तीन तरह का होता है।

क्लासिकल (साधारण) डेंगू बुखार – साधारण डेंगू बुखार करीब 5 से 7 दिन तक रहता है, जिसके बाद मरीज ठीक हो जाता है। ज्यादातर मामलों में इसी किस्म का डेंगू बुखार पाया जाता है।
क्लासिकल डेंगू बुखार के लक्षण-
-ठंड लगने के बाद अचानक तेज बुखार होना।
- सिर, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना।
- आंखों के पिछले हिस्से में दर्द होना, जो आंखों को दबाने या हिलाने से और बढ़ जाता है।
- बहुत कमजोरी लगना, भूख न लगना, जी मितलाना और मुंह का स्वाद खराब होना।
- गले में हल्का दर्द होना।
- शरीर खासकर चेहरे, गर्दन और छाती पर लाल-गुलाबी रंग के रैशेज होना।

डेंगू हॅमरेजिक बुखार (डीएचएफ) – dengue hemorrhagic fever (DHF) : अगर क्लासिकल साधारण डेंगू बुखार के लक्षणों के साथ-साथ ये लक्षण भी दिखाई दें तो डीएचएफ हो सकता है। ब्लड टेस्ट से इसका पता लग सकता है।

डेंगू हॅमरेजिक के लक्षण-

- नाक और मसूढ़ों से खून आना।
- शौच या उल्टी में खून आना।
- स्किन पर गहरे नीले-काले रंग के छोटे या बड़े निशान पड़ जाना।

डेंगू शॉक सिंड्रोम (डीएसएस) – dengue shock syndrome (DSS)

इस बुखार में DHF के लक्षणों के साथ-साथ 'शॉक' की अवस्था के भी कुछ लक्षण दिखाई देते हैं। जैसे कि -
- मरीज को बेचैनी होना।

- तेज बुखार के बावजूद उसकी त्वचा का ठंडा होना।

- मरीज का धीरे-धीरे बेहोश होना।

- मरीज की नाड़ी कभी तेज और कभी धीरे चलने लगती है। उसका ब्लड प्रेशर एकदम लो हो जाना।

इन तीनों में से डेंगू हॅमरेजिक बुखार और डेंगू शॉक सिंड्रोम का डेंगू सबसे ज्यादा खतरनाक होते है। साधारण डेंगू बुखार अपने आप ठीक हो जाता है और इससे जान को खतरा नहीं होता लेकिन अगर किसी को DHF या DSS है और उसका फौरन इलाज शुरु किया जाना चाहिए।

कब दिखती है बीमारी
काटे जाने के करीब 3-5 दिनों के बाद मरीज में डेंगू बुखार के लक्षण दिखने लगते हैं। शरीर में बीमारी पनपने की मियाद 3 से 10 दिनों की भी हो सकती है।

ये टेस्ट जरूर करवाएं
अगर तेज बुखार हो, जॉइंट्स में तेज दर्द हो या शरीर पर रैशेज हों तो पहले दिन ही डेंगू का टेस्ट करा लेना चाहिए। डेंगू की जांच के लिए शुरुआत में एंटीजन ब्लड टेस्ट (एनएस 1) किया जाता है। जिसमें डेंगू किस प्रकार का है यह पता चल जाता है। इस टेस्ट में डेंगू शुरू में ज्यादा पॉजिटिव आता है, जबकि बाद में धीरे-धीरे पॉजिविटी कम होने लगती है। ये टेस्ट खाली या भरे पेट, कैसे भी कराए जा सकते हैं।



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Know about three types of dengue fever

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