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सबसे कम हेल्दी है भारत के डिब्बाबंद खाना और पेय पदार्थ, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का दावा


हेल्थ डेस्क. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुए अध्यययन के मुताबिक, भारत में बिकने वाले डिब्बाबंद फूड और पेय पदार्थ सबसे कम स्वास्थ्यकर हैं। इनमें वसा, चीनी और नमक की मात्रा अधिक होती है। यूनिवर्सिटी ने यह नतीजे 12 देशों के 4 लाख खाद्य पदार्थों का विश्लेषण करने के बाद जारी किए हैं। विश्लेषण के बाद जारी सूची में लंदन शीर्ष पर जबकि भारत निचले पायदान पर है।

  1. विश्लेषण करने वाले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ के मुताबिक, अलग-अलग देशों के खाद्य पदार्थों की जांच के आधार पर उन्हें रेटिंग दी गई है। रेटिंग की सूची के मुताबिक, अमेरिका दूसरे और ऑस्ट्रेलिया तीसरे नंबर पर है।

  2. रैंकिंग का आधार पैकेज फूड में मौजूद ऊर्जा, नमक, शक्कर, सैचुरेटेड फैट, प्रोटीन, कैल्शियम और फायबर की मात्रा है। रैकिंग का सबसे निचला प्वाइंट 1/2 है जिसका मतलब है सबसे कम हेल्दी फूड। वहीं 5 रेटिंग का मतलब है सबसे बेहतर पैकेज फूड।

  3. ओबेसिटी रिव्यू जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, लंदन को 2.83, अमेरिका को 2.82 और ऑस्ट्रेलिया को 2.81 रेटिंग मिली है। वहीं, भारत को 2.27 और चीन को 2.43 रेटिंग दी गई है। दोनों ही देश सूची में सबसे नीचे हैं।

  4. चीन के पैकेज फूड में सैचुरेटेड फैट का स्तर अधिक है। चीन के 100 ग्राम खाद्य पदार्थ में 8.5 ग्राम शुगर है जबकि भारत में यह मात्रा 7.3 ग्राम है। शोध के मुताबिक, भारत में पैकेज फूड और पेय पदार्थ अधिक ऊर्जा देने वाले हैं।

  5. शोधकर्ता एलिजाबेथ डूनफोर्ड का कहना है कि दुनियाभर के लोग ज्यादातर प्रोसेस्ड फूड खा रहे हैं जो चिंता का विषय है। सुपर मार्केट में भी ऐसे खाद्य पदार्थों की भरमार है जिनमें अधिक फैट, शक्कर और नमक है। ये हमें बीमार बना रहे हैं।



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      Indias packaged food drinks least healthy says Oxford study

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16 साल की एंजल ने गरीब बच्चों की मदद के लिए 45 किमी तक की तैराकी, जुटाए 42 लाख रुपए


लाइफस्टाइल डेस्क. गरीब बच्चों की मदद के लिए 16 वर्ष की एंजल मोरे ने 2 लाख रुपए जुटाए हैं। यह धनराशि उन्होंने पानी में 45 किमी. तक तैरने के बाद जुटाई है। एंजल अमेरिका के मैनहट्टन की रहने वाली हैं और लोगों की मदद से फंड जुटा रही हैं। उनका कहना है कि यह उनके जीवन की सबसे लंबी स्विमिंग टूर था जो काफी चुनौतीपूर्ण था।

  1. एंजल पिछले दस सालों से स्विमिंग कर रही हैं। उन्होंने मैनहट्टन में45 किलोमीटर की यात्रा 10 घंटे में पूरी की है। इस दौरान उन्होंने 20 पुलों को पार किया जो कठिन रहा। एंजल का कहना स्विमिंग के दौरान दूरी से ज्यादा गर्मी का सामना करना कठिन था।

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  2. एंजल यह रकम चिल्ड्रेन इंटरनेशनल एनजीओ को देंगी, जो गरीब बच्चों की मदद करने के लिए जाना जाता है। ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य मेगान मार्केल और प्रिंस हैरी भी इससे जुड़े हैं। एंजल की यह पहली यात्रा नहीं है इससे पहले वह 32 किलोमीटर लंबी तैराकी कर चुकी हैं। 10 साल की उम्र में किलिमंजारो चोटी पर चढ़ने वाली सबसे युवा लड़की का रिकॉर्ड भी एंजल के नाम है।

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  3. एंजल का अगला लक्ष्य ट्रिपल क्राउन ऑफ ओपन वॉटर स्विमिंग में हिस्सा लेना है जिसमें दुनिया के कुछ चुनिंदा एथलीट ही भाग लेते हैं। एंजल के मुताबिक, मेरी मां अर्चना मोरे ने हमेशा आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया है, मेरी उपलब्धियों में उनका सबसे अहम रोल है।



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      16 Year Old angel more Swims 45 kilometer Around Manhattan to Raise rs 42 lakh for Charity

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साढ़े नौ करोड़ में बिका 125 साल पुराना दुर्लभ सिक्का, दुनिया में ऐसे सिर्फ 9 नौ सिक्के


लाइफस्टाइल डेस्क. पिछले हफ्ते शिकागो में हुई नीलामी में 125 साल पुराना चांदी का सिक्का साढ़े नौ करोड़ में बिका है। इसे ऊटा के अमेरिकी बिजनेसमैन डेल लॉय ने खरीदा है। यह एक दुर्लभ सिक्का है और 1894 के दौर का है। इसका नाम बार्बर डाइम है। उस दौर में ऐसे केवल 24 सिक्के बनाए गए थे जिनमें से यह एक है।

  1. इस सिक्के की पहचान 9 जून, 1894 को अमेरिका के सेन फ्रेंसिस्को मिंट में की गई थी। यह सिक्कों की परख कर आधिकारिकतौर जानकारी जारी करने वाली संस्था है। सिक्के को चार्ल्स ई. बार्बर ने डिजाइन किया था इसलिए इसका नाम बार्बर डाइम रखा गया था। चार्ल्स ने इसके अलावा भी अमेरिका में प्रचलिए हुए कई सिक्कों को डिजाइन किया था।

  2. वर्तमान में ऐसे सिर्फ नौ सिक्के ही हैं जिनके बारे में पुख्ता तौर पर जानकारी उपलब्ध है। इसे खरीदने वाले डेल लॉय रियल साल्ट लेक के मालिक हैं। यह सिक्का कभी स्पोर्ट्स टीम के मालिक की शान-ओ-शौकत को दर्शाता था। जो पहले अमेरिका की बेसबॉल टीम लॉस एंजलिस लेकर्स के मालिक जैरी बस के पास था। 1988 में इसकी नीलामी कर दी गई थी।

  3. 2016 में ऐसे ही एक और सिक्के की नीलामी की गई थी जिसकी बोली 14 करोड़ रुपए लगी थी। हालांकि खरीदार का नाम जारी नहीं किया गया था। 1894 में सेन फ्रेंसिस्को मिंट के सुप्रीटेंडेंट लॉन डेगेट ने ऐसे तीन सिक्के अपनी बेटी हैली को दिए थे। 1950 में हैली ने उनमें से दो सिक्कों को सेन फ्रांसिस्को के कॉइन डीलर को बेच दिया था। जानकारी देते हुए बताया था कि तीसरा सिक्का उन्होंने एक आइसक्रीम खरीदने में खर्च किया था।

  4. सिक्कों का संग्रह करने वाले हेंसन के मुताबिक, उनके पास 1792 से लेकर अब तक ज्यादातर सिक्के हैं। कलेक्शन को पूरा करने के लिए उन्हें सिर्फ छह सिक्कों की जरूरत है। लेकिन कुछ सालों में हुई नीलामी में वह हिस्सा नहीं ले पाए और संग्रह अधूरा रह गया। हेंसन कहते हैं जब ऐसे किसी सिक्के की बोली करोड़ों में लगाई जाती है तो यह बेशकीमती हो जाता है। इसे हाथ में रखने का अहसास ही कुछ अलग होता है।



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      extremely rare dime minted in 1894 sold in auction in rs 948 lakh brought by Utah businessman

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कान्हा के जन्मोत्सव पर लगाएं गोपालकाला और फलाहारी गुलाब जामुन का भोग


लाइफस्टाइल डेस्क. जन्माष्टमी पर कन्हैया के मन को भाने वाले माखन मिश्री का प्रसाद बनाया जाता है। धनिया पंजीरी, मखाना पाग, सिंघाड़े की पूरी भी बनाते हैं। लेकिन इस बार कान्हा के जन्मोत्सव पर भोग को बदलाव कर सकते हैं। उन्हें गोपालकाला और फलाहारी गुलाब जामुन का भोग लगा सकते हैं। अंजु पांडे बता रही हैं इन्हें कैसे बनाएं...

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    क्या चाहिए :पोहा- 1 कप, मुरमुरे (लाई) - कप, जीरा- चम्मच, नमक- स्वादानुसार, शक्कर - 1 बड़ा चम्मच, देसी घी- 2 बड़े चम्मच, हरी मिर्च- 2 या 3, अदरक- इंच टुकड़ा, हरा धनिया- 2 बड़े चम्मच बारीक कटा हुआ, दही- 2 कप, ककड़ी- 1 बारीक कटी हुई, ताज़ा नारियल- 4 बड़े चम्मच कद्दूकस किया हुआ, अनारदाना- कप, आम का अचार छोटा चम्मच, नींबू का अचार- छोटा चम्मच।

    ऐसे बनाएं :पोहा भिगोकर 15 मिनट के लिए रखें। पोहे का पानी अच्छी तरह से निथार लें। बड़े बर्तन में भीगा हुआ पोहा, मुरमुरे, ककड़ी, दही, अनारदाना, हरा धनिया, आम व नींबू का अचार, नमक, शक्कर और नारियल का बूरा डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। इसे एक तरफ़ रख दें। अब कड़ाही में घी गर्म करें। इसमें जीरा डालकर तड़काएं। कद्दूकस किया हुआ अदरक और बारीक कटी हुई हरी मिर्च डालकर भूनें। यह तड़का तैयार पोहे के मिश्रण में मिलाएं। गोपालकाला प्रसाद तैयार है।

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    क्या चाहिए : पनीर- कप कद्दूकस किया हुआ, सिंघाड़े का आटा- 1 कप, उबला और मसला हुआ आलू- 1 कप, अदरक का पेस्ट- 1 छोटा चम्मच, हरी मिर्च 5 बारीक कटी हुई, दही- 2 कप, नमक स्वादानुसार, देसी घी या तेल- तलने के लिए, शक्कर- 1 छोटा चम्मच, भुना हुआ जीरा पाउडर- छोटा चम्मच, हरा धनिया- थोड़ा-सा, इमली की चटनी और हरी चटनी।

    ऐसे बनाएं: कद्दूकस पनीर, मसला हुआ आलू, कटी हरी मिर्च, अदरक का पेस्ट और सेंधा नमक अच्छी तरह से मिलाएं। मिश्रण के छोटे-छोटे गोले बना लें। बड़े बोल में सिंघाड़े का आटा और पानी का गाढ़ा घोल बनाएं। घोल इतना गाढ़ा रखें कि दही बड़े पर आसानी से लिपट जाए। कड़ाही में घी या तेल गर्म करें। तैयार दही बड़ों को सिंघाड़ा आटा के घोल में डुबोएं। फिर मध्यम आंच पर सुनहरा होने तक तलें। अलग बर्तन में दही, नमक और शक्कर मिलाकर अच्छी तरह से फेंटें। तैयार दही बड़े एक प्लेट में रखें। ऊपर से दही, भुना हुआ जीरा पाउडर, चटनी और कटा हुआ हरा धनिया से सजाकर परोसें।

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    क्या चाहिए: मावा- 250 ग्राम, सिंघाड़े का आटा- 4 बड़े चम्मच, काजू- 5, पिस्ता- 5, छोटी इलायची का पाउडरछोटा चम्मच, देसी घी- 4 बड़े चम्मच, शक्कर- 500 ग्राम, बेकिंग पाउडर- छोटा चम्मच, पानी- आवश्यकतानुसार।

    ऐसे बनाएं:चाशनी तैयार करने के लिए बर्तन में शक्कर और पानी उबालें। चाशनी के लिए शक्कर का एक चौथाई हिस्सा पानी होना चाहिए। शहद जैसी गाढ़ी होने तक चाशनी को पकाएं। फिर छोटी इलायची का पाउडर डालकर मिलाएं। आंच बंद करके एक तरफ़ रख दें। अब मावा को मसलकर अच्छी तरह नरम कर लें। सिंघाड़े का आटा और बेकिंग पाउडर छानकर मिला लें। इसे मावे में डालें और अच्छी तरह से मसलकर एकसार कर लें। भरावन के लिए तैयार मावे के मिश्रण से एक छोटा हिस्सा अलग कर लें। इसमें बारीक कटे हुए काजू, पिस्ता और एक बड़ा चम्मच पिसी हुई शक्कर डालकर मिलाएं। गुलाब जामुन बनाने के लिए बचे हुए मावा मिश्रण की नींबू के आकार की लोई बना लें। इसे गोल करके हथेली से दबाएं। तैयार भरावन का छोटा-सा टुकड़ा लोई पर रखें और चारों तरफ से बंद करें। अच्छी तरह से चिकना होने तक गोल करें। इसी तरह सभी गुलाब जामुन तैयार करें। धीमी आंच पर घी में सुनहरा होने तक शैलो फ्राय करें। हल्की गर्म चाशनी में इन्हें डाल दें।



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      Janmashtami 2019 Bhog Prasad Recipes: Janmashtami Sri Krishna Favourite Food Special Prasad Bhog, Gopalakala Prasad

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यात्रा के दौरान हर नुकसान की भरपाई के लिए कराएं ट्रेवल इंश्योरेंस, बेफिक्र होकर करें टूर


लाइफस्टाइल डेस्क. शहर से बाहर यात्रा कर रहे हैं तो आपकी और साथ ले जाने वाले सामान की सुरक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी सुरक्षा का इंतजाम है यात्रा बीमा। बीमा विशेषज सत्य नारायण बता रहे हैं अलग-अलग जरूरतों के मुताबिक क्यों जरूरी है यात्रा का बीमा और कैसे करें क्लेम करें।

  1. बीमा में कैशलेस मेडिकल खर्च, सामान पहुंचने में देरी, दुर्घटना, सामान या पासपोर्ट खोना, फ्लाइट रद्द होने या उसमें देरी होने पर राहत मिलती है। यात्रा के दौरान अनहोनी होने पर मेडिकल ख़र्च के लिए भी यह बीमा बहुत जरूरी है। पर यदि यात्री को पहले से कोई बीमारी हो या यात्रा से पूर्व ही बीमार हाे तो बीमा उसे कवर नहीं करता। हालांकि कई कंपनियां कुछ बीमारियां जैसे मधुमेह, ऑस्टियोपोरोसिस और अस्थमा जैसी बीमारियों को कवर करती हैं, लेकिन कैंसर, हृदय सम्बंधी रोग आदि में अमूमन कवर नहीं दिया जाता। बीमा खरीदने से पूर्व इसकी जानकारी जरूर लें।

  2. यह बीमा ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से लिया जा सकता है। विभिन्न कंपनियों के प्लान्स में से अपनी आवश्यकतानुसार और उचित कीमत में अधिक कवर देने वाले बीमे का चुनाव कर सकते हैं। ध्यान दें कि बीमा खरीदने से पूर्व कवर की पूरी जानकारी लें। देखें कि वह सिर्फ सामान खोने, फ्लाइट रद्द होने या ट्रिप रद्द होने का ही कवर दे रही है या अन्य वित्तीय सहायता भी प्रदान कर रही है, यह पहले ही सुनिश्चित करें। कुछ बीमा कंपनियां यात्रियों को जरूरत पड़ने पर वित्तीय मदद भी देती हैं। बीमा कंपनी की विश्वसनीयता जरूर परखें। मेडिकल कवर के हिस्से को ध्यान से समझें।

  3. क्लेम करने के लिए हर बीमk कंपनी में कवर क्लेम करने की अवधि अलग-अलग होती है। मसलन सार्वजनिक क्षेत्र की भारतीय जनरल इंश्योरेंस कंपनी में 15 दिन की अवधि के भीतर क्लेम दायर करना हयोता है। वहीं कुछ कंपनियों में यह 7 दिन का भी हो सकता है। साथ ही यदि सामान गुम हुआ है तो उसकी एफआईआर लगाना आवश्यक होता है।

  4. हर जरूरत का अलग बीमा होता है, जैसे-

    • घरेलू यात्रा बीमा : यह बीमा देश के अंदर घूमने वाले यात्रियों को दिया जाता है। सामान खो जाने या चोरी होने, दुर्घटना, मृत्यु, यात्रा में देरी होने जैसी स्थितियों में सहायता दी जाती है।
    • अंतरराष्ट्रीय यात्रा बीमा : यह बीमा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुविधा का लाभ देता है जैसे विदेश यात्रा के समय पासपोर्ट या अन्य जरूरी कागजात खो जाना, प्लेन हाइजैक होने या फिर यात्रा के समय किसी अनहोनी की स्थिति में विदेश में चिकित्सा के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करता है।
    • कॉर्पोरेट ट्रैवल इंश्योरेंस : कामकाज के सिलसिले में जो कर्मचारी घरेलू या विदेश यात्रा पर जाते हैं उन्हें इस बीमा के अंतर्गत कवर मिलता है।
    • छात्र यात्रा बीमा : इस बीमा के अंतर्गत उन छात्रों को लाभ मिलता है जो उच्च शिक्षा पाने के लिए विदेश जाते हैं। मेडिकल कवर और पासपोर्ट खो जाने पर भी यह बीमा मददगार साबित होता है।
    • वरिष्ठ नागरिक यात्रा बीमा: इसके तहत सामान्यत: 60 से लेकर 70 साल तक के लोग आते हैं। कंपनियों के नियमानुसार आयुवर्ग में अंतर हो सकता है। जरूरत पर मेडिकल ट्रीटमेंट और कैशलेस हॉस्पिटल की सुविधा मुहैया कराई जाती है।
    • परिवार यात्रा बीमा: इसमें देश और विदेश के भीतर यात्रा के समय पूरे परिवार का बीमा होता है। दुर्घटना, बीमारी या उड़ान रद्द होने पर इसका फायदा मिलता है।


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      why travel insurance is important and how to claim travel insurance know from insurance expert

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टेबल में बदल जाता है यह स्कूल बैग, इससे बच्चे सही पोजीशन में बैठकर पढ़ सकेंगे


गैजेट डेस्क. 6 से 14 साल के 4 करोड़ भारतीय छात्रों को स्कूलों में टेबल-कुर्सी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इसका असर उनके बॉडी पॉश्चर, स्वास्थ और परफॉर्मेंस पर पड़ रहा है। इससे निपटने के लिए भारतीय कंपनी PROSOC खास तरह का बैग डिजाइन किया है। इसे डेसकिट नाम दिया गया है। बैग के साथ फोल्डेबल स्टडी टेबल भी जोड़ी गई है।

स्टडी के बाद फोल्ड हो सकेगी टेबल
स्टडी के दौरान टेबल ओपन की जा सकती है और काम खत्म होने पर यह बैग में फोल्ड की जा सकती है। कंपनी का दावा है कि यह बच्चों का बॉडी पॉश्चर बिगड़ने और नजर कमजोर होने से बचाएगी।


500 रुपए है इसकी शुरुआती कीमत
कई कलर ऑप्शन में उपलब्ध डेसकिट का यह स्कूल बैग पूरी तरह से वॉटरप्रूफ है, साथ ही यह मजबूत और लाइटवेट भी है। इसे दो साल तक आराम से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें दिए टेबल को अलग किया जा सकता है। टेबल की ऊंचाई बच्चे के मुताबिक घटाई या बढ़ाई जा सकती है। कंपनी का उद्देश्य है कि इसके जरिए बच्चों को बेहतर जीवनशैली मिल सके। फिलहाल इसे देश के अलग-अलग प्रदेशों के 20 हजार स्कूली छात्र इस्तेमाल कर रहे हैं। इसकी शुरुआती कीमत 500 रुपए है।



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DESKIT is a backpack that can be transformed into a desk for kids in india

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196 फीट की ऊंचाई पर विकसित किया किया मंगल जैसा ग्रह, 3 दिन रहने का किराया 4.80 लाख रु.


लाइफस्टाइल डेस्क. मंगल ग्रह पर जाने की इच्छा रखने वालों के लिए हॉलीडे वेबसाइट ट्रिप एडवाइजर ने धरती पर ही कृत्रिम ग्रह तैयार किया गया है। मंगल ग्रह जैसा दिखने वाला आर्टिफिशियल प्लेनेट उत्तरी स्पेन की गुफाओं में तैयार किया गया है। कंपनी ने पर्यटकों को यहां तीन दिन और रातें बिताने का ऑफर दिया है। इसके लिए 4.80 लाख रुपए चुकाने होंगे।

  1. कृत्रिम मंगल धरती से 196 फीट की ऊंचाई पर है और यहां 1.4 किलोमीटर लंबी गुफा है। दावा है कि गुफा में बिल्कुल मंगल ग्रह जैसी स्थिति देखने को मिलेगी। यहां पहुंचने के बाद दुनिया और लोग आपकी पहुंच से दूर हो जाएंगे। इसका पहला ट्रायल हो चुका है। एजेंसी ने इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया है।

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  2. कंपनी का कहना है इस जगह पर आने के लिए पर्यटक को पहले 30 दिन के प्रोग्राम का हिस्सा बनना होगा। इसमें उन्हें तीन हफ्ते की ऑनलाइन ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके अलावा पर्यटक को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत बनाने के लिए 3 दिन की ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके बाद उन्हें 3 दिन और रातों का टूर पर जाने की अनुमति मिलेगी। पर्यटकों को खास उपकरण पहनकर ही इस कृत्रिम मंगल पर जाना होगा।

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  3. कंपनी के मुताबिक, तीन दिन का किराया करीब 4,80,000 रुपए है।आप रोमांचक यात्रा पर जाना चाहते हैं तो यह सफर यादगार साबित होगा। इसे तैयार करने वाली कंपनी एस्ट्रोलैंड के सीईओ डेविड सेबलोस का कहना है हम ट्रिप एडवाइजर के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। प्रोजेक्ट से जुड़कर काफी काफी खुश हूं क्योंकि स्पेस टेक्नोलॉजी में निवेश करना भी एक इनोवेशन की तरह है।

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      Tourists can now take a trip to MARS in Northern Spain as trip adviser and astroland devolved artificial planet

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उम्र को पीछे छोड़ जायके संग जी रहे जिंदगी, इन सीनियर सिटिजन्स ने डिजिटल तकनीक से सोच बदली


लाइफस्टाइल डेस्क. उम्र का 70वां पड़ाव यानी जीवन को वो दौर जब ज्यादातर बुजुर्ग मान लेते थे कि समय बहुत कम बचा है। लेकिन आज के बुजुर्ग की सोच बदल रही है। ये युवाओं की तरह नए प्रयोग कर रहे हैं और तकनीक से दोस्ती भी। ये डिजिटल प्लेटफाॅर्म पर पैसे भी कमा रहे हैं और शोहरत भी। ये पुराने और पारम्परिक जायकों को यूट्यूब-फेसबुक और खुद की वेबसाइट पर पोस्ट कर रहे हैं। इनके वीडियो मिलियन्स में देखे और शेयर किए जा रहे हैं। आज वर्ल्ड सीनियर सिटिजन डे है, इस मौके पर जानिए कैसे सीनियर सिटीजन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नाम, पैसा और शोहरत कमा रहे हैं और दूसरों को प्रेरित भी कर रहे हैंं…

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    65 साल के नंदलाल सोनी और रामरखी मिलकर यूट्यूब पर ‘पापा मम्मी किचन’ नाम से चैनल चला रहे हैं। इनके चार चैनल हैं और कुल सब्सक्राइबर 11 लाख 6 हजार हैं। रामरखी राजस्थानी, स्पेशल डिश और कई राज्यों के परंपरागत जायकों को वीडियो की मदद से लोगों तक पहुंचा रही हैं। नंदलाल सोनी पेशे से रोबोटिक एक्सपर्ट रहे हैं। रामरखी ने पॉलिटिकल साइंस से मास्टर किया है और चैनल के मुताबिक, वह अपनी कम्युनिटी की पहली महिला हैं जिन्होंने शिक्षा हासिल की है। नंदलाल को मिठाई बनाना पसंद है तो रामरखी को कुकिंग को कला मानती हैं। चैनल पर भी रामरखी को मम्मी और नंदलाल को पापा बताया गया है।

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    अरुमुगम तमिलनाडु से हैं और उम्र 75 साल है। इनके यूट्यूब चैनल ‘विलेज फूड फैक्टरी’ पर 32 लाख 18 हजार से अधिक सब्सक्राइबर हैं। चैनल की शुरुआत 2015 में हुई थी। अरुमुगम अपने वीडियोज में वेज और नॉनवेज दोनों की रेसिपी यूजर्स को बता रहे हैं। खाना बनाने की खास शैली लोगों को इतनी पसंद आई कि महज 4 साल में चैनल पर मौजूद वीडियोज के व्यूज का आंकड़ा 58 करोड़ पहुंच गया है।चैनल की शुरुआत करने का आइडिया इनके बेटे ए. गोपीनाथ का था, जो पेशे से एक डायरेक्टर हैं। गोपीनाथ के मुताबिक, मैं तमिल सिनेमा में करियर बनाना चाहता था लेकिन सफलता नहीं मिली तो पिता के सपने को साकार किया। पिता हमेशा से एक्टर बनना चाहते थे।

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    ग्रैंड मां शेफ के नाम से मशूहर यू-ट्यूबर शेफ कारे मस्तानम्मा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन इन्होंने हजारों बुजुर्गों को प्रेरित किया है।इनके परिजनों का कहना है, वह यादों के रूप मेंआज भी हमारे बीच में हैं। देसी तरीके से मैदान खाना बनाने के ट्रेंड की शुरुआत इन्होंने ही की थी। यू-ट्यूब पर उनकी फैन फॉलोइंग का इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके चैनल कंट्री फूड के 12.18 लाख सब्सक्राइबर हैं। सब्सक्राइबर की संख्या पिछले दो सालों में दोगुनी हुई है।मस्तानम्मा को देसी परंपरागत व्यंजनों को बेहद खास तरह से बनाने के लिए जाना जाता थ जिनका लगभग हर वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होता है। जिसे बनाने में उनका पोता लक्ष्मण और उनके दोस्त मदद करते हैं।

    मस्तानम्मा को खास तरह की बिरयानी के लिए भी जाना गया जो हैदराबाद की दम बिरयानी से काफी अलग है। इस खास तरह की बिरयानी को बांस की लकड़ी को जलाकर बनाते हैं ताकि उसके धुएं का फ्लेवर इसके स्वाद में आ सके। जो इसे खास बनाता है। मस्तानम्मा आंधप्रदेश, तेलंगाना और मुगलई डिशेज को खास तरह से बना चुकी हैं जिसे काफी पसंद किया गया है। इनकी बनाई गई डिशेज में हालांकि नॉन-वेज प्रमुखता से शामिल रहा है।

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    17 लाख सब्सक्राइबर वाले चैनल ‘वेज विलेज फूड’ को 80 साल की ग्रैनी चला रही हैं। डिजिटल से लेकर निजी जिंदगी तक में लोग उन्हें ग्रैनी ही कहते हैं। वह परंपरागत शाकाहारी डिशेज को अलग-अलग तरीके से बनाना बताती हैं। इसे चलाने में उनकी पोती मदद कर रही है। चैनल पर पंजाबी रेसिपी से लेकर मैगी नूडल्स को कई तरह से बनाने तक की रेसिपी उपलब्ध है। चैनल बनाने की शुरुआत 2014 में हुई थी और वर्तमान में इसमें मौजूद वीडियोज 28 करोड़ व्यूज का आंकड़ा पार कर चुके हैं।

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    65 साल की लक्षमम्मा अपने यू-ट्यूब चैनल ‘देसी किचन’ पर ज्यादातर नॉन-वेज डिशेज की रेसिपी बताती नजर आती हैं। इनके साथ परिवार के दूसरे लोग भी दिखते हैं। चैनल की शुरुआत 2017 में हुई थी। वर्तमान में चैनल के 4 लाख से अधिक सब्सक्राइबर हैं और वीडियो के व्यूज 7 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुके हैं।लक्षमम्मा अपनी कुछ खास रेसिपीज के लिए फेमस हैं। इनमें फिश करी, वॉटरमिलन चिकन, बैम्बू चिकन और चिकन कुलुम्बो शामिल है।

  6. हर साल 21 अगस्त को यह दिन मनाया जाता है, इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई थी। बुजुर्गों को सम्मान देने और उनसे जुड़े सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को दुनिया के सामने लाने के लिए इस दिन को सेलिब्रेट किया जाता है। 1935 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रेंक्लिन रोसवेल्ट ने सामाजिक सुरक्षा अधिनियम साइन किया था। जिसके बाद से हर साल 14 अगस्त को वर्ल्ड सीनियर सिटीजन्स डे मनाने की शुरुआत हुई थी। लेकिन 1988 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रोगन ने इस दिवस को मनाने की तारीख बदलकर 21 अगस्त कर दी थी।



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      World Senior Citizens Day 2019 personalities who left youngster behind and earing name fame money

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86 फीसदी भारतीय मानते हैं वर्कप्लेस पर झपकी लेने से कार्यक्षमता बढ़ती है


हेल्थ डेस्क. भारतीयों को नींद लेना बेहद पसंद है, हालिया सर्वे में यह बात सामने आई है। ऑनलाइन रिसर्च स्टार्टअप वेकफिट के सर्वे के मुताबिक, 86 फीसदी भारतीयों का मानना है कि कार्यस्थल पर झपकी लेने से कार्यक्षमता में इजाफा होता है। सर्वे का नाम राइट टू वर्क नैप्स रखा गया था और इसमें 1500 लोगों को शामिल किया गया था।

  1. सर्वे के मुताबिक, 70 फीसदी लोगों का मानना है ऑफिस में सोने के लिए कमरा (नैप रूम) होना है चाहिए जहां वे कुछ समय के लिए झपकी ले सकें। ऐसा न होने का सीधा असर उनकी कार्य क्षमता पर पड़ रहा है। सर्वे में सामने आया है कि 41 फीसदी लोग अधूरी नींद से जूझ रहे हैं।

  2. सर्वे में जांचा गया कि कैसे ऑफिस में काम को लेकर होने वाली बेचैनी का असर उनकी नींद पर पड़ता है। कार्यस्थल पर नींद से बचने के लिए भारतीय या तो अपना चेहरा धोते हैं या सहकर्मियों से बात करना शुरू करते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो थोड़ी देर चहलकदमी करके नींद दूर करते हैं। ऐसे मामलों में कमी लाने और कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए लोगों ने वर्कप्लेस पर नैप रूम बनाने की वकालत की है।

  3. मार्केट रिसर्च फर्म केजेटी और फिलिप्स के एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि नींद लेने के मामले में भारतीयों ने चीन, सउदी अरब के लोगों को भी पीछे छोड़ दिया है। इस सर्वे में 12 देशों के 18 और इससे अधिक उम्र के 11006 लोगों पर किया गया है। सर्वे में सामने आया कि दुनियाभर के 62 फीसदी लोगों को रात में नींद नहीं आती लेकिन भारतीय पूरी नींद लेने के मामले में भारतीय अव्वल हैं।

  4. फिलिप्स ग्लोबल स्लीप सर्वे 2019 के मुताबिक, कनाडा और सिंगापुर ऐसे देश हैं जहां नींद न आने का सबसे बड़ा कारण तनाव है। अनिद्रा की वजह लाइफस्टाइल का व्यवस्थित न होना है। सर्वे में नींद न आने के पांच कारण गिनाए गए हैं। इनमें तनाव (54 %), सोने की जगह (40 %), काम और स्कूल का शेड्यूल (37 %), एंटरटेनमेंट (36 %) और स्वास्थ्य की स्थिति (32 %) शामिल है।



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      86% of Indians feel napping at work can improve productivity say a online survey

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193 साल पहले ली गई थी दुनिया की पहली तस्वीर, खिड़की से बाहर का दृश्य किया गया था कैप्चर


लाइफस्टाइल डेस्क. एक तस्वीर लाख शब्दों के बराबर होती है लेकिन इसे यह दर्जा इतनी आसानी से नहीं मिला है। दुनिया की पहली तस्वीर 1826 में ली गई थी यानी तस्वीर 193 साल पुरानी हो चुकी है। तस्वीर एक खिड़की से ली गई थी जिसे फ्रेंच वैज्ञानिक जोसेफ नाइसफोर ने लिया था। तस्वीर को हकीकत में बनाने का श्रेय वैज्ञानिक जोसेफ नाइसफोर और लुइस डॉगेर को ही जाता है। इन्होंने डॉगोरोटाइप प्रक्रिया का आविष्कार किया था। यह फोटोग्राफी की सबसे पहली प्रक्रिया है। इस अविष्कार की घोषणा 19 अगस्त 1839 को फ्रांसीसी सरकार ने की थी। इसी याद में हर साल 19 अगस्त को वर्ल्ड फोटोग्राफी मनाते हैं।

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    1820 के करीब जोसेफ नाइसफोर और लुइस डॉगेर ने मिलकर फोटोग्राफिक प्रक्रिया डॉगोरोटाइप का आविष्कार किया। इसकी मदद से ही पहली तस्वीर 1826 में कैप्चर की गई। इसे फ्रेंच साइंटिस्ट जोसेफ नाइसफोर ने अपने घर की खिड़की से लिया था। ऑब्सक्यूरा कैमरे से तस्वीर को कैप्चर करने में 8 घंटे लगे थे। इस पूरी प्रक्रिया को नाम दिया गया था हीलियोग्राफी।

  2. हीलियोग्राफी से तैयार की जाने वाली तस्वीर में सिल्वर प्लेट का इस्तेमाल किया जाता था। इस प्लेट पर बिटुमिन ऑफ जुडिया लगाया जाता था। यह एक तरह का रसायन था। इसे लगाने के बाद तस्वीर के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता था। दोनों वैज्ञानिकों ने तस्वीर लेने की प्रक्रिया को और विकसित किया। 1832 में वैज्ञानिकों ने लैवेंडर ऑयल का इस्तेमाल किया और तस्वीर को एक दिन में तैयार करना संभव हो सका।

    डॉगोरोटाइप दुनिया की पहली फोटोग्राफिक प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल 1839 से आम लोगों ने तस्वीरों के लिए किया गया था। इसमें काफी बड़े कैमरों का इस्तेमाल किया गया। इसकी मदद से कुछ मिनटों में ही साफ तस्वीर खिंची जा सकती थी लेकिन सिर्फ ब्लैड एंड व्हाइट। यह साल फोटोग्राफी के लिहाज से सबसे अहम माना गया।

    • 5वीं शताब्दी में चीनी और ग्रीक दार्शनिकों ने प्रकाश और कैमरे के सिद्धांतों को समझाया।

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    • 1021 में वैज्ञानिक अल-हायतम ने कैमरा ऑब्सक्यूरा का आविष्कार किया। जो फोटोग्राफिक कैमरे का सबसे पुराना रूप है।
    • 1827 में पहली बार फोटोग्राफिक प्लेट और कैमरा ऑब्सक्यूरा का इस्तेमाल कर वैज्ञानिक जोसेफ ने तस्वीर खींची। जो एक खिड़की से ली गई थी, यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थी।

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    • 1838 में लुईस डॉगेर ने डॉगोरोटाइप प्रक्रिया से तस्वीर को खींचा जो पूरी तरह स्पष्ट थी। इस उपलब्धि को फ्रांस की सरकार ने 1839 में आम जनता से साझा किया।
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    • दुनिया की पहली सेल्फी अक्टूबर 1839 में ली गई थी। यह आज भी युनाइटेड स्टेट लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस प्रिंट में उपलब्ध है।
    • 1913 में कैमरों का आकार छोटा हुआ। 35 एमएम स्टिल कैमरे विकसित किए गए।
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    • 1963 में ऐसे पाेलरॉयड कैमरे बनाए गए जिनसे रंगीन तस्वीर ली जा सकती थी और मिनटों में उसे इंसान को डिलीवर भी किया जा सकता था।
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    • 1968 में पहली बार चांद से धरती की तस्वीर को कैमरे में कैप्चर किया गया।
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    स्कॉटलैंड के भौतिक शास्त्री क्लर्क मैक्सवेल ने लंबे समय रंगीन तस्वीर को तैयार करने की प्रक्रिया पर काम किया। उन्होंने 1861 में दुनिया की पहली रंगीन तस्वीर ली। यह तस्वीर एक फीते की थी, जिसमें लाल, नीला और पीला रंग था।

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    दुनिया में पहली मूवमेंट वाली तस्वीर को कैप्चर करने में 6 साल का समय लगा। इसकी शुरुआत फोटोग्राफर एडवर्ड मुएब्रिज ने 1872 में की थी। उन्होंने घोड़ों का हर मूवमेंट कैमरे में कैद करने के लिए रेसट्रैक पर 12 वायर कैमरे लगाए। 6 साल की मेहनत के बाद जमीन को छुए बगैर घोड़ों की तस्वीरों को कैद किया गया। इसे फर्स्ट मोशन पिक्चर
    भी कहा गया।

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    1906 में पहली बार रात में तस्वीर ली गई। तस्वीर हिरणों की थी जिसे कैमरे में वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर जॉर्ज शिरास ने कैप्चर किया था। जॉर्ज फ्लैशलाइट और वायर फोटोग्राफी के आविष्कारक थे। यह तस्वीर मिशिगन की वाइटफिश नदी में ली गई थी। जैसे ही जानवर मौके पर पहुंचे जॉर्ज ने रिमोट से संचालित होने वाले फ्लैशलाइट कैमरे का इस्तेमाल किया।

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    पानी में रंगीन फोटोग्राफी की शुरुआत 1926 में हुई थी। नेशनल जियोग्राफिक के फोटोग्राफर चार्ल्स मार्टिन ने 1926 में मैक्सिको में हॉगफिश की तस्वीर को कैप्चर किया था। कैमरे को एक वाटरप्रूफ केस में रखा था। पानी के अंदर रोशनी रहे इसके लिए मैग्नीशियम फ्लैश पाउडर का इस्तेमाल किया गया था। यहां से ही वाटर फोटोग्राफी की शुरुआत हुई थी।

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    नेशनल जियोग्रफिक के फोटोग्राफर स्टीव मैगकरी ने 1984 में एक ऐसी तस्वीर को कैमरे में कैद किया है जो आज भी लोगों का ध्यान आकर्षिक करती है। यह तस्वीर दिसंबर 1984 में ली गई थी और पाकिस्तान में अफगान रिफ्यूजी कैंप की है। इस अफगानी युवती की हरी आंखों ने दुनियाभर का ध्यान आकर्षित किया था।

  8. 90 का दशक फोटोग्राफी के लिहाज से बड़ा बदलाव लानेवाला साबित हुआ। इस दौर में रील वाले कैमरे अपने चरम पर थे। इन कैमरों से फोटो लेने पर कई बार स्पष्ट आने की गारंटी नहीं होती थी। लेकिन दशक के अंत तकतेजी से पॉप्युलर हुए डिजिटल कैमरे ने पूरी तस्वीर ही बदल दी। इनमें रील की जगह मेमोरी कार्ड का इस्तेमाल किया गया।अब कैमरे में कैद हुई तस्वीरों को देखा जा सकता था और क्रिएटिविटीकी भी गुंजाइश थी। धीरे-धीरे मोबाइल के कैमरे भी बदलाव के दौर से गुजरे और मोबाइल फोटोग्राफी का चलन शुरू हुआ।



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      World Photography Day History story of world first photograph take by French photographer Joseph Nicéphore Niépce

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जनहित में दिए फैसलों के कारण इनकी बेंच को लोग ‘सोशल जस्टिस बेंच’ कहते थे


लाइफस्टाइल डेस्क. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर को जानने वाले लोगों के मुताबिक वह हमेशा शांत रहने वाले और जूनियर वकीलों से सम्मान के साथ पेश आने वाले जजेस में से एक रहे हैं। हमेशा सामाजिक मुद्दों पर प्राथमिकता से सुनवाई और लोगों के हित में फैसला देने के कारण जस्टिस मदन जिस भी बेंच यानी न्यायपीठ में रहे, लोग उस न्यायपीठ को उनके नाम से बुलाने के बजाय सामाजिक न्यायपीठ (सोशल जस्टिस बेंच) कहने लगे थे।

जस्टिस लोकुर साथी वकीलों से बेहद शालीनता से पेश आते हैं, लेकिन वक्त आने पर वह सीनियर एडवोकेट्स से भी भिड़ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में वकील गोपाल शंकरनारायण की एक स्टोरी के मुताबिक आमतौर पर जजेस बड़े और सीनियर एडवोकेट्स से सीधा पंगा लेने में हिचकिचाते हैं, यह आग में हाथ डालने जैसा है। लेकिन जस्टिस लोकुर आम लोगों से जुड़े हुए मामलों में किसी से भी भिड़ जाते थे। इसका उदाहरण है 2007 में बीएमडब्ल्यू से तीन पुलिसकर्मियों समेत छह व्यक्तियों की कुचलकर जान लेने वाला मामला।

इसमें आरोपी की तरफ से पैरवी कर रहे दो सीनियर एडवोकेट आर के आनंद और आई यू खान को गलत तरीके आजमाने के कारण जस्टिस लोकुर ने चार महीने तक किसी भी अदालत में पैरवी करने पर रोक लगा दी थी। उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की पद्दवी से वंचित करने की सिफारिश भी की थी। इसी तरह 2012 में आंधप्रदेश के चीफ जस्टिस रहते हुए सीबीआई जज पी रामा राव को रिश्वत के एक मामले में तुरत-फुरत सस्पेंड कर दिया था।

मदन बी लोकुर की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में हुई। बाद में बोर्ड परीक्षा इलाहाबाद के सेंट जोसेफ्स कॉलेज में पूरी हुई। मदन बी लोकुर के पिता जस्टिस भीमजी एन. लोकुर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज रहने के साथ पूर्व युनियन लॉ सेक्रेटरी भी रह चुके हैं। मदन बी लोकुर ने 1977 में वकील के तौर पर बार एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन करवाया और दिल्ली हाई कोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। मदन बी लोकुर 1997 में सीनियर एडवोकेट बने।

साल 1998 में वह भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया चुने गए। 1999 में दिल्ली हाई कोर्ट के एडिशनल जज बने। 2010 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर पदोन्नत किया गया। उसके बाद आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और फिर 4 जून 2012 में सुप्रीम कोर्ट में जज बने। 31 दिसंबर 2018 तक वह सुप्रीम कोर्ट में रहे। ऑल इंडिया केस मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से केस का रिकॉर्ड रखने के लिए जस्टिस लोकुर ने नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (एनजेडीजे) शुरू करवाया।



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decisions made in public interest their bench was called social justice bench

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लड़कों से बॉक्सिंग करके निखारा अपना खेल


लाइफस्टाइल डेस्क. निखत जरीन भारत में फीमेल बॉक्सिंग में अपनी पहचान बनाने वाली उन गिनी चुनी खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने बेहद कम समय में लंबी छलांग लगाई है। निखत अभी सोने से कुंदन बनने की उस प्रक्रिया में हैं, जिसमें उनका खेल के प्रति पागलपन उन्हें और आगे बढ़ा रहा है। इसमें उनके पिता मोहम्मद जमील अहमद पिता के साथ-साथ गुरु की भूमिका में रहकर पूरा सपोर्ट कर रहे हैं। पिता निखत की डाइट का ख्याल रखते हैं।

निजामाबाद(तेलंगाना) में जन्मी निखत ने 13 साल की उम्र में बॉक्सिंग खेलना शुरू किया था। इससे पहले वह एथलेटिक्स में रुचि रखती थीं। वह 100 मीटर और 200 मीटर रनिंग करती थीं। शुरू में उनके मन में प्रोफेशनल बॉक्सिंग खेलने जैसे ख्याल नहीं थे। आठवीं में पढ़ने वाली निखत निजामाबाद के कलेक्टर ग्राउंड में हो रहे अरबन गेम्स खेलने गईं थीं। वहां सारे गेम्स में लड़कियां थी, लेकिन बॉक्सिंग में किसी भी महिला खिलाड़ी को ना देखकर उन्होंने अपने पिता से पूछा कि इस खेल में क्यों कोई भी लड़की नहीं है। पिता का जवाब था, ‘शायद लड़कियां मार खाने या मारपीट‌वाले खेल में आने से डरती हैं।’

बस यहीं से बचपन से जिद्दी स्वभाव की निखत को इस खेल में आने की जिद लग गई। रियल एस्टेट एजेंट पिता ने अपने काम से ध्यान हटाकर अपनी बेटी को सही ट्रेनिंग दिलवाने पर पूरा ध्यान लगाया। हैंडबॉल के कोच अनवर ने निखत के खेल के बारे में पहचाना। उन्होंने निखत के पिता को खेल के फील्ड में आगे बढ़ने की सलाह दी। उन्होंने निखत को बेसिक ट्रेनिंग दी। इसके बाद कोच शमशम ने उन्हें ट्रेनिंग दी। दो-ढाई महीने की ट्रेनिंग के बाद स्टेट में चौथे नंबर पर आ गईं। इसके बाद उन्होंने स्टेट मैडल जीता। पांच महीने की ट्रेनिंग करने के बाद वह पंजाब गईं, उस वक्त 14 साल की निखत ने अंडर 18 में अपने से 4 साल बड़े बॉक्सर्स को हराकर ब्रॉन्ज मैडल जीता। 2010 में तमिलनाडु के इरोड में आयोजित नेशनल्स में गोल्डन बेस्ट बॉक्सर का खिताब जीता। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के कोच द्रोणाचार्य अवॉर्डी आईवी राव ने उन्हें ट्रेनिंग दी।


निखत ने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया और नेशनल कैंप में ट्रेनिंग से पहले हैदराबाद के निजाम कॉलेज में ट्रेनिंग ली। यहां आमतौर पर अपोनेंट्स के रूप में, वो भी बॉक्सिंग जैसे खेल में लड़कियां नहीं होती थीं। ऐसे में निखत लड़कों के साथ ही ट्रेनिंग करतीं थी। इस दौरान उन्हें कई बार चोट भी लगी। निखती कहती हैं कि कुछ बनना है, तो मार खानी पड़ती है। वह उदाहरण सेट करना चाहती हैं, ताकि बॉक्सिंग जैसे खेल में भी लड़कियां आएं।

मैरी कॉम हैं रोल मॉडल, उनसे फाइट के लिए किया मेल
निखत जरीन मैरी कॉम को अपनी रोल मॉडल मानती हैं। मैरी कॉम पहले 48 किलोग्राम वेट कैटेगरी में खेलती थीं, लेकिन अब वह 51 किलोग्राम कैटेगरी में खेल रही हैं। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड चैंपियनशिप के सिलेक्शन ट्रायल में 36 साल की मैरी कॉम ने 23 साल की निखत से फाइट करने के इंकार कर दिया। मैरी के अनुसार सीनियर होने के नाते उन्हें ट्रायल देने की जरूरत नहीं है। हालांकि निखत ने इसके खिलाफ फेडरेशन को ईमेल लिखकर शिकायत की है।



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boxing with boys flourished my game nikhat zareen

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2 हजार साल पुराने तरीके से तैयार किया गया इत्र, इसे मिस्र की महारानी क्लियोपेट्रा लगाती थीं


लाइफस्टाइल डेस्क. वैज्ञानिकों ने 2 हजार साल पुरानी विधि से वो इत्र तैयार किया है जिसे मिस्रकी राजकुमारी क्लियोपट्रा लगाती थीं। इसे हवाई (नॉर्थ अमेरिका) के दो विश्वद्यालयों के शोधकर्ताओं ने मिलकर बनाया है। शोधकर्ताओं का कहना है यह आज के इत्र जैसा नहीं है। यह काफी गाढ़ा है औरजैतून के तेल जैसा दिखता है।

  1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसे तैयार करने में एक दशक से अधिक का समय लगा। काहिरामें हुई रिसर्च के दौरान पुरानी विधियों का अध्ययन किया गया। इत्र को इलायची, जैतून के तेल, दालचीनी और लोबान से मिलकर तैयार किया है। यह तेज खुशबू वाला इत्र है और दूसरे इत्रों के मुकाबले लंबे समय तक इसका असर रहता है।

  2. शोधकर्ता प्रो. लिटमैन का कहना है कि दो हजार साल पुरानी विधि से इत्र तैयार करना और इसे सूंघना बेहद अलग अनुभव था, जिसका इस्तेमाल कभी क्लियोपेट्रा करती थीं। शोधकर्ताओं ने इस इत्र को इजिप्ट के तेल-एल तिमाई में रखा था। वर्तमान में इसे अमेरिका के नेशनल जियोग्राफिक म्यूजियम में प्रदर्शनी के लिए रखा गया है।

  3. शोधकर्ता एटलस ऑब्सक्यूरा का कहना है कभी यह प्राचीन दुनिया का सबसे बहुमूल्य इत्र था। इस इत्र की खोज मिस्र में तीसरी शताब्दी में हुई थी। रसायनों की जांच का काम प्राचीन परफ्यूम प्रयोगशाला में किया गया था। उस दौरान इसे तैयार करने वाले विदेशों से मिट्टी मंगाते थे, जिससे इत्र को रखने के लिए बोतल तैयार की जा सके। 2012 में इसे तैयार करने वाले इंसान का घर खोजा गया था।

  4. जहां इस इत्र कीखोज हुई थी, वहां एक भट्टी थी और कुछ सोने-चांदी के जेवरात भी पाए गए। माना जा रहा है कि इत्र के बदले जेवरातों का लेन-देन किया जाता था। शोधकर्ताओं का दावा है कि इत्र को वैसा हीतैयार किया गया है, जैसा क्लियोपेट्रा इस्तेमाल करती रही होंगी। कैलिफोर्निया के परफ्यूम कारोबारी मेंडे आफटेल का कहना है कि मिस्री राजा बेहद अलग किस्म के इत्र का इस्तेमाल करते थे।



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      Scientists recreate Cleopatras PERFUME using 2000 year old recipe

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मिस इंडिया रहीं, 37 की उम्र में दोबारा पढ़ाई शुरू की, लाखों टीचर्स को दी ट्रेनिंग


लाइफस्टाइल डेस्क. 60 साल की स्वरूप रावल का अधिकांश समय बच्चों के बीच गुजरता है। वह कभी महाराष्ट्र के किसी गांव से आने वाले जनजातीय समुदाय के बच्चों को पढ़ाती हैं तो कभी सूरत-मुंबई के इलीट स्कूल के बच्चों को लाइफ स्किल एजुकेशन (एलएसई) तकनीक से टीचिंग करती हैं। स्वरूप रावल गुजरात-सूरत के कई स्कूल्स में बच्चों को पढ़ा रही हैं, तो वहीं गरीब बस्तियों में जाकर सुविधाओं से दूर जरूरमंद बच्चों को भी एजुकेशन दे रही हैं। वह पारंपरिक शिक्षा पद्धतियों से अलग पढ़ाने में नाटक, गीत, संगीत, चित्रकला,
समूह चर्चा जैसी तकनीकों का सहारा लेती हैं। वह सैटेलाइट से गुजरात के ढाई लाख प्राइमरी स्कूल टीचर्स को ट्रेनिंग दे चुकी हैं। फिलहाल वह महाराष्ट्र के 5.5 लाख गवर्नमेंट टीचर्स को ट्रेनिंग दे रही हैं।


स्वरूप रावल ने सोचा नहीं था कि वे कभी टीचर बनेंगी। स्वरूप के पिता बचु संपत गुजराती थिएटर आर्टिस्ट थे। मां सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट थीं। स्वरूप पिता की ही तरह गुजराती थिएटर करती थीं। 1979 में वह मिस इंडिया बनीं। इसके बाद मॉडलिंग और एक्टिंग शुरू कर दी, लेकिन असल पहचान 1984 में शुरू हुए टीवी सीरियल ‘ये जो है ज़िंदगी’ से मिली। इसके बाद ‘शांति’ जैसे टीवी सीरियल में एक्टिंग की। कुछ और सीरियल्स के अलावा स्वरूप अब तक लगभग एक दर्जन फिल्मों में अभिनय कर चुकी हैं।

स्वरूप की 1987 में अभिनेता परेश रावल से शादी हुई। दोनों एक-दूसरे को 17 साल से डेट कर रहे थे। शादी के बाद जब बच्चेहुए, तो 37 साल की स्वरूप ने दोबारा पढ़ने का मन बनाया। वह कॉलेज ड्रॉपआउट थीं। 2010 में उन्होंने अन्नामलाई यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में पोस्ट ग्रैजुएशन किया। इसके बाद इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ वॉर्सेस्टर जाकर एजुकेशन में अपनी पीएचडी पूरी की। स्वरूप की थीसिस का विषय "बच्चों में ड्रामा के माध्यम से लाइफ स्किल्स बढ़ाना...' था।

स्वरूप को टीचिंग में आने की प्रेणा उनके बच्चों को देखकर मिली। उन्होंने यह बात नोटिस की कि उनके दो बेटे अनिरुद्ध और आदित्य स्कूल से आते, तो वे स्ट्रैस में होते। बकौल स्वरूप, स्कूल के सिलेबस या एजुकेशन बोर्ड में कोई गलती नहीं थी, लेकिन जिस तरह से टीचिंग करवाई जा रही है, वह चिंताजनक थी। बच्चों को उस नन्ही उम्र में तनावग्रस्त देखकर स्वरूप ने टीचिंग करने का निश्चय किया। उनके मन में पढ़ाई के तरीके बदलने का विचार आया।



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she was miss india again started study at the age of 37 trained millions of teachers

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3.3 किलो वजनी दुनिया का सबसे बड़ा अफ्रीकन मेंढक गोलियथ, रहने के लिए अपना तालाब खुद बनाता है


लाइफस्टाइल डेस्क. एक शोध में दुनिया के सबसे बड़े मेंढक गोलियथ के बारे में नई बात सामने आई है। ये अपने रहने के लिए तालाब का निर्माण खुद ही करते हैं। जर्नल ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के मुताबिक, यह अफ्रीकन प्रजाति का मेंढक है और तालाब में निर्माण करना इसके व्यवहार में है।

  1. नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, बर्लिन के शोधकर्ता मार्विन शेफर ने इसका व्यवहार जानने के लिए प्रयोग किया। जंगल में टाइमलैप्स कैमरे लगाए और इसे मिट्टी वाली जगह पर छोड़ दिया गया। वीडियो में इसकी पुष्टि भी हुई। इसके मुताबिक, ये तालाब बना सकें इसलिए कभी-कभी 2 किलो से अधिक वजन वाले पत्थरों को भी हटाते हैं।

  2. मेंढक का वजन 3.3 किलो है और लंबाई 34 सेंटीमीटर है। इसमें पैरों को शामिल नहीं किया गया है। शोधकर्ता मार्विन शेफ के मुताबिक, विशाल होने के साथ ये अपने बच्चों की देखभाल भी खास तरीके से करते हैं। ये अपने अंडों की सुरक्षा के लिए सुरक्षित जगह खोजने के बाद वहां तालाब का निर्माण करते हैं। जहां इनके बच्चे पानी में रहते हैं वहां ये पानी में झाग पैदा करते हैं ताकि इन्हें कोई जानवर नुकसान न पहुंचा सके।

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  3. गोलियथ खुदाई और चट्टानों के बीच अपना घर बनाने में सक्षम हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीकी बुलफ्रॉग इससे कुछ हद तक समान है, जैसे वह एक तालाब को दूसरे तालाब से जोड़ता है ताकि वह सूखने से बच जाए। गोलियथ प्रजाति के मेंढकों का व्यवहार दूसरे मेंढकों से अलग है। यह पूरी तरह वर्षा और तेज बहनेवाली धाराओं पर निर्भर रहते हैं। दूसरे मेंढक की तरह वोकल सैक से नहीं बल्कि गोलियथ अपने मुंह को खोलकर सीटी बजाते हैं।

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  4. मेंढक की यह प्रजाति आमतौर पर कैमरून और इक्वेटोरियल गिनीमें पाए जाते हैं। दक्षिण अफ्रीका की एम्पुला नदी के किनारे इनकी संख्या ज्यादा है। शोधकर्ताओं ने इसकी 22 ब्रीडिंग साइट ढूंढी हैं। इनमें से 14 जगहों पर 3 हजार अंडे मिले हैं। शोधकर्ताओं ने पाया उन जगहों पर बेहद सफाई से छोटे पत्थरों को अलग हटाकर तालाब बनाया गया था। हालांकि शोधकर्ता इन्हें देखकर नर और मादा में फर्क बता पाने में असमर्थ रहे हैं।



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      scientist reveals Worlds Largest Frogs Are So Big They Build Their Own Ponds

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चाय के बागान और मसालों के पेड़ से सजा है मुन्नार, मन को तरोताजा कर देती हैं यहां की वादियां और खुशबू


लाइफस्टाइल डेस्क. मानसून में मुन्नार की वादियों में घुली चाय और मसालों की खुशबू मन को मोह लेती है। यह मन को सुकून देने के साथ तरोताजा कर देता है। फ्रिक्वेंट ट्रेवलर डॉ. अतुल नाहर मुन्नार की खूबसूरती देखने पहुंचे। जानिए उनको कैसा लगा मुन्नार…

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    रोज की आपाधापी की जिंदगी से समय निकालकर हम निकल पड़े बेंगलुरु से कोच्चि और मुन्नार की यात्रा पर। दरअसल पर्यटन मन को सुकून देता है। इससे मन-मस्तिष्क तरोताजा हो जाता है और नया कार्य करने की प्रेरणा भी मिलती है। अपनी यात्रा के दौरान हमें यही महसूस हुआ।

    हम कोच्चि एयरपोर्ट पर उतरे। वहां से टैक्सी द्वारा मुन्नार पहुंचे। सुबह की पहली किरण जब पड़ी तो ऐसा लगा मानो ये किरणें हमारा स्वागत कर रही हों। जैसे ही हम मुन्नार पहुंचे मुंह से सिर्फ यही शब्द निकला, वाह...। हमने वहां कोको पाउडर के पेड़ देखे। जगह-जगह चॉकलेट की दुकानें देखीं। काली मिर्ची लौंग- इलाइची एवं काजू के पेड़ देखे। मुन्नार में जगह-जगह मसालों की दुकानें काफी हैं। यहां के लोग भी शांतिप्रिय और मेहनती हैं। यहां जाएं तो जगह-जगह आपको नारियल के पेड़ देखने को मिलेंगे।

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    हमने वहां का रोज गार्डन भी देखा। यहां मौजूद गुलाब के फूलों की अलग-अलग प्रजाति अचंभित करने वाली थी। बड़े ही खूबसूरत खिले हुए गुलाब मन को सुकून दे रहे थे। रोज गार्डन आते ही हमारी थकावट दूर हो गई। गुलाब के साथ ही विभिन्न प्रकार के पौधे देखकर मन प्रफुल्लित हो रहा था।

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    यह मुन्नार शहर से करीब 3 किमी दूर 16 एकड़ से अधिक दायरे में फैला है। यह एक शांतिपूर्ण स्थान है। यहां आते ही शांति का अहसास होता है। यहां स्थित रंग-बिरंगे फूल और हरी-भरी पहाड़ियां पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। साइकिल चलाना, रोलर स्कैटिंग जैसी गतिविधियां रोमांचकारी होती हैं। इको पॉइंट मुन्नार से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। चिल्लाकर अपनी आवाज को दोबारा सुनना यहां आने वाले पर्यटकों को अचंभित करता है। ये जगह बेहद खूबसूरत है जो किसी का भी मन मोह सकती है।

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    हमने मुन्नार का चाय बागान भी देखा, जो करीब 100 साल पुराना है। एशिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक क्षेत्रों में से एक है यह जगह। यहां चाय की पत्तियों को तोड़कर प्रोसेस किया जाता है। इसके बाद इसकी कीमत 2 हजार रुपए प्रति किलो हो जाती है। यह चाय निर्यात कर दी जाती है, जो कि दवा बनाने के काम भी आती है। इस चाय के सेवन से बॉडी में स्थित फैट्स बर्न होते हैं। 1880 में मुन्नार में चाय उत्पादन की शुरुआत से जुड़ी निशानियां जैसे दुर्लभ कलाकृतियां, चित्र और मशीनें यहां स्थित चाय संग्रहालय में रखी गई हैं। यहां कई ऐतिहासिक तस्वीरें भी लगी हुई हैं। इसके पास ही स्थित टी प्रोसेसिंग ईकाई में चाय बनने की पूरी प्रक्रिया को करीब से देखा व समझा जा सकता है।

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    कुंडला झील पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक छोटे से आकार के बांध के एक कृत्रिम जलाशय है। यह मुन्नार से करीब 27 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां शिकारा नाव की सवारी का मजा ही कुछ और है। इसके बाद हम टैक्सी द्वारा एलेप्पी पहुंचे। सबसे पहले वैम्बनाड झील को देखा। ये भारत की सबसे लंबी और केरल की सबसे बड़ी झील है। यह झील 2000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है और 96.5 किलोमीटर लंबी व 14 किलोमीटर चौड़ी झील है।

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    एलेप्पी जिला, एर्नाकुलम जिला एवं कोट्‌टयम जिला वैम्बनाड झील की बॉर्डर है। इस झील की खासियत है कि इसके एक हिस्से में समुद्र का बैक वाॅटर है और दूसरे हिस्से में साफ पानी, जो नदियों से आता है। इस झील में अथिणकौरिल, मणि माला, मिनाचिल, पेरियार सहित 10 नदियों का पानी आकर मिलता है। बैक वाॅटर पर्यटन का अपना ही मजा है। यहां 1000 बोट हैं। इसे पूर्व का वेनिस भी कहते हैं, क्योंकि इसमें कैनल्स का नेटवर्क है। इसमें स्नेक बोट रेस हर साल आयोजित की जाती है। यह झील अपने सौंदर्य से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। हमने यहां के स्ट्रीट फूड में मिर्चीबड़ा और केले व अदरक के जूस का आनंद लिया।



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      enjoy fragrance of tea and spices of munnar a monsoon travel destination places to visit munnar

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लक्ष्य पूरा न करने पर कंपनी ने कर्मियों को किया प्रताड़ित, जिंदा मछली और मुर्गे का रक्त पीने को किया मजबूर


लाइफस्टाइल डेस्क. चीन की एक कंपनी ने बिक्री का लक्ष्य पूरा न करने पर कर्मचारियों को जबरदस्ती जिंदा मछली और मुर्गे का रक्त पीने की सजा दी है। कंपनी अपने कर्मचारियों को ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है। हाल ही में इसका एक वीडियो वायरल हुआ, जिसके बाद मामला सुर्खियों में आया।

  1. कर्मचारियों को प्रताड़ित करने का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें एक आदमी दर्जनभर कर्मियों को बाल्टी से मछलियां निकालकर खाने के निर्देश दे रहा है। कंपनी के एक प्रतिनिधि ने चीनी अखबार को बताया कि यह घटना 4 अगस्त की है। इसमें 20 कर्मचारी शामिल थे जो निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहे थे।

  2. कंपनी के अधिकारी का कहना है कि कर्मचारियों को भविष्य में बेहतर करने के लिए प्रेरणा के रूप में जीवित मछली खाने और मुर्गे कारक्त पीने के लिए प्रेरित किया था। कंपनी के एक अन्य प्रवक्ता ने यह बात स्वीकारते हुए दावा किया है कि यह घटना हुई थी लेकिन कर्मचारियों ने अपनी इच्छा से इसमें भाग लिया था।

  3. वीडियो वायरल होने के बाद कर्मचारियों ने भी इस बात की पुष्टि भी की है। स्थानीय श्रम विभाग का कहना है कि मामला सामने आने के बाद जांच शुरू कर दी गई है। चीन में ऐसे मामले पहले भी सामने आ चुके हैं जब कंपनी के उच्च अधिकारी कर्मचारियों को लक्ष्य पूरा हासिल कर पाने पर सख्त सजा देते हैं।

  4. इस मामले में भले की कंपनी के उच्च अधिकारियों पर कार्रवाई न की गई हो लेकिन सोशल मीडिया पर यूजर इसकी आलोचना और सख्ती कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यूजर ऐसी घटनाओं को रोकने की मांग कर रहे है। चीनी सोशल मीडिया वीबो पर एक यूजर का कहना है कि सेल्स का टार्गेट पूरा न होने पर ऐसी सजा के मामले सामने आना यहां सामान्य सी बात है लेकिन उच्च अधिकारी ऐसा कैसे कर लेते हैं।



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      chinese company Guizhou construction forces employees to eat live fish and drink chiken blood for Failing to Meet Goals

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नशे में ऑफिस पहुंचे तो चेहरा देखकर सॉफ्टवेयर कर लेगा पहचान, एचआर को भेजेगा अलर्ट


लाइफस्टाइल डेस्क. अब जल्द ही अल्कोहल लेने वालों को ऑफिस में एंट्री नहीं मिलेगी। चेन्नई की रैमको कंपनी ने ऐसा फेशियल रिकग्निशन अटेंडेंस सिस्टम तैयार किया है जो सांसों की गति को पढ़कर बता देगा कि आप कितने नशे में हैं। फेशियल रिकग्निशन अटेंडेंस सिस्टम में ब्रीथ एनालाइजर का प्रयोग किया गया है। जो कर्मचारी के चेहरे और सांसों का विष्लेषण करेगा और नशे में होने पर जानकारी कंपनी के एचआर को जानकारी भेजेगा।

  1. कंपनी का दावा है कि ब्रीथ एनालाइजर 100 प्रतिशत सही जवाब देने में सक्षम है। इस तकनीक से ऑफिस में नशा करने वालों की पहचान आसानी से होगी और वर्कप्लेस में बेहतर माहौल बनेगा। कंपनी के सीईओ, विरेंदर अग्रवाल का कहना है कि वह ऐसा सॉफ्टवेयर बनाने पर भी काम कर रहे हैं जो नशे के साथ ड्रग लेने वाले लोगों को भी पकड़ सकेगा क्योंकि भारत में ड्रग्स लेने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

  2. भारत में भी ऐेसे मामले कई बार सामने आ चुके हैं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, डीजीसीए ने एक सवाल के जवाब में बताया है कि 2015 में 171 पायलटों ने विमान उड़ाने से पहले नशा किया था। इनमें कुछ अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट भी थीं। जून में दिल्ली जल निगम के एक कर्मचारी का अल्कोहल लेते हुए वीडियो वायरल हुआ था, जिसके बाद उसे सस्पेंड किया गया था।

  3. जर्मनी में हुई एक रिसर्च में सामने आया था कि भारत में 2010-2017 के बीच अल्कोहल लेने वालों की संख्या 38% बढ़ गई है। जिसका बुरा असर ऑफिस में काम करने वालों और माहौल पर पड़ रहा है। यह ऑफिसकर्मियों की सुरक्षा पर भी सवाल उठा रहा है। कंपनी का कहना है कि समय पर जानकारी देकर यह सॉफ्टवेयर शराब सेवन के कारण होने वाली बड़ी दुर्घटना को रोकने में सक्षम है।



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      Chennais company designed a facial recognition that comes with a breath analyser

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यात्रा के दौरान ऐसे करें मलेरिया से बचाव


बीमारी आने का कोई निश्चित समय नहीं होता। लेकिन जब आप घर पर होते है तो आपके लिए बीमारी की जटिलता पर काबू पाना आसान होता है। पर कभी-कभी यात्रा के दौरान आपका सामना बीमारी से भी हो जाता है। ऐसे में इन बीमारियों से लड़ना और भी जरूरी हो जाता है जिससे आप जल्द से जल्द बीमारी से मुक्त हो सके और अपनी यात्रा का मजा ले सके। मलेरिया जैसी बीमारी यदि सफर के दौरान हो जाए तो मलेरिया संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है। यात्रा के दौरान जाने से पहले कुछ ऐसी तैयारी करनी जरूरी होती है जिससे मलेरिया जैसी बीमारियों से मुक्त रहा जा सकें।

आइए जानें यात्रा में मलेरिया से बचाव कैसे किया जाए :

  • यात्रा पर जाने से पहले सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि जहां जा रहे हैं क्या वो जगह सुरक्षित है। वहां किसी तरह से जान-माल की हानि या महामारी का प्रकोप तो नहीं।
  • आप जहां यात्रा करने जा रहे है यदि आपको पता है वहां मलेरिया, डेंगू या चिकनगुनिया का प्रकोप है तो ऐसी जगह जाने से बचे। अगर ये संभव न हो तो अपने साथ कुछ जरूरी सामान जैसे मॉसकीटो मशीन, कुछ दवाईयां और नींबू, शहद इत्यादि रखें।
  • यात्रा के दौरान मलेरिया संक्रमण होने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह ले।
  • संभव हो तो यात्रा कैंसिल कर किसी सुरक्षित स्थान पर ठहरें। अन्यथा मलेरिया का जल्द से जल्दी उपचार करवाएं। रक्त जांच करवाएं।
  • अपने साथ मच्छर निरोधी नेट साथ लेकर जाएं। मच्छरों के काटने से बचें।
  • मलेरिया प्रभावित क्षेत्र में जाने से पहले अपने आपको मानसिक रूप से तैयार कर लें और जरूरत पड़ने पर आपके पास उसके क्या उपाय है इसे पहले से ही सुनिश्चित कर लें।
  • अपने साथ कुछ हेल्दी खुराक भी रखें साथ ही मलेरिया से संबंधित बीमारी के बारे में पूरी जानकारी रखें ताकि आपातकाल में सही कदम उठाया जा सकें।
  • संभव हो तो मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में जाने से पहले मलेरिया निरोधी टीका लगवा लें जिससे संक्रमित मच्छर के काटने से आप पर गंभीर असर न पड़े।


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This is how to prevent malaria during travel

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22 साल की पांग सिम 18 सेकंड में याद कर लेती हैं 5000 अंक और ताश की पूरी गड्डी का ऑर्डर


प्योंगयांग. दुनिया में उत्तर कोरिया की चर्चा तानाशाह किम जोंग उन और उनके परमाणु-मिसाइल परीक्षणों के चलते ज्यादा होती है। लेकिन यहां के लोगों के पास खुद के देश पर गर्व करने के और भी चीजें हैं। याददाश्त (मेमोरी) के मामले में उत्तर कोरियाई किसी से कम नहीं। यहां की 22 साल की पांग उन सिम महज 18 सेकंड में 5 हजार से ज्यादा अंक याद कर लेती हैं। इतना ही नहीं वे एक मिनट से कम वक्त में ताश की पूरी गड्डी (52 पत्ते) का पूरा ऑर्डर याद कर उसे दोबारा से जमा लेती हैं।

  1. पिछले साल दिसंबर में उत्तर कोरिया पहली बार वर्ल्ड मेमोरी चैम्पियनशिप में शामिल हुआ। इसमें पांग ने ही देश का प्रतिनिधित्व किया। कोरियाई टीम ने 7 स्वर्ण, 7 रजत और 5 कांस्य पदक अपने नाम किए। पांग कहती हैं- यह आसान नहीं होता। लेकिन जब आप तयशुदा वक्त में बेहतर कोशिश करने लगते हैं तो चीजों याद रहने लगती हैं। यह उतना भी कठिन नहीं है जितना लोग इसे समझते हैं। अगर आप इसमें आनंद लेंगे, तो काफी सरल है।

  2. चैम्पियनशिप में पांग ओवरऑल दूसरे स्थान पर रहीं। उन्होंने 5187 बाइनरी नंबरों और 1772 कार्ड्स को एक घंटे में जमा दिया। पांग प्लेइंग कार्ड्स की एक गड्डी को उसी ऑर्डर में 17.67 सेकंड में जमाने का रिकॉर्ड है। पांग की टीममेट री सोंग मी ओवरऑल 7वें स्थान पर रहीं। उन्होंने 15 सेकंड में 302 शब्द रिकॉल किए।

  3. चैम्पियनशिप के एक इवेंट में 60 मिनट में ज्यादा से ज्यादा शब्द याद करने को दिए जाते हैं। इसमें टॉप 5 खिलाड़ियों में से तीन उत्तर कोरिया के थे। इनमें से 2 ने वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा, पांग ने 3240 अंक स्कोर किए।

  4. आयोजकों को अंतिम मिनट तक उम्मीद नहीं थी कि उत्तर कोरियाई टीम प्रतियोगिता में हिस्सा ले पाएगी। चैम्पियनशिप के एक संस्थापक टोनी बुजान कहते हैं- रजिस्ट्रेशन खत्म होने वाला था, उनकी टीम ने अंतिम पलों में आकर अपना नाम दर्ज कराया। चैम्पियनशिप के खत्म होने के दौरान चौंकने की बारी हमारी थी। 10 इवेंट में उत्तर कोरियाई खिलाड़ी टॉप 3 में रहे।

  5. उत्तर कोरियाई टीम के कोच चा योंग हो के मुताबिक- याददाश्त की तकनीकें बच्चों को मिडिल स्कूल से सिखाई जाती हैं। चीजों को याद रखने के लिए हम फीलिंग (भावनाएं), टेस्ट (स्वाद), मूवमेंट (गति), इमेजिनेशन (कल्पना), राइम्स (श्लोक) समेत उन सभी चीजों की मदद लेते हैं, जो हमारे दिमाग में है।



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      वर्ल्ड मेमोरी चैम्पियनशिप में पांग उन सिम ओवरऑल दूसरे स्थान पर रहीं।

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पड़ोसियों को खुश करने के लिए दीवारों पर स्माइली और इमाेजी बनवाईं, यही झगड़े की वजह बनीं


हैप्पी लाइफ डेस्क. पड़ोसियों को खुश करने के लिए घर की दीवारों पर स्माइली और इमाेजी बनवाना एक महिला के लिए विवाद की वजह बन गया है। मामला कैलिफोर्निया का है। दो मंजिला घर की मालकिन कैथरीन कीड का कहना है मैंने घर को काफी रंग-बिरंगा तैयार कराया है, ताकि डिप्रेशन के माहौल में भी पड़ोसी खुश रह सकें। मेरा इरादा उनको परेशान करना नहीं था।

  1. कैथरीन ने बताया कि मैंने दो मंजिला घर को गुलाबी रंग से रंगवाया और दीवारों पर अलग-अलग तरह की स्माइली पेंट करवाईं। इसकी कई वजह हैं। मेरे पड़ोसी हमेशा दुखी और थके दिखाई देते हैं, दूसरों के मामले में ताकझांक करते हैं। वे ऐसा न करें और खुश दिखें, इसलिए मैंने मकान को डेकोरेट कराया है,लेकिन पड़ोसीको यह नागवार गुजरा है।

  2. पड़ोसन सुसेन विलैंड कैथरीन की बातों से सहमत नहीं हैं। कुछ समय पहले सुसेन और कैथरीन के बीच विवाद भी हुआ था। सुसेन का मानना है कि कैथरीन ने मुझे चिढ़ाने के लिए ऐसा किया है। मकान पर लगाई गईं इमोजी बेहत अतिशयोक्तिपूर्व हैं। इसके मायने नकारात्मक है। एक इमोजी मुंह पर लगाम लगाने का इशारा कर रही है, तो दूसरे मजाक उड़ाने का।

  3. पड़ोसन सुसेन के मुताबिक, कैथरीन का घर सामने होने के कारण मुझे यह पसंद नहीं आ रहा है। जब से मैंने घर पर बनी स्माइली को देखा है उसके बाद से मैंने अपने घर के परदे तक नहीं हटाए। इमोजी से होने वाले विवाद का यह अनोखा मामला नहीं है। इससे पहले भी सोशल मीडिया पर टेलर स्विफ्ट और किम कर्दाशियां का इमोजी को लेकर विवाद हो चुका है।



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      The house painted with spiteful smileys and other emoji rows in america

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46% भारतीय लाइफस्टाइल बेहतर बनाने के लिए कर्ज लेने तैयार,ज्यादातर लोग की राय सकारात्मक


लाइफस्टाइल डेस्क. करीब आधे भारतीय (46%) पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने और लाइफ स्टाइल को बेहतर बनाने के लिए लोन लेना चाहते हैं। यह जानकारी कंज्यूमर फाइनेंस प्रोवाइडर होम क्रेडिट इंडिया के ताजा सर्वे से सामने आई है। सर्वे देश के 12 शहरों में 2,571 लोगों के साथ बातचीत कर तैयार किया गया है। इसमें लोगों से सेविंग, खर्च और कर्ज लेने के पैटर्न के बारे में सवाल किए गए।

  1. सर्वे के मुताबिक एक तिहाई भारतीय मोबाइल फोन, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल खरीदने लोन लेने को तैयार हैं। 23.3% लोग दो पहिया वाहन और 20.3% लोग निजी खर्च के लिए लोन चाहते हैं। कार लोन की इच्छा 12.5% लोगों ने जताई। 12% लोग होम लोन और 10.5% लोग गोल्ड लोन लेना चाहते हैं।

  2. भविष्य के बारे में पूछे जाने पर 33% भारतीयों ने कंज्यूमर ड्यूरेबल्स लोन, 28% पर्सनल लोन और 22.8% दो पहिया वाहन लोन लेना चाहते हैं। कृषि लोन (0.7%), क्रेडिट कार्ड ईएमआई (1.1%) ट्रैवल लोन (1.5%) और मेडिकल लोन (3.7%) सबसे कम रैंक वाली कैटेगरी के लोन हैं। सर्वे में कहा गया है कि देश में आमतौर पर लोन के बारे में राय सकारात्मक है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे नकारात्मक नजरिए से देखते हैं और कभी लोन नहीं लेते हैं।

  3. सर्वे में भाग लेने वाले 34% लोगों ने कहा है कि वे लोन लेने के लिए दोस्तों की सलाह को महत्व देते हैं। वहीं, 31.8% लोग परिवार के सदस्यों और 25.4% लोग दफ्तर के साथियों से पूछ कर लोन तय करते हैं। परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिए लोन लेने की इच्छा सबसे ज्यादा पटना (61%) के लोगों ने दिखाई। इसके बाद लखनऊ (58%), नागपुर (56%), जयपुर (54%) का नंबर आता है।



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      46 percent indian to take loan to make lifestyle better says home credit survey

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कीटनाशक का बढ़ता इस्तेमाल मधुमक्खियों के लिए बन रहा जहर, घटी संख्या


साइंस डेस्क. खेती में बढ़ता रसायनों का प्रयोग मधुमक्खियों के लिएजहर का काम कर रहा है। हालिया रिसर्च में इसका खुलासा हुआ है। अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि कीटनाशक में मौजूद नियोनिकोटिनोयड्स मधुमक्खियों के लिए विषैला साबित हो रहा और उनकी संख्या घटा रहा है। इसकी शुरुआत 2004 से हुई थी।

ऐसे कीटनाशक के छिड़काव के बाद पौधे में निकले फूलों से जब मधुमक्खी परागण करती हैं तो यह उसमें पहुंच जाता है और जानलेवा हो जाता है। इनकी संख्या घटने से फसल उत्पादन गिरेगा और किसानों के लिए आर्थिक संकट पैदा होगा।

  1. पीएलओएस जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, पिछले दो दशक में कीटनाशकों का इस्तेमाल 48 गुना तक बढ़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि पहले कीटनाशकों में ऑर्गेनोफॉस्फेट का इस्तेमाल किया जाता था जिसका असर अन्य कीटनाशकों की तुलना में लंबे समय तक रहता था। लेकिन वर्तमान में सस्ता होने के कारण नियोनिकोनॉयड्स का इस्तेमाल खेती में बढ़ गया है।

  2. वर्तमान में ऐसे बीज भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं जिन पर पहले से ही कीटनाशक रसायनों की पर्त चढ़ी होती है। जब ये पौधे बनते हैं तो इनकेहर हिस्से में ये रसायन मौजूद होते हैं पराग में भी। जिसका इस्तेमाल मधुमक्खी परागण के दौरान करती है।

  3. चीन में हुई एक रिसर्च में भी ऐसे कीटनाशकों से मधुमक्खियों की मौत की बात सामने आई है। चीन में एडजुवेनट्स नाम का रसायन कीटनाशकों में डाला जाता है जिसके कारण मधुमक्खियों की बड़े पैमाने पर मौत हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, नियोनिकोटिनोयड्स कीटों के लिए बेहद जहरीला रसायन है। जो कुछ क्षेत्रों में इनकी संख्या 90 फीसदी तक घटा रहा है।



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      american researcher says Commonly used pesticides have turned honey bees habitats into a toxic world

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कृत्रिम जीभ बताएगी अल्कोहल में कितनी मिलावट, 99% सटीक नतीजे का दावा


साइंस डेस्क. स्कॉटलैंड के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी कृत्रिम जीभ बनाई है, जिसका इस्तेमाल अल्कोहल में मिलावट का पता लगाने में किया जाएगा। यह इंसान की जीभ की तरह काम करती है इसमें भी कई टेस्ट बड्स हैं जो अलग-अलग तरह के स्वाद को पहचानने में समर्थ हैं। इसे ग्लासगो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। शोधकर्ताओं का दावा है कि ब्लैक कॉफी में क्या है ,यहइंसानी जीभ नहीं बता सकती,लेकिनकृत्रिम जीभ इसकी भी जानकारी देने में सक्षम है।

  1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसे कृत्रिम जीभ इसलिए कहा गया है कि क्योंकि यह पूरी तरह से मनुष्य की जीभ की तरह है, लेकिन इसे प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। यह स्वाद के बारे में ज्यादा और सटीक जानकारी देती है। यह नकली और असली व्हिस्की में अंतर बताने में समर्थ है। रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, कृत्रिम जीभ की शुरुआत एक जांच करने वाली डिवाइस के तौर पर की गई थी और प्रयोग स्कॉच व्हिस्की पर हुआ था।

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  2. शोधकर्ताओं के मुताबिक, जब कृत्रिम जीभ पर प्रकाश डाला जाता है तो इसमें लगी नैनोस्केल मेटल इसे अवशोषित करती हैं और अलग-अलग तरह की व्हिस्की के बारे में 99%तक सटीक जानकारी देती हैं। यह 12, 15 और 18 साल पुरानी व्हिस्की के बीच अंतर बताने में भी समर्थ हैं।

  3. शोधकर्ता एल्सडेयरक्लार्क का कहना है- इस जीभ में दो तरह नैनोस्केल मेटल लगाए गए हैं जो टेस्टबड्स की तरह काम करते हैं। ये सोने और एल्युमिनियम से तैयार किए गए हैं। नैनोस्केल मेटल इंसान की टेस्टबड्स से 500 गुना ज्यादा छोटे हैं,जो स्वाद की तेज और सटीक जानकारी देते हैं।

  4. क्लार्क के मुताबिक- हमने इसकी जांच के लिए व्हिस्की का इस्तेमाल किया ताकि भविष्य में इसका इस्तेमाल खाने-पीने की चीजों की जांच करने और क्वालिटी कंट्रोल में किया जा सकेगा। इसके साथ खाने को दाेबारा इस्तेमाल करने पर भी इसकी जांच कृत्रिम जीभ से की जा सकेगी।



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      Glasgow university scientist developed Artificial tongue can spot a fake whisky

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शिकायत यूं करें कि सुनी जाए,साफतौर पर अपनी बात रखें लेकिन सवालों का तांता न लगाएं


लाइफस्टाइल डेस्क. पत्नियों की अक्सर शिकायत होती है कि पति उन्हें पर्याप्त वक्त नहीं देते। वहीं पति ये कहते मिल जाते हैं कि पत्नियां अधिक खर्च करती हैं। ये शिकायतें मामूली हैं पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कहना और समझना दोनों जरूरी हैं, ताकि रिश्ता हरा रहे। ऐसी कई शिकायतें या बातें हैं जो मन के भीतर किसी कोने में सालों-साल चलती रहती हैं पर कभी कहने का अवसर नहीं मिलता, तो कभी लगता। रिश्तों में शिकायतें होना आम हैं। खासतौर पर यदि रिश्ता जीवनभर का है तो यह सब और भी सामान्य है। पर शिकायत की नियति तो उसके दूर किए जाने में है। पहले यह प्रयास हो कि शिकायत सुनी जाए, जानिए तरीके।

  1. कुछ बुरा लगा हो और कह पाने में झिझक महसूस हो रही हो, तो इस असमंजस से बाहर निकलिए। अभिव्यक्ति जरूरी है। मन में रखेंगे, तो कभी गुस्से में वह सारा जमा हुआ असंतोष निकल आएगा। कह देना, रिश्ते की मज़बूती के लिए जरूरी है। ऐसे वक्त की तलाश करें जब आप और आपका साथी दोनों के पास बातचीत के लिए पर्याप्त समय हो। ध्यान रखें कि समय ऐसा चुनें जब दोनों ही शांत मूड में हों। ऐसा न हो कि बातचीत शुरू हो और शिकायतों का पिटारा खुल जाए। जो भी एक-दूसरे से कहना है उसके लिए साधारण बातचीत से शुरू करें।

    • क्या न करें- शुरूआत होते ही ताने देना या आलोचना न करें। इससे सामने वाला खीझ कर या तो चला जाएगा या बातचीत बहस में बदल जाएगी। सामने वाले को ये न लगे कि आप उसे दोष दे रहे हैं, बल्कि ये लगे कि आप मन की बात रख रहे हैं।
  2. जब आप बातचीत की शुरुआत करते हैं और अपने साथी को बताते हैं कि आप उनके व्यवहार को लेकर कैसा महसूस करते हैं, तो इस दौरान सटीक बात करें और उस एक बात के बारे में बताएं जो आपको तकलीफ देती है ताकि सामने वाला पहले समझे और फिर अपने व्यवहार में बदलाव ला सके।

    • क्या न करें- हवा में बातें करने से कोई सार नहीं निकलेगा। जो भी शिकायत है उसे कहने का तरीका ऐसा हो कि दोषारोपण न लगे।
  3. यदि आपको लगता है कि सामने वाला आपकी भावनाओं को समझता नहीं हैं तो मन में कयास लगाने से बेहतर है इस बारे में बात करें। यदि आप चाहती हैं कि पति आपको समय दें तो उन्हें इससे अवगत कराएं। पति चाहते हैं कि आप रोक-टोक कम करें या सवाल कम पूछें तो इस आदत में भी बदलाव लाना होगा। जो भी मन में हैं उसे जब तक एक-दूसरे से साझा नहीं करेंगे तब तक समस्या का समाधान कैसे निकलेगा।

    • क्या न करें- मन में गलतफहमी पालकर न बैठें। इस बात का इंतज़ार न करें कि सामने वाला ही बातचीत शुरू करेगा/करेगी। शिक़ायतों का पिटारा जितनी जल्दी खोलेंगे समस्या उतनी जल्दी सुलझेगी।
  4. अब बातचीत शुरू हो ही गई है तो इस बात को जानना ज़रूरी है कि समस्या कहां है। साथी से पूछें कि उनके व्यवहार के पीछे का कारण क्या है या आपकी कोई आदत या अनजाने में की गई गलती के कारण ऐसा है। इस तरह पूछने से वे सहजता से अपने मन की बात आपके सामने रख सकेंगे। हो सकता है कि उनके व्यवहार का कारण कोई अन्य समस्या हो जिसे लेकर वो शांत रहते हों या चर्चा करना मुनासिब न समझते हों।

    • क्या न करें- समस्या जानना चाहते/चाहती हैं तो सवालों का तांता न लगाएं। सवाल पूछने के बाद जवाब देने का समय दें। लगातार सवाल पूछने से चिढ़चिढ़ाहट होना सामान्य है।


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      Complain that you should be heard keep your point clearly in any relationship

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अपनी खूबी को प्रोफेशन में बदलिए और जिंदगी को खुशगवार बनाएं


लाइफस्टाइल डेस्क. कहते हैं शौक अगर प्रोफेशन बन जाए, तो जिंदगी खुशगवार हो जाती है। काम, काम नहीं लगता, जुनून का हिस्सा बन जाता है। जैसे कुछ लोगों को नई-नई जगह घूमना पसंद होता है तो कुछ को वहां की रोचक जानकारी इकट्ठा करने में मजा आता है। इसी तरह के शौक हम सबके अंदर मौजूद हैं जिन्हें करने से ख़ुशी महसूस होती है। वही हमारी खूबी भी बन जाती है। इसी खूबी को प्रोफेशन में बदलकर देखिए। सच मानिए काम करने में मजा आ जाएगा।

  1. नई-नई जगहों पर घूमने और उनके बारे में जानने के शौक़ को कमाई का जरिया भी बना सकते हैं। टूरिस्ट गाइड या ट्रैवल ब्लॉगर या पार्ट-टाइम ट्रैवलर बनकर देखिए। शुरुआत में शहर के आस-पास घूमकर, प्रसिद्ध जगहों की जानकारी ब्लॉग या सोशल मीडिया के जरिए साझा करें। इसके अलावा किसी ट्रैवल वेबसाइट या मैगजन में बतौर स्तम्भकार या ब्लॉगर जुड़ना भी अच्छा विकल्प है।

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  2. फोटोग्राफी के शौकीन हैं तो सोशल मीडिया ब्लॉग से आगे बढ़ें। छोटे अवसरों से कॅरियर की शुरुआत करें। किसी के जन्मदिन की तस्वीरें खींचने का अवसर मिले तो वो भी करें। इसके बाद धीरे-धीरे बड़े अवसर ख़ुद-ब-खुद मिलने लगेंगे। बेहतरीन और हाई रेजोल्यूशन तस्वीरें ऑनलाइन बेच सकते हैं जो कमाई का अच्छा जरिया है। बेहतर अवसर के लिए फोटो एडिटिंग सीखें ताकि तस्वीरों को और भी आकर्षक बना सके।

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  3. योग या जिम करना पसंद है तो फिटनेस एक्सपर्ट बनिए। अपने वीडियो ऑनलाइन शेयर करें। स्कूल या फिटनेस सेंटर से जुड़कर योग या फिटनेस टीचर भी बन सकते हैं। कुछ साल तजुर्बा लेने के बाद खुद का फिटनेस सेंटर की शुरुआत कर सकते हैं। ऑनलाइन क्लासेस भी ले सकते हैं। इनके अलावा मैगजीन या चैनल में सलाहकार के रूप में कॅरियर बना सकते हैं।

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  4. कुछ लोगों को वीडियाे गेम खेलना बहुत पसंद होता है। अगर आप भी इन्हीं लोगों में शामिल हैं तो वीडियो गेमिंग की दुनिया में शामिल हो जाइए। गेम डेवलपिंग सीखकर किसी वीडियो गेम बनाने वाली कंपनी के साथ काम कर सकते हैं। यदि गेम डिजाइनिंग या आर्ट की थोड़ी जानकारी है ताे इसमें प्रोफेशनल कोर्स करके अनेक अवसर हासिल कर सकते हैं। हाल ही में एक 16 साल के बच्चे ने गेमिंग की दुनिया में अव्वल आकर 21 करोड़ रुपए की इनामी राशि जीती है।

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  5. अगर आपके हाथों में कला है तो इसे लोगों के सामने लेकर आइए। स्केचिंग या पेंटिंग करना आपकी हॉबी है तो इन्हें ऑनलाइन शॉप या एक्जीबीशन के जरिए बेचें। डिजिटल पेंटिंग भी सीखिए। इलस्ट्रेशन, ग्रैफिक डिज़ाइन या कैरीकेचर जैसी नई चीजें सीखकर आगे बढ़ें। इन दिनों इनकी काफी मांग भी है। वहीं होम इंटीरियर में माहिर हैं तो शुरुआत अपने या किसी करीबी के घर से करें। इन्हें सोशल मीडिया में अपलोड करें ताकि लोगों तक आपकी कला पहुंचें।

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    • अगर खाना बनाने से आपको ख़ुशी मिलती है तो फूड ब्लॉगर बनिए। वीडियो या फोटो ब्लॉग के जरिए लोगों तक पहचें। वेबसाइट, चैनल या मैगजीन को रेसिपी भी भेज सकते हैं। जो खाना बनाना सीखना चाहते हैं उन्हें कुकिंग क्लास भी दीजिए।
    • नई तकनीक और गैजेट के बारे में जानने की रुचि रखते हैं तो टेक ब्लॉगिंग की शुरुआत कर सकते हैं। वीडियो के जरिए इनका रिव्यू दे सकते हैं। इसी तरह फैशन, ब्यूटी, कॉमेडी, बागवानी आदि को कमाई का जरिया बना सकते हैं।
    • तकरीबन हर शौक के लिए इंटरनेट की समझ ज़रूरी है। इसकी मदद से आपका काम लाखों लोगों के बीच पलक झपकते ही पहुंच जाता है।
    • हमेशा अपने शौक के क्षेत्र में होकर नए कामों पर नजर रखें। नयापन बनाए रखें। सफलता की राह पर चलते रहने का यह सबसे भरोसेमंद मंत्र है।


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      turn your hobby into profession and enjoy your life

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न्यूजीलैंड में पाए जाते थे 1 मीटर लंबे और 7 किलो वजनी तोते, एक दशक पहले मिले जीवाश्म से हुई पुष्टि


हैप्पी लाइफ डेस्क. 1.9 करोड़ साल पहले न्यूजीलैंड में पाए जाने वाले तोते के जीवाश्म से वैज्ञानिकों ने नया खुलासा किया है। जीवाश्म की जांच में सामने आया किन्यूजीलैंड में 1 मीटर लंबाई वाले तोते पाए जाते थे। शोधकर्ताओं का दावा है कि इसका वजन 7 किलो रहा होगा। यह दुनिया के सबसे मोटे और दुर्लभ तोते कहे जाने वाले काकापो की प्रजाति से दो गुना भारी रहे होंगे। इसके जीवाश्म न्यूजीलैंड के सेंट बाथंस में मिले थे। न्यूजीलैंड को दुनिया के सबसे बड़े तोते की प्रजाति के घर के तौर पर भी जाना जाता है। हाल ही में दुनिया के सबसे मोटे और दुर्लभ तोते काकापो ने ब्रीडिंग सीजन में रिकॉर्ड बनाया था और 249 अंडे दिए थे।

  1. बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, यह तोता उड़ने में समर्थ नहीं था दूसरी चिड़िया के उलट यह दिन में नहीं रात में निकलता था। ऑस्ट्रेलिया की फ्लाइंडर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता और जीवाश्म विज्ञानी ट्रेवर वर्थी का कहना है कि दुनिया में इसके अलावा कोई बड़ा तोता नहीं था। जीवाश्म वैज्ञानिकों ने इसे हेरेकेल्स इनएक्सपेक्टेटस की नई प्रजाति बताई है क्योंकि यह आकार और क्षमता के मामले में सबसे अलग है।

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  2. शोधकर्ताओं का कहना है कि जीवाश्म 11 साल पहले मिला मिला था। इसमें मौजूद हड्डियों को चील या बत्तख की समझा जा रहा था। लेकिन इसी साल की शुरुआत में जीवाश्म वैज्ञानिकों ने इसकी दोबारा गहनता से जांच की। जांच में सामने आया कि इसकी चोंच भी काफी बड़ी रही होगी और आम तोते के मुकाबले इसे खाना खाने में अधिक मदद मिलती होगी।

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    दुनिया का सबसे मोटा और दुर्लभ तोताकाकापो

  3. जीवाश्म विज्ञानी ट्रेवर का कहना है कि उस दौर में इसका शिकार करने वाले जानवर या पक्षी न होने के कारण इस तोते का व्यवहार काफी आक्रामक था। यह जमीन पर ही चलता था और बीज व नट्स खाता था। न्यूजीलैंड में सेंट बाथंस के जिस क्षेत्र इसके जीवश्म मिले हैउस क्षेत्र को जीवाश्मों की खोज के लिए ही जाना जाता है। न्यूजीलैंड दुर्लभ पक्षियों के लिए भी जाना जाता है। यह विलुप्त हो चुकी चिड़िया मोआ का घर भी था। जिसकी लंबाई 3.6 मीटर थी और वजन 230 किलो तक होता था।



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      palaeontologist reveals about Squawkzilla the three-foot tall cannibal parrot found in new Zealand

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ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने बनाया दुनिया का सबसे पतला सोना, इंसानी नाखून से 10 लाख गुना महीन


लाइफस्टाइल डेस्क. इंग्लैंंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के वैज्ञानिकों ने शुद्ध सोने का दुनिया का सबसे पतला रूप तैयार किया गया है। यह इंसानी नाखून से 10 लाख गुना ज्यादा पतला है। सोने यह रूप केवल दो परमाणु से मिलकर बना है। सोने की पर्त की मोटाई 0.47 नैनोमीटर है। इसका प्रयोग चिकित्सीय उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। इसे टू-डी सोना भी कहा जा रहा है।

  1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, जांच में सामने आया है कि यह वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे सोने के नैनो पार्टिकल से 10 गुना ज्यादा बेहतर है। वर्तमान नैनो पार्टिकल 3डी मैटेरियल में जिसमें काफी संख्या में परमाणु हैं। शोधकर्ता सुंजी ये के मुताबिक, यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसका इस्तेमाल तकनीक को और भी बेहतर बनाने में किया जा सकेगा।

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    इसकेघोल का रंगहरा दिखता है

  2. इसका प्रयोगरोगों की जांच करने वाले उपकरण और पानी को साफ करने वाले वाटर प्यूरीफायर में भीकिया जाएगा। एडवांस साइंस जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, इस नए तरीके से नैनो मेटल के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा और ये तैयार किए जा सकेंगे।

  3. शोधकर्ताओं के अनुसार, सोने के नए प्रकार को तैयार करने में क्लोरोऔरिक अम्ल का प्रयोग किया गया है। इसकेजलीय घोल में गोल्ड नैनोशीट को डुबोकर 2डी गोल्डबनाया गया है। सोने के नए प्रकार को एक खास रसायन की मदद से तैयार किया गया है जो इसे दो परमाणु वाली चौड़ी पर्त के रूप में बदलने में मदद करता है।

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  4. इसे पानी में डालने पर यह हर रंग के घोल के रूप में दिखाई देता है। इसकी मदद से मुड़ने वाली स्क्रीन, इलेक्ट्रॉनिक इंक और ट्रांसपेरेंट डिस्प्ले बनाए जा सकते हैं। लीड्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीफन इवांस के मुताबिक, 2डी गोल्ड तैयार करना एक बेहतरीन आइडिया है जिसका इस्तेमाल कई रसायनिक उत्पाद बनाने में किया जा सकता है।



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      Scientists made worlds thinnest precious gold metal one MILLION times thinner than n

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जापानी वैज्ञानिकों ने बनाई रोबोटिक पूंछ, यह शरीर का बैलेंस बनाकर गिरने से बचाती है


लाइफस्टाइल डेस्क.जापान की किओ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने रोबोटिक पूंछ बनाई है। इसे पहनने पर इंसान को गिरने से बचाया जा सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, डिवाइस को कमरबंद की तरह तैयार किया गया है जिसे कमर पर बांधकर इसमें लगी पूंछ का इस्तेमाल किया जा सकता है। गिरने की स्थिति में यह विपरीत दिशा में मूव करती है और गिरने से बचाती है। इसका नाम आर्क्यू रखा गया है।

  1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसका डिजाइन समुद्री घोड़े से प्रेरित है। यह जलीय जंतु अपनी पूंछ से शिकार पर अटैक करता है और कई चीजों को एक साथ जकड़ने में सक्षम है। यह काफी लचीली होती है। रोबोटिक पूंछ को भी ऐसा ही तैयार करने की कोशिश की गई है। इसे पहनने वाले की लंबाई के मुताबिक, छोटा या बड़ा भी किया जा सकता है। पूंछ में लगे छोटे-छोटे खंडों को बढ़ाया या घटा सकतेहैं।

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  2. शोधकर्ताओं के मुताबिक, पूंछ छोटे-छोटे खंड से मिलकर बनी है। हर खंड भारी है जो पहनने वाले को भारी सामान उठाकर चलने के दौरान बैलेंस बनाने में मदद करता है। रोबोटिक पूंछ में लगे हार्डवेयर का इस्तेमाल गेमिंग और वर्चुअल रिएल्टी में भी किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने फिलहाल इसका एक प्रोटोटाइप तैयार किया है जिसे हाल ही में लॉस एंजलिस के वार्षिक अधिवेशन में पेश किया गया था।

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  3. आर्क्यू में कई तरह की रोबोटिक मांसपेशियों लगाई गई हैं। ये मांसपेशियां इसकी लंबाई और इसमें बनने वाले एयर दबाव से संचालित होती हैं। ये शरीर के मूवमेंट के आधार पर खिंचती और सिकुड़ती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है, आर्क्यू का इस्तेमाल एक कंकाल के तौर रोबोट में भी किया जा सकेगा जो इंसानी क्षमता वाला होगा।

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      Japanese researchers designed robotic TAIL that straps body to improve balance and agility
      Japanese researchers designed robotic TAIL that straps body to improve balance and agility

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चौड़े बॉर्डर की साड़ी के साथ मैचिंग जैकेट और माथे पर बड़ी बिंदी था सुषमा स्वराज का सिग्नेचर स्टाइल


लाइफस्टाइल डेस्क. माथे पर बिंदी, चौड़े बॉर्डर वाली साड़ी और इससे मैच करती हुई जैकेट और गले में मोतियों की माला, ये था भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का सिग्नेचर स्टाइल। संसद में जितनी तारीफ उन्हें उनके दमदार भाषण के लिए मिलती थी उतनी ही सराहना उनके फैशन सेंस की वजह से भी होती थी। बहुत कम महिला पॉलिटिशयन हैं जिनके पास साड़ियों का बेहतरीन कलेक्शन रहा हो। लेकिन जयललिता के बाद सुषमा स्वराज इसी फेहरिस्त में सबसे ऊपर हैं।

  1. वह प्रत्येक दिन के हिसाब से साड़ियों के रंग का चयन करती थीं। यह कभी भी मिस नहीं होता था..जिस दिन पर जो रंग शुभ माना जाता है, उसी रंग की साड़ियां पहनती थीं। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह ज्योतिष में भी काफी विश्वास रखती थीं।

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    सुषमा स्वराज को साड़ियों और जैकेट से जितना लगाव था उतना ही अलग था इनके पहले का अंदाज। साड़ी पर मैचिंग जैकेट और एक कंधे पर शॉल उनके फैशन स्टाइल का हिस्सा था जो उन्हें अलग बनाता था। संसद से लेकर विदेशी दौरे में भी वह साड़ी और स्वीव-लेस जैकेट में ही नजर आती थीं। उनके पास सबसे ज्यादा कॉटन और सिल्क की साड़ियां थीं।

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    उनके जैकेट प्रेम से जुड़ा एक मामला भी है। उदयपुर के राजेश शर्मा नाम के शख्स की बेटी ने फैशन ड्रेस कॉम्पिटीशन में हिस्सा लिया और सुषमा स्वराज की तरह तैयार हुई। बेटी की तस्वीर को राजेश ने सुषमा स्वराज को ट्वीट किया। इस पर उनका जवाब आया, मैं तुम्हारी जैकेट से प्यार करती हूं।

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    उनका साड़ी पहनने का अंदाज कितना पॉप्युलर था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बच्चे फैंसी ड्रेस कॉम्पिटीशन में सुषमा स्वराज की तरह दिखना पसंद करते थे। सुषमा स्वराज राजनीति में जितना सक्रिय थीं, त्योहार के मौकों पर उनकी भागीदारी कम नहीं थी। तीज-त्योहार में भी वह पूरी तरह सजना संवरना पसंद करती थीं और समय निकालकर हर रीति-रिवाज में हिस्सा लेती थीं।

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    खानपान को लेकर उनका रूटीन फिक्स था। वह घर के बने खाने को तरजीह देती थीं। आमतौर पर उन्हें घर के बने मक्खन के साथ परांठा और चाय लेना पसंद था। लेकिन जब वह अपने घर अंबाला जाती थीं तो उन्हें वेद केगोलगप्पे और कालका पूड़ी वालेकचौड़ी खाना नहीं भूलती थी।

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    कालका पूड़ी वाले अंबाला1957 से दुकान लगा रहे है।उन दिनों को याद करते हुए दुकानदार बताते हैं कि सुषमा स्वराज को यहां की पूड़ी बहुत पसंद थी बचपन में यहां की पूड़ी का ऐसा स्वाद लगा कि फिर उनकी जुबान से जिंदगी भर ना उतरा।विदेश मंत्री बनने के बाद एक बार अपने इंटरव्यू में भी उन्होंने इस बात का जिक्र किया था कि वह जब भी अंबाला गईं तो पूड़ी जरूर खाती थीं।



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      Former foreign minister Sushma Swaraj love for saree and jacket know Sushma Swaraj lifestyle

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जुरासिक पीरियड के डायनासोर की नई प्रजाति खोजी गई, 41 साल से म्यूजियम में गुमनाम रखा था


साइंस डेस्क. ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने डायनासोर की नई प्रजाति खोजी है। जिसका अवशेष कई दशकों से एक म्यूजियम में रखा था और पहचाना नहीं जा सका था। नई प्रजाति का नाम मैस्सोपॉन्डायलस है जिससे जुरासिक पीरियड के शुरुआती समय का बताया गया है।

  1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, 1978 में साउथ अफ्रीका मेंं डायनासोर के अवशेष मिले थे जिसे पहचाना नहीं जा सका था। इसे लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में रखा गया था। कुछ समय पहले इसे साउथ अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटरस्रेंड के शोधकर्ताओं की टीम में देखा। पाया गया कि इसकी हड्डियां और खोपड़ी डायनासोर की एक प्रजाति से मिलती हैं।

  2. नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के पीएचडी स्कॉलर किंबर्ले चेपल और डायनासोर रिसर्चर पॉल बारेट ने म्यूजियम में रखे टुकड़े को पहचाना और इसे डायनासोर के होने की पुष्टि की। डायनासोर रिसर्चर पॉल के मुताबिक, मेरे कई साथी इसे सालों से देख रहे हैं लेकिन उनका कहना है यह काफी अलग है। जांच में यह डायनासोर की सबसे आम प्रजाति मैस्सोपॉन्डायलस का पाया गया है। जो खासतौर पर दक्षिण अफ्रीका में पाया जाता था।

  3. डायनासोर रिसर्चर पॉल के मुताबिक, किंबर्ले चेपल काफी समय से डायनासोर की मैस्सोपॉन्डायलस प्रजाति पर काम कर रहे हैं। वह इस जानवर की कई दूसरी प्रजातियों का भी अध्ययन कर रहे हैं। लेकिन लैब में रखा यह जीवाश्म हड्डियों और खोपड़ी के मामले में काफी अलग है। जो इस बात का संकेत देता है यह प्रजाति कितनी अलग है।

  4. शोधकर्ताओं के मुताबिक, नए डायनासोर की प्रजाति 10 फीट लंबी रही होगी। ये पेड़ और छोटे जानवरों को खाते होंगे। इनकी गर्दन लंबी और सिर काफी छोटा रहा होगा। म्यूजियम में रखे नमूने को नगवेवू इंटलोको नाम दिया गया है। इसका मतलब होता है ग्रे खोपड़ी। यह दक्षिण अफ्रीका की विरासत का हिस्सा है।

  5. शोधकर्ताओं के मुताबिक, लैब में रखा नमूना ट्रियासिक और जुरासिक समय के बीच हुए बदलाव की कई अहम जानकारियां देता है। इससे पता चलता है कि करीब 20 करोड़ साल पहले इको-सिस्टम हमारी सोच से कहीं ज्यादा पेचीदा था। डायनासोर रिसर्चर पॉल कहते हैं नमूने को और गहराई में समझने की कोशिश की जा रही है। अभी इसकी मदद से और भी कई नई बातें सामने आएंगी।



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      New species of dinosaur discovered after decades in museum

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क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप आर्थिक रूप से सक्षम यात्रियों के लिए स्मार्ट ऑप्शन


एक बढ़ती हुई संख्या में परिवारों ने अपनों के साथ छुट्टियां बिताने के मायने बदल दिए हैं। अपनों के साथ छुट्टियों का आनंद तब और भी दोगुना हो जाता है जब इन छुट्टियों में ढेर सारे ऑफर्स जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए आरती और राहुल भल्ला, जो एक सामान्य परिवार से आते हैं। दोनों ही नौकरी की भागदौड़ के चलते परिवार को वक्त कम दे पाते हैं। पेशे से बैंक कर्मचारी राहुल भल्ला कहते हैं " क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप ने सच में हमारी छुट्टियां मनाने के तरीके बदल दिए हैं।" पेशे से प्रबंधन सलाहकार आरती मुस्कुरा कर बताती हैं कि " अब सच में हम हर साल परिवार के साथ छुट्टियां बिताने जाते हैं। अब यह सब इतना आसान हो गया है – क्योंकि ज़्यादातर हमारी छुट्टियां पहले ही क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप में शामिल होतीं हैं, हमें छुट्टियों के लिए सिर्फ जगह चुननी होती है ।

क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स - क्लब महिंद्रा रिव्यूज के अनुसार तेजी से बढ़ता हॉलिडे ऑप्शन

क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप कम समय में ज़्यादा और बेहतर वेकेशन की चाह रखने वाले उपभोक्ताओं के लिए एक उचित समाधान है। कोई आश्चर्य नहीं है कि यात्रा उद्योग ने हाल के वर्षों में तजी से बढ़ौतरी प्राप्त की है। ऑल इंडिया रिजॉर्ट डेवलपमेंट एसोसिएशन का मानना ​​है कि टाईम शेयर व वेकेशन ऑनार्शिप यात्रा उद्योग में शायद सबसे तेजी से बढ़ता हुआ सेगमेंट है। 15-18% सालाना वृद्धि के साथ, यह स्पष्ट है कि छुट्टियों की ऑनार्शिप का विकल्प पूरी तरह से भारतीय उपभोक्ता के पास है। एज़ोथ एनालिटिक्स की शोध रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल वेकेशन ओनरशिप (टाईमशेयर) मार्केट में 2018-2023* के दौरान 7% के सीएजीआर द्वारा एक मजबूत विकास प्रदर्शित होने का अनुमान है।
“यह आसानी से समझ आता है“ राहुल बताते हैं “कि क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी में आपका पैसा ज्यादा स्मार्ट तरीके से काम करता है। आपको सुविधाजनक कीमत पर शानदार क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स मिलते हैं। सोचिये ज़रा आप दुनिया के कुछ बेहतरीन स्थानों पर बेहतरीन क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स में छुट्टियां बिताते हैं वो भी अपनी जेब देखे बिना और सब अच्छी बात यह है की यहाँ पर बच्चों, दादा दादी, और हम- हर एक के लिए कुछ है "

क्लब महिंद्रा फ़ीस और विवरण

(25 साल के क्लब महिंद्रा ब्लू सीजन स्टूडियो मेम्बरशिप के साथ सालाना पारिवारिक वेकेशन पर 50%* बचत का चित्रण।)

क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी - स्मार्ट फायनेंशियल विकल्प !
क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी के आर्थिक लाभों को समझने के लिए, यहाँ दो उदाहरण हैं - ब्लू सीज़न (इन्फोग्राफिक को देखें ) और रेड सीज़न।
रेड सीज़न मेम्बरशिप उन लोगों के लिए है जो पीक सीजन तथा पूरे वर्ष में कभी भी छुट्टियां मना सकते हैं जैसे की स्कूल, कॉलेज की छुट्टियां, त्योहार के हफ़्तों की छुट्टियां, लेकिन वो भीड़ वाले वाले सुपर-पीक सीजन जैसे की ‘न्यू इयर ईव’ से बचना पसंद करते हैं।

इसकी तुलना में, ब्लू सीजन उन लोगों के लिए है जो शांति प्रिय वेकेशन पसंद करते हैं। ब्लू सीजन लो-डिमांड के साथ नॉन-पीक टूरिज्म अवधि में उन लोगों को इत्मीनान से छुट्टियों मनाने का विकल्प देता है जो पीक हॉलिडे सीजन के दौरान छुट्टी पाने में असमर्थ हैं।

उदहारण के तौर पर, एक दंपत्ति अपने दो बच्चों के साथ साल में एक बार एक सप्ताह की छुट्टियों के लिए बाहर जाते हैं। भारत में एक होटल के कमरे का न्यूनतम किराया एक रात के लिए लगभग रुपये 5,000/- होता है, जो की हर साल 7 रातों के लिए रुपये 35,000/- होता है। अगले 25 वर्षों में, यह रुपये 8,75,500/- के बराबर होगा। अब 6% इन्फ्लेशन के हिसाब से देखें तो आपके परिवार की छुट्टी के लिए इन्फ्लेशन की लागत रुपये 19,20,257/- होगी। इसका मतलब है, आपके परिवार को अगले 25 वर्षों में 19 लाख रुपये खर्च करने होंगे।

अब इस 25 साल वाले हिसाब को क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप के रेड सीज़न स्टूडियो के साथ तुलना करके देखें। लगभग 6 लाख रुपये की मेम्बरशिप में हर साल 7 रातें/8दिन की छुट्टियां शामिल है। एनुअल सब्सक्रिप्शन शुल्क (एएसएफ) और इन्फ्लेशन सहित आपका कुल खर्च लगभग रुपये 12.5 लाख, वो भी 25 साल से अधिक समय के लिए। इसका मतलब 25 वर्षों में हर वर्ष लगभग 34% की महत्वपूर्ण बचत होती है।

एडवेंचर - क्लब महिंद्रा

आरती कहती हैं "हम यहाँ बात सिर्फ भारत की कर रहे हैं। अगर इस हिसाब को हम विदेशों की होटलों में रहने के खर्चों से तुलना विशेष रूप से फ्लकच्युएटिंग एक्सचेंज रेट्स के साथ करें तो भी फायदा आपका ही होगा। इसके अलावा, बुकिंग पहले से हो जाती है तो हवाई किराया और यात्रा के अन्य खर्चों की लागत में बचत का लाभ भी मिलता है।“

क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स - अधिक महत्त्व, अधिक लाभ!

भल्ला परिवार की क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप पर एक नज़र डालें तो सीमित बजट में इससे बेहतर लक्जरी नहीं मिल सकती। यह रिसॉर्ट्स सभी आयु के ग्रुप्स के सदस्यों के लिए समर्थ हैं । इसके विशाल कमरे 4 सदस्यों वाले परिवार के लिए पर्याप्त हैं। जहाँ 4 या 5-सितारा होटल के कमरे 250 वर्ग फीट से शुरू होते हैं वहीं क्लब महिंद्रा रिज़ॉर्ट का बेस केटेगरी वाला रूम 400 वर्ग फुट से शुरू होता है। स्टूडियो अपार्टमेंट, 1 ​​बेडरूम और 2 बेडरूम का विकल्प परिवार और दोस्तों को एक छत के नीचे एक साथ समय बिताने की सुविधा देता है। इन सब में सबसे अच्छी सुविधा रसोईघर के होने की है। जो की छोटे बच्चों व बुज़ुर्ग लोगों के साथ यात्रा करने में सहायक होते हैं। भारत और दुनिया भर में 2 दशकों से भी अधिक समय में संचालन के साथ क्लब महिंद्रा ने स्मार्ट यात्रियों की ज़रूरतों को पहचानते हुए उनको प्राथमिकता दी है।

राहुल कहते हैं कि "क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी में फ्लेक्सिबिलिटी का होना एक बेहतर फायदा है। कोई भी सदस्य क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स नाइट्स को 3 साल तक इकट्ठा कर एक बार में ही 20-21 नाइट्स की लम्बी घरेलू या अंतरराष्ट्रीय यात्रा प्लान कर सकता है।

जो लोग वेकेशन ओनरशिप के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, उनके लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स स्थान और सुविधाओं के अनुरूप सेवा मानकों पर बराबर ध्यान देती है। यात्रा की शुरुआत से लेकर अंत तक हमेशा एक समर्पित होस्ट होता है। यात्रा, भोजन, दर्शनीय स्थलों पर भ्रमण आदि मांगो पर भी ध्यान देने के अलावा उनकी व्यवस्था पहले से की जाती है।

क्लब महिंद्रा में वेकेशन

क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी के अन्य लाभ :

• फ्लाइट बुकिंग: क्लब महिंद्रा वेबसाइट और मोबाइल एप्लिकेशन के साथ हवाई बुकिंग को किफायती और आसान बनाता है। क्लब महिंद्रा ने स्काइस्कैनर (ऑनलाइन फ्लाइट एग्रीगेटर) के साथ मिलकर आपको उड़ान बुकिंग पर सबसे किफायती दरों की उपलब्धता की सहूलियत देता है।
• अंतर्राष्ट्रीय इन्वेंटरी: क्लब महिंद्रा के सदस्य को देश के बाहर और यूरोप (बर्लिन, रोम, प्राग, मिलान, फ्लोरेंस) और दक्षिण-पूर्व एशिया (श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर) में आरक्षण की सहायता प्रदान की जाती है। इनमें से प्रत्येक स्थान मेम्बरशिप केटेगरी और उपयोग के आधार पर भुगतान की शर्तों में भिन्न हो सकता है। यह आवश्यक रूप से क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी में शामिल नहीं किया जा सकता है।
• क्यूरेटेड वेकेशंस: क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट के सदस्यों को हमेशा सांस्कृतिक उत्सवों जैसे रण-उत्सव (गुजरात), जल महोत्सव (मध्य प्रदेश), महिंद्रा ओपन स्कय फेस्टिवल (राजस्थान), चेतक फेस्टिवल (महाराष्ट्र) आदि कार्यक्रमों में आकर्षक ऑफर्स मिलेंगे।
• क्रूज हॉलिडेज़: सदस्य अपनी छुट्टियों को क्रूज़ हॉलिडेज़ में भी परिवर्तित कर सकते हैं। राहुल कहते हैं कि "सचमुच यह अद्भुत है। क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप में पास पूरे परिवार के लिए कुछ न कुछ है जो शानदार अनुभव प्रदान करता है।"
• आरसीआई मेम्बरशिप: क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी में 2 साल की आरसीआई मेम्बरशिप भी शामिल है। आरसीआई एक अंतरराष्ट्रीय सहबद्ध विनिमय नेटवर्क है जो दुनिया भर के टाइमशैयर मालिकों को घरेलू छुट्टियों को अंतर्राष्ट्रीय छुट्टियों में तब्दील करने की अनुमति देता है। एक बार सदस्य न्यूनतम शुल्क का भुगतान करने के बाद वह 90 से अधिक देशों में कई प्रकार के रिसॉर्ट से चुन सकते है। मेम्बरशिप को मामूली शुल्क के साथ रिन्यूअल किया जा सकता है।
• वेलनेस: क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट में स्पा पर विशेष डिस्काउंट भी प्रदान किया जाता है।
• इसके अलावा मेम्बरशिप में रेफरल रिवार्ड्स भी शामिल हैं।

क्लब महिंद्रा - वित्तीय लाभ से परे!

जैसा कि राहुल विस्तार से बताते हैं, "क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स वास्तव में आपको वह करने के लिए प्रेरित करता है जो हर वेकेशन में करना चाहिए - आराम। उनकी सभी सुविधाएँ व सेवाएँ इसी पर केन्द्रित हैं। क्लब महिंद्रा रिसॉर्ट्स में बच्चों का एक्टिविटी सेंटर और हैप्पी क्लब में बच्चों का अच्छी तरह से मनोरंजन किया जाता है, इसलिए आरती और मेरे पास भी खुद के लिए कुछ समय रहता है। मेरे बच्चे अपने दादा-दादी के साथ खेलते हुए समय बिताकर काफी खुश हैं। यह एक अद्भुत पारिवारिक अनुभव है। आरती क्लब महिंद्रा कान्हा में अपना अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि “हमारे लिए वास्तव में यह एक यादगार और सुखद समय था। सुबह का योग और स्पा सेशंस ने मुझे फिर से जीवंत कर दिया। मैं कहती हूं कि हमारा सबसे यादगार अनुभव तब था जब हमने सफारी पर एक बाघ देखा था।"


क्या आप भल्ला रिसोर्ट को दूसरे लोगों को सुझाएंगी? "हाँ बिलकुल" आरती मुस्कुराती हुई कहती हैं। “हमने कुछ ही वर्षों में हमारे क्लब महिंद्रा मेम्बरशिप फी की लागत पहले ही वसूल कर ली है। आर्थिक रूप से होशियार, बेहतरीन जगहों पर रिसॉर्ट्स, बड़ों के लिए लक्ज़री और बच्चों के लिए ढ़ेर सारी एक्टिविटीज़? क्या कोई और विकल्प है?” यह अनुभव क्लब महिंद्रा के खुशहाल सदस्यों द्वारा साझा किए गए हैं। महिंद्रा की विचारधारा क्लब महिंद्रा हॉलिडेज़ के मूल्यों, दृष्टि और लक्ष्य में निहित है। अपने उत्पाद से परे जाकर यह अद्भुत और यादगार अनुभव देने के साथ अद्वितीय आतिथ्य अनुभव भी प्रदान करते हैं।

अधिक जानकारी के लिए क्लब महिंद्रा रिव्यूज़ पढ़ें और जाने सदस्यों के अनुभव। क्लब महिंद्रा को हाल ही के टाइम्स ट्रैवल अवार्ड्स में हॉलिडे आईक्यू द्वारा 'इंडियाज फेवरेट रिसॉर्ट्स चेन' और 'मोस्ट पॉपुलर रिसोर्ट चेन' से सम्मानित किया गया।



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क्लब महिंद्रा नालदेहरा रिज़ॉर्ट शिमला

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केंद्र शासित राज्य बनने के बाद पर्यटकों की संख्या में होगा इजाफा, बढ़ेंगे रोजगार के अवसर


लाइफस्टाइल डेस्क. केंद्र सरकार ने सोमवार को अनुच्छेद 370 हटा दिया। अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश होंगे। जम्मू-कश्मीर में 20 और लद्दाख में दो जिले लेह और करगिल होंगे। क्षेत्रफल के हिसाब से लेह भारत का सबसे बड़ा जिला है। यह 45,110 वर्ग किलोमीटर में फैला है। लद्दाख पर्यटन के लिहाज से खास है। नई अधिसूचना लागू होने के बाद यहां पर्यटन कितना बढ़ेगा और कितना बदलेगा, भास्कर ने ट्रैवल एक्सपर्ट से जाना, पढ़िए रिपोर्ट…

  1. लद्दाख-स्पीति के ट्रैवल एक्सपर्ट अतुल सिंह के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर से धारा अनुच्छेद 370 हटने से पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद सुरक्षा और बढ़ेगी और पर्यटकों के लिए सकारात्मक माहौल बनेगा। पूरी उम्मीद है ट्रैवल इंडस्ट्री को आर्थिक रूप से फायदा होगा। लद्दाख पहुंचने वाले पर्वतारोहियों में ट्रैकिंग के लिए खास जुनून होता है। ये 15-20 दिनों के लिए यहां आते हैं और उन्हें नए शिखर की तलाश होती है। इसके लिए पर्यटक स्थानीय लोगों की मदद लेते हैं। किराए पर घोड़े और टट्टू लेकर स्थानीय लोगों गाइड बनाकर साथ ले जाते हैं। नए बदलाव के बाद यहां के स्थानीय लोगों के लिए और भी नए अवसर भी पैदा होेंगे।

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  2. ट्रैवल एक्सपर्ट परवेश ठाकुर के मुताबिक, यहां लैंस स्लाइड के मामले रोकने और नालों को ढकने की जरूरत है। मनाली या जम्मू-कश्मीर से लेह फोर-व्हीलर से पहुंचने के लिए के लिए कई बार घंटों तक जाम में फंसा रहना पड़ता है। खासतौर पर रोहतांग वाले क्षेत्र में रास्ता संकरा होने के कारण ट्रैफिक बढ़ता है इसे पार करने के लिए कई बार लंबा इंतजार करना पड़ता है। इस क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण पर सरकार ध्यान देती है तो पर्यटकों की संख्या में इजाफा होगा।

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    ट्रैवल एक्सपर्ट्स का कहना है कि लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा होने के बावजूद हिंसा से प्रभावित नहीं रहा है। इसलिए यहां से ज्यादा पर्यटक पहुंचते हैं। कई बार कश्मीर में हिंसा होने के कारण पर्वतारोहियों की संख्या में कमी आती है लेकिन धारा 370 लगने के बाद उम्मीद है घाटी में शांति रहेगी और पर्यटन नई ऊंचाइयों को छुएगा। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि मनाली के अलावा ज्यादातर पर्वतारोही जम्मू-कश्मीर के रास्ते से लद्दाख पहुंचते हैं।

  3. ट्रैवल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हर साल लद्दाख में 2 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचते हैं। 2017 पर्यटन के लिहाज से काफी बेहतर रहा है, इस साल यहां 2.77 लाख पर्यटक पहुंचे थे। 2018 में लद्दाख को बेस्ट एडवेंचर टूरिज्म डेस्टिनेशन का अवॉर्ड भी मिला था।

    ज्यादातर लोग लद्दाखको पांगोंग झील के लिए जानते हैं लेकिन वर्तमान में यहां जंस्कार नदी पर ट्रैकिंग, स्टोक कांगड़ी और नून एंड कुन चोटी पर चढ़ाई पर्यटकों को अधिक आकर्षित कर रही है। पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए करगिल और लेह में स्पोर्ट्स टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा लुबरा वैली और जीरो प्वाइंट भी पर्यटन के लिहाज से देखने लायक जगह हैं। करगिल भी ट्रैकिंग, माउंटेनियरिंग और कैंपिंग के लिए बेहतर डेस्टिनेशन हैं। यहां पेंसी-ला लेक, सुरु वैली, गोमा करगिल, उर्गेयन डिजॉन्ग, शेर्गोल करगिल का मुख्य आकर्षण है।

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  4. कश्मीर के श्रीनगर में चश्मे शाही, शालीमार गार्डन, निशात बाग, शंकराचार्य मंदिर, डल लेक की खूबसूरती आपको अलग अनुभव कराती है। पहलगाम में आरू वैली, बेताब वैली, चंदनवाड़ी के अलावा गोंडोला और शिकारा राइड की सैर पर जा सकते हैं।

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    • जम्मू को डुग्गर प्रदेश भी कहते हैं और यह राज्य की शीतकालीन राजधानी थी है। यहां की भाषा डोगरी है। यहां के मूल निवासियों को डोगरा कहते हैं। यह इलाका संस्कृति के हिसाब से पंजाब व हिमाचल के नजदीक है। शादियां भी पंजाब हिमाचल में होती रहती हैं।
    • संभाग में दस जिले हैं इनमें जम्मू, सांबा, कठुआ, डोडा, पुंछ, राजौरी, रिसासी, रामबन और किश्तवाड़ है। 36,315 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले जम्मू का लगभग 13,297 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तान के अवैध कब्जे में शामिल है। कब्जा 1947-48 में युद्ध के दौरान किया गया था। जम्मू में हिंदुओं की आबादी 67 फीसदी है। शेष 33 फीसदी में मुसलमान, गुज्जर और पहाड़ी समेत अन्य लोग रहते हैं।
    • जम्मू का मीरपुर पाकिस्तान के कब्जे में है। पुंछ शहर को छोडकर बाकी सारी जागीर पाक के कब्जे में है। मुज्जफराबाद भी पाक के कब्जे में है। इस इलाके में कश्मीरी भाषा बोलने वालों की संख्या बहुत कम है। यहां के लोग गुज्जर हैं या फिर पंजाबी।
    • जम्मू के भिंबर, कोटली, मीरपुर, पुंछ, हवेली, बाग, सुधांती, मुज्जफराबाद, हट्टियां और हवेली जिले पाकिस्तान के कब्जे में हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू प्रांत के हिस्से में डोगरी और पंजाबी भाषा बोली जाती है। मुज्जफराबाद में लहंदी पंजाबी व गुजरी बोली जाती है। पाकिस्तान जम्मू में कब्जा किए गए इसी हिस्से को आजाद कश्मीर कहता है।
    • कश्मीर का क्षेत्रफल लगभग 16,000 वर्ग किमी है। इसमें दस जिले श्रीनगर, बड़गाम, कुलगाम, पुलवामा, अनंतनाग, कुपवाड़ा, बारामूला, शोपिया, गांदरबल, बांदीपोरा हैं। घाटी के अलावा यहां बहुत बड़ा पर्वतीय इलाका है, जिसमें पहाड़ी और गुज्जर रहते हैं।
    • जम्मू संभाग पीर पंचाल की पर्वत श्रृंखला में खत्म होता है। इस पहाड़ी की दूसरी तरफ कश्मीर शुरू होता है।
    • पहले इन दोनों संभागों का संबंध गर्मियों में ही जुड़ता था। सर्दियों में बर्फ के कारण दोनों संभाग कटे रहते थे। जम्मू के उलट यहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। शिया लोगों की भी एक बड़ी संख्या है। पर्वतीय इलाकों में गुज्जरों की आबादी ज्यादा है। गुज्जरों की ही एक शाखा को बक्करवाल कहा जाता है।
    • कश्मीरी भाषा केवल घाटी के हिंदू या मुसलमान बोलते हैं। पर्वतीय इलाकों में गोजरी और पहाड़ी भाषा बोली जाती है। घाटी के मुसलमान सुन्नी हैं। बहावी और अहमदिया भी हैं। आतंकवाद का प्रभाव कश्मीर घाटी के कश्मीरी बोलने बाले सुन्नी मुसलमानों तक ही है।
    • 33,554 वर्ग मील में फैले लद्दाख में बसने लायक जगह बेहद कम है। यहां हर ओर ऊंचे-ऊंचे विशालकाय पथरीले पहाड़ और मैदान हैं। ऐसा माना जाता है कि लद्दाख मूल रूप से किसी बड़ी झील का एक डूबता हिस्सा था, जो कई वर्षों के भौगोलिक परिवर्तन के कारण लद्दाख की घाटी बन गया।
    • लद्दाख एक ऊंचा पठार है जिसका अधिकतर हिस्सा 3,500 मीटर (9,800 फीट) से ऊंचा है। यह हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखला और सिंधु नदी की ऊपरी घाटी में फैला है। 18वीं शताब्दी में लद्दाख और बाल्टिस्तान को जम्मू और कश्मीर के क्षेत्र में शामिल किया गया।
    • लद्दाख के पूर्वी हिस्से में लेह के आसपास रहने वाले निवासी मुख्यतः तिब्बती, बौद्ध और भारतीय हिंदू हैं। लेकिन पश्चिम में कारगिल के आसपास जनसंख्या मुख्यत: भारतीय शिया मुस्लिमों की है। तिब्बत पर कब्जे के दौरान बहुत से तिब्बती यहां आकर बस गए थे। चीन लद्दाख को तिब्बत का हिस्सा मानता है। सिंधु नदी लद्दाख से निकलकर ही पाकिस्तान के कराची तक बहती है।
    • लद्दाख कई अहम व्यापारिक रास्तों का प्रमुख केंद्र था। लद्दाख मध्य एशिया से कारोबार का एक बड़ा गढ़ था। सिल्क रूट की एक शाखा लद्दाख से होकर गुजरती थी।
    • दूसरे मुल्कों से यहां सैकड़ों ऊंट, घोड़े, खच्चर, रेशम और कालीन लाए जाते थे। जबकि हिंदुस्तान से रंग, मसाले आदि बेचे जाते थे। तिब्बत से भी याक पर ऊन, पश्मीना वगैरह लादकर लोग लेह तक आते थे। यहां से इसे कश्मीर लाकर बेहतरीन शॉलें बनाई जाती थीं।


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      article 370 revoked j&k split into kashmir and ladakh how tourism will be change in ladakh and kashmir

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भारत में हर साल हजारों लोगों को होता है चिकनगुनिया, पिछले कुछ सालों में चिकनगुनिया के मरीजों में हुई है बढ़ोतरी


बारिश का मौसम आने के साथ ही चिकनगुनिया का खतरा भी बढ़ गया है। चिकनगुनिया बुखार में होने वाला दर्द मरीज को बुखार ठीक होने के कई दिनों बाद तक परेशान करता है। चिकनगुनिया से 100-200 नहीं बल्कि हजारों लोग चिकनगुनिया बुखार का शिकार होते हैं। पिछले सालों में चिकनगुनिया से कई लोग प्रभावित हुए हैं। जानते हैं पिछले सालों के चिकनगुनिया के आंकड़े क्या कहते हैं...

अगर चिकनगुनिया के आंकड़ों की बात करें तो पिछले कुछ सालों में चिकनगुनिया के मरीजों में बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि साल 2018 में चिकनगुनिया के मरीजों में कमी आई है। साल 2015 में 27553, 2016 में 64057, 2017 में 67769 मरीज चिकनगुनिया से प्रभावित पाए गए। वहीं साल 2018 में यह संख्या घटकर 47208 हो गई है। माना जा रहा है कि इस साल भी चिकनगुनिया के मरीजों में कमी हो सकती है।

जानिए डेंगू और चिकनगुनिया में अंतर
डेंगू में बुखार के साथ हाथ-पैर में दर्द रहता है। भूख कम लगने लगती है। जी मिचलाना और उल्टी करने की टेंडेंसी भी हो सकती है। डेंगू का बुखार बहुत तेज होता है और ठंड के साथ बुखार आता है। डेंगू के बुखार का एक खास लक्षण होता है सिर में और आंखों में तेज दर्द। डेंगू की सबसे अहम पहचान होती है कि मरीज को बुखार के साथ कमजोरी लगने लगती है क्योंकि उसके प्लेटलेट्स कम होने लगते हैं। वहीं, चिकनगुनिया के लक्षण भी डेंगू से मिलते जुलते हैं, लेकिन इसमें प्लेटलेट्स काउंट कम नहीं होते हैं इसलिए मरीज को डेंगू की तुलना में कमजोरी कम लगती है। तेज बुखार के साथ जोड़ों में दर्द चिकनगुनिया का सामान्य लक्षण होता है। हालांकि इस बुखार में जोड़ो में दर्द होना सबसे बड़ी परेशानी होती है।


चिकनगुनिया के लक्षण :

  • एडिस मच्छर के काटने के दो-तीन दिन बाद ही चिकनगुनिया के लक्षण नजर आने लगते हैं।
  • इसमें तेज बुखार और जोड़ों में दर्द होता है। मुख्य रूप से हाथ व पैरों की अंगुलियों में ज्यादा दर्द होता है। हालांकि, एक हफ्ते बाद मरीज को आराम आना शुरू हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में जोड़ों का दर्द कई महीनों तक रहता है।
  • सिर में दर्द और मांसपेशियों में जकड़न महसूस होती है।
  • आंखों व दिल में परेशानी महसूस हो सकती है।
  • मरीज को न्यूरोलॉजिकल समस्या भी हो सकती है।
  • जी-मचलना जैसा महसूस होगा और भूख लगनी कम हो जाएगी।
  • इस बीमारी में शरीर पर जगह-जगह लाल रंग के दाने उभर आते हैं।
  • यह रोग एक हफ्ते में ही मरीज को इतना कमजोर कर देता है कि रोगी स्वयं से कुछ करने लायक नहीं रह जाता।
  • कुछ मरीज तेज रोशनी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।


चिकनगुनिया के घरेलू इलाज
1. तुलसी : चिकनगुनिया बुखार में तुलसी के पत्ते बेहद फायदेमंद साबित होते हैं। तुलसी की गुणकारी पत्तियां बुखार को कम कर, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करती हैं। आयुर्वेद में तुलसी की पत्तियों का इस्तेमाल कई प्रकार की दवाइयां बनाने में होता है। इन पत्तियों में एंटीमाइक्रोबियल गुण होता है, जो बीमारी से जल्द उबरने में मदद करता है।

2. लहसुन : जोड़ों के दर्द से राहत दिलाने में लहसुन का कोई मुकाबला नहीं है। इसे प्रभावित जगह पर जितना ज्यादा लगाया जाए, उतना अच्छा है। यह न सिर्फ दर्द से राहत दिलाता है, बल्कि सूजन को कम करके रक्त संचार को बेहतर करता है।

3. गिलोय : गिलोय एक आयुर्वेदिक औषधी है। इसका पौधा विभिन्न बुखारों व बीमारियों में कारगर तरीके से काम करता है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-आर्थराइटिस और इम्यूनोमॉड्यूलेटरी गुण पाए जाते हैं, जो चिकनगुनिया बुखार से राहत दिलाते हैं।



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Thousands of people in India are chikungunya every year, Chikungunya patients have increased in the last few years

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दिव्यांग बेटे को ओवरसीज स्कॉलरशिप दिलाने 11 महीने सिस्टम से लड़ी मां


भोपाल. कोलार की सांईनाथ कॉलोनी में रहने वाले हर्ष वजीरानी भारत सरकार की ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिए चयनित हुए हैं। वे मध्यप्रदेश में दिव्यांग श्रेणी के इकलौते व्यक्तिहैं। हर्ष कहते हैं कि सिलेक्शन जरूर हो गया, लेकिन डेढ़ करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप के लिए इतने ही रुपयों की साल्वेंसी मांगी गई। सारे नाते-रिश्तेदारों ने हमसे किनारा कर लिया था।हमारे लिए डेढ़ करोड़ रुपए की साल्वेंसी जुटाना पहाड़ जैसा काम था। मां ने हार नहीं मानीं। केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत और विभाग के अफसरों से मिलीं। नियम बदला और तय हुआ कि 50 हजार रुपए की एफडी से काम चल जाएगा।

हर्ष कहते हैं कि हफ्ते भर में स्कॉलरशिप की पहली किस्त रिलीज हो जाएगी। मैं एयरो स्पेस इंजीनियरिंग के लिए ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी जा रहा हूं। यूनिवर्सिटी ने मुझे दस लाख रुपए की अतिरिक्त स्कॉलरशिप दी है और टीचिंग के लिए भी मौका दिया है। मैं सेटेलाइट बस डिजाइन पर काम करना चाहता हूं।

  1. मां दीपिका की जिद थी, हर हाल में हर्ष का सपना पूरा हो। वह बताती हैं, बड़े बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया था। अपने गहने बेचकर उसका इलाज हिंदुजा में कराया, लेकिन वह बच नहीं सका। पति और बहू तो पहले ही चल बसे थे। बस छोटा बेटा हर्ष ही है अब मेरे जीने की वजह। हर्ष बचपन से ही आर्थो और न्यूरो की बीमारी से परेशान है। उसके 5 बड़े ऑपरेशन कराए।

  2. ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिए सिलेक्ट तो हो गया, लेकिन डेढ़ करोड़ की साल्वेंसी जुटाना संभव नहीं था। डॉ. प्रकाश वर्मा और एचवी जोशी ने इसमें मदद भी की। फिर, मैंने दिल्ली पहुंचकर मंत्री थावरचंद गेहलोत के दफ्तर में बात की।धीरे-धीरे रास्ता निकलता गया। भोपाल आई तो दिग्विजय सिंह, नरेश ज्ञानचंदानी ने गेहलोत जी से समन्वय किया।

  3. साल्वेंसी को एसडीएम और तहसीलदार से अटेस्टेट कराने में मुश्किलें भी हुईं। मैं बीते 11 महीने से हर दिन इस सिलसिले में किसी न किसी से मिलती रही हूं। बेटा हर्ष हमेशा दूसरों के लिए सोचता है। दिल्ली में रहकर उसने नौकरी से जो पैसे बचाए थे, उसे नारायण सेवा संस्थान और सैनिक कल्याण कोष में दान कर दिया था।

  4. हर्ष कहते हैं कि मैं 2010 में ट्रिपल आईटी ग्वालियर से पासआउट हूं। 2013 में कॉमनवेल्थ स्कॉलरशिप के लिए चयनित हुआ था, लेकिन उस वक्त दुर्भाग्य ही हावी रहा। पिताजी नरेंद्र वजीरानी मेरे कैरियर की चिंता में बीमार हुए और चल बसे। फिर भाई-भाभी भी नहीं रहे। मैं सिलेक्ट हो गया हूं, लेकिन मेरी चिंता मां के लिए है। मैं आस्ट्रेलिया चला जाऊंगा तो मां अकेले कैसे रहेगी?



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      मां दीपिका के साथ हर्ष वजीरानी।

      Click here to Read full Details Sources @ https://www.bhaskar.com/interesting/news/67-year-old-mother-who-fought-the-system-for-11-months-to-provide-overseas-scholarship-to-01610543.html

65 साल के जोए ने जिस एलिगेटर की जान बचाई, उसी ने डिप्रेशन से निकालकर जीना सिखाया


पेंसिलवेनिया. अमेरिकी शहर पेंसिलवेनिया में रहने वाले जोए हेनी का पालतू एलिगेटर वैली भले ही लोगों के लिए डरावना हो, लेकिन जोए के लिए उनके दिल का टुकड़ा है। जब से जोए को वैली का साथ मिला है, उनका तनाव छू-मंतर हो गया है और वह पहले से ज्यादा स्ट्रॉन्ग बन गए हैं। 65 साल के जोए ने वैली को अपने साथ रखने के लिए न सिर्फ डॉक्टर की इजाजत ली है, बल्कि उसका रजिस्ट्रेशन भी इमोशनल सपोर्ट एनिमल के तौर पर करवाया है।

अब इमोशनल सपोर्ट एनिमल के तौर पर हर कोई तो एलिगेटर का नाम रजिस्टर नहीं करवाता, लेकिन जोए शायद ऐसा करवाने वाले पहले शख्स हैं। उनके पालतू एलिगेटर वैली को भी लोगों को गले लगाना और लाड-दुलार करना बेहद पसंद है। जोए कहते हैं- 5 फीट का वैली इतना इमोशनल है कि बिल्लियों से भी डर जाता है, मेरे बीमार होने पर खुद मेरे पास आ जाता है।

  1. जोए के मुताबिक, उन्होंने डिप्रेशन के शिकार होने के बाद दवा लेने से मना कर दिया था, क्योंकि वह इस बीमारी को दवा से दूर करना ही नहीं चाहते थे। उन्होंने बताया, मेरा वैली तो बिल्कुल पेट डॉग जैसा है। काफी सॉफ्ट और शांत, लोग यकीन नहीं करते हैं, लेकिन सच में वह बिल्लियों से भी डरता है और उसने आज तक किसी को नहीं काटा। मैं जानता हूं कि अगर वैली चाहे तो मेरा बाजू भी काट खा सकता है, लेकिन मुझे उससे कोई डर नहीं लगता है।

  2. वैली को अच्छा लगता है जब कोई उसे लाड-दुलार करे। उसका ख्याल रखे। उसने मेरी भी जिंदगी बदल दी है। जब भी कभी मेरा मूड बिगड़ता है, तो उसे पता चल जाता है और वह अपने-आप मेरे पास आ जाता है। कई बार मेरी तबियत ठीक न होने पर वह खुद मेरे बेड पर आ चुका है।

  3. जोए कहते हैं कि फिलहाल वैली चार साल का है और अभी उसका कद साढ़े पांच फीट है और कुछ सालों में साढ़े 16 फीट हो जाएगा लेकिन उन्हें इस बात को सोचकर चिंता नहीं होती कि आने वाले समय में वैली के व्यवहार में क्या बदलाव होगा क्योंकि वह जैसा है वैसे ही रहेगा। उन्होंने कहा, वैली का मेरी जिंदगी में आना किसी संयोग से कम नहीं था।

  4. वैली मुझे और मेरे एक दोस्त को ऑरलैंडो में मिला था और अगर उस दिन वैली को न बचाया होता तो वह शायद इस दुनिया में ही नहीं होता। उस वक्त मैं बुरे डिप्रेशन से जूझ रहा था, लेकिन वैली जब भी मेरे पास होता तो मुझे अच्छा लगता। मेरे डॉक्टर ने भी इस चीज को नोटिस किया और मैंने वैली का रजिस्ट्रेशन बतौर रजिस्टर्ड सपोर्ट एनिमल के तौर पर करवा लिया।

    जोए और वैली एलिगेटर।

  5. अब मैं उसके साथ शॉपिंग से लेकर पार्क में घूमने जाता हूं और अक्सर हम नर्सिंग होम सेंटर जाते हैं। यहां सबका ध्यान वैली पर होता है। लोग उसे देखकर सहम जाते हैं और तब मुझे उन्हें समझाना पड़ता है कि वे डरे नहीं, यह मेरा अपना है और कुछ नहीं करेगा। मैं नहीं जानता कि वैली के बिना मेरी जिंदगी कैसी होती क्योंकि वह मेरी लाइफ लाइन है।

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      वैली के साथ जोए।
      Wally made life line for 65-year-old Joe, lives like both close friends

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दोस्ती के 5 किस्से: ये सिखाते हैं कि हालात कैसे भी हों, दोस्त ही काम आता है


हैप्पी लाइफ डेस्क. दोस्ती का भी एक साइंस है, जो कहता है लंबी उम्र चाहिए है तो दोस्तों की संख्या बढ़ाइए। अमेरिका की ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी की रिसर्च कहती है कि दोस्त न होना मोटापे से भी ज्यादा खतरनाक है। इससे जान काजोखिम बढ़ता है। सबसे अच्छा दोस्त वही है, जो आपकोकभी अकेला नहीं छोड़ता। आज फ्रेंडशिप डे है।जानिए दोस्ती के ऐसे 5 मशहूर किस्से, जोदोस्ती शब्द के मायने समझाते हैं और सिखाते हैं कि दुनिया भले ही साथ छोड़ दे, सच्चा दोस्त कभी साथ नहीं छोड़ता।

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    27 साल से टीवी शो‘आप की अदालत’ को होस्ट कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा और पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की दोस्ती शुरुआत बिल्कुल फिल्मी थी। बात 45 साल से भी ज्यादा पुरानी है।वाकयादिल्ली के एक कॉलेज का है। यह वह दौर था जब रजतकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी।रजत ने एक बार बताया था,“मैं बहुत होशियार नहीं था।11वीं में मेरा नाम मैरिट में आया। इसके बाद मुझे श्रीराम कॉलेज में दाखिला मिल गया। इस घटना से मेरा जीवन ही बदल गया। कॉलेज में पहले दिन मेरी मुलाकात अरुण जेटली से हुई। अरुण उस समय कॉलेज यूनियन के अध्यक्ष थे। कॉलेज का पहला दिन था, मैं फीस जमा करने के लिए लाइन में लगा था। जेब में कुछ ही सिक्के थे, जिन्हें मैं बार-बार गिन रहा था, क्योंकि फीस पूरी नहीं थी। देरी होने के कारण अकाउंटेंट ने मुझे डांटा और कहा- इकट्ठे पैसे लेकर आया करो। जब फीस दी, तो उसमें 4 रुपए कम थे। अकाउंटेंट एक बार फिर जोर से चिल्लाया। उस समय अरुण वहां आए और अकाउंटेंट को डांटा- फ्रेशर से ऐसीबातकैसे कर सकते हो। अरुण ने फीस पूरी करने के लिए जेब से 5 रुपए निकालकर मुझे दिए। फिर कंधे पर हाथ रखकर कैंटीन लेकर आए। बोले- तुम्हारे पास तो चाय के लिए भी पैसे नहीं होंगे, चलो तुम्हें चाय पिलाता हूं।”

    पूरेवाकये को रजतने आप की अदालतमें खुद साझा किया। दोनों के जीवन की यह घटना दोस्ती के बीज की तरह थी। जो सालों पहले पारिवारिक रिश्ते में तब्दील हो गया। बताते हैं कि जेटली ने रजत की शादी अपने बंगले पर रचाई और बाद में उनके टीवी करिअर में भी भरोसेमंद दोस्त की तरह हमेशा साथ निभाया। पिछले साल दिल्ली क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पद पर रजत शर्मा के चुनाव के पीछे भी जेटली की दोस्ती को बड़ा कारण माना जाता है।

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    भारतीय क्रिकेट की सबसे चर्चित दोस्ती है सचिन और विनोद कांबली की। इन्हें मुम्बई क्रिकेट के ‘जय-वीरू’ के नाम से भी जाना है। दोस्ती की शुरुआत तब हुई, जब सचिन की उम्र 9 और विनोद कांबली की 10 साल थी। जगह थी मुंबई का शारदा श्रम स्कूल। यहां पढ़ाई, मजाक, मस्ती और सजा भी दोनों को साथ मिलती थी। क्रिकेट भी साथ ही खेलते थे। गहरी दोस्ती का ही नतीजा था कि 1988 में दोनों ने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। दोनों ने मिलकर स्कूल क्रिकेट में 664 रन बनाए, जिसे गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में शामिल किया गया। इस घटना के बाद दोनों लाइमलाइट में आए और कुछ साल बाद भारतीय टीम में शामिल हुए।

    कांबली के मुताबिक, ‘‘कैंटीन में हम दोनों का फेवरेट फूड वडापाव था। कौन कितने वड़ा पाव खा सकता है, इसकी भी शर्त लगती थी।’’सचिन के 100 रन बनाने पर विनोद उन्हें 10 वडापाव खिलाते थे। यही सचिन भी विनोद के लिए करते थे। स्कूल में भाषण देने की बारी आने पर चालाकी से विनोद सचिन को पीछे छोड़ देते थे। ऐसा ही एक वाकया है, जब सचिन को स्पीच देनी थी। सचिन का भाषण बमुश्किल एक से दो मिनट का था। लेकिन कांबली ने अंग्रेजी के टीचर से भाषण लिखवाया और उसे मंच पर पढ़कर सचिन को हैरानी में डाल दिया।

    दोस्ती का कारवां आगे बढ़ा और मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम पहुंचा। जी तोड़ मेहनत रंग लाई और दोनों क्रिकेट जगत में सितारे की तरह चमके। लेकिन इस बीच पहली बार दोनों का प्यार भरा झगड़ा भी हुआ। वजह थी किसमें कितनी ताकत है। जगह थी स्टेडियम की विट्ठल स्टैंड की चौथी कतार। हाथापाई शुरू हुई लेकिन सचिन को खुश देखने के लिए कांबली जानबूझकर जमीन पर गिर गए। कांबली ने एक इंटरव्यू बताया, मुझे हराने में सचिन को बहुत मजा आता था चाहेक्रिकेट का मैदान हो या स्कूल में ताकत दिखाने की आदत। सचिन उनसे उम्र में छोटे थे, वह उन्हें निराश नहीं करना चाहते थे। कांबली के मुताबिक, सचिन को हमेशा से ही पंजा लड़ाकर ताकत दिखाने का शौक रहा है।

    दोनों ने 14-15 साल की उम्र में 1987 वर्ल्ड कप में बतौर बॉल बॉयक्रिकेट से जुड़े। मैच इंग्लैंड और भारत के बीच था। यह वो दिन था जब दोनों ने मिलकर सपना देखा कि अगला वर्ल्ड कप हम साथ मिलकर ही खेलेंगे और ऐसा ही हुआ। 1992 में वर्ल्ड कप खेला। अब तक के सफर में दोनों के बीच कई बार दोस्टी टूटने की खबरें भी आईं, लेकिन दोनों हमेशा इस पर शांत रहे और कभी एक-दूसरे का विरोध नहीं किया।

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    दोस्त की बिगड़ी छवि को सुधारने और उसे सही पटरी पर लाने का काम एक दोस्त ही कर सकता है।फिल्ममेकर राजकुमार हीरानीऔर अभिनेता संजय की दोस्ती भी इसी पटरी पर आगे बढ़ती है। फिल्म संजू बनाने के बाद राजकुमार हीरानी पर संजय की बिगड़ी छवि को सुधारने के आरोप लगे। यूं तो संजय और राजकुमार ने कभी खुलकर एक-दूसरे से दोस्ती को नहीं स्वीकारा लेकिन ‘संजू’ में छवि बदलने के आरोप लगे तो आखिरकार हीरानी ने स्वीकारा कि उन्होंने फिल्म में कई ऐसे सीन डाले जो संजय के प्रति लोगों के दिलमें सहानुभूति पैदा करते हैं।

    राजकुमार और संजय की पहली मुलाकात 2003 में हुई। हीरानी फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस के लिए जिमीशेरगिल के रोल में संजय दत्त को लेना चाहते थे और मुन्नाभाई के लिए शाहरुखपहली पसंद थे। लेकिन बात नहीं बन पाई और अंत में संजय ने मुन्नाभाई का किरदार निभाया। दोनों की दोस्ती आगे बढ़ी और संजय की पत्नी मान्यता के कहने पर हीरानी ने संजू की बायोपिक कीशुरू की।

    राजकुमार के मुताबिक, जब फिल्म का एक हिस्सा बनकर तैयार हुआ, तो उसे पहले उन लोगों को दिखाया गया जो संजय दत्त से नफरत करते थे। उनका जवाब था, हम इस इंसान से नफरत करते हैं और ऐसी फिल्म नहीं देखना चाहते। इसके बाद फिल्म में कुछ बदलाव किए गए।

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    बिजनेसमैन उदय कोटक, आनंद महिंद्रा को सिर्फ दोस्त ही नहीं मेंटर और गाइड भी मानते हैं। दोस्ती की शुरुआत उस समय हुई जब उदय की शादी हो रही थी, तो मेहमानों में आनंद भी थे। आनंद विदेश से पढ़कर तभी लौटे थे और महिंद्रा एंड महिंद्रा समूह की कंपनी महिंद्रा स्टील का कारोबार देख रहे थे। यह स्टील कंपनी कोटक की क्लाइंट थी।बातों-बातों में कोटक के व्यापार में निवेश की बात निकल आई और 30 लाख रुपए के शुरुआती इक्विटी कैपिटल के साथ नई कंपनी की शुरुआत करने की बात तय हुई। आनंद के पिता भी उदय की कंपनी के चेयरमेन बनने कोराजी हो गए।

    जब आनंद की एंट्री बोर्ड मेंबर्स में हुई, तो उन्होंने कंपनी को नाम दिया-कोटक महिंद्रा। इस तरह कोटक महिंद्रा फाइनेंस की शुरुआत हुई। महिंद्रा के जुड़ने से कंपनी की विश्वसनीयता और बढ़ गई। हालांकि 2009 में आनंद महिंद्रा ने अपने आप को इस कंपनी से अलग कर लिया, पर आज भी महिंद्रा का नाम इस कंपनी से जुड़ा है।

    2017 में कोटक-महिंद्रा बैंक की एक स्कीम की लॉन्चिंग पर कोटक महिंद्रा ग्रुप के एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरपर्सन और मैनेजिंग डायरेक्टर उदय कोटक ने यह बात साझा की थी। इसको लेकर आनंद ने ट्वीट किया जिसमें लिखा था, ‘‘1985 में युवा उदय कोटक मेरे ऑफिस आए थे, वह बहुत स्मार्ट थे।मैंने पूछा कि क्या मैं उनकी कंपनी ने निवेश कर सकता हूं, यह मेरा सबसे बेहतरीन निर्णय था।’’ इसका जवाब देते हुए उदय ने लिखा, ‘‘धन्यवाद आनंद, इस पूरी यात्रा में आप मेरे दोस्त, मेंटर और मार्गदर्शक रहे हैं।’’

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    दोस्ती का एक बेहतरीन किस्सा बायोकॉन की मैनेजिंग डायरेक्टर किरणमजूमदार शॉ से भी जुड़ा है। जीवन में एक समय ऐसा भी आया था जब पति और दोस्त दोनों कैंसर से जूझ रहे थे लेकिन उन्होंने बिजनेस, परिवार और दाेस्ती के बीच तीनों ही जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं भीं दूसरों की मदद का रास्ता भी साफ किया।

    किरणकी सबसे करीबी दोस्त नीलिमा रोशेन को 2002 में कैंसर डिटेक्ट हुआ था। आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार से होने के बाद भी ज्यादातर दवाएं बाहर से आने कारण नीलिमा को पैसों की बेहद जरूरत थी। ऐसे में किरण उनके साथ खड़ी रहीं और आर्थिक मदद की। किरण दोस्त की बीमारी के तनाव से बाहर निकल पाती इससे पहले उन्हें एक और खबर ने परेशान कर दिया। 2007 में पता चला कि पति जॉन शॉ भी कैंसर से जूझ रहे हैं।

    दोनों ही घटनाओं ने किरण को इस हद तक परेशान किया कि भविष्य में दूसरे के साथ ऐसा न हो, इसका हल सोचने पर मजबूर कर दिया। किरण ने नारायण हृदयालय के देवी शेट्टी के साथ मिलकर बेंगलुरुमें 2007 में मजूमदार-शॉ कैंसर हॉस्पिटल की शुरुआत की, जो बेहद कम खर्च में कैंसर का इलाज उपलब्ध कराता है।

    कई महीने के चले इलाज के बाद किरण को पति केकैंसर मुक्त होने की खबर मिली। किरन के मुताबिक, जब डॉक्टर के मुंह से यह खबर सुनी कि जॉन अब पूरी तरह स्वस्थ हैं, इस खुशी को शब्दाें में नहीं बता सकती। दोस्त के इलाज के दौरान किरणने उनके साथ काफी समय बिताया, उनके साथ टूर पर भी गईं ताकि वह अच्छा महसूस करें। किरणहर वीकेंड पर हैदराबाद दोस्त से मिलने आती थीं और सरप्राइज पार्टी देती थीं। व्यस्तता के बावजूद उनके साथ समय बिताती थीं।एक दिन नीलिमा ने अंतिम सांस ली लेकिन यह दोस्ती अंतिम समय तक कायम रही।



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      bhaskar special story on friendship day 5 story that tells a friend need is a friend indeed
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तनाव कम करने बनाया 'ब्वॉयफ्रेंड', गले लगाते ही म्यूजिक बजाएगा, अकेलापन भी दूर करेगा


टोक्यो. जापान की वीडियो गेम कंपनी लेवल-5 ने ओतोमे युशा के साथ मिलकर एक नकली ब्वॉयफ्रेंड तैयार किया है। लड़कियों और महिलाओं इसे गले लगाकर अपना तनाव दूर कर सकेंगी। इसे अपने साथ कहीं भी ले जा सकती हैं। जैसे कि रेस्त्रां, थियेटर या शॉपिंग सेंटर। इस प्रोडक्ट का नाम 'ब्वॉयफ्रेंड हग स्पीकर्स' है।

दो बड़ेबाजुओं वाले इस प्रोडक्ट के साथ सफेद रंग का एक पिलो (तकिया) लगा है, जिस पर कंपनी की नई गेम हीरो ऑफ मेडन्स के मेन कैरेक्टर का स्केच बना है। आपको ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करवाने के लिए इन बाजुओं में ब्लूटुथ स्पीकर्स भी लगे हैं जिनको गले लगाने पर म्यूजिक बजता है।

कंपनी ने एक ही सेट, प्रतियोगिता के विनर को ही मिलेगा
बहरहाल, इस ब्वॉयफ्रेंड स्पीकर को हासिल करना इतना भी आसान नहीं क्योंकि ओतोमे युशा ने सिर्फ इसका एक ही सेट बनाया है और वह भी सेल के लिए नहीं है। हालांकि, कोई भी लकी विनर इसे जीत सकता है। दरअसल, ओतोमे युशा कंपनी एक इसके लिए ट्विटर पर एक कंपीटिशन शुरू किया है जिसके विनर के नाम की घोषणा 9 अगस्त को होगी और उसे ये स्पीकर्स दिए जाएंगे।

लड़कों के लिए भी हों ऐसे स्पीकर्स
कंपनी के एक अधिकारी ने बताया, हालांकि ब्वॉयफ्रेंड हग स्पीकर्स काफी कमाल हैं, लेकिन कई लोगों का मानना है कि इनका इस्तेमाल तो सिर्फ लड़कियां और महिलाएं ही करेंगी। लड़कियों की आवाज में भी ऐसे स्पीकर्स होने चाहिए क्योंकि वे भी अकेलापन महसूस करते हैं और ऐसे समय में उन्हें भी किसी ऐसे की जरुरत होती है जो उन्हें गले लगा सके।

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Japanese video game company has partnered up with Otome Yusha to provide a solution

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बार्बी डॉल को लेगो टॉय ने पीछे छोड़ा, प्लास्टिक ब्रिक्स के खिलौनों की मांग बीते दो वर्ष में बढ़ी


बीजिंग. चीन में बच्चों के बीच डेनमार्क की कंपनी लेगो ग्रुप के प्लास्टिक की इंटों से बनने वाले गेम टॉय की बढ़त चौंकाने वाली है। उसने लोकप्रियता में अमेरिकी कंपनी मैटेल की बार्बी डॉल को चीन में पीछे छोड़ दिया है। पिछले दो वर्ष में लेगो ने चीन में 89 स्टोर खोले हैं। लेगो को चीन की कामयाबी से सहारा मिला है। 2017 में लेगो ने 1400 नौकरियां खत्म कर दी थीं। पिछले दस वर्ष में पहली बार उसकी आय और मुनाफे में कमी आई थी।

2018 मेंउसने फिर बढ़त हासिल कर ली और आय व मुनाफा 4% बढ़ गए। इस तरह लेगो ने दुनिया के सबसे बड़े खिलौना निर्माता का दर्जा बनाए रखा है। उसने यह दर्जा अमेरिकी कंपनी मैटेल से 2014 में छीना था।

चीन के लिए लेगा के तीन सेट लॉन्च

पश्चिमी देशों के समान लेगो के इंटों से बनने वाले आकारों के शैक्षणिक पहलू ने चीनी पेरेंट्स को प्रभावित किया है। लेगो ने स्थानीय रुचि का ध्यान रखा है। उसने खासतौर से चीन के लिए तीन सेट लॉन्च किए हैं। ऐसा पहली बार किसी देश के लिए किया गया है। चीनी नव वर्ष का डिनर किट, ड्रैगन बोट रेस जैसे सेट लोगों को आकर्षित करते हैं।

4.5% की हिस्सेदारी के साथ लेगो पहले स्थान पर

मैटेल ने बार्बी को भी चीनी रूप दिया है, लेकिन वह लोगों पसंद नहीं आया। 2009 में मैटेल ने मध्य शंघाई की एक लग्जरी शॉपिंग स्ट्रीट में विश्व की सबसे बड़ी बार्बी शॉप खोली थी। दो वर्ष बाद दुकान बंद करना पड़ी। चीन में मैटेल का सबसे सफल ब्रांड शैक्षणिक बेबी टॉय फिशर प्राइस है। इसका मार्केट शेयर 1.1% है। बार्बी 0.3% के साथ 31 वें स्थान पर है। इसकी तुलना में 4.5% की हिस्सेदारी के साथ लेगो पहले स्थान पर है।

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लेगो

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आवाज से कंट्रोल होने वाली एआई साइकिल बनाई, तेज गति और बाधा आने पर अलर्ट करेगी


लाइफस्टाइल डेस्क. चीन की शिंगुआ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ऐसी एआई साइकिल तैयार की है जो आवाज से नियंत्रित की जा सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस साइकिल में लगे वॉइस असिस्टेंट एलेक्सा से बोलने भर से ही गति बढ़ाई-घटाई जा सकती है। इसे दाएं-बाएं मोड़ने के लिए भी आपकी आवाज ही काफी है। एआई साइकिल रास्ते में बाधा आने और स्पीड अधिक बढ़ने पर अलर्ट भी करती है। साथ ही बैलेंस बनाने का काम भी अपने आप करती है।

  1. शोधकर्ताओं के मुताबिक, साइकिल के पिछले पहिए में एआई चिप लगाई गई है। साइकिल कितनी मजबूत है इसकी जांच गायरोस्कोप से की गई है। रास्ते में आने वाली बाधाओं का पता लगाने के लिए कैमरा फिट किया गया है। माइक्रोफोन की मदद से साइकिल चलाने वाले की आवाज से यह कंट्रोल होती है और स्पीड अधिक बढ़ने में इसमें लगा सेंसर बताता है कि यह तेज गति से चल रही है।

  2. नेचर जर्नल के मुताबिक, यह साइकिल एक से दूसरे देश की यात्रा करने के लिए परफेक्ट है क्योंकि यह सामने खड़े इंसान को पहचानने और एक सीधी लाइन में चलने में भी समर्थ है। हालिया जारी इसके वीडियो के अनुसार, सड़क पर स्पीड ब्रेकर और ट्रैफिक को समझने में सक्षम है। ऐसी स्थिति में संभलने के लिए राइडर को पैडल तक का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता।

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  3. ब्रिटिश साइकिलिंगके पॉलिसी मैनेजर निक चैंबरलिन का कहना है कि हम एआई तकनीक से लैस साइकिल को देखने के लिए उत्सुक हैं। यह साइकिल चलाने का अंदाज बदल देगी। यह खासकर बुजुर्ग, दिव्यांग या बीमार लोगों के लिए बेहतरीनसाबित होगी। नई तकनीक के इस्तेमाल से भविष्य में एक से दूसरी जगह जाना काफी उत्साहित करने वाला है।

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      AI bike developed in China self balances avoids obstacles and responds to voice commands
      AI bike developed in China self balances avoids obstacles and responds to voice commands

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फिल्टर लगाकर खुद को महारानी बताकर धोखा देने वाली 58 साल चीनी व्लॉगर पर लगा प्रतिबंध


लाइफस्टाइल डेस्क. उम्र छिपाकर खुद को महारानी बताने वाली चीनी व्लॉगर कुइयाव बिलुआव पर चीन के लाइफ स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने प्रतिबंध लगा दिया है। उसके सभी वीडियो हटा दिए गए हैं। महिला पर आरोप है उसने अपनी पहचान और उम्र छिपाकर लोगों को धोखा दिया है। महिला खुद को ‘आपकी महारानी कुइयाव बिलुआव’ के नाम से सम्बोधित करती है। मामला चीन के फेमस लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म डोउ यू का है, जिस पर महिला के हजारों फॉलोवर हैं।

  1. महिला की उम्र 58 साल है और लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग के दौरान फिल्टर का इस्तेमाल करती है। जिसके कारण वह काफी युवा दिखाई देती है। मधुर और कर्णप्रिय आवाज के कारण उसे लोगों ने प्यारी देवी की उपाधि दी है। कई डोउ यू यूजर उसकी देवी की तरह पूजा करते हैं।

  2. मामला 25 जुलाई को सामने आया था। जब महिला एक यूजर से लाइव बात कर रही थी। इस दौरान फिल्टर ने अचानक काम करना बंद कर दिया था और असली चेहरा सामने आ गया। काफी समय से यूजर्स फिल्टर हटाकर उससे चेहरा दिखाने की गुजारिश कर रहे थे जिसे महिला नजरअंदाज कर रही थी। महिला का जवाब था, चूंकि मैं एक बेहतरीन होस्ट हूं इसलिए 8 लाख रुपए मिलने के बाद चेहरा दिखाउंगी। वीडियो स्ट्रीमिंग के दौरान बड़ी संख्या में यूजर उसे महंगे डिजिटल गिफ्ट भेजते थे।

  3. जिस समय महिला की पोल खुली तब तक उसे यूजर्स 4 लाख रुपए भेज चुके थे। मामला सामने आने पर महिला ने बताया, यह सब योजनाबद्ध तरीके अंजाम दिया जा रहा था। मैंने प्रसिद्धी पाने के लिए ऐसा किया। एक विबो यूजर का कहना है कि अब महिला को प्रतिबंधित कर दिया गया है, यह घटना काफी परेशान कर देने वाली है। एक महिला यूजर का कहना है वह अपना खुद का प्लेटफॉर्म विकसित करने के लिए पैसा इकट्ठा कर रही थी।

  4. इस मामले पर चीनी माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट सीना विबो पर वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म डोउ यू ने अपना बयान जारी किया है। बयान में कंपनी ने कहा है, महिला ने लोगों को धोखा दिया है। लोगों से जुड़ने वाले प्लेटफार्म को चुनौती दी है और समाज में इसका गलत असर पड़ेगा। हम ऐसी चीजों का विरोध करते हैं। हम इंटरनेट पर सिर्फ सकरात्मक चीजों को ही बढ़ावा देते हैं।



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      Chinese Vlogger Banned from Live Streaming Platform after Glitch Reveals Her Real Age as fliter didnot work
      Chinese Vlogger Banned from Live Streaming Platform after Glitch Reveals Her Real Age as fliter didnot work

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प्लास्टिक नहीं मिट्टी के गमलों में लगाएं पौधे, छत, बालकनी और जमीन के मुताबिक लगाएं सब्जियां


हैप्पी लाइफ डेस्क. अमूमन लोगों को यही लगता है कि सब्जियां उगाने के लिए बड़े बगीचे की जरूरत होती है। पर इन्हें घर पर भी उगा सकते हैं। अगर जमीन से जुड़ा बगीचा नहीं है तो सब्जियों को गमलों और प्लांटर बैग्स में लगाकर बालकनी या छत पर भी रख सकते हैं।आशीष कुमार, सीएसआईआर-सीमैप अनुसंधान केंद्र, हैदराबाद से जानिए घर में कैसे उगाएं सब्जियां...

  1. घर में फल-सब्ज़ियां उगाने के लिए सही जगह चुनना बहुत ज़रूरी है। जहां बगीचाबना रहे हैं वह स्थान खुला और सूर्य की रोशनी से पूर्ण होना चाहिए। जब इन्हें भरपूर हवा और सूर्य की रोशनी मिलेगी तभी ये अच्छी तरह से उग पाएंगी। किचन गार्डन या गृहवाटिका के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी का उपयोग करें।

  2. अगर जमीन से जुड़ा छोटा बगीचा हो तो इसमें फूलगोभी, पत्तागोभी, हरा धनिया, करी पत्ता, पुदीना, मेथी, गाजर, गांठगोभी, हरा प्याज, पालक, आलू, मटर, मूली आसानी से उगा सकते हैं। बाउंड्री के किनारे खाली स्थान पर क्यारियां बनाकर कद्दू, लौकी, फ्रेंच बीन्स, खीरा, तोरई उगा सकते हैं। अगर बगीचा नहीं है तो प्लांटर बॉक्स भी लगा सकते हैं। इनमें गोभी, बैंगन, टमाटर बहुत आसानी से उगते हैं। इन्हें बालकनी, छत या पीछे के हिस्सों में रख सकते हैं।

  3. सब्जियां मौसम के अनुसार लगाएं और पौधो की संख्या सीमित रखें। प्लास्टिक के गमलों की जगह मिट्टी के गमलों में पौधे लगाएं। सब्जियों के बीजों की बुवाई पंक्तियों में करें। पौधे या बीजों की बुवाई करते वक्त इनके बीच थोड़ी दूरी रखें। फैलने वाले पौधों के लिए कतार से कतार की दूरी अधिक रखें ताकि पौधों को बढ़ने के लिए उचित स्थान मिल सके। विभिन्न सब्जियाेंमें पौधे से पौधे की दूरी और कतार से कतार की दूरी रखें।

    • गमलों में भी सब्जियां आसानी से उगा सकते हैं। गमलों के नीचे पानी की निका्सी के लिए ट्रे लगा दें ताकि जमीन पर पानी न गिरे।
    • अगर छत है तो सब्जियों के लिए इससे बेहतर जगह और कोई और नहीं हो सकती। यहां गमलों पर सीधी धूप पड़ेगी जिससे सब्जियां अच्छी तरह से उग सकेंगी।
    • छत नहीं है तो बालकनी में जमीन या स्टैंड पर भी गमले रख सकते हैं। इनमें पुदीना, बैंगन, टमाटर, मेथी, हरी मिर्ची, धनिया, करेला, मूली, चुकंदर, बेसिल आदि उगा सकते हैं। हरी पत्तियों की सब्जियां लंबे व आयताकार गमलों में लगाएं ताकि ये फैल सकें।
    • आलू, चुकंदर, अरबी आदि जड़ वाली सब्जियां भी छोटे स्थान पर आसानी से उगा सकते हैं। प्लांटर बैंग्स में इन्हें लगाकर बालकनी या किसी खुले स्थान पर रखें। इन बैग्स में नीचे का हिस्सा खोलकर सब्जियां निकाल सकते हैं।
    • बालकनी में सब्जियां उगाना चाहते हैं तो वर्टिकल गार्डन में छोटी- छोटी सब्ज़ियां जैसे हरा धनिया, पुदीना, हरी मिर्च आदि लगा सकते हैं। वहीं बेल वाले पौधे जैसे मटर, कुंदरू, करेला आदि लगा सकते हैं।
    • रेलिंग के पास लम्बे कंटेनर रखकर कद्दू, लौकी, खीरे, तोरई लगाकर बेल चढ़ा सकते हैं। अगर दीवार के सहारे बेल नहीं लगाना चाहते तो इसके लिए अलग से जाली भी लगा सकते हैं।


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      how to make garden at home and how to harvest vegetable at home

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होमवर्क को बनाएं आसान लेकिन बच्चों की आदत न बिगड़ने दें


लाइफस्टाइल डेस्क. बच्चों को होमवर्क कराना कई अभिभावक अपनी ड्यूटी मानते हैं, कैसे भी बस कराना है, तो वहीं बच्चों की बात करें तो उन्हें ये काम कम ही पसंद होता है या उसे मजबूरी समझते हैं। लेकिन रोज की ये पढ़ाई जरूरी है, ताकि बच्चे को भविष्य के लिए तैयार किया जा सके।

टाइम टेबल कैसे सेट करें
अधिकतर माता-पिता बच्चों के लिए टाइम-टेबल बनाते हैं। इसमें थोड़ा बदलाव कीजिए। बच्चों से कहिए कि वे अपना टाइम टेबल खुद सेट करें। इसमें स्कूल से आने के बाद के समय से शुरूआत करने को कहें। इसमें उनके खेलने, खाने, आराम के समय को शामिल किया जाना चाहिए। ऐसा करने से वो अपनी पसंद के अनुसार होमवर्क का समय तक कर सकेंगे। इससे उनकी प्रबंधन क्षमता भी विकसित होगी। होमवर्क के लिए एक निश्चित समय तय करें। बच्चे की उम्र के आधार पर 15 मिनट, 30 मिनट या एक घंटा भी निर्धारित किया जा सकता है।

आसपास रहें आप
बच्चे अक्सर होमवर्क करते-करते खेलने लगते हैं या उनका ध्यान और किसी चीज़ में लग जाता है। कोशिश करें कि बच्चे की स्टडी टेबल वहां हो जहां आप आसपास रहें। कोशिश करें कि, जब बच्चा होमवर्क कर रहा हो उस दौरान आप अपनी पसंदीदा किताब पढ़ सकते हैं। इससे बच्चा भी आपको देखकर गंभीरता से अपना कार्य करेगा। इसके अलावा पास रहने से आप बच्चे पर नज़र भी रख सकेंगे कि वह ठीक से अपना कार्य कर रहा है या नहीं।

शिक्षक से संपर्क में रहें
अभिभावक हमेशा शिक्षक से संपर्क में रहें। इससे उन्हें बच्चे से सम्बंधित सारी जानकारी मिल सकेगी। पेरेंट्स-टीचर मीटिंग हमेशा अटेंड करें। स्कूल डायरी को बिना लापरवाही के चैक करें। इससे बच्चे को भी लगेगा कि आप उसकी पढ़ाई को लेकर सक्रिय रहते हैं।

मज़बूत हो बुनियाद
बच्चों का होमवर्क खानापूर्ति मात्र न हो। होमवर्क कराते वक्त इस बात का ख्याल रखें कि बच्चा बुनियादी शिक्षा ले रहा है या नहीं। सिर्फ परीक्षा में पास होना या अच्छा प्रदर्शन ही उद्देश्य न हो। बच्चे परीक्षा में दिए सवालों ही पढ़ाई समझते हैं। उन्हें शुरू से तर्क के साथ याद करने के बारे में बताएं , ताकि हर छोटी चीज के बारे में जान-समझ सकें।

किन चीजों से दूरी रहे
बात बहुत सामान्य है पर इस पर ध्यान कम ही देते हैं। घर में मौजूद कई चीजें ऐसी हैं जो बच्चों का ध्यान भटकाती हैं। इनमें टी.वी, कम्प्यूटर, मोबाइल फोन मुख्य हैं। बच्चे जहां पढ़ाई करते हैं उस जगह पर इन चीजों को न रखें या पढ़ाई के लिए अलग जगह की व्यवस्था करें। माएं अक्सर बच्चों को होमवर्क करने बैठाकर फोन इस्तेमाल करने लगती हैं या टी.वी देखने लगती हैं। ऐसा करने से बच्चे का ध्यान भटकता है और उन्हें लगता है कि उनसे जबरदस्ती होमवर्क कराया जा रहा है, जबकि मम्मी खुद टी.वी/फोन चला रही हैं। इसलिए कोशिश करें कि बच्चे की पढ़ाई की जगह एकांत में हो।

मदद करने की कोशिश न करें
अभिभावक अक्सर बच्चे का अधिक होमवर्क देखकर मदद करने बैठ जाते हैं। कुछ तो होमवर्क बांट लेते हैं, उदाहरण के तौर पर असाइनमेंट, प्रोजेक्ट आदि को खुद बनाने लगते हैं। इस बात का ख्याल रखें कि यह कार्य बच्चे का है आपका नहीं। आपके द्वारा की गई एक बार की मदद उन्हें आप पर निर्भर कर देगी। मदद करना चाहते हैं तो उन्हें मार्गदर्शन दें न कि खुद करने न बैठ जाएं।



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make home work for kids know what to remember while completing home work

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इंस्टाग्राम पर कमाई के मामले में जिफपॉम ने सेलिब्रिटीज को पीछे छोड़ा, एक पोस्ट से कमाता है 9 लाख रु.


हैप्पी लाइफ डेस्क. इंस्टाग्राम पर फैन फॉलोइंग और कमाई के मामले में सेलिब्रिटीज को एक कुत्ता टक्कर दे रहा है। इसका नाम जिफपॉम है। इंस्टाग्राम पर इसके 90 लाख से अधिक फॉलोअर हैं और अपनी एक पोस्ट से 9.6 लाख रुपए तक कमाता है। जिफपॉम अपनी पोस्ट में कई कंपनियों के प्रोडक्ट को प्रमोट करता है और इसके नाम कई रिकॉर्ड हैं। कई सेलिब्रिटीज जैसे डैनियन जोनस और सुपरवुमन-लिली सिंह भी इसे फॉलो करते हैं।

  1. जिफपॉम की प्रसिद्धी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इसे अमेरिकन सिंगर केटी पैरी ने 2014 में अपने वीडियो "डार्क हॉर्स" में शामिल किया था। बच्चों में इसकी दीवानगी को देखते हुए इसके खिलौने भी लॉन्च किए जा चुके हैं। यह इतना ज्यादा पॉप्युलर है कि इसे इंस्टाग्राम पर सबसे फेवरेट पेट के लिए निकलोडियन 'किड्स चॉइस अवॉर्ड' भी मिल चुका है।

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  2. जिफपॉम एक प्रोजेक्ट के शूट के लिए 12 लाख रुपए चार्ज करता है। इसके मालिक का कहना है कि इसकी फैन फॉलोइंग का देखकर समझा जा सकता है कि यह हमसे कितना ज्यादा कमाता होगा। जिफपॉम कई फिल्मों में काम कर चुका है। इनमें अ नाइट इन काउटाउन (2013), सेलेब रिएक्ट (2016) और जैकर सार्टोरियस : हिट या मिस (2016) शामिल हैं।

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  3. अमेरिका में इस प्रसिद्धी का आलम यह है कि इसके नाम पर 2017 में जिफ-डे की शुरुआत हुई थी। यह दिन इसकी उपलब्धियों को समर्पित किया गया है। दो पैरों से चलने वाला सबसे तेज जानवर का रिकॉर्ड भी जिफपॉम के नाम है। मई 2018 में फेसबुक को-फाउंडर मार्क जुकरबर्ग ने इसे इंस्टाग्राम के रियल्टी फिल्टर के लॉचिंग इवेंट पर आने के लिए आमंत्रित किया था। फैन फॉलोइंग के मामले में इसने मार्क जुकरबर्ग और बिल गेट्स को पीछे छोड़ दिया है।

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      jiffpom pomeranian dog left celebraties in terms of follower and earning 9 lakh by one post on instgram
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दिमाग समझ कर 2045 तक इंसान को अमर बनाया जा सकेगा, रशियन बिजनेसमैन इट्सकोव का दावा, तैयारी जारी


लाइफस्टाइल डेस्क. रशियन बिजनेसमैन मिट्री इट्सकोव का दावा है कि 2045 तक इंसानों को अमर बनाया जा सकेगा। इट्सकोव ने इसका पूरा प्लान भी पेश किया है। उनके मुताबिक, वह इंसानी दिमाग को कोड में तब्दील करके रोबोट में बदलेंगे। उनका कहना है कि 30 साल के अंदर इसे हकीकत में बदला जा सकेगा।

  1. इट्सकोव के मुताबिक, इंसान की पर्सनैलिटी को कृत्रिम मस्तिष्क में बदला जाएगा। जिसका इस्तेमाल रोबोट में किया जाएगा। इस तरह इंसान को अमर बनाया जा सकेगा। ऐसा करना संभव है। इसकी तैयारी 2011 में ही शुरु हो गई थी, प्रोजेक्ट 2045 तक पूरा कर लिया जाएगा। इसमें कई रशियन वैज्ञानिकों को भी शामिल किया गया है।

  2. इट्सकोव बड़े स्तर पर रिसर्च सेंटर का निर्माण कर रहे हैं जो सिर्फ रोबोट और सायबरनेटिक्स पर काम करेगा, ये दोनों विभाग मिलकर इंसान और मशीन के बीच तालमेल बिठाने का काम करेंगे। टीम का नाम रेकॉन रखा गया है जो इंसान के दिमाग को कम्प्यूटर में मैप करेगी। टीम के एक वैज्ञानिक के मुताबिक, 2035 तक इंसान की पर्सनैलिटी को समझकर आर्टिफिशियल ब्रेन तैयार कर लिया जाएगा।

  3. वैज्ञानिक के मुताबिक, इसके लिए मरने से कुछ समय पहले बुजुर्ग इंसान के ब्रेन की एनालिसिस की जाएगी। इसकी कोडिंग रोबोट में की जाएगी। टीम का दावा है, रोबोट की शक्ल जैसी आप चाहेंगे उसे वैसा ही तैयार किया जा सकेगा। टीम का मानना है कि इंसानी दिमाग बिल्कुल कंप्यूटर की तरह काम करता है, इसलिए इसे ट्रांसफर किया जा सकता है।

  4. इट्सकोव की इस योजना को विज्ञान के क्षेत्र में शोध कर रहे ज्यादातर वैज्ञानिकों का समर्थन मिला है। ये वैज्ञानिक पहले से ही शरीर के लिए ऐसे अंग तैयार कर रहे हैं तो दिमाग से नियंत्रित किए जा सकते हैं। इन्हें बायोनिक बॉडी पार्ट्स कहते हैं। हालांकि कुछ वैज्ञानिक इसे खुराफाती आइडिया बता रहे हैं।

  5. मेट्रो कम्प्यूटेशनल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. ग्रेस लिंडसे के मुताबिक, इसे तैयार करने में सबसे बड़ा रोड़ा दिमाग का है क्येांकि तकनीक उसे अभी पूरी तरह समझ ही नहीं पाई है। डॉ. ग्रेस लिंडसे कहते हैं, इंसानी दिगाग न्यूरॉन्स, ब्लड वेसल्स और कई तरह की कोशिकाओं का एक गुच्छा है। इसमें ऐसा बहुत कुछ जो अब तक समझा नहीं जा सका है।



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      Russian billionaire is confident that he can make humans IMMORTAL by 2045

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हिजाब पहनकर कुश्ती लड़ती है 19 साल की रेसलर, कहा- बंदिशें सपने पूरा करने से रोक नहीं सकतीं


कुआलालंपुर.मलेशिया की 19 साल की नॉर डायना हिजाब पहनकर प्रोफेशनल कुश्ती लड़ती हैं। पुरुषों के दबदबे वाले इस खेल में किसी महिला का हिजाब पहनकर रिंग में उतरना कट्टरपंथी मुल्लाओं के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। फीनिक्स नाम से मशहूर डायना दुनिया की पहली रेसलर हैं जो हिजाब पहनकर कुश्ती लड़ती हैं। हाल ही में डायना ने मलेशिया प्रो रेसलिंग (एमवाईपीडब्ल्यू) में हिस्सा लिया था। यह स्थानीय स्तर पर अमेरिका के वर्ल्ड रेसलिंग एंटरटेनमेंट (डब्ल्यूडब्ल्यूई) की तरह लोकप्रिय है।

  1. डायना महज 5 फीट 1 इंच लंबी हैं और उनका वजन 43 किलो है। इसके बावजूद वे रिंग गजब की मुस्तैदी दिखाती हैं और अपने विरोधी को पटखनी दे देती हैं। एक तरफ मुस्लिम कट्टर उनकी आलोचना कर रहे हैं तो सोशल मीडिया पर उनकी तारीफ हो रही है। डायना कहती हैं- मैं मुस्लिम हूं, हिजाब भी पहनती हूं, लेकिन इसके चलते कोई भी मुझे सपने पूरा करने से नहीं रोक सकता।

  2. नॉर डायना उनका सही नाम नहीं है। वह अपनी पहचान बताना नहीं चाहतीं। उन्हें लोग फीनिक्स नाम से भी जानते हैं। वह शर्मीली और मृदुभाषी हैं। इतना ही नहीं वे एक अस्पताल में काम करती हैं।

  3. डायना ने 2015 में रेसलिंग की ट्रेनिंग लेना शुरू किया था। वह बचपन से ही कुश्ती लड़ना चाहती थीं। ट्रेनिंग के कुछ हफ्ते बाद ही वह रिंग में उतर गईं।

  4. मलेशिया की आबादी 3 करोड़ 20 लाख है, जिसमें से 60% मलय मुस्लिम हैं। हालांकि ये लोग उदार माने जाते हैं लेकिन यहां का समाज अभी भी कई मायनों में रूढ़िवादी है। डायना को उनके परिवार का पूरा सपोर्ट है।

  5. हाल ही में उन्होंने प्रतियोगिता में 4 पुरुषों को मात दी। रेसलिंग की शुरुआत में डायना मास्क पहनकर रिंग में उतरती थीं, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। पिछले साल एक मैच हारने के बाद उन्होंने मास्क उतारकर लड़ने का फैसला किया।

  6. रेसलिंग भले ही तेजी से लोकप्रिय हो रही हो लेकिन दक्षिण पूर्व एशिया में यह अभी छोटे स्तर पर ही है। यहां अभी 30 फाइटर्स हैं और महीने में दो या तीन मैच ही होते हैं। इनमें दर्शकों की संख्या भी सीमित होती है।

  7. डायना के कोच अयेज शौकत फोंसेका कहते हैं- जैसे-जैसे उसकी शोहरत बढ़ रही है, हमारे पास कई महिलाओं के संदेश आ रहे हैं। ये सभी रेसलिंग जॉइन की इच्छुक हैं। डायना ने हर दीवार तोड़कर यह साबित किया है कि अगर वह कर सकती है तो कोई भी कर सकता है।



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      19 years old Hijab-wearing wrestler in malaysia
      19 years old Hijab-wearing wrestler in malaysia

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चाय की एक दुर्लभ किस्म ऑक्शन में 50000 रुपए प्रति किलो बिकी, बनाया रिकॉर्ड


गुवाहाटी (असम). असम की दुर्लभ मनोहारी गोल्ड टी अब तक की सबसे महंगी किस्म बन गई है।गुवाहाटी टी ऑक्शन सेंटर में मंगलवार को एक किलो मनोहारी गोल्ड टी 50000 रुपए में बिकी। पिछले साल चाय की यह किस्म 39000 रुपए प्रति किलो मेंबिकी थी।

इससे पहले 2018 में अरुणाचल प्रदेश के डोनी पोलो टी एस्टेटकी गोल्डन नीडल वैरायटी 40000 रुपए प्रति किलो में बिकी थी। गुवाहाटी टी ऑक्शन बायर एसोसिएशन के सचिव दिनेश बिनानी ने दावा किया कि सार्वजनिक ऑक्शन में किसी भी चाय की यह सबसे महंगीबोली है।

सिर्फ 5 किलो तैयार की गई
ऊपरी असम के डिब्रूगढ़ में मनोहारी टी एस्टेट के ऑनर राजन लोहिया ने बताया कि इसकिस्म की चाय सिर्फ 5 किलो ही बनाई गई। इसे पैदा करना बेहद कठिन काम है, क्योंकि मौसम ने साथ नहीं दिया। इसे छोटी कलियों से बनाया गया है न कि पत्तियोंसे। इस पर पिछले पांच साल से काम हो रहा है।इन्हें बेहद सावधानी से तोड़ा जाता है। यह बहुत मुलायम होती है। दुनिया में असम, दार्जिलिंग और नीलगिरी कीचाय की सबसे ज्यादा मांग रहती है।



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Assams rare Manohari Gold tea sold Rs 50000 kg in auction

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पालतू कुत्ते को सैर कराने के लिए दंपती ने छोड़ी नौकरी, 2 साल के टूर पर निकले


हैप्पी लाइफ डेस्क. लंदन के एक दंपती ने अपने पालतू कुत्ते को यूरोप घुमाने के लिए जॉब छाेड़ दी है। दो साल के टूर में वे आपने पालतू जानवर के साथ पीसा की मीनार, स्पेनिस बीच और वेनिस जैसे खूबसूरत टूरिस्ट प्लेसेस एंजॉय कर रहे हैं। दंपति को आपने पालतू जानवर से इतना लगाव है कि वे उसे दुनिया की सबसे बेहतरीन जगहों को दिखाना चाहते हैं। पालतू जानवर का नाम बॉर्डर टेरियर है और उम्र 10 साल है।

  1. पूर्वी सुसेक्स के रहने वाले दंपती जो पार्टिंग्टन (54) और नताशा कूपर (48) ने 2 साल की छुट्टी ली है। इस दौरान वे अपने पेट के साथ पूरा समय यादगार बनाने के लिए यूरोप टूर पर निकले हैं। नताशा कूपर के मुताबिक, जीवन बहुत छोटा है और इसे कम से कम तनाव और अधिक से अधिक खुशियों के साथ बिताना चााहिए। जीवन का सबसे खूबसूरत समय बिताने के लिए हम रिटायरमेंट तक इंतजार नहीं कर सकते।

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  2. नताशा कूपर के मुताबिक, हमारा पालतू जानवर बॉर्डर टेरियर बूढ़ा हो रहा है, इसलिए हम उसे सबसे खूबसूरत जगहों से रूबरू कराना चाहते हैं। अब उसे भी ट्रेन और बस में घूमने की आदत पड़ गई है। हमने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि ज्यादातर पालतू जानवरों को नई जगह जाना अच्छा लगता है। समुद्रतट पर उन्हें लोगों के साथ गेंद खेलना पसंद है।

  3. टूर की शुरुआत 2017 में हुई थी। बॉर्डर टेरियर अब तक फ्रांस, इटली, मोनाको, पुर्तगाल, स्पेन, वेल्स और आयरलैंड घूम चुका है। ज्यादातर जगहों पर कैंप में रुकने की व्यवस्था की थी। दंपती के पास बॉर्डर 8 हफ्ते की उम्र से है। दंपती के मुताबिक, इटली जानवरों घूमने के लिए सबसे बेहतरीन टूरिस्ट प्लेस है। अगले टूर में अब नीदरलैंड, डेनमार्क और स्वीडन जाने की योजना है।

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  4. नताशा कूपर के मुताबिक, हमारी प्राथमिकता कम बजट में बेहतर जीवन जीने की है, इसके लिए हम रिटायरमेंट तक इंतजार नहीं कर सकते। हम लोग कार से यात्रा करते हैं इसलिए बजट और सामान सीमित रखते हैं। अक्सर कई दिन एक ही कपड़े में बिताने पड़ते हैं।



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      couple quits their jobs to spend two years travelling Europe with their beloved border terrier Pete

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मच्चरों से बचने के लिए अपनाये ये घरेलु नुस्खे


हेल्थ डेस्क.मानसून के बाद सबसे बड़ी समस्या है मच्छर और उसके काटने से होनी वाली बीमारियों की। इस सीजन में मलेरिया, डेंगू व चिकुनगुनियां का खतरा बढ़ जाता है। इन बीमारियों से बचने के लिएकुछघरेलू उपायों अपना सकते हैं।

7 उपाय : मच्छर से दूर रहने में मदद करेंगे

कपूर जलाएं :कमरे में कपूर जला दें। 10 मिनट के लिए खिड़की दरवाजे बंद कर दें। सारे मच्छर भाग जाएंगे।

केरोसीन, नीम का तेल, कपूर :एक लैम्प में थोड़ा केरोसीन और कुछ बूंदें नीम के तेल की लें। 2 टिकिया कपूर मिला लें। इस लैम्प को जलाएं इससे मच्छर भाग जाएंगे।

नींबू और लौंग का घोल :जिस जगह ज्यादा मच्छर आते हैं वहां नींबू और लौंग के घोल का छिड़काव करें। मच्छर आसपास भी नहीं भटकेंगे।

नींबू और नीलगिरी का तेल :खाली मॉस्किटो रेपेलेंट की बोतल में नींबू का रस और नीलगिरी का तेल भरकर जलाएं।

नीम का तेल :नीम के तेल को हाथ-पैरों में लगाएं फिर नारियल के तेल में नीम का तेल मिलाकर दिया जलाएं।

सिट्रोनेला केंडल जलाएं :सिट्रोनेला एक के प्रकार की हर्ब है जिसकी गंध मच्छरों को पसंद नहीं आती है, इसलिए सिट्रोनेला केंडल को जलाने से वातावरण को बड़ी सरलता से मच्छर मुक्त किया जा सकता है।

सोते समय ये जरूर करें :सोते समय लहसुन की कच्ची कली चबाने से मच्छर नहीं काटते। इसके साथ ही लहसुन शरीर के रक्त संचार को भी बेहतर करता है।



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These home remedies to avoid meshes

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मिस राजस्थान 2019 के टैलेंट राउंड में दिखा 28 फाइनलिस्ट का उभरता व्यक्तित्व


अगर टैलेंट को निखारने के लिए सही और सटीक मार्ग दर्शन व मंच मिल जाए तो निश्चित रूप  किसी भी क्षेत्र की प्रतिभा को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।  ऐसे में मिस राजस्थान 2019 भी  विभिन्न प्रतिभाओं और टैलेंट से भरपूर लड़कियों को एक बेहतर मंच प्रदान कर रहा है। टेलेंट का ऐसा ही कुछ मेला 28 जुलाई, रविवार को मानसरोवर स्थित तक्षशिला बिजनेस स्कूल के ऑडिटोरियम में देखने को मिला। जहां फ्यूजन ग्रुप द्वार आयोजित मिस राजस्थान 2019 के टैलेंट राउंड में 28 फाइनलिस्ट गर्ल्स ने एक से बढ़कर एक क्रिएटिव टैलेंट पेश किए, जिसनें वहाँ के जजेज एवं ऑडियंस की खूब तालियां बटोरीं। इस टेलेंट राउंड में सभी फाइनलिस्ट्स नें सिंगिंग, डांसिंग, ड्रामा, पॉयट्री, पेंटिंग जैसे कई  टैलेंट से सबको अवगत कराया और अपनी प्रतिभाओं का लोहा मनवाया। इस इवेंट में जजेज के रूप में  मिस राजस्थान के पेट्रोन पवन टांक, दीपा माधुर,चित्रा शर्मा, मिसेज राजस्थान 2018 आकृति शर्मा, मिस्टर इंडिया आकाश चारण, स्टारडम के जी.एम. सचिन देव यादव, डांस गुरु मेडी सब मौजूद थे। इन सभी ज़्यूरी मेंबर्स नें इन 28 फाइनलिस्ट के टैलेंट का वो अनूठा मिश्रण बताया जो भविष्य में राजस्थान का नाम देश-विदेश में अवश्य रोशन करेंगी। इस कार्यक्रम का शुभारंभ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी नीरज.के.पवन, तक्षशिला की प्रेसिडेंट अनुराधा मेहता, किशोर मेहता एवं अनिता हाडा, समाज सेवी संजय जोशी ने दीप प्रज्ज्वलित कर के किया। सबसे गणेश वंदना के साथ मिस राजस्थान 2018 आंचल बोहरा, मिस राजस्थान 2017 सिमरन शर्मा ने अपनी टीम के साथ मनमोहक डांस प्रस्तुती दी। इस के बाद टॉप 28 फाइनलिस्ट गर्ल्स ने अपने-अपने टैलेंट का प्रर्दशन किया। मिस राजस्थान के डायरेक्टर योगेश मिश्रा एवं निमिषा मिश्रा ने बताया कि फ्यूजन ग्रुप द्वारा आयोजित मिस राजस्थान 2019 का ग्रेंड फिनाले 11 अगस्त को बिड़ला ऑडिटोरियम में भव्य रूप से किया जाना है जिसके तहत पहली बार इतिहास में एक माह के फिनाले मंथ के जरिए अलग अलग इवेंट्स के माध्यम से फाइनलिस्ट गर्ल्स की ग्रुमिंग की जा रही है।


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Emerging personality of 28 finalists showing in Talent round of Miss Rajasthan 2019

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